टिप्पणी लिखिए- ( क ) बरकतउल्लाह भोपाली ( ख ) चन्द्रशेखर आजाद ( ग ) कुँवर चैनसिंह ( घ ) टांट्या भील ( ङ ) वीरांगना रानी अवंतीबाई ( च ) ठाकुर रणमत सिंह ।

उत्तर- ( क ) बरकतउल्लाह भोपाली – 

स्वतंत्रता संग्राम के समय अनेक क्रान्तिकारी देश के बाहर रहकर आन्दोलन चला रहे थे जिनमें मध्यप्रदेश के मौलाना मोहम्मद बरकतउल्लाह ( भोपाल ) जैसे महान क्रान्तिकारी भी थे । उन्होंने अपने बेजोड़ साहस , देशभक्ति की अमिट लगन के साथ देश की आजादी के लिए कार्य किए । अमेरिका , जापान , काबुल में आजादी के लिए संघर्ष में उनकी भूमिका उल्लेखनीय रही । 

 

( ख ) चन्द्रशेखर आजाद – 

अमर शहीद चन्द्रशेखर आजाद का जन्म मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले के भाभरा ग्राम में हुआ । वे 14 वर्ष की अवस्था में असहयोग आन्दोलन से जुड़े । गिरफ्तार होने पर अदालत में उन्होंने अपना नाम ‘ आजाद ‘ पिता का नाम ‘ स्वतंत्रता ‘ और घर का पता ‘ जेलखाना ‘ बताया , तभी से चन्द्रशेखर के नाम के साथ ‘ आजाद ‘ जुड़ गया । ब्रिटिश सरकार के लिए आतंक का दूसरा नाम था चन्द्रशेखर आजाद । सम्पूर्ण उत्तर भारत में सशक्त क्रांति की ज्वाला धधकने तथा क्रांतिकारियों की एक पीढ़ी तैयार करने का श्रेय चन्द्रशेखर आजाद को जाता है । उत्तर भारत की पुलिस आजाद के पीछे पड़ी हुई थी । दल के कुछ साथी विश्वासघात कर चुके थे , जिससे वे चिन्तित और क्षुब्ध थे । आजाद बचते – छिपते इलाहाबाद जा पहुँचे 27 फरवरी , 1931 को वे अलफ्रेड पार्क में बैठे हुए थे । दिन के दस बज रहे थे कि पुलिस ने उन्हें घेर लिया । दोनों ओर से गोलियाँ चलने लगी । आजाद ने पुलिस के छक्के छुड़ा दिए और जब उनकी पिस्तौल में एक गोली बची थी , तब उसे अपनी कनपटी पर दागकर शहीद हो गए । 

 

( ग ) कुँवर चैनसिंह – 

नरसिंहगढ़ के राजकुमार चैनसिंह को अंग्रेजों की सीहोर छावनी के पोलिटिकल एजेंट मैडाक ने अपमानित किया । इस पर चैनसिंह ने अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष छेड़ दिया । सीहोर के वर्तमान तहसील चौराहे पर चैनसिंह तथा अंग्रेजों के बीच सन् 1824 में भीषण लड़ाई हुई । अपने मुट्ठीभर वीर साथियों सहित अंग्रेजी सेना से मुकाबला करते हुए चैनसिंह सीहोर के दशहरा बाग वाले मैदान में वीरगति को प्राप्त हुए । 

 

( घ ) टांट्या भील –

1857 के महासमर के बाद मध्यप्रदेश के पश्चिमी निमाड़ में टांट्या भील ब्रिटिश सरकार के लिए आतंक का पर्याय था । उसके साथी दोपिया और बिजनिया भी उसकी क्रांतिकारी गतिविधियों में सहभागी थे । वर्षों तक जनजीवन में घुले – मिले रहकर गुप्त ढंग से क्रान्तिकारी कार्यवाहियाँ करते रहकर उसने ब्रिटिश सरकार को कैंपा दिया था । धोखे और षड्यंत्रपूर्वक अंग्रेजों ने टांट्या को गिरफ्तार किया और नवम्बर 1886 में फाँसी पर लटका दिया । भीलों के बीच आज भी टांट्या प्रेरणास्वरूप मौजूद हैं । 

 

( ङ ) वीरांगना रानी अवंतीबाई – 

मंडला जिले के वीर सेनानियों में रामगढ़ की रानी ने भी अपनी मातृभूमि के प्रति जिस प्रेम तथा शौर्य का प्रदर्शन किया था , उसके कारण उन्हें हमारे देश की महानतम वीरांगनाओं में स्थान प्राप्त है । रामगढ़ मंडला जिले की पहाड़ियों में स्थित एक छोटा – सा नगर है । सन् 1850 में रामगढ़ के राजा लक्ष्मण सिंह की मृत्यु के उपरांत उनके एकमात्र पुत्र विक्रमजीत सिंह को मानसिक रूप से अस्वस्थ होने के कारण शासन के अयोग्य समझते हुए अंग्रेज सरकार ने शासन प्रबन्ध अपने हाथ में ले लिया । रानी ने अपना विरोध प्रकट करते हुए रामगढ़ से अंग्रेजों द्वारा नियुक्त अधिकारी को निकाल भगाया और अपने राज्य का शासन सूत्र अपने हाथ में ले लिया । अप्रैल 1858 को अंग्रेजों की सेना ने रामगढ़ पर दोनों ओर से आक्रमण किया । रानी और उनकी सेना ने अपनी शक्ति और स्थिति को देखते हुए किला खाली कर दिया और पास के जंगल में चली गई । जब वह घिर गई तो वीरंगनाओं की गौरवशाली परम्परा के अनुरूप बंदी होने की अपेक्षा मृत्यु को श्रेष्ठतर समझा और क्षणमात्र में अपने घोड़े से उतर कर अपने अंगरक्षक के हाथ से तलवार छीनकर उसे अपनी छाती में घोंप कर हँसते – हँसते मातृभूमि के लिए बलिदान दे दिया । 

 

( च ) ठाकुर रणमत सिंह –

1857 में सतना जिले के मनकहरी ग्राम के निवासी ठाकुर रणमत सिंह ने भी अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए थे । पोलिटिकल एजेंट की गतिविधियों से क्षुब्ध होकर ठाकुर रणमत सिंह ने अंग्रेजों के विरुद्ध झंडा उठाया । उन्होंने अपने साथियों के साथ चित्रकूट के जंगल में सैन्य संगठन का कार्य कर नागौद की अंग्रेजी रेजीडेन्सी पर हमला कर दिया । वहाँ के रेजीडेंट भाग खड़े हुए । ठाकुर रणमत सिंह ने कुछ दिन बाद नौगाव छावनी पर भी धावा बोला एवं बरौधा में अंग्रेज सेना की एक टुकड़ी का सफाया कर डाला । ठाकुर रणमत सिंह पर 2000 रु . का पुरस्कार घोषित किया गया । लम्बे समय तक अंग्रेजों से संघर्ष करने के पश्चात् जब रणमत सिंह अपने मित्र के घर विश्राम कर रहे थे , धोखे से उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और 1859 में फाँसी पर चढ़ा दिया ।

 

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