सर्वोच्च न्यायालय की शक्तियों का वर्णन कीजिए ?

उत्तर- भारत के सर्वोच्च न्यायालय की शक्तियाँ निम्नानुसार हैं 

 

1. प्रारम्भिक क्षेत्राधिकार- 

ऐसे विवाद , जो देश के अन्य न्यायालयों में नहीं जाते , केवल सर्वोच्च न्यायालय में ही प्रस्तुत होते हैं ।

2. राज्यों के मध्य विवाद- 

( 1 ) संघीय सरकार एवं एक या एक से अधिक राज्यों के बीच 

( 2 ) ऐसा विवाद , जिसमें एक ओर संघीय शासन व एक या अधिक राज्य हों तथा दूसरी और एक या अधिक राज्य हों ।

( 3 ) दो या दो से अधिक राज्यों के बीच विवाद । 

( ख ) मौलिक अधिकारों से सम्बन्धित विवाद- नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए सर्वोच्च न्यायालय को समुचित कार्रवाई करने की शक्ति प्राप्त है । 

 

3. अपीलीय क्षेत्राधिकार- 

सर्वोच्च न्यायालय देश का सबसे बड़ा अंतिम अपीलीय न्यायालय है । उस क्षेत्राधिकार के तहत सर्वोच्च न्यायालय को निम्न अपील सुनने का अधिकार है । 

( क ) संवैधानिक अपीलें 

( ख ) दीवानी अपीलें 

( ग ) फौजदारी अपीलें 

( घ ) विशेष अपीलें 

 

4. परामर्शदात्री क्षेत्राधिकार- 

संविधान की धारा 143 के अनुसार यदि राष्ट्रपति किसी संवैधानिक या कानूनी प्रश्न पर सर्वोच्च न्यायालय से परामर्श लेना चाहे तो राष्ट्रपति को परामर्श दे सकता है । न्यायिक पुनरावलोकन सम्बन्धी क्षेत्राधिकार- सर्वोच्च न्यायालयों को संसद एवं विधानसभाओं द्वारा निर्मित विधियों एवं प्रशासकीय निर्देशों की वैधता को जाँचने का अधिकार है । इस अधिकार के द्वारा सर्वोच्च न्यायालय विधियों या नियमों की वैधता की जाँच करता है कि ये नियम या विधियाँ संविधान के अनुसार हैं , या नहीं । अपनी इस शक्ति के द्वारा सर्वोच्च न्यायालय विधान की रक्षा करता है । 

 

5. अभिलेख न्यायालय- 

सर्वोच्च न्यायालय अभिलेख न्यायालय भी है अर्थात् उसके समस्त निर्णय एवं अभिलेख लिखित रहते हैं तथा प्रकाशित किए जाते हैं तथा इन्हें अभिलेख के रूप में रखा जाता है । अधीनस्थ न्यायालयों के सम्मुख इन निर्णयों को नजीर ( उदाहरण ) के रूप में प्रस्तुत किया जाता है तथा अधीनस्थ न्यायालय इन नजीरों को मानते हैं 

 

6. अन्य कार्य – 

सर्वोच्च न्यायालय उपर्युक्त अधिकारों के अलावा ये कार्य भी करता है- 

( अ ) अपने अधीनस्थ न्यायालयों का निरीक्षण एवं जाँच । 

( ब ) अपने तथा अपने अधीनस्थ कर्मचारियों व अधि कारियों की सेवा – शर्तों का निर्धारण व उन्हें पदोन्नत तथा पदच्युत करना । 

( स ) न्यायालय की अवमानना करने वाले किसी भी व्यक्ति को दण्डित करने की शक्ति । 

 

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