टिप्पणी लिखिए ( क ) तात्या टोपे ( ख ) रानी लक्ष्मीबाई ( ग ) नाना साहब ( घ ) हजरत महल ।

उत्तर- 

( क ) तात्या टोपे- 

तात्या टोपे , 1857 के उन वीर सेनानियों में से एक थे , जिसकी आरम्भिक निष्ठा पेशवा परिवार के प्रति थी । तात्या टोपे अपनी देशभक्ति , वीरता , व्यूह रचना , शत्रु को चकमा देने की कुशलता , साधनहीनता की स्थिति में युद्ध जारी रखने का साहस , निर्भीकता और गुरिल्ला पद्धति से युद्ध के लिए जाने जाते हैं । पेशवा नाना साहेब की ओर से युद्ध का समस्त उत्तरदायित्व उनके स्वामिभक्त तात्या टोपे पर ही था । झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के साथ ग्वालियर पर अधिकार करने में तात्या टोपे का बड़ा योगदान रहा । रानी लक्ष्मीबाई की मृत्यु के पश्चात् तात्या ने निरन्तर गुरिल्ला युद्ध के माध्यम से मध्यभारत और बुन्देलखण्ड में अंग्रेजों को कड़ी टक्कर दी । अंग्रेजों ने तात्या टोपे को बन्दी बनाने के लिए कुटिलता और विश्वासघात की नीति का पालन किया । अंततः तात्या टोपे को आरौन ( जिला गुना ) के जंगल में विश्राम करते समय बन्दी बनाया गया । अंग्रेजों ने 18 अप्रैल , 1859 को तात्या टोपे को शिवपुरी में फाँसी दी । 

 

( ख ) रानी लक्ष्मीबाई- 

अंग्रेजों ने 1854 में झाँसी के राजा गंगाधर राव की मृत्यु के पश्चात् उनकी रानी लक्ष्मीबाई के दत्तक पुत्र को झाँसी की गद्दी का उत्तराधिकारी मानने से इंकार कर दिया तथा झाँसी को अंग्रेजी साम्राज्य में विलय कर लिया । इसका विरोध करते हुए रानी लक्ष्मीबाई ने ब्रिटिश सेना से भयंकर टक्कर ली । सर ह्यूरोज द्वारा पराजित होने पर वह कालपी आयीं व तात्या टोपे की मदद से ग्वालियर पर अधिकार किया । अंग्रेज सेनापति यूरोज ने ग्वालियर आकर किले को घेर लिया । 17 जून , 1858 को झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई बड़ी वीरता से सैनिक वेश में संघर्ष करते हुई वीरगति को प्राप्त हुई । उनकी वीरता की गाथाएँ आज भी देशवासियों को प्रेरित करती हैं । 

 

( ग ) नाना साहेब- 

नाना साहेब , संग्राम के अन्य महत्वपूर्ण नेता थे । नाना साहेब भूतपूर्व पेशवा बाजीराव द्वितीय के दत्तक पुत्र थे और बिठूर में निवास करते थे । पेशवा की मृत्यु के उपरान्त लार्ड डलहौजी ने नाना साहेब को पेंशन एवं उपाधि देने से वंचित कर दिया था । अतः नाना ने अपने स्वामिभक्त सैनिकों की मदद से अंग्रेजों को कानपुर से निकाल दिया और स्वयं को पेशवा घोषित कर दिया । तात्या टोपे और अजीमुल्लाह नाना साहेब के स्वामिभक्त सेनानायक थे । 

 

( घ ) बेगम हजरत महल – 

बेगम हज़रत महल अवध के नवाब की विधवा थी । संग्राम आरम्भ होने पर 4 जून , 1857 को अवध की बेगम ने संग्राम को प्रोत्साहन दिया और उसका संचालन किया । उसने अपने युवा पुत्र बिराजिस कादर को अवध का नवाब घोषित कर दिया तथा लखनऊ स्थित : ब्रिटिश रेजीडेन्सी पर आक्रमण किया । बेगम हजरत महल ने शाहजहाँपुर में भी संग्राम का नेतृत्व किया । पराजित होने के पश्चात् बेगम सुरक्षा की दृष्टि से नेपाल चली गयीं । 

 

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