MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 1 मैं और मेरा देश

MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 1 मैं और मेरा देश (निबन्ध, कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’)

In this article, we will share MP Board Class 10th Hindi Solutions गद्य Chapter 1 मैं और मेरा देश Pdf, These solutions are solved subject experts from the latest edition books.

मैं और मेरा देश पाठ अभ्यास

 

मैं और मेरा देश अति लघु उत्तरीय प्रश्न 

 

प्रश्न 1.

पंजाब केसरी के नाम से कौन जाना जाता है ? 

उत्तर – 

पंजाब केसरी के नाम से लाला लाजपत राय को जाना जाता है । 

प्रश्न 2. 

‘ दीवार में दरार पड़ गई ‘ का आशय किससे है ? 

उत्तर – 

‘ दीवार में दरार पड़ गई ‘ से आशय लेखक के मन में जो पूर्णता का आनन्द भाव था उसमें उनको कमी का अनुभव होने से है । 

प्रश्न 3. 

जापानी युवक ने स्वामी रामतीर्थ को दिये गये फल के मूल्य रूप में क्या माँगा ? 

उत्तर – 

जापानी युवक ने स्वामी रामतीर्थ को दिये गये फल के मूल्य के रूप में माँगा कि ” आप अपने देश में जाकर किसी से यह न कहियेगा कि जापान में अच्छे फल नहीं मिलते ।

प्रश्न 4.

बूढ़े किसान ने राष्ट्रपति को कौन – सा उपहार दिया ?

उत्तर – 

बूढ़े किसान ने राष्ट्रपति को उपहार में पाव – भर शहद दिया ।

 

मैं और मेरा देश लघु उत्तरीय प्रश्न 

 

प्रश्न 1. 

तेजस्वी पुरुष लाला लाजपत राय की दो विशेषताएँ कौन – सी थीं ? 

अथवा 

लाला लाजपत राय की कोई दो विशेषताएँ लिखिए ।

उत्तर – 

पंजाब केसरी लाला लाजपत राय ने देश के बुरे दिनों में सहायता की । वे उन महापुरुषों में से थे जिन्होंने अपने खून से गौरव के दीप प्रज्ज्वलित किये । भयंकर अंधकार और तूफानों में वे दीपक नहीं बुझे । वे निरन्तर उस दीपक की रक्षा में लगे रहे । लाला लाजपत राय की दो विशेषताएँ र्थी – एक उनकी लेखनी जो ओज उत्पन्न करती थी और दूसरी उनकी वाणी जो आग उगलती थी । उनकी कलम और वाणी ने देश की स्वतंत्रता के आन्दोलन को उत्कर्ष तक पहुँचाया ।

प्रश्न 2. 

देहाती बूढ़ा राष्ट्रपति कमाल पाशा के पास क्यों गया था ? 

उत्तर – 

देहाती बूढ़ा राष्ट्रपति कमाल पाशा के जन्म दिन पर उन्हें उपहार देने गया था । उपहार में वह एक हंडिया में पाव भर शहद लेकर आया था । कमाल पाशा ने उस उपहार को सराहते हुए कहा ” दादा आज सर्वोत्तम उपहार तुमने ही भेंट किया क्योंकि इसमें तुम्हारे हृदय का शुद्ध प्यार है ।

प्रश्न 3. 

स्वामी रामतीर्थ जापानी युवक का उत्तर सुनकर क्यों मुग्ध हो गए ? 

उत्तर – 

स्वामी रामतीर्थ जब जापान गये तो रेल यात्रा में उन्हें कहीं फल नहीं मिले । स्टेशन पर खोजने पर फल न मिले तो उनके मुँह से निकल गया कि ‘ जापान में शायद अच्छे फल नहीं मिलते । ‘ यह बात पास खड़े एक जापानी युवक ने सुन ली । वह तुरन्त गया और एक टोकरी में ताजे फल ले आया । स्वामी रामतीर्थ ने फलों का मूल्य देना चाहा तो युवक ने कहा कि ‘ आप इनका मूल्य देना चाहते हैं तो वह यह है कि आप अपने देश में जाकर किसी से यह न कहियेगा कि जापान में अच्छे फल नहीं मिलते । ‘ यह उत्तर सुनते ही स्वामी रामतीर्थ उस युवक के देश – प्रेम को समझकर मुग्ध हो उठे । उस युवक में अपने देश के प्रति लगाव था , वह अपने देश की बुराई सहन नहीं कर सकता था । इसी भावना पर स्वामी रामतीर्थ मुग्ध हो गए । 

प्रश्न 4.

लेखक के अनुसार हमारे देश को किन दो बातों की सर्वाधिक आवश्यकता 

उत्तर – 

लेखक अनुभव करते हैं कि हमारे देश भारतवर्ष को दो बातों की अति आवश्यकता है । प्रथम शक्तिबोध और दूसरी सौन्दर्यबोध की । हमें अपने अन्तर में दृढ़ निश्चय कर लेना चाहिए कि हमारे किसी कार्य से हमारे देश की कमजोरी या हीनता को बल न मिले । हमारे कार्य राष्ट्र को सबल बनाने वाले हों । यह भी आवश्यक है कि हमारी रुचि श्रेष्ठ , सुन्दर तथा सकारात्मक हो । किसी भी अवसर पर हम अन्य देश को महान और अपने देश को हीन सिद्ध न करें । हमारे मन में हर कोने से देश के प्रति गौरव का भाव होना चाहिए । 

प्रश्न 5. 

देश के सामूहिक मानसिक बल का ह्रास कैसे हो रहा है ?

उत्तर – 

लोग क्लबों में, मुसाफिरखानों में, चौपालों पर, बसों में प्रायः चर्चा करते हैं कि हमारे देश में यह नहीं हो रहा, वह नहीं हो रहा । सब गड़बड़ है, बड़ी परेशानी है । दूसरे देशों के साथ तुलना करते हुए अपने देश को हीन और दूसरे देश को महान सिद्ध करने का प्रयास भी लोग करते हैं । इस तरह का व्यवहार राष्ट्र के लिए बहुत घातक है । उससे देश के शक्तिबोध को भारी चोट पहुँचती है । इसी के कारण सामूहिक मानसिक बल का ह्रास हो रहा है । आवश्यकता इस बात की है कि हम इसके विपरीत अपने देश की अच्छाइयों पर चर्चा करें और दूसरे देशों की तुलना में उसकी महानता को उजागर करें । 

 

मैं और मेरा देश दीर्घ उत्तरीय प्रश्न 

 

प्रश्न 1. 

‘जय’ बोलने वालों का महत्व प्रतिपादित कीजिए । 

उत्तर – 

जीवन एक युद्ध है । युद्ध में मात्र लड़ना ही महत्वपूर्ण नहीं है यदि लड़ने वालों को रसद न पहुँचे तो वे कैसे लड़ पायेंगे । किसान खेती में अन्न न उगाये तो रसद कहाँ से आयेगी । इस तरह हर स्तर के कार्य करने वालों का महत्व होता है । युद्ध में जय बोलने वालों का भी बड़ा महत्व होता है । जिस प्रकार क्रिकेट में तालियों की गड़गड़ाहट से खिलाड़ी के पैरों में बिजली का सा करंट लग जाता है । हीनता अनुभव कर रहे खिलाड़ी तालियों से चौकन्ने होकर खेलने लगते हैं वैसे ही युद्ध में जय – जयकार से लड़ने वालों का मनोबल बढ़ता है । वे कठिन – से – कठिन स्थिति का सामना करते हुए विजयी होने को तत्पर हो उठते हैं । जय – जयकार से उल्लास , संघर्ष की क्षमता तथा समर्पण का भाव बढ़ता है । लड़ने वाला स्वाभिमान से भर उठता है । अतः युद्ध में जय बोलने वालों का भी बहुत महत्व होता है । 

प्रश्न 2. 

जापान में शिक्षा लेने आये विद्यार्थी की कौन – सी गलती से उसके देश के माथे पर कलंक का टीका लग गया ? 

उत्तर – 

एक अन्य देश का युवक जापान में शिक्षा प्राप्त करने आया था वह पुस्तकालय से पढ़ने के लिए एक पुस्तक लाया । इस पुस्तक में कुछ दुर्लभ चित्र थे । इस विद्यार्थी ने पुस्तक से उन चित्रों को निकाल लिया । एक जापानी युवक ने उसे चित्र निकालते हुए देख लिया । उसने पुस्तकालय के अधिकारियों को इसकी सूचना दे दी । पुलिस आई और तलाशी लेने पर वे चित्र उसके कमरे से बरामद किये गये । उस विद्यार्थी को जापान से निकाल दिया गया । अपराधी को तो दण्ड मिलना ही चाहिए । यह बात मात्र यहीं तक नहीं रुकी , पुस्तकालय के बाहर बोर्ड पर मोटे अक्षरों में लिख दिया गया कि जिस देश का वह विद्यार्थी था वहाँ का कोई भी व्यक्ति इस पुस्तकालय में प्रवेश नहीं कर सकता है । इस प्रकार , उसकी छोटी – सी चोरी ने देश के माथे पर कलंक का टीका लगा दिया । 

प्रश्न 3. 

देश के शक्तिबोध को चोट कैसे पहुँचती है ?

उत्तर – 

हमें देश के शक्तिबोध का ध्यान हर स्तर पर , हर क्षण रखना चाहिए । हमें सावधान रहना चाहिए कि हमारे किसी छोटे – से – छोटे काम से भी देश की हीनता या कमजोरी को बल न मिले । दुर्भाग्यपूर्ण है कि चलती रेलों में , मुसाफिरखानों में , क्लबों में , बसों में , चौपालों पर चर्चा करते रहते हैं कि हमारे देश में यह नहीं है , वह नहीं हो रहा है । सब गड़बड़ है , बड़ी परेशानी है । इस प्रकार चर्चाओं में अपने देश की तुलना दूसरे देशों से करते हैं और अपने देश को हीन तथा दूसरे देश को महान सिद्ध करते हैं । इस प्रकार की चर्चाएँ देश के शक्तिबोध को गहरी चोट पहुँचाती हैं । इन चर्चाओं से देश का सामूहिक मनोबल गिरता है । हमें अपने देश की अच्छाइयों का गुणगान कर अपने देश को अन्य देशों से महान सिद्ध करना चाहिए । इससे हमारे शक्तिबोध को बल मिलेगा । 

प्रश्न 4. 

देश के सौन्दर्यबोध को आघात लगता है तो संस्कृति को गहरी चोट लगती है । ” इस कथन की विवेचना कीजिए । 

उत्तर – 

देश के सौन्दर्यबोध के प्रति लोगों में बहुत उदासीनता देखी जाती है । लोग केला खाकर उसका छिलका मार्ग में डाल देते हैं । अपने घर का कूड़ा – करकट बाहर फेंक देते हैं । गन्दे भावों को गन्दी भाषा में प्रकट करने में संकोच नहीं करते । इधर की उधर और उधर की इधर चुगली करते रहते हैं । अपना घर , गली , कार्यालय आदि गन्दा रखते हैं । धर्मशालाओं , होटलों , जीनों , अन्यान्य कोनों में पान की पीक थूकते हैं । पर्वो , मेलों , रेलों , खेल – कूदों में धक्कामुक्की करते हैं । इन सभी से सौन्दर्यबोध को भयंकर आघात लगता है । इस प्रकार के कार्यों से संस्कृति को गहरी चोट लगती है , संस्कृति हीनता की ओर अग्रसर होती है । अत : यह आवश्यक है कि उन स्थितियों से बचा जाये , ऐसे कार्य न किये जायें ।

प्रश्न 5. 

देश के लाभ और सम्मान के लिए नागरिकों के कर्तव्यों का वर्णन कीजिए । 

उत्तर – 

प्रत्येक देश का नागरिक अपने देश से जुड़ा होता है । देश के गौरव और हीनत्व का फल व्यक्ति को मिलता है और व्यक्ति की हीनता और गौरव का फल देश को मिलता है । ऐसी स्थिति में यह आवश्यक है कि व्यक्ति स्वयं को देश मानकर चले । जिस प्रकार वह अपने सम्मान के लिए छोटी – से – छोटी बात पर ध्यान देता है । उसी प्रकार , देश के सम्मान से जुड़ी छोटी – से – छोटी बात पर ध्यान दे । व्यक्ति का यह कर्त्तव्य है कि जैसे वह अपने सम्मान और साधनों से अपने जीवन में सहयोग पाता है वैसे ही देश के सम्मान और साधनों से सहयोग प्राप्त करे । वास्तविकता यह है कि व्यक्ति और देश को अलग करना सम्भव नहीं है ।

 

मैं और मेरा देश पाठ – सारांश 

इस निबन्ध में कन्हैयालाल मिश्र ‘ प्रभाकर ‘ ने मानव जीवन के समग्र विकास में घर नगर , समाज की भूमिका को रेखांकित किया है । फिर उन्होंने राष्ट्र के प्रति उसके कर्त्तव्य बोधक जगाने पर रचनात्मक ढंग से बल दिया है । उन्होंने कहा है कि अपने घर , पड़ौस एवं नगर में ममता , सहयोग , ज्ञान तथा आनन्द का उपहार पांकर भी मानव हीन बना रहता है । आवश्यकता इस बात की है कि समाज और राष्ट्र के प्रति जिस प्रकार कलम और वाणी दोनों के तेजस्वी पंजाब केसरी लाला लाजपत राय आदि ने अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया था वैसे ही वह सदैव राष्ट्रहित को तत्पर रहे । अपनी स्थिति के अनुरूप कोई भी स्तर समर्पण , त्याग का हो सकता है , किन्तु उसमें राष्ट्र गौरव का भाव विद्यमान होना चाहिए । राष्ट्र की हीनता को अपनी हीनता तथा राष्ट्र के गौरव को अपना गौरव मानने वाला एक पुरुष भी महान कार्य करने में सफल होगा । एक व्यक्ति ही राष्ट्र की हीनता तथा गौरव को गिरा और बढ़ा सकता है । देश के सच्चे नागरिक का दायित्व है कि वह राष्ट्र के प्रत्येक कार्य को अपना मानकर निष्ठापूर्वक करे । उसे पूर्ण शक्तिबोध और सौन्दर्य बोध के साथ श्रेष्ठ कार्य करने के प्रति सजग रहना चाहिए । देश की रक्षा , कृषि , व्यवसाय सभी कार्य देश हित के हैं । स्वच्छता , सद्भावना एवं देश – प्रेम सभी का ध्यान रखना आवश्यक है । अपने देश के गौरव की रक्षा हर स्तर पर करना मानव का पहला उत्तरदायित्व है । इसके लिए मतदान के अधिकार का लाभ उठाते हुए श्रेष्ठ महापुरुषों को पदासीन करना चाहिए ।

 

पाठ के कठिन शब्दार्थ 

ममता = अपनत्व । दुलार = प्यार । विशाल = बड़ा । संचित = एकत्रित । सीमा = दायरा । अपील = फिर से विचार की प्रार्थना । बहुमुखी = बहुत धाराओं वाला । रसद – खाने की सामग्री । साक्षी = गवाह । इन्कार = मना । मुग्ध = प्रसन्न । लांक्षित = बदनाम । उत्सव = समारोह । ह्रास = हानि । आघात = चोट । कसौटी = मानदण्ड , परख का आधार । सारथी = रथ हाँकने वाला । उत्तेजक = उत्तेजना जगाने वाले , भावना जाग्रत करने वाले । 

 

मैं और मेरा देश संदर्भ, प्रसंग सहित गद्यांशों की व्याख्या 

 

(1) एक दिन आनन्द की इस दीवार में दरार पड़ गई ; और तब कि अपने घर , अपने पड़ोस , अपने नगर की सीमाओं में ममता , सहारा , ज्ञान और आनन्द के उपहार पाकर भी मेरी स्थिति एकदम हीन है ; हीन भी इतनी कि मेरा कहीं भी कोई भी अपमान कर सकता है , एक मामूली अपराधी की तरह ; और मुझे यह भी अधिकार नहीं कि मैं उससे अपमान का बदला लेना तो दूर रहा उसके लिए कहीं अपील या दया – प्रार्थना कर सकूँ ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘मैं और मेरा देश’ नामक पाठ से लिया गया है । इसके लेखक श्री कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ हैं । 

प्रसंग – 

यहाँ पर व्यक्ति के सीमित क्षेत्र तक संकुचित रहने पर होने वाले बोध का वर्णन किया गया है । 

व्याख्या – 

लेखक अपने नगर में पूरी तरह स्थापित होने से स्वयं को पूर्ण मान रहे थे परन्तु एक उनका जो पूर्णता का आनन्द भाव था उसमें दरार पड़ गई । उन्हें अनुभव हुआ कि अपने घर , पड़ौस या नगर की सीमाओं तक रहने में हीनता ही है । इतनी सीमित ममता , सहयोग , ज्ञान और आनन्द ही पर्याप्त नहीं है । मैंने जाना कि यह हीनता बहुत अधिक है । इसके रहते मेरा कहीं भी किसी के द्वारा अपमान किया जा सकता है । मेरे साथ तुच्छ अपराधी जैसा व्यवहार किया जा सकता है । ऐसी स्थिति में मुझे उतना भी अधिकार नहीं होगा कि मैं अपने अपमान का बदला लेने में समर्थ हो जाऊँ । मैं अपने अपमान से आहत किसी प्रकार की दया की प्रार्थना करने की स्थिति में भी नहीं हूँ । 

विशेष – 

(1) इसमें सीमित से व्यापक होने के बोध की स्थिति का ज्ञान कराया गया है । (2) सरल , शुद्ध साहित्यिक खड़ी बोली में विषय का प्रतिपादन हुआ है । (3) आत्म विश्लेषणात्मक शैली का प्रयोग किया गया है । 

 

(2) वे तेजस्वी पुरुष थे स्वर्गीय पंजाब केसरी लाला लाजपत राय । अपने महान् राष्ट्र की पराधीनता के दीन दिनों में जिन लोगों ने अपने रक्त से गौरव के दीपक जलाये और जो घोर अंधकार और भयंकर बवण्डरों के झकझोरों में जीवनभर खेल , उन दीपकों को बुझने से बचाते रहे , उन्हीं में एक थे वे लालाजी । उनकी कलम और वाणी दोनों में तेजस्विता की अद्भुत किरणें थीं । 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘मैं और मेरा देश’ नामक पाठ से लिया गया है । इसके लेखक श्री कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ हैं । 

प्रसंग – 

इसमें राष्ट्र भक्त महापुरुषों के गरिमामय प्रभाव की महिमा का अंकन हुआ है । 

व्याख्या – 

‘ पंजाब केसरी ‘ राष्ट्र भक्त लाला लालपत राय परम तेजस्वी पुरुष थे । देश की पराधीनता के काल में अनेक महापुरुषों ने अपने रक्त से गौरव का दीप प्रज्ज्वलित किया । उन्होंने अंधकार और भयानक तूफानों के तीव्र झोकों को झेलते हुए आजादी के गरिमामय भाव के दीपक को बुझने से बचाया । उन महापुरुषों में लाला लाजपत राय का स्थान बहुत ऊँचा है । लाला जी की लेखनी तथा वाणी दोनों में अनुपम तेज का प्रकाश फूटता था । 

विशेष – 

(1) राष्ट्र भक्तों की गौरवमय परम्परा में लाला लाजपत राय के व्यक्तित्व का प्रभावी वर्णन हुआ है । (2) शुद्ध , साहित्यिक खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है । (3) विवेचनात्मक शैली में विषय का प्रतिपादन हुआ है । 

 

(3) जीवन को दर्शनशास्त्रियों ने बहुमुखी बताया है । उसकी अनेक धाराएँ हैं । सुना नहीं आपने कि जीवन एक युद्ध है ; और युद्ध में लड़ना ही तो काम नहीं होता । लड़ने वालों को रसद न पहुँचे तो वे कैसे लड़ें । किसान ही खेती न उपजाए तो रसद पहुँचाने वाले क्या करें और लो ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘मैं और मेरा देश’ नामक पाठ से लिया गया है । इसके लेखक श्री कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ हैं ।

प्रसंग – 

प्रस्तुत गद्यांश में जीवन युद्ध में प्रत्येक व्यक्ति के महत्व को स्वीकार किया गया है ।

व्याख्या – 

दार्शनिक चिन्तकों ने जीवन के विविध आयामों का उल्लेख किया है । उन आयामों की भी अनेक धाराएँ हैं । सत्य यह है कि जीवन एक युद्ध है । जैसे युद्ध में मात्र लड़ना ही काम नहीं होता है । इसके अतिरिक्त भी अनेक काम होते हैं । युद्ध में लड़ने वालों के लिए भोजन की सामग्री न पहुँच सकी तो वे युद्ध कैसे कर पायेंगे ? यदि किसान खेतों में अन्न पैदा न करें तो एभोजन सामग्री पहुंचाने वाले क्या कर सकेंगे ? इस प्रकार हर स्तर का अपना महत्व होता है और तो छोड़िए जय – जयकार करने वालों की भी बड़ी महत्ता होती है । 

विशेष – 

(1) जीवन के हर पहलू पर कार्य की आवश्यकता है , उसका महत्व भी है । (2) सरल , सुबोध साहित्यिक खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है । (3) व्याख्यात्मक शैली का प्रयोग किया है । 

 

(4) युद्ध में जय बोलने वालों का भी बहुत महत्व है । कभी मैच देखने का अवसर मिला ही होगा आपको ! देखा नहीं आपने कि दर्शकों की तालियों से खिलाड़ियों के पैरों में बिजली लग जाती है, और गिरते खिलाड़ी उभर जाते हैं । कवि – सम्मेलनों और मुशायरों की सफलता दाद देने वालों पर निर्भर करती है । इसलिए मैं अपने देश का कितना भी साधारण नागरिक न हूँ, अपने देश के सम्मान की रक्षा के लिए कुछ भी कर सकता हूँ । अकेला चना क्या भाड़ फोड़े – यह कहावत, मैं अपने अनुभव के आधार पर ही आपसे कह रहा हूँ – कि सौ फीसदी झूठ है । इतिहास साक्षी है, बहुत बार अकेले चने ने ही भाड़ फोड़ा है, और ऐसा फोड़ा है कि भाड़ में खिल – खिल ही नहीं हो गया, उसका निशान तक ऐसा छूमन्तर हुआ कि कोई यह भी न जान पाया कि वह बेचारा आखिर था कहाँ ?

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘मैं और मेरा देश’ नामक पाठ से लिया गया है । इसके लेखक श्री कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ हैं ।

प्रसंग – 

प्रत्येक स्तर के काम का पूरा – पूरा महत्व होता है । यह तथ्य पुष्ट किया गया है । 

व्याख्या – 

युद्ध लड़ने वालों , भोजन व्यवस्था करने वालों का ही नहीं जय – जयकार करने वालों का भी पूरा महत्व होता है । उदाहरणार्थ , क्रिकेट का ही मैच लीजिए , प्राय : देखा गया है कि जैसे – जैसे दर्शकों की तालियाँ बजती हैं वैसे – वैसे खिलाड़ियों के पैरों में बिजली का सा करंट लग जाता है । वे बड़ी तेजी से निष्ठापूर्वक खेलते हैं । जो खिलाड़ी हताश होने लगते हैं , तालियों की गड़गड़ाहट से वे भी सजग हो जाते हैं । कवि सम्मेलनों और मुशायरों में भी यही स्थिति होती है । दाद देने वालों पर इनकी सफलता आधारित रहती है । इसलिए साधारण – से – साधारण नागरिक होते हुए भी अपने राष्ट्र की रक्षा के लिए सब कुछ करने को तैयार रहना चाहिए । अकेला व्यक्ति भी बहुत करने की सामर्थ्य रखता है । इतिहास इस सत्य का प्रमाण है कि अकेले व्यक्ति ने महान कार्य करते हुए विरोधी का नामोनिशां मिटाकर राष्ट्र के गौरव की वृद्धि की है । अत : अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता । यह उक्ति पूरी तरह गलत है । 

विशेष – 

(1) हर स्तर के कार्य का महत्व बताया गया है । (2) एक व्यक्ति का कार्य भी राष्ट्र के गौरव को बढ़ा सकता है । (3) सरल , सुबोध एवं साहित्यिक खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है । (4) लाक्षणिक भाषायुक्त उद्धरण शैली का प्रयोग हुआ है । 

 

(5) हरेक नागरिक अपने देश के साथ बँधा हुआ है और देश की हीनता और गौरव 1335 का ही फल उसे नहीं मिलता , उसकी हीनता और गौरव का फल उसके देश को मिलता है । 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘मैं और मेरा देश’ नामक पाठ से लिया गया है । इसके लेखक श्री कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ हैं ।

प्रसंग – 

यहाँ बताया गया है कि व्यक्ति के कार्यों का सम्बन्ध देश के साथ जुड़ा रहता है । 

व्याख्या – 

प्रत्येक देश का नागरिक अपने देश से जुड़ा होता है । राष्ट्र का हीन भाव अथवा उत्थान भाव ही उसको फल देने वाला होता है । मानव के हीनत्व और गौरव के फल का सीधा सम्बन्ध उसके राष्ट्र से सम्बद्ध होता है । जैसे उसके कार्य होंगे वैसा ही उसके देश का यश – अपयश होगा । उसके कामों का प्रतिफल ही देश को मिलता है । 

विशेष – 

(1) नागरिक के हीन और श्रेष्ठ कार्य का प्रतिफल उसके राष्ट्र को मिलता है । (2) सरल , सुबोध खड़ी बोली का प्रयोग हुआ है । (3) विवेचनात्मक शैली को अपनाया है । 

 

(6) मैं अपने देश का नागरिक हूँ ; और मानता हूँ कि मैं अपना देश हूँ । जैसा मैं अपने लाभ और सम्मान के लिए हरेक छोटी – छोटी बात पर ध्यान देता हूँ , वैसा ही मैं अपने देश के लाभ और सम्मान के लिए भी छोटी – छोटी बातों पर ध्यान दूं । यह मेरा कर्तव्य है और जैसे मैं अपने सम्मान और साधनों से अपने जीवन में सहारा पाता हूँ , वैसे ही देश के सम्मान और साधनों से भी सहारा पाऊँ – यह मेरा अधिकार है । बात यह है कि मैं और मेरा देश दो अलग चीज तो हैं ही नहीं ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘मैं और मेरा देश’ नामक पाठ से लिया गया है । इसके लेखक श्री कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ हैं ।

प्रसंग – 

यहाँ बताया गया है कि नागरिक को देश – हित की छोटी – से – छोटी बात पर भी पूरा ध्यान देना आवश्यक है ।

व्याख्या – 

लेखक कहता है कि मैं अपने देश का नागरिक होने के कारण मानता हूँ कि अपना देश मैं ही हूँ । मुझे देश के हित – अहित सम्बन्धी छोटी – से – छोटी बात का पूरा ध्यान उसी प्रकार रखना है जिस प्रकार अपने व्यक्तिगत लाभ – हानि का रखा जाता है । मेरा धर्म है कि मैं जिस प्रकार अपने स्वाभिमान तथा साधनों से सहयोग प्राप्त करता हूँ उसी प्रकार देश के सम्मान तथा साधनों से भी सहयोग पाऊँ । वास्तविकता तो यह है कि मैं और मेरा देश एक ही है । उनमें किसी प्रकार का अलगाव नहीं है । 

विशेष – 

(1) व्यक्ति तथा राष्ट्र के हित – अहित एक ही होते हैं । (2) शुद्ध , साहित्यिक भाषा में विषय का प्रभावी प्रस्तुतीकरण हुआ है । (3) आत्मबोधपरक शैली में विषय को स्पष्ट किया गया है । 

 

(7) महत्व किसी कार्य की विशालता में नहीं है , उस कार्य के करने की भावना में है । बड़े – से – बड़ा कार्य हीन है, यदि उसके पीछे अच्छी भावना नहीं है और छोटे – से – छोटा कार्य भी महान है , यदि उसके पीछे अच्छी भावना है 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘मैं और मेरा देश’ नामक पाठ से लिया गया है । इसके लेखक श्री कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ हैं ।

प्रसंग – 

यहाँ बताया गया है कि कार्य से अधिक कार्य के मूल में होने वाली भावना का होता है । 

व्याख्या – 

जीवन अध्ययन एवं अनुभव के आधार पर लेखक कहते हैं कि महत्त्व कार्य की महानता या लघुता का नहीं होता है । छोटा – सा कार्य भी महानता का परिचायक हो सकता है . और बहुत बड़ा कार्य हीनता का कारण बन सकता है । महत्व किये गये कार्य के मूल में होने वाली भावना का होता है । अच्छी भावना से किया गया छोटा – सा कार्य भी महान् हो सकता है । स्पष्ट है कि काम से अधिक महत्वपूर्ण उसके पीछे की भावना होती है ।

विशेष – 

(1) सद्भावना से किया गया कार्य ही महान होता है । (2) यदि भली भावना नहीं है तो बड़ा कार्य भी हीनता का परिचायक होगा । (3) सरल, सुबोध , साहित्यिक खड़ी बोली विषय को समझाया गया है । (4) विवेचनात्मक शैली का प्रयोग हुआ है । 

 

(8) हमारे देश को दो बातों की सबसे पहले और सबसे ज्यादा जरूरत है । एक शक्तिबोध और दूसरा सौन्दर्यबोध । बस, हम यह समझ लें कि हमारा कोई भी काम ऐसा न हो जो देश में कमजोरी की भावना को बल दे या कुरुचि की भावना को ही ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘मैं और मेरा देश’ नामक पाठ से लिया गया है । इसके लेखक श्री कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ हैं ।

प्रसंग – 

यहाँ देश के लिए शक्तिबोध और सौन्दर्यबोध की आवश्यकता को रेखांकित किया गया है । 

व्याख्या – 

भारतवर्ष के उत्थान के लिए दो बातें बहुत आवश्यक हैं , प्रथम है – शक्ति का ज्ञान और दूसरा है – सौन्दर्यबोध । हमें किसी भी स्थिति में ऐसा काम नहीं करना है जो देश की हीनता या निर्बलता का आभास दे । हमें ऐसा कोई काम भी नहीं करना है , जो देश के कुरुचिपूर्ण स्वभाव का परिचय दे । 

विशेष – 

(1) देश हित के लिए शक्तिबोध एवं सौन्दर्य – बोध की महत्ता को इंगित किया है । (2) साहित्यिक खड़ी बोली में विषय को प्रस्तुत किया गया है । (3) विवेचनात्मक शैली का प्रयोग हुआ है । 

 

(9) क्या आप कभी केला खाकर छिलका रास्ते में फेंकते हैं ? अपने घर का कूड़ा बाहर फेंकते हैं या मुँह से गन्दे शब्दों में गन्दे भाव प्रकट करते हैं ? इधर की उधर, उधर की इधर लगाते हैं ? अपना घर, दफ्तर, गली गन्दा रखते हैं ? होटलों – धर्मशालाओं में या ऐसे ही दूसरे स्थानों में, जीनों में, कोनों में पीक थूकते हैं ? उत्सवों, मेलों, रेलों और खेलों में ठेलमठेल करते हैं और इसी तरह किसी भी रूप में क्या सुरुचि और सौन्दर्य को आपके किसी काम से ठेस लगती है ? 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘मैं और मेरा देश’ नामक पाठ से लिया गया है । इसके लेखक श्री कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ हैं ।

प्रसंग – 

यहाँ पर सुरुचि सम्पन्नता पर बल दिया गया है । 

व्याख्या – 

व्यक्ति को सुरुचि सम्पन्न होना चाहिए । केले खाकर उसका छिलका मार्ग में डाल देना या घर का कूड़ा बाहर रास्ते में फेंक देना अनुचित है । अपने मुँह से गन्दे भावों को गन्दी भाषा में व्यक्त करना या इधर की बात उधर भिड़ाकर चुगली करना भी उचित नहीं है । अपने घर , बाहर गन्दगी रखना या होटलों , धर्मशालाओं , किसी जीने , कोने में पान चबाकर उसकी पीक थूकना बहुत गलत कार्य है । मेलों , पौं , रेलों अथवा खेल – कूदों में धक्कामुक्की करना अशिष्टता का परिचायक है । ये सभी काम आपकी कुरुचि का संकेत करते हैं तथा सुरुचि को चोट पहुँचाते हैं । अत : उनसे बचकर सुरुचि का विकास करना हमारा धर्म है । 

विशेष – 

(1) सुरुचि का विकास करके ही मानव अपना तथा अपने देश का हित साधन कर सकता है । (2) सरल , सुबोध , साहित्यिक खड़ी बोली का प्रयोग हुआ है । (3) प्रश्नवाचक शैली में विषय को स्पष्ट किया है । 

 

(10) मेरा यानी हरेक नागरिक का यह कर्त्तव्य है कि वह जब भी कोई चुनाव हो , मनुष्य को अपना मत दें ; और मेरा अधिकार है कि मेरा मत दिये बिना कोई भी आदमी, वह संसार का सर्वश्रेष्ठ महापुरुष ही क्यों न हो, किसी अधिकार की कुर्सी पर न बैठ सके । 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘मैं और मेरा देश’ नामक पाठ से लिया गया है । इसके लेखक श्री कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ हैं ।

प्रसंग – 

देश हित में अपने मताधिकार के सही उपयोग पर बल दिया गया है । 

व्याख्या – 

देश के कल्याण के लिए प्रत्येक देशवासी नागरिक का यह पवित्र कर्त्तव्य है कि वह चुनाव के समय अपने मत का सही प्रयोग करे । अपने मत के अधिकार के महत्व को समझकर सही व्यक्ति को ही चुनकर भेजें । अपनी क्षमता इतनी बढ़ा लें कि संसार का महापुरुष भी हमारे मत के बिना उच्च पद च्च पद पर आसीन न हो सक आसीन न हो सके । लोकतंत्र के इस अधिकार को समझना आवश्यक है । 

विशेष – 

(1) लोकतांत्रिक पद्धति में मताधिकार महत्व को समझ उसका प्रयोग देश हित में करने का आह्वान किया गया है । (2) शुद्ध, साहित्यिक खड़ी बोली में विषय को स्पष्ट किया गया है । (3) विवेचनात्मक शैली का प्रयोग किया गया है ।

 

कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर लेखक परिचय

जीवन परिचय – 

श्री कन्हैयालाल मिश्र ‘ प्रभाकर ‘ का जन्म सन् 1906 ई . में पुरोहित पं. रामदत्त मिश्र के यहाँ हुआ । पारिवारिक स्थिति के कारण आपकी विद्यालयी शिक्षा भली प्रकार न हो सकी । मिश्रजी ने अपने प्रयास से ही संस्कृत , अंग्रेजी आदि का अध्ययन किया । जब आप खुर्जा संस्कृत विद्यालय के छात्र थे तभी राष्ट्र नेता मौलाना आसफ अली का भाषण सुना । उससे प्रभावित होकर आपने परीक्षा त्याग दी और स्वतन्त्रता संग्राम में कूद पड़े । इसके बाद आपने समस्त जीवन देश – सेवा को समर्पित कर दिया । आप प्रारम्भ से ही राष्ट्रीय नेताओं के सम्पर्क में रहे हैं । मई 1995 में आपका देहावसान हो गया । राष्ट्रीयता के भाव से ओत – प्रोत होकर समाज तथा साहित्य की सेवा का व्रत लेने वाले मिश्रजी पत्रकारिता की ओर आकर्षित हुए । इसके माध्यम से ही आपने विविध नवीन विधाओं के साहित्य का सृजन कर हिन्दी को समृद्ध किया । नवीन मानव मूल्यों की स्थापना करके आपने हिन्दी साहित्य में विशेष स्थान बनाया । प्रभाकर जी ने हिन्दी पत्रकारिता का मार्गदर्शन करते हुए निहित स्वार्थों से परे समाज हितकारी आदर्शों का समर्थन किया है । अन्याय , शोषण तथा अत्याचार के प्रति आपने तीव्र रोष प्रकट किया है , आपका दृष्टिकोण आशावादी रहा है । कृतियाँ – प्रभाकरजी ने संस्मरण , रेखाचित्र , यात्रावृत्त , रिपोर्ताज आदि के रूप में पर्याप्त साहित्य लिखा है । 

उनकी प्रमुख प्रकाशित कृतियाँ इस प्रकार हैं-

(1) आकाश के तारे

(2) भूले बिसरे चेहरे

(3) धरती के फूल

(4) दीप जले शंख बजे

(5) जिन्दगी मुस्कराई 

(6) माटी हो गई सोना

(7) हमारी जापान यात्रा

(8) महके आँगन चहके द्वार 

साहित्य में स्थान – 

कन्हैयालाल मिश्र ‘ प्रभाकर ‘ ने अपने निबन्धों में भाव , विचार और कथन की पुष्टि के लिए संस्कृत , हिन्दी आदि के उद्धरणों का प्रयोग किया है । कहीं – कहीं कवियों की पंक्तियाँ भी अपने कथन के समर्थन में उद्धृत की हैं । उन्होंने हिन्दी लेखन को विविध दिशाएँ प्रदान की हैं । निबन्ध , संस्मरण , रेखाचित्र , यात्रावृत्त आदि पर आपने साधिकार लेखनी चलायी । हिन्दी साहित्य में सशक्त गद्यकार के रूप में आपका विशिष्ट सम्मान है ।

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