भारत में मिट्टियों के विभिन्न प्रकार, उनकी विशेषताएँ एवं वितरण को स्पष्ट कीजिए ।

भारत में मिट्टियों को निम्नानुसार वर्गीकृत किया जा सकता है

 

1. जलोढ़ मिट्टी- 

इसे काँप , दोमट , कछारी या चीका मिट्टी कहा जाता है । यह मिट्टी हल्के भूरे रंग की होती है । इस मिट्टी में पोटाश और चूना पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है । भारत में यह मिट्टी हिमालय से निकलने वाली तीन बड़ी नदियों – सतलज , गंगा एवं ब्रह्मपुत्र और उनकी सहायक नदियों द्वारा बहाकर लाई गई है । यह मिट्टी हिमालय से निकलने वाली सतलज , गंगा तथा ब्रह्मपुत्र और उनकी सहायक नदियों की द्रोणी में स्थित पंजाब , हरियाणा , उत्तरप्रदेश , उत्तराखण्ड , बिहार , पश्चिमी बंगाल , असम , मेघालय तथा उत्तर – पूर्वी राजस्थान में मिलती है । 

 

2. काली या रेगड़ मिट्टी- 

इस मिट्टी को रेगड़ या कपास वाली काली मिट्टी भी कहते हैं । इसका रंग गहरा काला और कणों की बनावट बारीक व घनी होती है , इसमें अधिक देर तक जल एवं नमी ठहर सकती है । इस मिट्टी में चूना , पोटाश , मैग्नीशियम , एल्युमीनियम तथा लोहा पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है । इसमें रासायनिक तत्वों की मात्रा अधिक होती है । सूख जाने पर इसमें दरारें पड़ जाती हैं । इन दरारों से इसके वायु मिश्रण में सहायता मिलती है । इसे स्वतः जुताई वाली मिट्टी भी कहा जाता है । यह मिट्टी महाराष्ट्र के विदर्भ , खानदेश एवं मराठवाड़ा , मध्यप्रदेश में , उड़ीसा के दक्षिणी भाग , कर्नाटक के उत्तरी जिलों , आन्ध्रप्रदेश के दक्षिणी और तटवर्ती भाग , तमिलनाडु के भाग तथा राजस्थान के कुछ जिलों तथा उत्तरप्रदेश के बुन्देलखण्ड संभाग में मिलती है । 

 

3. लाल मिट्टी- 

यह मिट्टी शुष्क और तर जलवायु में प्राचीन रवेदार और परिवर्तित चट्टानों के टूट – फूट से बनती है । ताप्ती नदी घाटी में पहाड़ियों के ढालों पर लगातार अधिक गर्मी पड़ने से चट्टानों के टूटने पर उसमें मिला हुआ लोहा मिट्टी में फैल जाता है , जिससे इसका रंग लाल हो गया है । यह मिट्टी अत्यन्त रन्ध्रयुक्त है । यह अत्यन्त बारीक तथा गहरी होने पर ही उपजाऊ होती है । यह मध्यप्रदेश , झारखण्ड , पश्चिमी बंगाल , मेघालय , नागालैण्ड , उत्तरप्रदेश , राजस्थान , तमिलनाडु तथा महाराष्ट्र में मिलती है । 

 

4. लैटेराइट मिट्टी- 

इस मिट्टी का निर्माण ऐसे भागों में हुआ है , जहाँ शुष्क व तर मौसम बारी – बारी से होता है । यह मिट्टी लैटेराइट चट्टानों की टूट – फूट से बनती है । यह मिट्टी चौरस उच्च भूमियों पर मिलती है । इस में चूना , फास्फोरस और पोटाश कम मिलता है , किन्तु बनस्पति का अंश पर्याप्त होता है । लेटराइट मिट्टी तीन प्रकार की होती है- ( 1 ) गहरी लाल लैटेराइट मिट्टी , ( 2 ) सफेद लैटेराइट मिट्टी , ( 3 ) भूगर्भीय जल वाली लैटेराइट मिट्टी । वह तमिलनाडु के पहाड़ी भागों और निचले क्षेत्रों , कर्नाटक के कुर्ग जिले , केरल राज्य के चौड़े समुद्री तट , महाराष्ट्र के रत्नागिरि जिले , पश्चिम बंगाल के बेसाल्ट और ग्रेनाइट पहाड़ियों के बीच तथा उड़ीसा के पठार के ऊपरी भागों और घाटियों में मिलती है । 

 

5. मरुस्थलीय मिट्टी- 

यह बालू प्रधान मिट्टी है , जिसमें बालू के कण मोटे होते हैं । यह मिट्टी दक्षिण – पश्चिम मानसून द्वारा कच्छ के रन की ओर से उड़कर भारत के पश्चिमी शुष्क प्रदेश में जमा हुई है । इसमें खनिज नमक अधिक मात्रा में पाया जाता है । इस मिट्टी में गेहूँ , गन्ना , कपास , ज्वार , बाजरा , सब्जियाँ आदि पैदा की जा सकती हैं । सिंचाई की सुविधा उपलब्ध न होने पर यह बंजर पड़ी रहती है । इस प्रकार की मिट्टी शुष्क प्रदेशों में विशेषकर पश्चिमी राजस्थान , गुजरात , दक्षिणी पंजाब , दक्षिणी हरियाणा और पश्चिमी उत्तरप्रदेश में मिलती है ।

 

6. पर्वतीय मिट्टी- 

यह मिट्टी हिमालयी पर्वत श्रेणियों पर पायी जाती है । अधिकांशतः यह मिट्टी पतली , दलदली और छिद्रमयी होती है । नदियों की घाटियों और पहाड़ी ढालों पर यह अधिक गहरी होती है । पहाड़ी ढालों के तलहटी में टरशियरीकालीन मिट्टी पाई जाती है , जो हल्की बलुई , छिछली , छिद्रमय और कम वनस्पति अंश वाली है ।

हिमालय के दक्षिणी भाग में , असम और दार्जिलिंग में , चिकनी एवं महीन मिट्टी मिलती हैं , जिसमें पत्थरों के छोटे टुकड़े अधिक तथा वनस्पति , चूना और लोहे के अंश कम पाये जाते हैं । यह चाय एवं आलू की कृषि के लिए उपयुक्त है । नैनीताल , मसूरी , चकराता आदि स्थानों के निकट चूने एवं डोलोमाइट चट्टानों से मिट्टी प्राप्त होती है , जिसमें चीड़ एवं साल के वृक्ष होते हैं ।

 

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