MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions पद्य Chapter 3 प्रेम और सौन्दर्य

hapter 3 प्रेम और सौन्दर्य

सौन्दर्य बोध (बिहारी)

श्रद्धा (कामायनी) (जयशंकर प्रसाद)

MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions पद्य Chapter 3 प्रेम और सौन्दर्य

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प्रेम और सौन्दर्य अति लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1. 

श्रीकृष्ण के हृदय पर किसकी माला शोभा पा रही है ? 

उत्तर – 

श्रीकृष्ण के हृदय पर गुंजाओं की माला शोभा पा रही है । 

प्रश्न 2. 

गोपाल के कुण्डलों की आकृति कैसी है ? 

उत्तर – 

गोपाल के कुण्डलों की आकृति मकर ( मछली ) की है ।

प्रश्न 3. 

श्रद्धा का गायन स्वर किस तरह है ? 

उत्तर – 

श्रद्धा का गायन स्वर भ्रमरी का सा है । 

प्रश्न 4. 

मधुर विश्रांत और एकान्त जगत का सुलझा हुआ रहस्य ‘ सम्बोधन किसके लिए है ? 

उत्तर – 

‘ मधुर विश्रांत और एकान्त जगत का सुलझा हुआ रहस्य ‘ सम्बोधन मनु के लिए है । 

प्रश्न 5. 

श्रीकृष्ण के माथे पर लगे टीके की तुलना किससे की गई है ? 

उत्तर – 

माथे पर लगे टीके की तुलना रवि से की गई है । प्रश्न 6. 

‘ कामायनी ‘ के नायक एवं नायिका का नाम बने हुए इसके रचनाकार का नाम बताइए । 

उत्तर – 

‘ कामायनी ‘ के नायक ‘ मनु ‘ एवं नायिका श्रद्धा ‘ है । इसके रचनाकार जयशंकर प्रसाद हैं ।

प्रेम और सौन्दर्य लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. 

गोपाल के गले में पड़ी गुंजों की माला की तुलना किससे की गई है ? 

उत्तर – 

गोपाल के गले में गुंजों की माला शोभायमान है । लाल रंग के गुंजों से बनी इस माला की तुलना वन की आग से की गई है । जैसे गहरे लाल रंग के गुंजा माला में हैं उसी लाल रंग की वन में लगने वाली आग भी होती है । यहाँ रंग की समानता है । 

प्रश्न 2. 

श्रीकृष्ण के ललाट पर लगे टीके की समानता किससे की गई है ? 

उत्तर – 

श्रीकृष्ण के ललाट पर लगा टीका बड़ा भला लग रहा है । यह टीका श्वेत रत्नों से जड़ा है , इसलिए उससे सफेद चमक निकल रही है । यही कारण है कि रत्नों से जड़े गये टीके की समानता रवि से की गई है । रवि की किरणें भी टीके की तरह सफेद चमकदार होती हैं । 

प्रश्न 3. 

मनु को हर्ष मिश्रित झटका – सा क्यों लगा ? उत्तर – 

जब थकान से चूर होकर मनु एकान्त में नीचे मुँह किए बैठे थे तभी श्रद्धा ने आकर मधुर वाणी में उनसे परिचय जानना चाहा । श्रद्धा का स्वर इतना मीठा था कि मनु उसकी ओर देखने को मजबूर हो गये । उन्होंने जैसे ही मुँह ऊपर करके श्रद्धा के अद्भुत सौन्दर्य को देखा तो मनु को हर्ष मिश्रित झटका सा लगा । वे इस सुन्दरता को देख हक्के – बक्के रह गये ।

प्रेम और सौन्दर्य दीर्घ उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1. 

पीताम्बरधारी श्रीकृष्ण का वर्णन कीजिए ।

उत्तर – 

भगवान श्रीकृष्ण का रंग श्याम था । इसीलिए उन्हें श्यामसुन्दर कहते हैं । वे पीला वस्त्र धारण करते थे । उनके श्याम वर्ण के शरीर पर पीले रंग का वस्त्र बड़ी शोभा पाता था । पीला रंग पवित्रता , शीलता तथा रोचकता का प्रतीक माना जाता है । पीला वस्त्र पहनकर श्री श्यामसुन्दर ऐसे लगते थे जैसे मानो नीलम मणियों के पर्वत पर प्रात : काल के सूर्य की पीली किरणों की धूप पड़ रही हो । जैसे उगते हुए सूरज की किरणों से नीलम के पहाड़ों की शोभा बढ़ती है वैसे ही पीले वस्त्र से श्रीकृष्ण भी बड़े सुन्दर तथा आकर्षक लग रहे थे । पीताम्बर धारण करने वाले श्रीकृष्ण का अत्यन्त विराट रूप रहा है । 

प्रश्न 2. 

‘ सुरतरु की मधु सिंधु में , लसति सपल्लव डार’का आशय स्पष्ट कीजिए । 

उत्तर – 

अद्भुत सौन्दर्यशाली नायिका अत्यन्त बारीक कपड़े पहने है । उन वस्त्रों में से उसके अंग – प्रत्यंगों की आभा का सौन्दर्य बाहर झलक रहा है जो बहुत ही आकर्षक लग रहा है । उसे देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो देववृक्ष कल्पतरु की कोई डाली पत्तों सहित समुद्र में शोभायमान हो । वस्त्र श्वेत वर्ण का है जिसे समुद्र माना है । नायिका के अंगों को पत्ते माना गया है । कोमल शरीर वाली नायिका को वृक्ष की डाली माना गया है । नायिका सात्विक स्वभाव की है अत : उसे देववृक्ष की डाली माना गया है । आशय यह है कि अनुपम सुन्दरी का अंग सौन्दर्य बारीक वस्त्रों में से झाँककर देखने वाले को सहज आकर्षित करता है । 

प्रश्न 3. 

‘ अरुण रवि मण्डल उनको भेद दिखाई देता हो छवि – धाम ‘ का भावार्थ लिखिए ।

उत्तर – 

अनुपम सौन्दर्य से युक्त नवयुवती श्रद्धा का स्वरूप मोहक था । उसका मुख लालिमामय कान्ति से शोभायमान था । उसके काले – काले बाल मुख के चारों ओर घिरे थे । गहरे काले बालों में से झाँकता हुआ मुख ऐसे लगता था जैसे संध्या को सूर्यास्त के समय पश्चिम दिशा में आकाश में काले बादल छाए हों और सायंकालीन लालिमामय सूर्य उन काले बादलों को चीरकर सुशोभित हो रहा हो । यहाँ काले बालों को बादल माना है और मुख को संध्याकालीन सूर्य माना गया है । सायंकाल में जब सूर्य छिपता है तो उसका रंग लाल हो जाता है , उसी प्रकार की लालिमा श्रद्धा के मुखमण्डल पर छाई थी । काले रंग से घिरा अरुण रंग बड़ा सुन्दर लगता है । इस प्रकार श्रद्धा के लालिमामय मुख की भव्यता को अरुण रवि मण्डल के द्वारा बताया गया है । काले बाल उसकी सुन्दरता को रोकने की बजाय और बढ़ा रहे हैं । 

सौन्दर्य बोध भाव सारांश 

रीतिकाल के प्रतिनिधि कवि बिहारी सौन्दर्य के अंकन में सर्वोपरि हैं । रूप – चेष्टा , शील , सौन्दर्य आदि का अद्भुत समन्वय उनके काव्य में देखा जा सकता है । प्रस्तुत दोहों में उन्होंने राधा – कृष्ण के अनुपम सौन्दर्य का मनोरम अंकन किया है । पीताम्बरधारी श्यामसुन्दर का विलक्षण सौन्दर्य , उनके हृदय पर विभूषित गुंजों की माला , कानों में मकर की आकृति के कुण्डल , मस्तक पर नंगों से जड़ा टीका सहज ही हृदय को अपनी ओर खींच लेते हैं । झीने वस्त्रों में झलकती राधा की अपार कान्ति , अद्भुत रूप सौन्दर्य वाली राधा का श्रीकृष्ण के हृदय में बस जाना आदि इन दोहों में साकार हो उठा है । भावों की चमत्कारिक अभिव्यक्ति के ये सजीव प्रमाण हैं ।

सौन्दर्य बोध सन्दर्भ, प्रसंग सहित पद्यांशों की व्याख्या 

(1) सोहत औ. पीतु पटु, स्याम सलौने गात।

मनौं नीलमनि-सैल पर, आतपु परयौ प्रभात॥

शब्दार्थ – 

सोहत = सुशोभित । पीतु = पीला । पटु = वस्त्र । सलोने = सुन्दर । गात = शरीर । सैल = पर्वत । आतपु = धूप ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘ प्रेम और सौन्दर्य ‘ पाठ के ‘ सौन्दर्य बोध ‘ शीर्षक से अवतरित है । इसके रचयिता रीतिकाल के श्रेष्ठ कवि बिहारी हैं । 

प्रसंग – 

यहाँ पर पीताम्बरधारी श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण के स्वरूप का मोहक अंकन किया गया है । 

व्याख्या – 

श्याम वर्ण वाले सुन्दर शरीर पर पीताम्बर धारण किये हुए श्रीकृष्ण अत्यन्त शोभायमान लग रहे हैं । वे ऐसे लगते हैं कि मानो नीलमणि पर्वत पर प्रात : कालीन धूप पड़ रही है । 

विशेष – 

(1) श्याम ‘ में श्लेष और समस्त दोहे में उत्प्रेक्षा अलंकार है । (2) भाषा – ब्रज । (3) रस – शृंगार । (4) छंद – दोहा । 

 

(2) सखि सोहत गोपाल के, उर गुंजनु की माल।

बाहिर लसति मनौ पिए, दावानल की ज्वाल॥

शब्दार्थ – 

गोपाल = गाय पालने वाले , श्रीकृष्ण । उर = हृदय । माल = माला । लसत = सुशोभित । दावानल = जंगल में लगने वाली आग । ज्वाल = आग ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘ प्रेम और सौन्दर्य ‘ पाठ के ‘ सौन्दर्य बोध ‘ शीर्षक से अवतरित है । इसके रचयिता रीतिकाल के श्रेष्ठ कवि बिहारी हैं । 

प्रसंग – 

श्रीकृष्ण के गले में विराजमान गुंजों की माला की शोभा का वर्णन किया गया है ।

व्याख्या – 

हे सखी ! गोपाल के हृदय पर सुशोभित गुंजाओं की माला ऐसी लग रही है मानो उन्होंने जंगल में लगी आग को पी लिया हो , वही लाल रंग के गुजों के रूप में बाहर शोभायमान है ।

विशेष – 

(1) श्रीकृष्ण के दावानल शान्त करने वाले रूप का अंकन हुआ है । (2) उत्प्रेक्षा , अनुप्रास अलंकारों की छटा दर्शनीय है । 

(3) लिखन बैठि जाकी सबी, गहि-गहि गरव गरूर।

भए न केते जगत के, चतुर चितेरे कूर॥

शब्दार्थ – 

सबि = शोभा । गरब = गर्व , अभिमान । गरूर = अहंकार । केते = कितने ही । चतुर = कुशल , निपुण । चितेरे = चित्रित करने वाले , चित्रकार । क्रूर = मूर्ख ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘ प्रेम और सौन्दर्य ‘ पाठ के ‘ सौन्दर्य बोध ‘ शीर्षक से अवतरित है । इसके रचयिता रीतिकाल के श्रेष्ठ कवि बिहारी हैं । 

प्रसंग – 

यहाँ पर भगवान श्रीकृष्ण के अवर्णनीय सौन्दर्य का बखान किया गया है । 

व्याख्या – 

जिस ( भगवान श्रीकृष्ण ) की शोभा को लिखने ( वर्णन करने के लिए ) इस संसार के कितने ही कुशल चित्रकार ( कवि , कलाकार ) बैठे हैं किन्तु ( न लिख पाने के कारण ) वे मूर्ख सिद्ध हुए हैं । 

विशेष – 

(1) भगवान का पल – पल परिवर्तित होने वाले सौन्दर्य का वर्णन शब्दों के द्वारा सम्भव नहीं है । (2) पुनरुक्तिप्रकाश , अनुप्रास अलंकारों एवं पद – मैत्री की शोभा अवलोकनीय है । 

 

(4) मकराकृति गोपाल कैं, सोहत कुंडल कान।

धस्यो मनौ हियगढ़ समरु, ड्योढ़ी लसत निसान॥

शब्दार्थ – 

मकराकृति = मछली की आकृति वाले । धस्यौ = जीत लिया है । हियगढ़ = हृदय रूपी धरती ( प्रदेश ) । समरु = स्मर , कामदेव । ड्योढ़ी = मुख्य द्वार । लसत = सुशोभित । निसान = ध्वज , पताका ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘ प्रेम और सौन्दर्य ‘ पाठ के ‘ सौन्दर्य बोध ‘ शीर्षक से अवतरित है । इसके रचयिता रीतिकाल के श्रेष्ठ कवि बिहारी हैं । 

प्रसंग – 

प्रस्तुत दोहे में मकराकृति – कुण्डल धारण किये हुए श्रीकृष्ण के काममय रूप का कलात्मक चित्र अंकित किया है । 

व्याख्या – 

सखी नायिका से कृष्ण का रूप वर्णन करते हुए कहती है कि गोपाल श्रीकृष्ण के कानों में मछली की आकृति वाले कुण्डल सुशोभित हैं । उनके कुण्डल देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो कामदेव ने कृष्ण के हृदय ( राज्य ) पर अधिकार कर लिया है और मुख्य प्रवेश द्वार ( कान ) पर विजयी कामदेव की पताकाएँ फहरा रही हैं ।

विशेष – 

(1) कुण्डलों को कामदेव की पताका इसलिए कहा गया है , क्योंकि कामदेव के झण्डे में मछली का चित्र अंकित है । (2) कृष्ण के इस रूप में उन्हें काम से विजित दिखाया गया है । (3) रूपक , उत्प्रेक्षा पर्यायोक्ति तथा अनुप्रास अलंकारों की छटा दर्शनीय है । 

 

(5) नीको लसत लिलार पर, टीको जरित जराय।

छविहिं बढ़वत रवि मनौ, ससि मंडल में आय॥

शब्दार्थ – 

नीको = भला , सुन्दर । लिलार = माथा । जरित = जड़ित , नग आदि से जड़ा । छबिहि = शोभा को । रवि = सूर्य । ससि = चन्द्रमा । आय = आकर ।

सन्दर्भ –

प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘ प्रेम और सौन्दर्य ‘ पाठ के ‘ सौन्दर्य बोध ‘ शीर्षक से अवतरित है । इसके रचयिता रीतिकाल के श्रेष्ठ कवि बिहारी हैं । 

प्रसंग – 

यहाँ श्रीकृष्ण के मस्तक पर सुशोभित टीके के सौन्दर्य का अंकन किया गया है । व्याख्या – श्रीकृष्ण के माथे पर रत्नों से जड़ा टीका ऐसा शोभायमान लग रहा है मानो सूर्य चन्द्र मण्डल में आकर सौन्दर्य को बढ़ा रहा हो ।

विशेष – 

(1) जड़ाऊ टीके के कारण हुई श्रीकृष्ण के सौन्दर्य की वृद्धि का मनोहर वर्णन हुआ है । (2) टीके को रवि के समान चमत्कारपूर्ण माना है । (3) शुद्ध , साहित्यिक ब्रजभाषा का प्रयोग हुआ है । 

 

(6) झीनैं पट मैं झिलमिली, झलकति ओप अपार।

सुरतरु की मनु सिंधु में, लसति सपल्लव डार।।

शब्दार्थ – 

झीनैं = बहुत बारीक , दूर – दूर बुना हुआ । पट = वस्त्र । झिलमिली चमकती । ओप = आभा । अपार = जिसका पार पाना सम्भव न हो , अत्यधिक । सुरतरु – देववृक्ष , कल्पतरु । सिंधुसागर । सपल्लव = पत्रों सहित ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘ प्रेम और सौन्दर्य ‘ पाठ के ‘ सौन्दर्य बोध ‘ शीर्षक से अवतरित है । इसके रचयिता रीतिकाल के श्रेष्ठ कवि बिहारी हैं ।  

प्रसंग – 

बारीक वस्त्र में झिलमिलाते नायिका के अंगों के सौन्दर्य का चित्रण किया गया व्याख्या – बारीक वस्त्रों में से चमत्कृत रूपसी नायिका के अंगों की असीम आभा ऐसी लग रही है मानो देववृक्ष कल्पतरु की कोई डाली पत्तों सहित समुद्र में सुशोभित हो रही हो । 

विशेष – 

(1) नायिका के अंग सौन्दर्य का प्रभावपूर्ण अंकन हुआ है । (2) नायिका के अंग – प्रत्यंगों को कल्पतरु के पत्ते माना है । (3) उत्प्रेक्षा , रूपक एवं अनुप्रास अलंकारों का सौन्दर्य अवलोकनीय है । 

 

(7) -त्यौं प्यासेई रहत, ज्यौं-ज्यौं पियत अघाई।

सगुन सलोने रूप की, जुन चख तृषा बुझाई॥

शब्दार्थ – 

त्यौं – त्यौं = वैसे – वैसे । ज्यौं – ज्यौं = जैसे – जैसे । अघाई = छककर । सगुन = साकार । सलोने = सुन्दर । चख = आँखों । तृषा = प्यास । बुझाई = बुझती है , शान्त होती है ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘ प्रेम और सौन्दर्य ‘ पाठ के ‘ सौन्दर्य बोध ‘ शीर्षक से अवतरित है । इसके रचयिता रीतिकाल के श्रेष्ठ कवि बिहारी हैं । 

प्रसंग – 

यहाँ सगुण के अद्भुत सौन्दर्य की महिमा का प्रतिपादन हुआ है । 

व्याख्या – 

सगुण कृष्ण के सुन्दर स्वरूप का दर्शन करके इन आँखों की प्यास नहीं बुझती है । जैसे – जैसे ये ( रूप सौन्दर्य का ) छक कर पान करते हैं , वैसे – वैसे ही ये प्यासे रह जाते हैं अर्थात् स्वरूप सौन्दर्य का पान करने की इच्छा शान्त नहीं होती है और बढ़ती ही जाती है ।

विशेष – 

(1) शुद्ध , साहित्यिक ब्रजभाषा का प्रयोग किया गया है । (2) पुनरुक्तिप्रकाश , अनुप्रास अलंकारों का सहज , स्वाभाविक प्रयोग हुआ है ।

 

(8) तो पर वारौं उरबसी, सुनि राधिके सुजान।

तू मोहन के उर बसी है, उरबसी समान॥

शब्दार्थ – 

वारौं = न्योछावर । उरबसी हृदय पर पहने वाली माला । सुजान = सुज्ञानी , चतुर । मोहन = मोहित करने वाले , श्रीकृष्ण । उरबसी = हृदय में बस गयी है । उरबसी = उर्वशी अप्सरा ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘ प्रेम और सौन्दर्य ‘ पाठ के ‘ सौन्दर्य बोध ‘ शीर्षक से अवतरित है । इसके रचयिता रीतिकाल के श्रेष्ठ कवि बिहारी हैं । 

प्रसंग – 

यहाँ राधा के मोहक रूप तथा प्रभाव का निरूपण सखी द्वारा किया गया है ।

व्याख्या – 

हे चतुर राधा ! तुझ पर मैं उर्वशी माला न्योछावर करती हूँ । सुन तू ( अपने रूप सौन्दर्य आदि के कारण ) उर्वशी ( अप्सरा ) के समान मनमोहन श्रीकृष्ण के हृदय में बस गयी है अर्थात् तुझे श्रीकृष्ण हृदय से चाहते हैं । 

विशेष – 

(1) सौन्दर्य सम्पन्न राधा के सहज प्रभावी रूप को प्रस्तुत किया गया है । (2) साहित्यिक ब्रजभाषा का प्रयोग हुआ है । (3) यमक , अनुप्रास अलंकारों की छटा दर्शनीय है । 

 

(9) फिरि-फिरि चित उत ही रहतु, टूटी लाज की लाव।

अंग-अंग-छवि-झौर में, भयो भौर की नाव॥ 

शब्दार्थ –

चित = मन , अन्तर । उत = उधर ही । टुटी = टूट गई है । लाज = लज्जा । लाव = रस्सी । छवि = शोभा । झौर = समूह । भयो = हो गया है । भौंर = भँवर ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘ प्रेम और सौन्दर्य ‘ पाठ के ‘ सौन्दर्य बोध ‘ शीर्षक से अवतरित है । इसके रचयिता रीतिकाल के श्रेष्ठ कवि बिहारी हैं ।  

प्रसंग – 

श्रीकृष्ण के अंग सौन्दर्य के प्रभाव का आकर्षक चित्रण किया गया है । 

व्याख्या – 

श्रीकृष्ण के रूप सौन्दर्य से प्रभावित नायिका कहती है कि मेरा मन बार – बार उधर ( श्रीकृष्ण की ओर ) ही लगा रहता है , मेरी लज्जा के बन्धन की रस्सी भी टूट गई है अर्थात् मैं लज्जा का निर्वाह भी नहीं कर पा रही हूँ । श्रीकृष्ण के प्रत्येक अंग के सौन्दर्य के सामूहिक प्रभाव में मेरा मन भँवर में फंसने वाली नाव हो गया है । 

विशेष – 

(1) आंगिक सौन्दर्य से प्रभावित नायिका के मन की दशा का स्वाभाविक अंकन हुआ है । (2) विषय के अनुरूप ब्रजभाषा का प्रयोग हुआ है । (3) पुनरुक्तिप्रकाश , रूपक , अनुप्रास अलंकार का सौन्दर्य अवलोकनीय है । 

 

(10) जहाँ-जहाँ ठाढ़ौ लख्यौ, स्याम सुभग-सिरमौरू।

उनहूँ बिन छिन गहि रहतु, दृगनु अजौं वह ठौरू॥

शब्दार्थ – 

ठाढ़ौ = खड़ा । लख्यौ = देखा । स्याम = श्यामसुन्दर । सुभग – सिरमौरु – सर्वाधिक सौन्दर्यशाली । छिन = क्षण । दृगनु = नेत्रों में । अजौं = आज भी । ठौरु- स्थान ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘ प्रेम और सौन्दर्य ‘ पाठ के ‘ सौन्दर्य बोध ‘ शीर्षक से अवतरित है । इसके रचयिता रीतिकाल के श्रेष्ठ कवि बिहारी हैं ।  

प्रसंग – 

सौन्दर्यशाली श्रीकृष्ण के दर्शन के स्थानों की स्मृति का सटीक चित्रण किया गया है । 

व्याख्या – 

नायिका कहती है कि मैंने सर्वाधिक सौन्दर्यशाली श्यामसुन्दर को जहाँ – जहाँ खड़े हुए देखा था वे स्थान उनके बिना आज भी मेरे नेत्रों में हर पल विद्यमान रहते हैं । 

विशेष –

(1) शुद्ध , साहित्यिक ब्रजभाषा का प्रयोग हुआ है । (2) पुनरुक्तिप्रकाश , विनोक्ति , अनुप्रास अलंकार एवं पद – मैत्री की शोभा दर्शनीय है ।

श्रद्धा भाव सारांश 

प्रेम और सौन्दर्य के महान् रचनाकार जयशंकर प्रसाद की अनन्य कृति ‘ कामायनी ‘ से लिये गये इस अंश में श्रद्धा और मनु के प्रथम मिलन का रोचक वर्णन हुआ है । ‘ श्रद्धा ‘ प्रलय काल के बाद अकेले रह गये मनु का परिचय जानने को प्रश्न करती है । मनु जैसे ही उनका स्वर सुनते हैं और उनकी ओर देखते हैं तो चकित रह जाते हैं । अनुपम सौन्दर्य से सम्पन्न श्रद्धा की शारीरिक संरचना , कान्ति एवं उनकी वेशभूषा आदि से वे बहुत प्रभावित होते हैं । यहाँ पर श्रद्धा के बाह्य स्वरूप के साथ – साथ आन्तरिक करुणा , उदारता , माधुर्य आदि का उदात्त अंकन हुआ है । भावानुरूप भाषा में नवीन उपमानों और प्रतीकों के सहारे श्रद्धा के स्वरूप का अत्यन्त आकर्षक वर्णन हुआ है । उन्हीं वर्णनों में प्रसाद की प्रेम – सौन्दर्य चेतना उजागर हुई है ।

श्रद्धा सन्दर्भ, प्रसंग सहित पद्यांशों की व्याख्या 

(1) “कौन तुम? संसृति-जलनिधि तीर-तरंगों से फेंकी मणि एक,

कर रहे निर्जन का चुपचाप प्रभा की धारा से अभिषेक?

मधुर विश्रांत और एकांत-जगत का सुलझा हुआ रहस्य,

एक करुणामय सुन्दर मौन और चंचल मन का आलस्य।”

शब्दार्थ – 

संसृति – जलनिधि = संसार – सागर । तीर = किनारे । तरंगों = लहरों । मणि = चमकता हुआ श्रेष्ठ रत्न । निर्जन = जन रहित शून्य प्रदेश । प्रभा = आभा । अभिषेक = स्नान कराना , सुशोभित करना । 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘ प्रेम और सौन्दर्य ‘ पाठ के ‘ श्रद्धा ‘ शीर्षक से अवतरित है । इसके रचयिता छायावाद के प्रतिनिधि कवि जयशंकर प्रसाद हैं ।

प्रसंग – 

हिमालय के एकान्त में मनु के पास जाकर श्रद्धा उनका परिचय जानना चाहती है 

व्याख्या – 

श्रद्धा पूछती है कि समुद्र की लहरें जिस प्रकार मणि को किनारे पर फेंक देती है उसी तरह इस संसार – सागर के दुःखों से खिन्न होकर इस शून्य प्रदेश में पड़े हुए तुम कौन हो ? अपनी तेजमयी आभा से एक एकान्त प्रदेश को सुशोभित करने वाले तुम कौन हो ? 

विशेष – 

(1) मनु की तेजमय सूर्यकान्ति का प्रभावी अंकन हुआ है । (2) तत्सम शब्दों से युक्त साहित्यिक भाषा का प्रयोग हुआ है । (3) रूपक , अनुप्रास अलंकारों का सौन्दर्य दर्शनीय है । 

 

(2) सुना यह मनु ने मधु गुंजार मधुकरी-सा जब सानन्द,

किए मुख नीचा कमल समान प्रथम कवि का ज्यों सुन्दर छन्द,

एक झिटका-सा लगा सहर्ष, निरखने लगे लुटे से कौन,

गा रहा यह सुन्दर संगीत? कुतूहल रहन सका फिर मौन।

शब्दार्थ – 

मधुर = मधुरता से भरा । विश्रांत = थकान से युक्त । एकान्त = अकेलेपन से भरा । मौन = नीरवता , शान्ति । आलस्य = अकर्मण्यता , कर्त्तव्यहीनता ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘ प्रेम और सौन्दर्य ‘ पाठ के ‘ श्रद्धा ‘ शीर्षक से अवतरित है । इसके रचयिता छायावाद के प्रतिनिधि कवि जयशंकर प्रसाद हैं । 

प्रसंग – 

यहाँ पूरी तरह अपरिचित चिन्ताग्रस्त मनु के विषय में श्रद्धा’जानना चाहती है । 

व्याख्या – 

श्रद्धा कहती है कि तुम मुझे इस मधुरता , थकान और अकेलेपन से युक्त संसार के सुलझे हुए रहस्य से जान पड़ रहे हो । आशय है कि निर्जन प्रदेश में थके आदमी की तरह अकेले बैठे हुए सोचने से तुम्हारे मुख के हावों से तुम्हारे हृदय के भाव प्रकट हो रहे हैं । यही कारण है कि तुम सुलझे हुए रहस्य लग रहे हो । तुम करुण भाव से भरे हुए सुन्दर मौन के रूप में दिख रहे हो । तुम्हारी कर्त्तव्यहीनता देखकर मुझे ऐसा लगता है कि तुम्हारे चंचल मन ने आलस्य धारण कर लिया है । इसलिए बताओ कि तुम कौन हो ?

विशेष – 

(1) अकर्मण्य मनु की स्थिति का भावमय अंकन हुआ है । (2) तत्सम शब्दों से युक्त साहित्यिक भाषा को अपनाया गया है । (3) रूपक , उत्प्रेक्षा , विरोधाभास अलंकारों का सौन्दर्य दर्शनीय है । (4) आन्तरिक भावों की सरस अभिव्यक्ति हुई है । 

 

(3) और देखा वह सुन्दर दृश्य नयन का इन्द्रजाल अभिराम,

कुसुम-वैभव में लता समान चन्द्रिका से लिपटा घनश्याम।

हृदय की अनुकृति बाह्य उदार एक लम्बी काया उन्मुक्त,

मधु-पवन, क्रीड़ित ज्यों शिशु साल, सुशोभित हो सौरभ-संयुक्त।

शब्दार्थ – 

सुन्दर दृश्य = अत्यन्त सौन्दर्यशाली दर्शनीय वस्तु । नयन = नेत्र । इन्द्रजाल = जादू । अभिराम = अच्छा , आकर्षक । कुसुम – वैभव = फूल से लदी । लता = बेल । चन्द्रिका – चाँदनी । घनस्याम = काले बादल । अनुकृति = अनुरूप , नकल । बाह्य = बाहरी अंग । काया = शरीर । उन्मुक्त खुला हुआ । मधु – पवन – वसन्त की वायु । क्रीड़ित – खेलता हुआ , हिलता हुआ । शिशु साल = साल का पौधा । सौरभ संयुक्त = गंध से युक्त । 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘ प्रेम और सौन्दर्य ‘ पाठ के ‘ श्रद्धा ‘ शीर्षक से अवतरित है । इसके रचयिता छायावाद के प्रतिनिधि कवि जयशंकर प्रसाद हैं । 

प्रसंग – 

यहाँ श्रद्धा के आकर्षक रूप का वर्णन किया गया है । व्याख्या – मनु ने ऊपर देखा तो उन्हें एक अत्यन्त सौन्दर्यशाली देखने योग्य वस्तु के रूप में श्रद्धा दिखाई दी । वह उन्हें नेत्रों के लिए जादू के आकर्षण की तरह खींचने वाली प्रतीत हुई । वह फूलों से लदी बेल के समान लगी । उन्हें जान पड़ा कि जैसे चाँदनी से बादल लिपटा खड़ा हो । श्रद्धा के हृदय के अनुरूप ही उसका बाहरी लम्बा एवं विस्तृत शरीर भी उदार था । वह ऐसे लग रही थी जैसे वसन्त की वायु से कोई साल का छोटा पौधा सुगन्ध से युक्त होकर हिल रहा हो । 

विशेष – 

(1) नखशिख पद्धति पर श्रद्धा के रूप – सौन्दर्य तथा उदारता का मनोरम वर्णन हुआ है । (2) शुद्ध साहित्यिक भाषा का प्रयोग किया गया है । (3) उपमा , अनुप्रास अलंकारों का सौन्दर्य अवलोकनीय है । 

 

(4) मसूण, गांधार देश के नील रोम वाले मेषों के चर्म,

ढंक रहे थे उसका वपु कांत बन रहा था वह कोमल वर्म।

नील परिधान बीच सुकुमार खुला रहा मृदुल अधखुला

अंग, खिला हो ज्यों बिजली का फूल मेघवन बीच गुलाबी रंग।

शब्दार्थ – 

मसृण = चिकने । गांधार देश = अफगानिस्तान में स्थित कंधार प्रदेश । नील रोम = नीले रोओं वाले । मेषों के चर्म = भेड़ों की खाल । वपु कान्त = कान्तिवान शरीर । वर्म = कवच । परिधान = वस्त्र । सुकुमार = कोमल । खुल रहा = खिल रहा , सुशोभित हो रहा था । मृदुल मधुर कोमल । मेघवन = बादलों के समूह । 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘ प्रेम और सौन्दर्य ‘ पाठ के ‘ श्रद्धा ‘ शीर्षक से अवतरित है । इसके रचयिता छायावाद के प्रतिनिधि कवि जयशंकर प्रसाद हैं । 

प्रसंग – 

यहाँ श्रद्धा की वेशभूषा एवं उसके अंग – सौन्दर्य का वर्णन किया गया है । 

व्याख्या – 

श्रद्धा का कान्तिवान शरीर गांधार देश की भेड़ों की चिकनी खाल से ढंक रहा था । उसे देखकर ऐसा लगता कि मानो वह खाल श्रद्धा ने कवच के रूप में धारण की हो । श्रद्धा के नीले रंग के वस्त्रों से जहाँ – तहाँ उसके शरीर का कोमल अंग दिखाई दे रहा था , जो ऐसा लगता था कि मानो काले बादलों के वन के मध्य गुलाबी रंग का बिजली का सुन्दर फूल खिला हुआ हो । 

विशेष – 

(1) यहाँ श्रद्धा के कोमल अंगों पर चर्म को कवच के रूप में अंकित किया है । (2) श्रद्धा के रूप – सौन्दर्य का प्रस्तुतीकरण रंग सामंजस्य से किया है । गौर वर्ण पर नीले वस्त्र शोभा बढ़ाते हैं । तत्सम प्रधान साहित्यिक भाषा का प्रयोग हुआ है । (3) उत्प्रेक्षा , रूपक , अनुप्रास अलंकारों का सौन्दर्य दर्शनीय है । 

 

(5) आज, वह मुख! पश्चिम के व्योम बीच जब घिरते हों घनश्याम,

अरुण रवि-मण्डल उनको भेद दिखाई देता हो छविधाम।

या कि, नव इंद्रनील लघु शृंग फोड़कर धधक रही हो कांत,

एक लघु ज्वालामुखी अचेत माधवी रजनी में अश्रान्त।। 

शब्दार्थ – 

व्योम = आकाश । घनश्याम = काले बादल । अरुण रवि – मंडल = लाल रंग का सूर्य – मण्डल । भेद = चीर कर । छविधाम = अपार सौन्दर्य । इंद्रनील लघु शृंग = नीलम के पहाड़ की छोटी चोटी । कांत = सुन्दर । अचेत = शांत , बिना विस्फोट के । माधवी रजनी = वसन्त की रात । अश्रान्त = बिना थके , लगातार ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘ प्रेम और सौन्दर्य ‘ पाठ के ‘ श्रद्धा ‘ शीर्षक से अवतरित है । इसके रचयिता छायावाद के प्रतिनिधि कवि जयशंकर प्रसाद हैं । 

प्रसंग – 

इसमें श्रद्धा के रूप – सौन्दर्य का वर्णन किया गया है । 

व्याख्या – 

श्रद्धा के ललिमायुक्त मुख का क्या कहना ! काले रंग के बालों से घिरा हुआ वह अरुण मुख ऐसा लगता था मानो संध्या के समय पश्चिम की ओर आकाश में काले – काले बादल घिरे हों और उन काले बादलों को चीरकर लाल रंग का सूर्य मण्डल अपार शोभामय दिखाई दे रहा हो । अथवा श्रद्धा का लालिमा से युक्त मुख ऐसा लग रहा था मानो वसन्त की रात में एक छोटा – सा सुन्दर ज्वालामुखी नवीन नीलम के पहाड़ की एक छोटी – सी चोटी को छोड़कर सुन्दरता के साथ लगातार धधक रहा हो किन्तु वह किसी प्रकार का विस्फोट न कर रहा हो । 

विशेष – 

(1) श्रद्धा के मुखमण्डल पर छाई अनन्त सुन्दरता का मनोहारी चित्रण हुआ है । (2) तत्सम प्रधान साहित्यिक भाषा का प्रयोग हुआ है । (3) उत्प्रेक्षा , रूपक , सन्देह एवं अनुप्रास अलंकारों की छटा दर्शनीय है । (4) प्रसाद के सौन्दर्य अंकन का यह अनूठा प्रयोग है । 

 

(6) घिर रहे थे घुघराले बाल अंस अवलम्बित मुख के पास,

नील घनशावक से सुकुमार सुधा भरने को विधु के पास।

और उस मुख पर वह मुसकान। रक्त किसलय पर ले विश्राम,

अरुण की एक किरण अम्लान अधिक अलसाई हो अभिराम।

शब्दार्थ – 

अंस = कंधा । अवलंबित = टिके हुए , पड़े हुए । घनशावक = बादल का टुकड़ा । सुकुमार = कोमल , सुन्दर । सुधा = समृत । विधु = चन्द्रमा । रक्त किसलय = लाल रंग की कोपलें । अरुण = प्रात : कालीन सूर्य । अम्लान = उज्ज्वल , स्वच्छ । अलसाई = आलस्य से भरी । अभिराम सुन्दर । 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘ प्रेम और सौन्दर्य ‘ पाठ के ‘ श्रद्धा ‘ शीर्षक से अवतरित है । इसके रचयिता छायावाद के प्रतिनिधि कवि जयशंकर प्रसाद हैं ।

प्रसंग – 

यहाँ पर श्रद्धा के रूप – सौन्दर्य का मनोरम वर्णन किया गया है । 

व्याख्या – 

श्रद्धा के मुख के पास ही उसके घुघराले बाल घिरे हुए थे जो उसके कंधों पर पड़े थे । उन्हें देखकर ऐसा लगता था जैसे नीले रंग के छोटे – छोटे बादल अमृत भरने के लिए चन्द्रमा के पास घिरे ( इकट्ठे ) हुए हों । श्रद्धा के स्वाभाविक लालिमामय होठों से सुशोभित उस कान्तिपूर्ण मुख पर मृदुल और मन्द मुस्कान बिखरी थी जो ऐसी लगती थी मानो प्रात : कालीन बाल – सूर्य की कोई एक उज्ज्वल किरण लाल रंग की कोपलों पर विश्राम कर रही हो तथा वह अलसा रही हो । 

विशेष – 

(1) अनन्य सुन्दरी श्रद्धा के स्वरूप का वर्णन भावपूर्ण ढंग से किया है । (2) भाव के अनुरूप साहित्यिक भाषा का प्रयोग हुआ है । (3) उपमा , उत्प्रेक्षा एवं अनुप्रास अलंकारों का सौन्दर्य सहज ही प्रभावित करता है । 

 

(7) नित्य-यौवन छवि से ही दीप्त विश्व की करुण कामना मूर्ति,

स्पर्श के आकर्षण से पूर्ण प्रकट करती ज्यों जड़ में स्फूर्ति।

उषा की पहिली लेखा कांत, माधुरी से भींगी भर मोद,

मद भरी जैसे उठे सलज्ज भोर की तारक-द्युति की गोद॥

शब्दार्थ – 

यौवन – चिर यौवन । छवि = सौन्दर्य । दीप्त = शोभायमान । करुण कामना मूर्ति करुणा से भरी कामना की प्रतिमा । स्पर्श छूना । स्फूर्ति = चेतना । उषा = भोर । लेखा = किरण । माधुरी = मधुरता । भर मोद = उल्लास से भरी । मद भरी = मस्ती से भरी । सलज्ज = लज्जा युक्त । तारक – द्युति = तारों की आभा ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘ प्रेम और सौन्दर्य ‘ पाठ के ‘ श्रद्धा ‘ शीर्षक से अवतरित है । इसके रचयिता छायावाद के प्रतिनिधि कवि जयशंकर प्रसाद हैं । 

प्रसंग – 

यहाँ नवयौवन के स्वाभाविक सौन्दर्य का चित्रण किया गया है । 

व्याख्या – 

श्रद्धा अनन्त काल तक रहने वाले यौवन से युक्त शोभायमान है । वह ऐसी जान पड़ती है मानो संसार की करुणा से भरी हुई कामना की मूर्ति हो । श्रद्धा के इस स्वरूप को देखकर प्रत्येक के मन में उसे छूने की स्वाभाविक इच्छा जाग सकती है । उस अलौकिक सौन्दर्य में जड़ ( भावना – हीन ) व्यक्ति में भी चेतना जगाने की क्षमता है । 

विशेष – 

(1) अलौकिक सुन्दरी श्रद्धा का बाह्य एवं आन्तरिक सौन्दर्य अंकित हुआ है । (2) भाव के अनुरूप भाषा का प्रयोग किया गया है । (3) उत्प्रेक्षा , रूपक तथा अनुप्रास अलंकारों का सौन्दर्य दर्शनीय है । (4) रस – शृंगार । 

 

(8) कुसुम कानन अंचल में मंद-पवन प्रेरित सौरभ साकार,

रचित-परमाणु-पराग-शरीर, खड़ा हो, ले मधु का आधार।

और पड़ती हो उस पर शुभ्र नवल मधु राका मन की साथ,

हँसी का मद विह्वल प्रतिबिम्ब मधुरिमा खेला सदृश अबाध।

शब्दार्थ – 

कुसुम कानन = फूलों के जंगल । अंचल = प्रदेश । मंद = पवन प्रेरित सौरभ धीमी – धीमी वायु के द्वारा बहाकर लाई गई गन्ध । परमाणु पराग = रचित = पराग के परमाणुओं से बना । शुभ्र = उज्ज्वल । नवल = नवीन । मधु = राका, वसन्त की पूर्णिमा की मन की साध = मन को प्रिय । मद विह्वल = मस्ती से भरा । प्रतिबिम्ब = प्रतिमूर्ति । मधुरिमा = मधुरता । खेला = लहर । अवाध, निरन्तर ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘ प्रेम और सौन्दर्य ‘ पाठ के ‘ श्रद्धा ‘ शीर्षक से अवतरित है । इसके रचयिता छायावाद के प्रतिनिधि कवि जयशंकर प्रसाद हैं ।

प्रसंग – 

यहाँ श्रद्धा के शारीरिक सौन्दर्य में विद्यमान आकर्षणों का सजीव चित्रण किया । गया है । 

व्याख्या – 

श्रद्धा को देखकर प्रतीत होता था मानो वह फूलों से भरे जंगलों में से वसन्त ऋतु की मन्द वायु द्वारा बहाकर लाई गई सुगन्ध को साकार मूर्ति हो और फूलों के रस , मधु में सनकर पराग के परमाणुओं से उसका शरीर बनाया गया हो । उसके मुख पर मस्ती और चंचलता से भरी जो मुस्कान थी उसे देखकर लगता था मानो उसके ऊपर वसन्त की पूर्णिमा के चन्द्रमा की चाँदनी पड़ रही हो । श्रद्धा के होठों पर खेलती हँसी की लहर ऐसी लगती थी मानो स्वयं मधुरता ही वहाँ आकर लगातार खेल रही हो । 

विशेष – 

(1) तत्सम शब्दों से युक्त खड़ी बोली में विषय को प्रस्तुत किया गया है । (2) उत्प्रेक्षा , उपमा तथा अनुप्रास अलंकारों की छटा दर्शनीय है । (3) रस – शृंगार ।

बिहारी कवी परिचय

जीवन परिचय – 

रीतिकाल के महान कवि बिहारी का जन्म संवत् 1607 में ग्राम बसुआ , गोविन्दपुरा , जिला ग्वालियर में हुआ था । पिता का नाम श्री केशवराय चौबे था । आप राजा जयसिंह के दरबारी कवि थे । निधन संवत् 1710 में हुआ । 

प्रमुख रचनाएँ –

बिहारी की एक मात्र रचना ‘ सतसैया ‘ या ‘ सतसई ‘ है जो बिहारी – सतसई के नाम से प्रसिद्ध है । 

काव्यगत विशेषताएँ 

भाव पक्ष – 

बिहारी गागर में सागर भरने के लिए प्रसिद्ध हैं । ये मुख्यतः शृंगारिक कवि हैं । नायिका भेद एवं नख शिख वर्णन में आपने शृंगार का कोना – कोना झाँक डाला है । 

कला पक्ष – 

ब्रजभाषा का साहित्य मुहावरों एवं लोकोक्तियों के स्वाभाविक प्रयोग इनकी रचना में है । आपने उपमा , रूपक , उत्प्रेक्षा , श्लेष एवं यमक अलंकार का चमत्कारपूर्ण प्रयोग किया है । माधुर्ययुक्त व्यन्जना शैली प्रधान काव्यों में रीति सिद्ध काव्य धारा के महान कवियों में आपका नाम लिया जाता है । समास शैली में कम शब्दों में बहुत कुछ कहने की क्षमता अन्यत्र दुर्लभ है । इसलिए उनके लिए कहा जाता है कि बिहारी ने अपने दोहों में गागर में सागर भर दिया है । श्रृंगार और शांत रस ही काव्य रूप में अधिक मात्रा में पाये जाते हैं ।

जयशंकर प्रसाद कवि परिचय

जीवन परिचय – 

वाराणसी के सुप्रसिद्ध ‘ सूंघनी साहू ‘ परिवार में सन् 1889 ( वि.सं. 1946 ) में आधुनिक हिन्दी काव्य के मूर्धन्य कवि , श्रेष्ठ नाटककार , सशक्त कहानीकार और उत्कृष्ट उपन्यासकार श्री जयशंकर प्रसाद का जन्म हुआ । बाल्यकाल में ही माता – पिता से विमुक्त बालक ने स्वाध्याय द्वारा हिन्दी , अंग्रेजी , संस्कृत , बंगाली , उर्दू तथा फारसी आदि भाषाओं का अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया । साहित्य साधना के इस साधक का महाप्रयाण 48 वर्ष की अल्पायु में सन् 1937 में गृहनगर काशी में हुआ ।

रचनाएँ – 

कामायनी , आँसू , झरना , प्रेम पथिक , लहर , कानन कुसुम , महाराणा का महत्व , 

भाव पक्ष – 

प्रसाद जी छायावाद के आधार स्तम्भ माने जाते हैं । इनका काव्य छायावाद की समस्त भाव – राशियों एवं कलात्मक सौन्दर्य से परिपूरित है ।

साहित्य में स्थान – 

प्रसाद जी आधुनिक हिन्दी कवियों में अन्यतम हैं । इनकी ‘ कामायनी ‘ महाकाव्य विश्व काव्य का श्रृंगार है । वाजपेयी जी ने इनके विषय में कहा है- ” प्रसाद जी काशी की महिमा थे और शक्ति के एकनिष्ठ उपासका ये शीर्षस्थ छायावादी कवि , सर्वश्रेष्ठ नाटककार तथा सफल कहानीकार के रूप में लब्धप्रतिष्ठ हैं ।

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