मुद्रा के विकास पर एक लेख लिखिए ?

उत्तर – आज जो मुद्रा का स्वरूप देखने को मिलता है , उसके विकास का एक लम्बा इतिहास है । प्राचीन युग का मनुष्य भी अपनी आवश्यकता की सभी वस्तुओं का उत्पादन स्वयं नहीं कर सकता था । फलतः उसने अपने द्वारा उत्पादित वस्तु का दूसरे व्यक्तियों द्वारा उत्पादित वस्तुओं से बदलना प्रारम्भ किया । इसे ‘ वस्तु विनिमय ‘ के रूप में जाना जाता है । अदला – बदली की यह प्रणाली काफी समय तक चलती रही । समय के साथ – साथ वस्तु – विनिमय प्रणाली की अनेक कठिनाइयाँ सामने आई । 

 

इस प्रणाली में सबसे बड़ी कठिनाई यह थी कि कोई ऐसा व्यक्ति मिले , जो एक व्यक्ति द्वारा उत्पादित वस्तु को स्वीकार करे एवं बदले में उसकी आवश्यकता की वस्तु को उपलब्ध कराए । फलतः ऐसी वस्तुओं की खोज की गई , जो सभी व्यक्तियों को स्वीकार हो । प्रारम्भ में गाय , बकरी , सीप , मछली के कार्यो , जानवरों की खाल , हाथी दाँत आदिको मुद्रा की इकाई के रूप में अपनाया गया । किन्तु इस व्यवस्था से भी अनेक कठिनाइयाँ सामने आई , जैसे- प्रमाणीकरण का अभाव , संचय की कठिनाई आदि । इससे धातुओं के उपयोग की प्रेरणा मिली फलतः धातु का सिक्कों के रूप में उपयोग होने लगा , जिससे अनेक समस्याएँ हल हो गई । राजा एवं महाराजाओं ने जालसाजी को रोकने के लए इन सिक्कों की तौल , आकार , रंग – रूप आदि को निर्धारित किया तथा इन सिक्कों की प्रमाणिकता के लिए उन पर सरकार की मुहर लगाई जाने लगी । 

 

सोना , चाँदी , ताँबा आदि धातुओं का उपयोग व्यापक रूप से सिक्कों के रूप में किया गया । समय के साथ – साथ धातु मुद्रा की कठिनाइयाँ सामने आने लगीं । फलतः बैंकिंग व्यवस्था के साथ साथ पत्र मुद्रा का विकास हुआ । पत्र मुद्रा का विस्तार अनेक रूपों में हुआ , जैसे – लिखित प्रमाण – पत्र , प्रतिनिधि कागजी मुद्रा , परिवर्तनीय कागजी मुद्रा , अपरिवर्तनीय कागजी मुद्रा आदि । केन्द्रीय बैंक एवं व्यापारिक बैंक के विस्तार के साथ – साथ चैक , हुण्डी , ड्राफ्ट के रूप में साख मुद्राओं का विकास हुआ । वर्तमान में क्रेडिट कार्ड एवं ए.टी.एम. कार्ड के रूप में प्लास्टिक मुद्रा भी चलन में है । इस प्रकार स्पष्ट है कि वर्तमान में हम जो मुद्रा देख रहे हैं , उसका एक लम्बा इतिहास है । 

 

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