सविनय अवज्ञा आन्दोलन व भारत छोड़ो आन्दोलन का मध्यप्रदेश पर क्या प्रभाव पड़ा ?

उत्तर – सविनय अवज्ञा आन्दोलन का मध्यप्रदेश पर प्रभाव – पूर्ण स्वराज्य प्राप्ति के लिए गाँधीजी के नेतृत्व में ‘ सविनय अवज्ञा आन्दोलन ‘ का आरम्भ दांडी यात्रा से हुआ । इस आंदोलन का व्यापक प्रभाव । मध्यप्रदेश में भी देखने को मिला । इस आन्दोलन के तहत मध्यप्रदेश में महिलाओं द्वारा शराब की दुकानों , अफीम के अड्डों और विदेशी वस्त्रों की दुकानों पर धावा बोला गया । विदेशी वस्त्रों की होली जलाई गई । हिन्दुओं ने छुआछूत का परित्याग करने का संकल्प लिया । सरकारी स्कूल और कॉलेज छोड़ दिये गये और सरकारी कर्मचारियों ने अपनी नौकरियों से त्यागपत्र देकर इस आन्दोलन में सहयोग दिया । इस आन्दोलन में मध्यप्रदेश के सभी वर्ग के लोगों ने अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया । 

 

मध्यप्रदेश पर भारत छोड़ो आन्दोलन का प्रभाव – 

अगस्त 1942 में देश में राजनीतिक रंगमंच पर ‘ भारत छोड़ो ‘ नामक ऐतिहासिक आन्दोलन की शुरुआत हुई । 8 अगस्त को भारत छोड़ो प्रस्ताव बम्बई में होने वाली अखिल भारतीय कांग्रेस समिति ने पारित किया । 9 अगस्त को गाँधीजी सहित सारे बड़े नेता बन्दी बनाये जा चुके थे । ऐसी स्थिति में पंडित रविशंकर शुक्ल , द्वारकाप्रसाद मिश्र सहित मध्यप्रदेश के सभी बड़े नेता दमन के नग्न तांडव का सामना करने के लिए अपने प्रदेश वापस लौट आये । प्रत्येक नगर , तहसील और ग्राम में जनता ने अपने – आपको संगठित किया और संघर्ष का सूत्रपात किया । बैतूल जिले में आन्दोलन ने उग्र रूप धारण किया । पुलिस ने गोली चलाकर दमन का प्रयास किया । मंडला , सागर , होशंगाबाद , छिंदवाड़ा , जबलपुर आदि स्थानों पर जनता ने शासकीय कार्यालयों पर हमला कर अभिलेखों को विनष्ट किया , रेल , तार के परिवहन – साधनों को छिन्न – भिन्न कर दिया । पुलिस ने यहाँ दमनकारी नीति अपनाई । जबलपुर में सेठ गोविन्द दास बन्दी बना लिये गये । इसकी प्रतिक्रियास्वरूप आन्दोलन और तेज हुआ । अतः खण्डवा , खरगोन , नरसिंहपुर , दमोह , बालाघाट सहित सभी स्थानों पर नागरिकों ने बढ़ – चढ़कर आन्दोलन में भाग लिया । 

 

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