महाराजा हरीसिंह ने भारत सरकार से सहायता कब और क्यों माँगी थी ?

उत्तर- कश्मीर भारत की उत्तर – पश्चिम सीमा पर स्थित होने के कारण भारत और पाकिस्तान दोनों को जोड़ता है । कश्मीर के राजा हरीसिंह ने अपनी रियासत जम्मू – कश्मीर को स्वतंत्र रखने का निर्णय लिया , किन्तु जब 22 अक्टूबर सन् 1947 को उत्तर – पश्चिम सीमा प्रान्त के कबायलियों और अनेक पाकिस्तानियों ने कश्मीर पर आक्रमण किया तो कश्मीर के शासक ने आक्रमण – कारियों से अपने राज्य को बचाने के लिए भारत सरकार से सैनिक सहायता माँगी , साथ ही कश्मीर को भारत में सम्मिलित करने की प्रार्थना की । 

 

भारत सरकार ने इस प्रस्ताव को स्वीकार किया और भारतीय सेनाओं को कश्मीर भेज दिया । संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद् ने कश्मीर समस्या के समाधान के लिए एक दल बनाया , इस दल ने मौके पर जाकर स्थिति का अध्ययन किया । दोनों पक्ष लम्बी वार्ता के बाद 1 जनवरी , 1949 को युद्ध विराम के लिए सहमत हो गए । कश्मीर के विलय का निर्णय जनमत संग्रह के आधार पर होना था । जवाहरलाल नेहरू जनमत संग्रह की अपनी वचनबद्धता का पालन करना चाहते थे , परन्तु पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्रसंघ की शर्तों का उल्लंघन कर अधिकृत क्षेत्र ( आजाद कश्मीर ) से अपनी सेनाएँ नहीं हटाई थीं । कबायली भी वहीं बने हुए थे । पं . नेहरू ने जब तक पाकिस्तान अपनी सेना नहीं हटा लेता , तब तक जनमत संग्रह से मना किया । 

 

कश्मीर के प्रश्न पर सोवियत संघ ने भारत का समर्थन किया । इस समर्थन से भारत की स्थिति मजबूत हो गयी । 6 फरवरी , 1954 को कश्मीर की विधान सभा ने एक प्रस्ताव पारित कर जम्मू , कश्मीर राज्य का विलय भारत में करने की सहमति प्रदान की । भारत सरकार ने 14 मई , 1954 को संविधान में संशोधन कर अनुच्छेद 370 , के अंतर्गत जम्मू – कश्मीर को विशेष दर्जा प्रदान किया । 26 जनवरी , 1957 को जम्मू – कश्मीर का संविधान लागू हो गया । इसके साथ ही जम्मू – कश्मीर भारतीय संघ का एक अभिन्न अंग बन गया । इसके बाद पाकिस्तान निरन्तर कश्मीर का प्रश्न उठाकर वहाँ राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने का प्रयास करता रहा है । 

 

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