MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 2 महापुरुष श्रीकृष्ण

MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 2 महापुरुष श्रीकृष्ण (निबन्ध, वासुदेव शरण अग्रवाल)

महापुरुष श्रीकृष्ण अभ्यास

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महापुरुष श्रीकृष्ण अति लघु उत्तरीय प्रश्न 

 

प्रश्न 1. 

‘ कृष्ण द्वैपायन ‘ को देश किस नाम से जानता है ? 

उत्तर – 

कृष्ण द्वैपायन को देश वेदव्यास नाम से जानता है । 

प्रश्न 2. 

भारतीय साहित्य का एक बहुत बड़ा भाग किस चरित्र से अनुप्राणित है ? 

उत्तर – 

भारतीय साहित्य का एक बहुत बड़ा भाग कृष्ण के चरित्र से अनुप्राणित है । 

प्रश्न 3. 

गीताशास्त्र के महान् उपदेशक कौन हैं ?

उत्तर – 

गीताशास्त्र के महान् उपदेशक श्रीकृष्ण हैं ।

प्रश्न 4. 

कृष्ण , बलदेव और कुंती , पाण्डवों के घनिष्ठ सम्बन्धों का सूत्रपात्र किस स्थान पर हुआ था । ? 

उत्तर – 

कृष्ण , बलदेव और कुंती , पाण्डवों के घनिष्ठ सम्बन्धों का सूत्रपात्र कुरुक्षेत्र में 

प्रश्न 5. 

कृष्ण ने शिशुपाल का वध कर महिष्मति की गद्दी पर किसे बैठाया ? 

उत्तर – 

कृष्ण ने शिशुपाल का वध कर महिष्मति की गद्दी पर उसके पुत्र धृष्टकेतु को बैठाया । 

 

महापुरुष श्रीकृष्ण लघु उत्तरीय प्रश्न 

 

प्रश्न 1. 

भारतीय राष्ट्रीय जीवन पर किन दो समकालीन व्यक्तियों के उदात्त मस्तिष्क की गहरी छाप है ?

उत्तर – 

भारतवर्ष में कई महापुरुषों ने मानव जाति के विचारों को स्थायी रूप से प्रभावित किया है । महापुरुषों की इस श्रृंखला में श्रीकृष्ण का नाम विशेष उल्लेखनीय है । आज से लगभग पाँच हजार साल पहले एक ही समय में दो महान् विभूतियों ने जन्म लिया था । उन्होंने भारत के राष्ट्रीय जीवन को गहन रूप में प्रभावित किया । इन दोनों ही महापुरुषों के नाम कृष्ण थे । तत्कालीन इतिहासकारों ने उन दोनों में अन्तर स्थापित करने की दृष्टि से एक का नाम द्वैपायन कृष्ण कर दिया था । ये द्वैपायन कृष्ण ही महर्षि वेदव्यास के नाम से जाने जाते हैं । दूसरे कृष्ण देवकी के पुत्र थे जिनको कृष्ण नाम से जाना जाता है । इन दोनों ही समकालीन व्यक्तियों के उदात्त मस्तिष्क की गहरी छाप भारतीय राष्ट्रीय जीवन पर है । 

प्रश्न 2. 

महर्षि वेदव्यास क्यों प्रसिद्ध हैं ? 

उत्तर – 

आज से पाँच हजार वर्ष पूर्व जन्म लेने वाले द्वैपायन – कृष्ण ही महर्षि वेदव्यास के नाम से विख्यात हैं । वे परम विद्वान तथा अद्भुत मेधा – सम्पन्न थे । उनकी प्रतिभा से भारतीय जीवन अन्तर तक प्रभावित है । ज्ञान गरिमा से अभिमण्डित व्यास जी ने महान कार्य किये । उन्होंने वेदों का वर्तमान रूपों में संकलन करने का महत्वपूर्ण कार्य किया । महाभारत , वेदति सूत्र और पुराणों की रचना का विलक्षण कार्य किया । महाभारत में यद्यपि कौरवों और पाण्डवों के युद्ध का वर्णन है , किन्तु इस ग्रन्थ में जीवन के प्रत्येक पक्ष पर प्रकाश डाला गया है । जीवन की प्रत्येक समस्या का समाधान महाभारत में मिलता है । इस प्रकार , अपने ज्ञान – गौरव के लिए महर्षि वेदव्यास प्रसिद्ध हैं । 

प्रश्न 3. 

श्रीकृष्ण ने एक – दूसरे ही प्रकार के जगत में कब प्रवेश किया ? 

उत्तर – 

श्रीकृष्ण अपने जन्म से पूर्व ही आदर्श मानव के चरित्रों के लिए चर्चित हो गये थे । देवकी और वासुदेव को इसी कारण से बन्दीगृह में रखा गया था । जन्म के बाद के उनके अद्भुत बाल – चरित्र भी भारतीय जीवन में चर्चा का विषय बन चुके थे । इसके बाद श्रीकृष्ण ने एक – दूसरे ही प्रकार के जगत में प्रवेश किया । यह जीवन के कठोर सत्यों से भरा जगत था । वृन्दावन से मथुरा आने तक कृष्ण ने इस जीवन में प्रवेश किया । उन्होंने प्रथम परिवर्तन शूरसेन जनपद में किया । यहाँ आतताई कंस का वध करके उनके पिता उग्रसेन को गद्दी पर प्रतिष्ठित किया । दुष्टों के दलन का यह क्रम जीवन पर्यन्त चलता रहा ।

प्रश्न 4. 

मस्तिष्क साधना हेतु श्रीकृष्ण कहाँ गये , वहाँ उन्हें क्या लाभ हुआ ? 

उत्तर – 

वृन्दावन – मथुरा में रहते हुए अन्यान्य अद्भुत कार्यों से श्रीकृष्ण चचित हो गये तैयारी कर ली थी , परन्त मस्तिष्क की साधना का संयोग उनको नहीं मिला था । इस अभाव की थे । उन्होंने अपने भाई बलदेव के साथ यमुना के तट पर ग्वालाओं के मध्य रहकर जीवन की बड़ी पूर्ति के लिए उन्होंने काशी में सान्दीपनि मुनि के गुरुकुल में प्रवेश लिया । दो विभूतियों काम पुरोहित गर्गाचार्य और विद्याचार्य सान्दीपनि का श्रीकृष्ण के साथ अत्यन्त मधुर सम्बन्ध है । गोला के उपदेशक श्रीकृष्ण के ज्ञान का बीजारोपण ऋषियों की ज्ञान परम्परा से तपस्वी ब्राह्मणों के द्वारा ही किया गया था । वहीं पर कृष्ण की शिक्षा सम्पन्न हुई । 

प्रश्न 5. 

कृष्ण जन्म सम्बन्धी कुछ तथ्य लिखिये । 

उत्तर – 

भारतीय जीवन को पूरी तरह प्रभावित करने वाले श्रीकृष्ण का जन्म बन्दीगृह में हुआ था । आज से लगभग पाँच हजार वर्ष पूर्व की बात है । शूरसेन के आतताई राजा कंस को जैसे ही पता लगा कि उसकी बहिन देवकी का आठवा पुत्र उसका वध करेगा । वह चिन्तित हो उठा । उसने अपनी बहिन देवकी और बहनोई वासुदेव को बन्दीगृह में डाल दिया तथा उनकी प्रत्येक संतान को पैदा होते ही मारने का निर्णय लिया । उसका सोचना था कि जब देवकी की कोई संताल बचेगी ही नहीं तो वध कौन करेगा , किन्तु उसका सोचना व्यर्थ सिद्ध हुआ और भाद्रपद माह की अष्टमी बुधवार को , रोहिणी नक्षत्र योग में आधी रात के समय बन्दीगृह में कृष्ण का जन्म हुआ । 

प्रश्न 6. 

श्रीकृष्ण हस्तिनापुर क्यों गये ? हस्तिनापुर जाकर कृष्ण ने क्या किया ? 

उत्तर – 

श्रीकृष्ण का परिचय कुरुक्षेत्र में कुन्ती और पाण्डवों से हो गया था । इस सम्पर्क से उनकी राजनीतिक प्रवृत्ति को बढ़ावा मिला जिसका उपयोग उन्होंने महाभारत के समय किया । भारतीय इतिहास की इस भयंकर घटना को रोकने का भरसक प्रयास श्रीकृष्ण ने किया । श्रीकृष्ण पाण्डवों से सभी प्रकार के अधिकार लेकर सन्धि के लिए हस्तिनापुर गये । वहाँ उन्होंने धृतराष्ट्र की सभा में जो ओजस्वी भाषण दिया , उसका प्रभाव आज तक भारतीय इतिहास में है । उन्होंने दुर्योधन को समझाया कि ‘ शान्ति से ही तुम्हारा और जगत का कल्याण होगा किन्तु दुर्योधन ने स्पष्ट कह दिया कि पाण्डवों को सुई की नोंक बराबर भी भूमि नहीं दी जायेगी । अत : दुर्योधन की जिद के कारण श्रीकृष्ण का संधि का प्रयास सफल न हो सका और उनके न चाहते हुए भी महाभारत का महाभीषण एवं विनाशकारी युद्ध हुआ ।

 

महापुरुष श्रीकृष्ण दीर्घ उत्तरीय प्रश्न 

 

प्रश्न 1. 

श्रीकृष्ण का जीवन तो एक काव्य ही है । ” इस उक्ति को सिद्ध कीजिए । 

उत्तर – 

जिसके जन्म से पूर्व ही उसके आगमन के भय के कारण उसके माता – पिता की स्वतंत्रता छिन गई हो वह बालक निश्चय ही अद्भुत होना चाहिए । हुआ भी यही । जन्म के पूर्व से चर्चित श्रीकृष्ण की बचपन की अनेक लीलाओं की चर्चा लोक में व्याप्त हो गई । उनको उन रसमयी मधुर लीलाओं का आनन्द जन – मानस को प्रसन्न करना था । आगे चलकर उन्होंने जो लोकरक्षक की सशक्त भूमिका का निर्वाह किया वह और अधिक लोकप्रिय हुई । . कंस , शिशुपाल , जरासंध , शाल्वराज , नरक एवं मुर आदि निरंकुश शासक जो लोकपक्षीय परम्परा को , अपनी राज शक्ति के दुरुपयोग से निर्बल बना रहे थे , उनका संहार किया । उन्होंने उनके स्थान पर उनके परिजनों को गद्दी सौंप दी । उनका समस्त जीवन इसी प्रकार के लोक कल्याणकारी कार्यों में व्यतीत हुआ । उन्होंने हस्तिनापुर जाकर कौरवों और पाण्डवों के महाभारत को टालने का हर प्रयास किया । इस प्रकार कृष्ण का समस्त जीवन एक सघनता से परिपूर्ण काव्य है जिसमें पूर्ण आनन्दानुभूति करने की क्षमता है । 

प्रश्न 2. 

श्रीकृष्ण ने रमणीय बाल चरित्रों की सुखदायी भूमिका के रूप में कौन – कौन से कार्य किए

उत्तर – 

श्रीकृष्ण के जन्म से पूर्व ही उनके विलक्षण चरित्र की चर्चाएँ लोक में प्रचलित धीं । उन चर्चाओं ने ही उनके माता – पिता की स्वतंत्रता भी छीन ली थी । जन्म के बाद तो उनका बचपन विविध रस – रंगमयी लीलाओं का सघन समवाय है । नटखट कृष्ण का माँ यशोदा को चकित करना , उनसे हठ करना , अपनी बात मनवाना , गाय चराने जाना , ग्वाल – बालों के साथ खेलकूद करना , वंशी वादन , रास रचाना , गीत गाना , गोपियों की दही – मक्खन लूटना , मक्खन चुराना , बछड़े – गाय खोलकर भगा देना आदि कितने ही बाल चरित्र हैं जो लोगों के हृदय को सुख का अनुभव कराते हैं । यमुना नदी , उसके किनारे के वन , वहाँ के पीलू वृक्षों पर छाई सुखद लताओं , कुँजों , वाटिकाओं में उनके बाल – चरित्रों की लीलाएँ आज भी प्रतिध्वनित हैं । गोचारण , कालिया दहन , वंशी वादन , माखन चोरी , वस्त्र हरण आदि लीलाओं के द्वारा कृष्ण ने मनोरंजन के साथ अनेक संकट दूर किये । कंस का वध करके लोक मानस को आनन्द प्रदान कराया । उन्होंने अनेक दुष्टों का दमन किया । 

प्रश्न 3. 

हस्तिनापुर से सम्पर्क के पश्चात् श्रीकृष्ण को जो अनुभव हुआ उसे अपने शब्दों में लिखिये । 

उत्तर – 

सान्दीपनि गुरु के गुरुकुल से शिक्षा सम्पन्न करने के तुरन्त बाद ही श्रीकृष्ण हस्तिनापुर के सम्पर्क में आ गये । कुरुक्षेत्र में कुन्ती एवं पाण्डवों से उनका हुआ परिचय निरन्तर गहरा होता गया । उन्होंने वहाँ अनुभव किया कि कुछ निरंकुश शासक भारत की लोक – पक्षीय परम्परा को निर्बल बनाने के लिए अपनी राज्य – शक्ति का दुरुपयोग कर रहे थे । उन्होंने उनके विरुद्ध संघर्ष का निर्णय लिया । वे लोकपक्ष के समर्थक एवं रक्षक थे । जैसे – जैसे कारण बनते गये एक – एक अत्याचारी शासक से उनका संघर्ष हुआ । उन्होंने जरासंध , शिशुपाल , नरक , मुर , शाल्वराज आदि का वध किया । 

प्रश्न 4. 

श्रीकृष्ण के बुद्धि – कौशल के आगे कौन – कौन से अराजक व्यक्तित्व परास्त हुए ? 

उत्तर – 

श्रीकृष्ण का बुद्धि – कौशल विलक्षण था । जो भी उनके सामने आया उसे पराजित होना पड़ा । वाणासुर , कलिंगराज , काशिराज उनके बुद्धि – कौशल के आगे परास्त हुए । कृष्ण की राजनीतिक बुद्धि अद्भुत थी । उनका मंत्र अचूक था । जहाँ पर कोई युक्ति काम न कर पाये वहाँ श्रीकृष्ण की युक्ति काम करती थी । धृतराष्ट्र , अर्जुन आदि कितने ही शासक , वीर उनके कौशल की सराहना करते थे । उनके समक्ष बड़े – बड़े आतताई शासक , बलवान क्षण भर भी सामना करने का साहस न कर सके । अपने बुद्धि – कौशल के बल पर ही उन्होंने अपनी विजय पताका को चतुर्दिक फहराया । 

प्रश्न 5. 

” महाभारत का युद्ध भारतीय इतिहास की एक दारुण घटना है । ” इस उक्ति की सार्थकता में अपने विचार प्रकट कीजिये ।

उत्तर – 

महाभारत का युद्ध भारत के इतिहास की सबसे भयंकर एवं विनाशकारी घटना थी । इस प्रलयकारी युद्ध में गान्धार , वाल्दीक , काम्बोज , कैकय , सिन्धु , मद्र आदि देशों के योद्धा दुर्योधन की ओर से संघर्षरत हुए थे । पाण्डवों की ओर से विराट , पांचाल , काशि , चेदि , संजय आदि वंशों के योद्धा युद्ध के लिए आये थे । प्रायः समस्त भारतीय शासक इस युद्ध में किसी – न – किसी पक्ष की ओर से लड़ रहे थे । इस विनाशकारी घटना को रोकने का हर प्रयास श्रीकृष्ण ने किया । वे पाण्डवों से सभी प्रकार के अधिकार लेकर कौरवों से सन्धि करने हस्तिनापुर गये । उन्होंने दुर्योधन को समझाया कि शान्ति से ही तुम्हारा तथा संसार का कल्याण होगा परन्तु दुर्योधन सुई की नोंक के बराबर भी भूमि पाण्डवों के लिए छोड़ने को तैयार न हुआ । फलस्वरूप यह दारुण युद्ध हुआ ।

प्रश्न 6. 

श्रीकृष्ण को सोलह कलाओं का अवतार क्यों कहा गया है ? 

उत्तर – 

श्रीकृष्ण को सोलह कलाओं का अवतार माना गया है । इस संसार में भिन्न – भिन्न चीजों की माप के लिए अलग – अलग परिमापों का प्रयोग है । ठोस वजन , तरल पदार्थ , समय , दूरी आदि सभी के नापने के लिए भिन्न – भिन्न नाप हैं । इसी तरह मानव की पूर्णता की नाप के लिए कला का प्रयोग होता है । चन्द्रमा जब पूर्ण होता है , तब सोलह कलाओं वाला कहलाता है । स्पष्ट है कि कृष्ण की सोलह कला की बात इसलिए कही जाती है कि वे मानवी विकास के पूर्णतम आदर्श थे । नृत्य , गीत , संगीत , वारित्र , वाणी कौशल , राजनीति , आध्यात्म , योग , ज्ञान , व्यवहार आदि के पूँजीभूत रूप श्रीकृष्ण थे । गाय दुहने से लेकर राजसूय यज्ञ में पुरोहितों के चरण धोने वाले कृष्ण , दीन सुदामा की मित्रता से लेकर गीता का उपदेश देने वाले योगेश्वर कृष्ण के अन्यान्य रूपों में अनेक रंग – बिरंगी किरणों के दर्शन होते हैं । उन्होंने यमुना तट पर प्रकृति के स्वच्छन्द वातावरण में पील वृक्षों पर लहलहाती लताओं कुँजों के , वाटिकाओं , ग्वाल – वालों , गायों के मध्य रहते किशोरावस्था में पदार्पण किया । किशोरावस्था में ही उन्होंने आततायी कंस का वध किया । मस्तिष्क साधना के लिए उनको मुनि सान्दीपनि के गुरुकुल में प्रवेश दिया गया । वहाँ पूर्ण शिक्षित होकर निकले ही थे कि उनका परिचय कुरुक्षेत्र में कुन्ती एवं पाण्डवों से हुआ । इस परिचय के साथ ही उनकी राजनीतिक प्रवृत्ति को बढ़ावा मिला । हस्तिनापुर पहुंचकर उन्होंने अनुभव किया कुछ निरंकुश शासक भारत की लोकपक्षीय – परम्परा को अपनी राज्य – शक्ति के दुरुपयोग से निर्बल कर रहे हैं । उन्होंने ऐसे दुष्ट शासकों – जरासंध , शिशुपाल , नरक एवं मुर , शाल्वराज आदि का वध कर दिया । उनके बुद्धि कौशल के समक्ष वाणासुर , कलिंगराज आदि परास्त हो गये थे । श्री कृष्ण विलक्षण व्यक्तित्व के धनी थे । उनके नेत्र अमोघ थे । धृतराष्ट्र , अर्जुन आदि वीर उनकी महिमा जानते थे । उन्होंने गीता का ज्ञान देकर भारतीय जीवन को आध्यात्म का मार्ग दिखाया । वे सोलह कला सम्पन्न मानव के पूर्ण आदर्श थे । उनका चरित्र मानवीय विकास के मानदण्ड के रूप में स्थित है । 

पाठ के कठिन शब्दार्थ 

सहस्त्र – हजार । उदात्त- उच्च , विकसित । अप्रतिहत = अबाधित , अपराजित । आख्यान = वृत्तान्त । असंख्य = अनगिनत , अनेक । अनुप्रासित = पोषित । अतीत- बीता हुआ । जिज्ञासुओं = जानने के इच्छुक । कौतूहल = उत्सुकता । बन्दीगृह = कारागार , जेल । आभास = झलक । उत्पीड़न = जुल्म करना । उच्छृखल = हल्के स्वभाव के । लोकपीड़क = प्रजा को सताने वाले । सत्ताधारी- शासक , राजा । अविचल = अटल । कंस – निपात – कंस के पतन । अतिमानवी = महामानव के । विटपों – वृक्षों । मल्ल विद्या = कुश्ती की शिक्षा । प्रतिपालन = पालन – पोषण । प्राप्तव्य = प्राप्त करने योग्य । राज्यच्युत = राजा की गद्दी से हटाना । पदार्पण = प्रवेश । प्रविष्ट = दाखिल । आर्ष = ऋषिकृत , वैदिक । धनुर्धर = धनुषधारी । पार्थ = अर्जुन । उत्तेजना = बढ़ावा । वृष्णि = यादव ! निरंकुश = नियंत्रणहीन । कण्टक = काँटा । अमोघ अचूक । युक्ति = उपाय । दारुण = भयंकर । अपरिहार्य – न रोका जाने वाला । मानवी = मानव की । समवाय = संयोग , मेल । आत्मिक = आत्मा के । उच्चता = ऊँचाई । 

 

महापुरुष श्रीकृष्ण संदर्भ, प्रसंग सहित गद्यांशों की व्याख्या 

 

(1) भारतवर्ष के जिन महापुरुषों का मानव – जाति के विचारों पर स्थायी प्रभाव पड़ता है , उनमें श्रीकृष्ण का स्थान प्रमुख है । आज से लगभग पाँच सहस्र वर्ष पूर्व एक ही समय में ऐसे दो व्यक्तियों का जन्म हुआ जिनके उदात्त मस्तिष्क की छाप हमारे राष्ट्रीय जीवन पर बहुत गहरी पड़ी है । संयोग से उन दोनों का नाम कृष्ण था । समकालीन इतिहास – लेखकों ने दोनों को भेद करने के लिए एक को ‘ द्वैपायन कृष्ण ‘ कहा है , जिन्हें आज सारा देश महर्षि वेद व्यास के नाम से जानता है और जिनके मस्तिष्क की अप्रतिहत प्रतिभा से आज तक हमारे धार्मिक जीवन और विश्वासों का प्रत्येक अंग प्रभावित है ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘महापुरुष श्रीकृष्ण’ पाठ से अवतरित है । इसके लेखक श्री वासुदेवशरण अग्रवाल हैं । 

प्रसंग – 

यहाँ पर श्रीकृष्ण नाम के दो महान व्यक्तियों का उल्लेख किया गया है । 

व्याख्या – 

भारतवर्ष में अनेक ऐसे महापुरुष हुए हैं जिनके विचारों ने मानव जाति को प्रभावित किया है । उन विभूतियों में श्रीकृष्ण का नाम महत्वपूर्ण है । संयोग की बात है कि आज से लगभग पाँच हजार वर्ष पूर्व दो महामानवों का जन्म हुआ । उन दोनों के नाम भी कृष्ण ही थे उन दोनों ही के महान कृतित्वों का गहरा प्रभाव भारतीय जीवन पर स्पष्ट दिखाई देता है । इन दोनों में भेद स्थापित करने की दृष्टि से इतिहासकारों ने एक का नाम ‘ द्वैपायन कृष्ण ‘ कर दिया है । आज वे ही ‘ द्वैपायन कृष्ण ‘ महर्षि वेद व्यास के रूप में विख्यात हैं । वे अद्भुत प्रतिभा के धनी थे । उनकी विलक्षण कशीलता से भारत के धार्मिक जीवन तथा मान्यताओं का हर पक्ष स्पष्टत : प्रभावित है । 

विशेष – 

(1) कृष्ण नाम की दो विभूतियों में से द्वैपायन कृष्ण की अनोखी प्रतिभा का अंकन हुआ है । (2) शुद्ध , साहित्यिक खड़ी बोली का प्रयोग हुआ है । (3) विचारात्मक शैली में विषय का प्रतिपादन किया गया है । 

 

(2) कृष्ण की बाल – लीलाओं के मनोरम आख्यान , उनके गीता – शास्त्र के महान् उपदेश तथा महाभारत के युद्ध में उनके विविध आर्योचित कर्मों की कथाएँ आज घर – घर में प्रचलित हैं । असंख्य मनुष्यों का जीवन आज कृष्ण के आदर्श से प्रभावित होता है । वस्तुतः हमारे साहित्य का एक बड़ा भाग कृष्ण चरित्र से अनुप्राणित हुआ है । कृष्ण के जीवन की घटनाएँ केवल अतीत इतिहास के जिज्ञासुओं के कौतूहल का विषय नहीं है , वरन् वे धार्मिक जीवन की गतिविधि को नियन्त्रित करने के लिए आज भी भारतीय आकाश में चमकते हुए आकाशद्वीप की तरह सुशोभित और जीवित हैं । 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘महापुरुष श्रीकृष्ण’ पाठ से अवतरित है । इसके लेखक श्री वासुदेवशरण अग्रवाल हैं । 

प्रसंग – 

श्रीकृष्ण के महान् व्यक्तित्व के प्रभाव का अंकन इस गद्यांश में किया गया है । 

व्याख्या – 

विराट व्यक्तित्व के धनी श्रीकृष्ण की बाल – लीलाओं के मनोहर वृत्तान्त भारत के प्रत्येक घर में व्याप्त हैं । उनके द्वारा दिये गये गीता के उपदेशों का भारतीय जीवन पर गहरा प्रभाव है । महाभारत के युद्ध में उन्होंने आर्य मान्यताओं के अनुरूप जो महान् कार्य किये थे उनकी कथाएँ आज घर – घर में प्रचलित हैं । भारतवर्ष के अनेक मनुष्यों के जीवन पर श्रीकृष्ण के व्यक्तित्व की अमिट छाप है । वास्तविकता यह है कि हमारे साहित्य का बहुत बड़ा भाग कृष्ण के विराट चरित्र से ही पोषित है । श्रीकृष्ण के जीवन में घटित होने वाली घटनाएँ मात्र इतिहासकारों की जिज्ञासा का विषय नहीं है , अपितु आज के धार्मिक जीवन में भी उनकी विशेष महत्ता है । आज के जीवन की विविध गतिविधियों के संचालन , नियंत्रण में वे प्रकाश पुंज की तरह दिशा निर्देश र रही हैं । वे इतिहास का विषय न होकर आज के सक्रिय जीवन की आवश्यकताएँ हैं । 

विशेष – 

(1) श्रीकृष्ण के बहुआयामी व्यक्तित्व के प्रभाव को रेखांकित किया गया है । (2) शुद्ध , साहित्यिक संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली का प्रयोग हुआ है । (3) विचारात्मक शैली को अपनाया गया है ।

 

(3) उस काल के जो भी उच्छृखल , लोकपीड़क सत्ताधारी थे , उन सबसे ही एक – एक करके कृष्ण की टक्कर हुई । जिस महापुरुष ने योग – समाधि के आदर्श को लेकर ब्रह्म – स्थिति प्राप्त करने का उपदेश दिया हो , जिसका अपना जीवन अविचल जान – निष्ठा का सर्वोत्तम उदाहरण हो , उसके जीवन में कस – निपात से लेकर निजवंश के विनाश तक की कथा एक अत्यन्त करुण कहानी के रूप में पिरोई हुई है । 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘महापुरुष श्रीकृष्ण’ पाठ से अवतरित है । इसके लेखक श्री वासुदेवशरण अग्रवाल हैं ।  

प्रसंग – 

दुष्टों का दमन कर लोकरक्षक के रूप में प्रतिष्ठित योगेश्वर श्रीकृष्ण की दारुण जीवन कथा का आभास दिया गया है । 

व्याख्या – 

श्रीकृष्ण का जीवन लोकरक्षा में व्यतीत हुआ । उन्होंने अपने समय के हीन चरित्रधारी , जन सामान्य को सताने वाले राजाओं से जमकर टक्कर ली । उन्होंने हर एक को पराजित किया । योगेश्वर श्रीकृष्ण ने योग – समाधि के द्वारा ब्रह्मत्व प्राप्त करने का आदर्श उपदेश दिया । उनका स्वयं का जीवन ज्ञान का सबसे उत्तम उदाहरण है । श्रीकृष्ण के समग्र जीवन की कहानी कंस के पतन से लेकर अपने वंश के विनाश तक व्याप्त है । उनका जीवन क्रम भयंकर वेदना की गाथा है । 

विशेष – 

(1) श्रीकृष्ण के लोकोपकारी रूप का निरूपण हुआ है । (2) संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है । (3) विचारात्मक शैली को अपनाया गया है । 

 

(4) कृष्ण का बाल – जीवन तो एक काव्य ही है । जन्म से लेकर अथवा उससे पूर्व ही , उनके सम्बन्ध के अतिमानवी चरित्रों का क्रम आरम्भ हो गया था और उनके वृन्दावन छोड़कर मथुरा आने के समय तक ये बाल – लीलाएँ आकाश में एकत्रित होने वाली सुन्दर सुखद मेघमालाओं की भाँति नाना वर्ण और रूपों से संचित होती रहीं । बिना कहे ही उन्हें हम जानते हैं । हमारे देश के बाल – वर्ग के लिए तो उन कथाओं की रसमय सामग्री एक अत्यन्त प्रिय वस्तु है । 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘महापुरुष श्रीकृष्ण’ पाठ से अवतरित है । इसके लेखक श्री वासुदेवशरण अग्रवाल हैं । 

प्रसंग – 

यहाँ श्रीकृष्ण के बचपन की मनोरम कथा के महत्व को बताया गया है । 

व्याख्या – 

श्रीकृष्ण का बाल – जीवन प्रत्यक्ष रूप से एक वृहद् काव्य है । उनके जन्म से पूर्व ही उनके महामानव चरित्र के सम्बन्ध में सभी को ज्ञात हो गया था । उनके अवतरण के भय से आततायी आतंकित थे । जब श्रीकृष्ण वृन्दावन छोड़कर मथुरा आये तब तक तो उनके बाल – चरित्र की विभिन्न लीलाएँ आनन्द देने वाली बदलियों की श्रृंखलाओं की तरह समस्त आकाश में व्याप्त हो गई थीं । आशय यह है कि सभी ओर उनके बाल कृतित्वों की चर्चा विस्तारपूर्वक थी । स्थिति यह रही कि बिना कहे ही लोक जीवन का हर व्यक्ति जानता था । भारतवर्ष के बच्चों के लिए तो आनन्दमयी कथाएँ अत्यन्त मनोरंजक विषय हैं । वे लीलाएँ बच्चे बड़े चाव से सुनते हैं तथा प्रसन्न है । 

विशेष – 

(1) श्रीकृष्ण के बाल चरित्रों का प्रभावी अंकन हुआ है । (2) होनहार विरवान के होत चीकने पात ‘ वाली कहावत श्रीकृष्ण के बाल चरित्र पर खरी उतरती है । (3) खड़ी बोली के साहित्यिक रूप का प्रयोग हुआ है । (4) वर्णनात्मक शैली में विषय का प्रतिपादन किया गया है । 

 

(5) इन रमणीय बाल – चरित्रों की सुखदायी भूमिका तैयार करने के बाद श्रीकृष्ण ने एक दूसरे ही प्रकार के जगत में प्रवेश किया । उनका वृन्दावन छोड़कर मथुरा को आना उस जगत का देहली – द्वार है । यहाँ जीवन के कठोर सत्य उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे । उनके द्वार का सबसे पहला परिवर्तन शूरसेन जनपद की राजनीति में हुआ । उग्रसेन के पुत्र लोकपीड़क कंस को राज्यच्युत करके कृष्ण ने अग्रसेन को सिंहासन पर प्रतिष्ठित किया । 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘महापुरुष श्रीकृष्ण’ पाठ से अवतरित है । इसके लेखक श्री वासुदेवशरण अग्रवाल हैं । 

प्रसंग – 

यहाँ श्रीकृष्ण के लोकरक्षक चरित्र की तैयारी का अंकन हुआ है । 

व्याख्या – 

बचपन में ही चकित कर देने वाले विविध सुखदाई कार्य करके श्रीकृष्ण के पर्याप्त ख्याति प्राप्त कर ली थी । उनके ये कार्य जनप्रिय थे । इसके पश्चात् उन्होंने एक दूसरे ही संसार में पदार्पण किया । वृन्दावन छोड़कर मथुरा आना उस जगत् का प्रवेश द्वार था । इस संसार में मानव जीवन के अनेक कठोर सत्य उनकी प्रतीक्षा में थे । उन्होंने प्रथम परिवर्तन शूरसेन जनपद की राजनीति में किया । जनता को दुःख पहुँचाने वाले उग्रसेन के बेटे कंस को गद्दी से हटाया और उग्रसेन को सिंहासन पर आसीन किया । 

विशेष – 

(1) लोकरक्षा को समर्पित श्रीकृष्ण के महान् कार्यों के प्रारम्भ को उजागर किया है । (2) सरल , सुबोध , साहित्यिक भाषा में विषय का प्रभावी प्रतिपादन हुआ है । (3) विवेचनात्मक शैली को अपनाया गया है । 

 

(6) कंस वध के समय ही कृष्ण अपनी राजनीतिक प्रवृत्ति का परिचय दे चुके थे । हस्तिनापुर की राजधानी के साथ सम्पर्क होने के बाद उस प्रवृत्ति की ओर भी उत्तेजना मिली । उन्होंने यह अनुभव किया कि इस देश में एक बड़ा प्रबल संगठन उन राजाओं का है जो भारतीय राजनीति की प्राचीन लोकपक्षीय परम्पराओं के विरुद्ध निरंकुश होकर राजशक्ति का प्रयोग करते हैं ; और जिनके कारण प्रजा में क्षोभ और कष्ट हैं । 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘महापुरुष श्रीकृष्ण’ पाठ से अवतरित है । इसके लेखक श्री वासुदेवशरण अग्रवाल हैं । 

प्रसंग – 

इस गद्यांश में कृष्ण की राजनीतिक प्रवृत्ति के विकास तथा लोकरक्षा के भाव की अभिव्यक्ति की गई है । 

व्याख्या – 

शूरसेन जनपद के आतताई कंस के वध के समय ही श्रीकृष्ण की राजनीतिक प्रवृत्ति का स्पष्ट परिचय हो गया था । उनके इस स्वभाव को और अधिक बढ़ावा । मिल गया जब उनका सम्पर्क हस्तिनापुर की राजधानी के साथ हो गया । वे भली – भाँति समझ गये थे कि भारतवर्ष के राजाओं का एक ऐसा संगठन है जो देश के लोकपक्ष का समर्थन करने वाली परम्पराओं के विरुद्ध सक्रिय थे । ये राजा नियंत्रण हीन होकर अपनी राज शक्ति का दुरुपयोग करते थे । प्रजा में इससे बेहद क्षोभ और दुःख व्याप्त था । 

विशेष – 

(1) श्रीकृष्ण के राजनीतिक स्वभाव के आभास की पुष्टि हुई है । (2) लोकपक्षीय परम्पराओं का समर्थन भारत का मूल स्वभाव रहा है । (3) सरल , सुबोध साहित्यिक खड़ी बोली का प्रयोग हुआ है । (4) विवेचनात्मक शैली में विषय का प्रतिपादन किया गया है । 

 

(7) कृष्ण की राजनीतिक बुद्धि अद्भुत थी । अर्जुन ने कहा कि युद्ध करने पर भी कृष्ण मन से जिसका अभिनन्दन करें वह सब शत्रुओं पर विजयी होगा । ‘ यदि मुझे वजधारी इन्द्र और कृष्ण में से एक को लेना पड़े तो मैं कृष्ण को लूँगा । ‘ आर्य विष्णुगुप्त चाणक्य को भी अपनी बुद्धि पर ऐसा ही विश्वास था । उनका मंत्र अमोघ था । जहाँ कोई युक्ति न हो , वहाँ कृष्ण की युक्ति काम आती थी । धृतराष्ट्र की धारणा थी कि जब तक एक रथ पर कृष्ण , अर्जुन और अधिज्य गाण्डीव धनुष – ये तीन एक साथ हैं , तब तक ग्यारह अक्षौहिणी सेना होने पर भी कौरवों की विजय असम्भव है ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘महापुरुष श्रीकृष्ण’ पाठ से अवतरित है । इसके लेखक श्री वासुदेवशरण अग्रवाल हैं ।  

प्रसंग – 

इस गद्यांश में श्रीकृष्ण के कुशल राजनीतिज्ञ रूप का बखान किया गया है । 

व्याख्या – 

श्रीकृष्ण अद्वितीय राजनीतिक बुद्धि – सम्पन्न थे । अर्जुन ने स्पष्ट शब्दों में कहा हा कि युद्ध करने पर भी कृष्ण अपने मन से जिसका अभिनन्दन करें वह सभी विरोधियों पर विजय प्राप्त करेगा । उन्होंने अपना मत व्यक्त करते हुए कहा था कि किन्हीं स्थितियों में मुझे धारण करने वाले इन्द्र और श्रीकृष्ण में से एक को चुनने को कहा जाय तो मैं कृष्ण का चयन करूंगा । आर्य विष्णुगुप्त चाणक्य भी विलक्षण बुद्धि के धनी थे । उन्हें स्वयं पर पूरा आत्म – विश्वास था । श्रीकृष्ण में अचूक मंत्र मारने की क्षमता थी । जहाँ पर किसी समस्या का हल सम्भव न हो वहाँ श्रीकृष्ण का उपाय कारगर होता था । श्रीकृष्ण के सन्दर्भ में धृतराष्ट्र का अभिमत था कि जब तक एक रथ पर श्रीकृष्ण , अर्जुन और गांडीव धनुष विद्यमान हैं तब तक कौरवों पर भले ही ग्यारह अक्षौहिणी सेना हो , विजय प्राप्त करना सम्भव नहीं है । 

विशेष – 

(1) श्रीकृष्ण के बुद्धि – कौशल को उजागर किया गया है । (2) सरल , साहित्यिक , खड़ी बोली का प्रयोग हुआ है । (3) विवेचनात्मक शैली में विषय का प्रतिपादन किया गया है । 

 

(8) भयंकर विनाश को रोकने के लिए कृष्ण से जो प्रयत्न हो सकता था , उन्होंने किया । वे पाण्डवों की ओर से समस्त अधिकारों को लेकर सन्धि करने के लिए हस्तिनापुर गये । वहाँ उन्होंने धृतराष्ट्र की सभा में जो तेजस्वी भाषण दिया उसकी ध्वनि आज भी इतिहास में गुंजायमान है । उन्होंने कहा कौरवों और पाण्डवों में बिना वीरों का नाश हुए ही शान्ति हो जाये , मैं यही प्रार्थना करने आया हूँ । 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘महापुरुष श्रीकृष्ण’ पाठ से अवतरित है । इसके लेखक श्री वासुदेवशरण अग्रवाल हैं । 

प्रसंग – 

महाभारत को रोकने के जो भरसक प्रयल कृष्ण ने किये उनका वर्णन यहाँ किया गया है । 

व्याख्या – 

श्रीकृष्ण दूरदृष्टा थे । उन्होंने कौरवों और पाण्डवों के मध्य संभावित युद्ध , महाभारत को रोकने का पूरा प्रयत्न किया था । पाण्डवों ने उन्हें सभी प्रकार के अधिकार सौंप दिये तब वे सन्धि ( मेल ) कराने के लिए कौरवों के पास हस्तिनापुर गये थे । वहाँ पर उन्होंने बड़े ओजपूर्ण शब्दों में युद्ध के भयंकर परिणामों को समझाने का प्रयास किया । युद्ध में असंख्य बहादुरों के विनाश के बिना ही शान्ति कराने की उन्होंने प्रार्थना तक की । कौरवों और पाण्डवों में सहमति स्थापित करने की भरपूर चेष्टा करने में किसी तरह की कमी नहीं रहने दी । 

विशेष – 

(1) शान्ति स्थापित करने के प्रयासों को व्यक्त किया गया है । (2) सरल , सुबोध भाषा में विषय को स्पष्ट किया गया है । (3) विवेचनात्मक शैली का प्रयोग किया गया है । 

 

(9) मनुष्य का मस्तिष्क मानवीय विकास का जो पूर्णतम आदर्श बन सकता है , वह हमें कृष्ण में मिलता है । नृत्य , गीत , वादित्र , वाग्मिता , राजनीति , योग , आध्यात्मक ज्ञान सबका एकत्र समवाय कृष्ण में पाया जाता है । गोदोहन से लेकर राजसूय यज्ञ में पुरोहितों के चरण धोने तक तथा सुदामा की मैत्री से लेकर युद्ध भूमि में गीता के उपदेश तक उनकी ऊँचाई का एक पैमाना है , जिस पर सूर्य की किरणों की रंग – बिरंगी पेटी की तरह हमें आत्मिक विकास के हर एक स्वरूप का दर्शन होता है । 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘महापुरुष श्रीकृष्ण’ पाठ से अवतरित है । इसके लेखक श्री वासुदेवशरण अग्रवाल हैं । 

प्रसंग – 

श्रीकृष्ण के सर्वगुणसम्पन्न व्यक्तित्व को उजागर किया गया है । 

व्याख्या – 

श्रीकृष्ण में मानव – मस्तिष्क का पूर्ण विकसित रूप विद्यमान था । सभी कलाएं , आध्यात्म , दर्शन , चिन्तन , ज्ञान आदि सभी का समन्वित रूप कृष्ण के व्यक्तित्व में समाहित था । गाय दुहने के छोटे – से – छोटे कार्य से लेकर अवश्मेध यज्ञ में पुरोहितों के पैर धोने तक का कार्य कृष्ण ने किया । उन्होंने अपने दीन – हीन मित्र सुदामा के साथ मित्रता का निर्वाह किया तो महाभारत के रणक्षेत्र में गीता का उपदेश देकर एक आदर्श मानदण्ड भी स्थापित किया । उनके द्वारा दिया गया गीता का ज्ञान मानव जीवन के आध्यात्मिक पक्ष के हर रूप को रंग – बिरंगी किरण समूह की तरह आलोकित करता है । 

विशेष – 

(1) सर्वगुणसम्पन्न कृष्ण के व्यक्तित्व को रेखांकित किया गया है । (2) शुद्ध , साहित्यिक भाषा का प्रयोग हुआ है । (3) विवेचनात्मक शैली को अपनाया गया है । 

 

(10) कृष्ण भारतवर्ष के लिए एक अमूल्य निधि हैं , वे हमारी राष्ट्रीय संस्कृति के सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधि हैं । जिस प्रकार पूर्व और पश्चिम के समुद्रों के बीच प्रदेश को व्याप्त करके गिरिराज हिमालय पृथ्वी के मानदण्ड की तरह स्थित है , उसी प्रकार ब्रह्मधर्म और क्षात्रधर्म इन दो मर्यादाओं के बीच की उच्चता को व्याप्त करके श्रीकृष्ण – चरित्र पूर्ण मानवी – विकास के मान – दण्ड की तरह स्थित है । 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘महापुरुष श्रीकृष्ण’ पाठ से अवतरित है । इसके लेखक श्री वासुदेवशरण अग्रवाल हैं । 

प्रसंग – 

राष्ट्रीय सस्कृति के मानदण्ड कृष्ण के चरित्र के पूर्ण विकास पर प्रकाश डाला गया है । 

व्याख्या – 

श्रीकृष्ण का चरित्र एक आदर्श चरित्र है । वे हमारे देश की बहुमूल्य सम्पदा हैं । भारत की श्रेष्ठतम संस्कृति के प्रतिनिधि स्वरूप वे आज प्रस्तुत हैं । जैसे समस्त धरा पर पर्वतराज हिमालय एक मानदण्ड के रूप में विराजमान हैं , उनके समान कोई ऊँचा नहीं है , वैसे ही श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व , उनका चरित्र मानव के विकसित रूप की कसौटी की तरह विद्यमान है । उनमें ज्ञान और क्षत्रिय धर्म की मर्यादाओं का उच्चतम आदर्श रूप विभाजित है । 

विशेष – 

(1) उच्चता के आदर्श स्वरूप कृष्ण के चरित्र का अंकन किया गया है । (2) शुद्ध , साहित्यिक खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है । (3) विचारात्मक शैली अपनाई गई है ।

 

वासुदेवशरण अग्रवाल लेखक परिचय 

जीवन परिचय – 

इतिहास , संस्कृति एवं पुरातत्व के मर्मज्ञ डॉ . वासुदेवशरण अग्रवाल का जन्म लखनऊ के प्रतिष्ठित वैश्य परिवार में सन् 1904 ई. में हुआ था । काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से स्नातक होने के बाद आपने लखनऊ विश्वविद्यालय से एम.ए. , पी – एच. डी. तथा डी. लिट्. की उपाधियाँ प्राप्त की । आप काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के भारतीय महाविद्यालय में पुरातत्व एवं प्राचीन इतिहास विभाग के अध्यक्ष और आचार्य रहे । आप देश की अनेक सुप्रतिष्ठित संस्थाओं के अध्यक्ष रहे । वैदिक साहित्य , दर्शन , पुराण के अन्वेषक , हिन्दी साहित्य एवं पुरातत्व के इस प्रकाण्ड विद्वान का देहावसान सन् 1967 ई . में हो गया ।

डॉ . वासुदेवशरण अग्रवाल की प्रमुख रचनाएँ इस प्रकार हैं 

(1) निबन्ध संग्रह 

(2) उर ज्योति 

(3) माता भूमि 

(4) पृथ्वी पुत्र 

(5) वेद विद्या 

(6) कला और संस्कृति 

(7) कल्पवृक्ष 

(8) वाग्धारा

साहित्य में स्थान – 

डॉ . वासुदेवशरण अग्रवाल हिन्दी के मूर्धन्य निबन्धकारों में गिने जाते हैं । उनके विचारात्मक निबन्धों का हिन्दी के निबन्ध साहित्य में एक विशिष्ट स्थान है । वे प्राचीन संस्कृति एवं साहित्य के उन्नायक हैं । उनकी भाषा – शैली में पाण्डित्य के.साथ लालित्य का अद्भुत समन्वय है ।

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