किन परिस्थितियों में भारत का विभाजन किया गया ? कांग्रेस ने भारत विभाजन क्यों स्वीकार किया ?

उत्तर- द्वितीय विश्वयुद्ध में भारतीयों का सहयोग प्राप्त करने की इच्छा , युद्ध के मोर्चों पर मित्र राष्ट्रों की स्थिति खराब होना तथा विश्व जनमत के दबाव के कारण ब्रिटिश सरकार ने क्रिप्स को भारत भेजा । क्रिप्स ने 22 मार्च , 1942 को भारत पहुँचकर सभी प्रमुख राजनीतिक दलों से विचार – विमर्श किया । भारत के वैधानिक गतिरोध को दूर करने के लिए क्रिप्स अपने साथ निश्चित प्रस्ताव लाया था । ये प्रस्ताव दो भागों में थे- युद्ध के समय लागू होने वाले तथा युद्ध के बाद लागू होने वाले प्रस्ताव । क्रिप्स के प्रस्ताव कांग्रेस को सन्तुष्ट नहीं कर सके , क्योंकि इसमें युद्ध के बाद औपनिवेशिक स्वराज्य देने की बात कही गयी थी , जबकि कांग्रेस की मांग पूर्ण स्वराज्य की थी । लीग इसलिए असन्तुष्ट थी , क्योंकि इसमें उनकी पाकिस्तान की मांग को स्पष्ट रूप से स्वीकार नहीं किया गया था । 

 

कांग्रेस एवं लीग के अतिरिक्त सिखों , हिन्दू महासभा , दलितों तथा अन्य ने भी प्रस्तावों से असहमति जताई । लार्ड बॉवेल अक्टूबर , 1943 में गवर्नर जनरल बनकर भारत आए । बावेल भारत के वैधानिक गतिरोध को हल करना चाहता था । बावेल ने जो योजना प्रस्तुत की , उस पर विचार करने के लिए 25 जून , 1945 को भारतीय नेताओं का एक सम्मेलन शिमला में बुलाया गया । सम्मेलन में तय हुआ कि केन्द्रीय मंत्रिमंडल मिला – जुला होगा तथा उसमें 14 मंत्री होंगे । इसमें 5 कांग्रेस , 5 लीग तथा 4 बायसराय द्वारा मनोनीत होंगे । वायसराय ने कांग्रेस तथा लीग को 8 से 12 नाम देने को कहा । कांग्रेस ने जो सूची वायसराय को भेजी , उसमें दो सदस्य मुसलमान थे । परन्तु जिन्ना चाहते थे कि मुसलमान प्रतिनिधि लीग के सदस्यों में से ही लिये जाएँ । इसका कारण यह था कि जिन्ना कांग्रेस को हिन्दू संस्था सिद्ध करके , लीग को भारतीय मुसलमानों की एकमात्र प्रतिनिधि संस्था होने का दावा करना चाहते थे । लीग के असहयोग के कारण शिमला सम्मेलन असफल हुआ । जिन्ना के हठ एवं दुराग्रह के समक्ष बावेल ने हथियार डाल दिये । 

 

माउण्टबेटन योजना और भारत का विभाजन –

23 मार्च , 1947 को लार्ड बावेल के स्थान पर लार्ड माउण्टबेटन नया गवर्नर जनरल बनकर भारत आया । ब्रिटिश सरकार ने उन्हें पूर्ण अधिकार देकर भारत भेजा था , जिससे वे कैबिनेट योजना के अनुसार गठित संविधान सभा के माध्यम से भारतीयों को शासन – सत्ता सौंप सकें । कांग्रेस के नेता विभाजन नहीं चाहते थे , परन्तु लीग विभाजन के अलावा और कोई बात करने को .. तैयार नहीं थी । अंततः साम्प्रदायिक पागलपन के ज्वार के समक्ष विवश होकर कांग्रेस को भारत विभाजन की सहमति देना पड़ी । अन्तरिम सरकार की अपंगता , साम्प्रदायिक हिंसा का ज्वार , मुस्लिम लीग की हठधर्मिता , कांग्रेस नेताओं की विवशता तथा ब्रिटिश कूटनीति के परिणामस्वरूप भारत का विभाजन हुआ । 

 

 

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