भारत में उपभोक्ता आन्दोलन की विवेचना कीजिए ?

उत्तर- भारत में उपभोक्ता आन्दोलन- 

भारत में उपभोक्ता आन्दोलन का प्रारम्भ उपभोक्ताओं के असन्तोष के कारण हुआ है । उपभोक्ताओं में असन्तोष के अनेक कारण थे , जैसे- खाद्य पदार्थों की कमी , जमाखोरी , कालाबाजारी , मिलावट आदि । इन समस्याओं से निपटने के लिए सबसे पहले सन् 1955 में ‘ आवश्यक वस्तु अधिनियम ‘ पारित किया गया । इस अधिनियम के द्वारा आवश्यक वस्तुओं के उत्पादन , वितरण , मूल्य एवं आपूर्ति को नियंत्रित करने का प्रयास किया गया । इसके बाद वस्तुओं की नाप – तौल को व्यवस्थित करने के लिए सन् 1976 में बाट एवं माप मानक अधिनियम पारित किया गया । तदुपरान्त सन् 1986 में भारत सरकार द्वारा ‘ उपभोक्ता सुरक्षा अधिनियम ‘ पारित किया गया । यह अधिनियम कोपरा ( COPRA ) के नाम से प्रसिद्ध है । 

 

इस कानून का मुख्य उद्देश्य उपभोक्ता की शिकायतों को तुरन्त निपटाने तथा कानूनी प्रक्रिया को सरल बनाना है । कोपरा के अन्तर्गत उपभोक्ता विवादों के निपटारे के लिए जिला , राज्य एवं राष्ट्रीय स्तरों पर एक त्रिस्तरीय न्यायिक तंत्र स्थापित किया गया है । जिला स्तर का न्यायालय 20 लाख तक के दावों से सम्बन्धित मुकदमों पर विचार करता है । राज्य स्तरीय अदालतों में 20 लाख से एक करोड़ तक के मामलों की सुनवाई की जाती है । राष्ट्रीय स्तर की अदालतें एक करोड़ से ऊपर की दावेदारी से सम्बन्धित मुकदमों को देखती है । उपभोक्ता सुरक्षा अधिनियम ने भारत में उपभोक्ता आन्दोलन को व्यापक बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है । 

 

ये अदालतें उपभोक्ताओं के विवादों को निपटाने के साथ – साथ उनका मार्गदर्शन भी करती हैं । भारत सरकार के उपभोक्ता मामलों के विभाग ‘ ने भी उपभोक्ता को जागरूक बनाने के लिए अनेक योजनाएं चलाई हैं , जैसे- देश के प्रत्येक जिले में उपभोक्ता संगठन एवं स्कूलों में उपभोक्ता क्लबों की स्थापना करना । उपभोक्ता अधिकारों के प्रति जागरुकता लाने के लिए विभिन्न स्तरों पर जागृति शिविरों का भी आयोजन किया जाता है । 24 दिसम्बर को भारत में राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस के रूप में मनाया जाता है ।

 

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