भारत के नियोजन की सफलताएँ एवं असफलताएँ लिखिए ।

उत्तर- भारत में नियोजन से प्रमुख सफलताएं निम्नलिखित हैं 

 

1. राष्ट्रीय एवं प्रतिव्यक्ति आय में वृद्धि- 

भारत की राष्ट्रीय आय वर्ष 1950-51 में वर्तमान कीमतों पर केवल 9142 करोड़ रु . थी , जो वर्ष 2005-06 में बढ़कर 28,46,762 करोड़ रु . हो गई । इसी प्रकार प्रतिव्यक्ति आय इस अवधि में 255 रु . से बढ़कर 25,716 हो गई । इस प्रकार स्पष्ट है कि नियोजन की अवधि में राष्ट्रीय एवं प्रति व्यक्ति आय में तेजी से वृद्धि हुई है । 

 

2. बचत व विनियोग दर में वृद्धि- 

आर्थिक विकास हेतु राष्ट्रीय आय के कुछ भाग को विनियोजित किया जाता है । इसके लिए प्रत्येक योजना में बचत व विनियोग के ऊँचे लक्ष्य निर्धारित किये गये थे , जिन्हें लगभग प्राप्त भी कर लिया गया है । चालू मूल्यों पर 1950-51 में सकल बचत व विनियोग दरें सकल राष्ट्रीय उत्पाद का केवल 8.9 व 8.7 प्रतिशत थीं , जो कि बढ़कर 2005-06 में क्रमशः 32.4 व 33.8 प्रतिशत हो गयी ।

 

3. कृषि क्षेत्र में विकास- 

आर्थिक नियोजन के परिणामस्वरूप कृषि उत्पादन में व्यापक वृद्धि हुई है । खाद्यान्नों का उत्पादन , जो 1950-51 में 508 लाख टन था , वह बढ़कर 2005-06 में 2083 लाख टन हो गया है । इस काल में हरित क्रान्ति के परिणामस्वरूप उन्नत बीजों , रासायनिक खादों , कीटनाशक दवाओं , सिंचाई सुविधाओं आदि को अपनाया गया । साथ ही कृषि क्षेत्र में आधारित संरचना का भी विकास हुआ है । 

 

4. विद्युत् उत्पादन में वृद्धि- 

नियोजन काल में विद्युत उत्पादन में पर्याप्त वृद्धि हुई । विद्युत उत्पादन , जो सन् 1950-51 में 5.1 अरब किलोवाट था , सन् 2005-06 में बढ़कर 623.2 अरब किलोवाट हो गया । योजना काल में देश में विद्युत उत्पादन में वृद्धि के साथ – साथ उपयोग में भी वृद्धि हुई । 1950-51 में प्रतिव्यक्ति विद्युत खपत 2.4 किलोवाट थी , जो वर्तमान में बढ़कर 83.6 किलोवाट हो गई । इसी प्रकार मार्च 2005 के अन्त तक देश के 85 प्रतिशत गाँवों का विद्युतीकरण किया जा चुका था । 

 

5. परिवहन एवं संचार क्षेत्र में वृद्धि- 

योजना में परिवहन एवं संचार साधनों में काफी प्रगति हुई । 1950-51 में देश में 53.6 हजार किलोमीटर रेलमार्ग था , जो सन् 2005-06 में बढ़कर 63.3 हजार किलोमीटर हो गया । इसी प्रकार सन् 1950-51 में सड़कों की कुल लम्बाई 4.00 लाख किलोमीटर थी , जबकि आज इसकी लम्बाई 33.2 लाख किलोमीटर हो गई है । इसी प्रकार जल परिवहन एवं वायु परिवहन के क्षेत्र में तेजी से विस्तार हुआ है । जहाँ तक संचार क्षेत्र का प्रश्न है , 1950-51 में देश में कुल 36,000 डाकघर थे , जिनकी संख्या आज बढ़कर 1,55,516 हो गयी है । 

 

6. शिक्षा – 

योजनाओं के प्रारम्भ होने के समय देश में 27 विश्वविद्यालय थे , लेकिन आज इनकी संख्या 389 है । 1950-51 में देश की साक्षरता दर 16.6 प्रतिशत थी , जो 2001 में बढ़कर 64.8 प्रतिशत हो गयी । इसी प्रकार देश में प्राथमिक स्कूलों की संख्या 1950-51 में 2.3 लाख थी , जो आज बढ़कर 7,10 , लाख से अधिक हो गयी है । 1950-51 में 6 से 11 वर्ष तक उम्र के 42.6 प्रतिशत बच्चे स्कूल जाते थे , लेकिन आज यह प्रतिशत बढ़कर 98.31 हो गया है 1950-51 में 11 से 14 वर्ष की उम्र के 12.7 प्रतिशत बच्चे पढ़ने जाते थे , जिनका प्रतिशत आज बढ़कर 62.49 हो गया है । 1950-51 में 578 स्नातक तथा स्नातकोत्तर महाविद्यालय थे , लेकिन आज इनकी संख्या 46,796 है । 

 

7. स्वास्थ्य – 

देश की स्वास्थ्य सेवाओं में भी योजना अवधि में विशेष प्रगति हुई । 1950-51 में अस्पतालों की कुल संख्या 9209 हजार थी , जो कि बढ़कर वर्ष 2005 में 27,770 लाख हो गयी । इसी – प्रकार देश में पंजीकृत डॉक्टरों की संख्या 1950-51 में 61.8 हजार थी , जो बढ़कर वर्ष 2005 में 6.56 लाख हो गई है । स्वास्थ्य सेवाओं में वृद्धि के परिणामस्वरूप औसत जीवन काल , जो 1950-51 में 32.1 वर्ष था , 2006 में बढ़कर 65.4 वर्ष हो गया है । 

 

भारत में नियोजन की प्रमुख असफलताएँ निम्नलिखित हैं- 

 

1. प्रतिव्यक्ति आय में धीमी प्रगति- 

भारत में आर्थिक नियोजन के बाद भी प्रतिव्यक्ति आय में वृद्धि बहुत ही धीमी गति से हुई है । भारत में लगभग 21 प्रतिशत जनसंख्या अभी भी गरीबी की रेखा के नीचे जीवन यापन कर रही है । 

 

2. क्षेत्रीय असन्तुलन- 

नियोजन के फलस्वरूप देश में क्षेत्रीय असन्तुलन कम होना चाहिए था लेकिन उसमें कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ है । आज भी उत्तरप्रदेश , उड़ीसा तथा बिहार आदिराज्य पिछड़े हुए हैं , जबकि महाराष्ट्र , तमिलनाडु , पश्चिम बंगाल , पंजाब , हरियाणा आदि राज्य तुलनात्मक रूप से विकसित श्रेणी में हैं । 

 

3. मूल्य वृद्धि – 

नियोजन अवधि में मूल्यों में निरन्तर वृद्धि होती जा रही है । थोक मूल्य सूचकांक 1993-94 के आधार पर बढ़कर दिसम्बर 2006 में 207.9 हो गया । अनुमान है कि नियोजन अवधि कीमतों में लगभग 27 गुनी से अधिक की वृद्धि हुई है । 

 

4. बेरोजगारी में वृद्धि- 

आर्थिक नियोजन का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य बेरोजगारी में कमी करना था , लेकिन हर योजना के अन्त में बेरोजगारी बढ़ती ही गयी है जहाँ प्रथम योजना के प्रारम्भ में 33 लाख व्यक्ति बेरोजगार थे । वहीं वर्तमान में लगभग 4 करोड़ व्यक्तियों के बेरोजगार होने का अनुमान है ।

 

5. आय व धन की असमानता में वृद्धि- 

आर्थिक नियोजन का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य धन के केन्द्रीयकरण को समाप्त कर आर्थिक समानता को बढ़ाना रहा , लेकिन नियोजन के बावजूद धनी व्यक्ति अधिक धनी व गरीब और अधिक गरीब होता गया है । 

 

6. सार्वजनिक उद्यमों की असफलता- 

देश में सार्वजनिक क्षेत्र में उद्यमों की संख्या 242 है । इनमें से अनेक उपक्रम हानि में चल रहे हैं । अतः सार्वजनिक उपक्रम आशा के अनुरूप परिणाम देने में असमर्थ रहे हैं । 

 

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