MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 3 परम्परा बनाम आधुनिकता

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MP Board Class 10th Hindi Solutions गद्य Chapter 3 परम्परा बनाम आधुनिकता (निबन्ध, हजारी प्रसाद द्विवेदी)

परम्परा बनाम आधुनिकता अति लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1. 

परम्परा क्या है ? 

उत्तर – 

परम्परा एक से दूसरे को, दूसरे से तीसरे को दिया जाने वाला क्रम है । 

प्रश्न 2. 

दो शताब्दी पूर्व किस प्रकार के नाटकों की रचना अनुचित जान पड़ती थी ? 

उत्तर – 

दो शताब्दी पूर्व दुखान्त नाटकों की रचना अनुचित जान पड़ती थी ।

प्रश्न 3. 

मनुष्य की महिमा किसे स्वीकार है ? 

उत्तर – 

आधुनिक समाज को मनुष्य की महिमा स्वीकार है । 

प्रश्न 4. 

अगली मानवीय संस्कृति का स्वरूप क्या होगा ? 

उत्तर – 

अगली मानवीय संस्कृति का स्वरूप मनुष्य की समता और सामूहिक मुक्ति पर आधारित होगा । 

प्रश्न 5. 

आधुनिकता को असंयत और विशृंखल होने से कौन बचाता है ? 

उत्तर – 

आधुनिकता को असंयत और विशृंखल होने से परम्परा बचाती है ।

 

परम्परा बनाम आधुनिकता लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1. 

भाषा की प्राप्ति किस प्रकार होती है ? 

उत्तर – 

भाषा परम्परा से प्राप्त रूप है किन्तु यह निरन्तर समय के साथ बदलती, कटती – छंटती रहती है । अनावश्यक छंट जाता है और आवश्यक जुड़ जाता है । आज की भाषा वैदिक युग से लेकर आज तक निरन्तर प्रवाहमान रूप में चली आ रही है परन्तु यह भाषा न तो वैदिक काल की है , न अपभ्रंश काल की । यह तो समकालीन सन्दर्भो में नवीन रूप धारण कर विकसित होती चली आ रही है । 

प्रश्न 2. 

नीति वाक्य में बुद्धिमान के विषय में क्या कहा गया है ? 

उत्तर – 

‘ परम्परा बनाम आधुनिकता ‘ निबन्ध में हजारी प्रसाद द्विवेदी ने एक संस्कृत का नीति वाक्य उद्धृत किया है , उसमें कहा गया है कि बुद्धिमान आदमी एक पैर से खड़ा रहता है और दूसरे से चलता है । यह बात मात्र व्यक्ति पर ही लागू नहीं होती है

प्रश्न 3. 

साहित्य के जिज्ञासु समझने में गलती कब कर सकते हैं ? 

उत्तर – 

साहित्य के जिज्ञासु को सामाजिक परिवर्तनों तथा परिवर्तित होने को तत्पर जीवन मूल्यों की ठीक – ठीक जानकारी होनी चाहिए । यदि उसे इनकी सही जानकारी नहीं होगी कि ये परिवर्तन किन परिस्थितियों के दबाव में हुए हैं , इन परिवर्तनों में कितना आवश्यक है और कितना अनावश्यक और इन अनावश्यक परिवर्तनों में से कितनों को उपयोगी बनाया जा सकता है , तो वह अनेक बातों को समझने में गलती कर सकता है । 

प्रश्न 4. 

चित्तगत उन्मुक्तता पर कौन – सा नया अंकुश लग रहा है ? 

उत्तर – 

मनुष्य की चित्तगत उन्मुक्तता पर एक नवीन अंकुश लग रहा है । व्यक्तिनिष्ठ मानव के स्थान पर समाज के मानव की प्रधानता हो रही है । व्यक्ति से अधिक समाज होने से मनुष्य की चित्त की स्वतन्त्रता पर नियन्त्रण लगने से मानव में प्रभावोत्पादक आदर्श के उत्साह का संचार हुआ है । 

प्रश्न 5. 

आधुनिकता सम्प्रदाय का विरोध क्यों करती है ?

उत्तर – 

आधुनिकता के सम्प्रदाय का विरोध करने का कारण यह है कि सम्प्रदाय स्थिति का संरक्षक होता है और आधुनिकता निरन्तर गतिशील प्रक्रिया होती है । स्थिति गतिशीलता की विरोधी है । इसलिए आधुनिकता का भी सम्प्रदाय से विरोध होगा ।

 

परम्परा बनाम आधुनिकता दीर्घ उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1. 

परम्परा और आधुनिकता की तुलनात्मक व्याख्या कीजिये ।

उत्तर – 

एक से दूसरे को, दूसरे से तीसरे को दिये जाने वाले क्रम को परम्परा कहते हैं जबकि आधुनिकता के मूल में पुराने भाव नवीन अनुभव के साथ होते हैं । यह मानना ठीक नहीं है कि कोई विचार नितान्त नवीन होता है या नितान्त प्राचीन होता है । वस्तुतः परम्परा आधुनिकता को आधार प्रदान करती है । परम्परा ही आधुनिकता को शुष्क , नीरस , अनियन्त्रित होने से बचाती है । इस तरह परम्परा और आधुनिकता एक – दूसरे की पूर्ति करती हैं । 

प्रश्न 2. 

पाठ के आधार पर आधुनिकता के व्यापक अर्थ समझाइये । 

उत्तर – 

आधुनिकता का शाब्दिक अर्थ अधुना ‘ अथवा जो कुछ इसमें है वह ही आधुनिक है किन्तु वास्तव में आधुनिक का इतना सीमित अर्थ नहीं है । स्पष्ट देखा जाता है कि इस समय जो है उसमें बहुत – सी बातें मध्यकाल की हैं , आज की नहीं हैं । इससे पुष्ट होता है कि प्रत्येक भाव के मूल में कुछ अतीत के संस्कार और नवीन अनुभव विद्यमान रहते हैं । हम पुराने संस्कारों में से समय के अनुसार जो अनावश्यक होता है उसे छाँट देते हैं और नई परिस्थितियों में जो आवश्यक होता है वह जोड़ देते हैं । इस तरह आधुनिकता गतिशील प्रक्रिया सिद्ध होती है । आधुनिकता अपने आप में कोई मूल्य नहीं है अपितु मानव के अनुभवों ने जो महान मूल्य उपलब्ध कराये हैं उन्हें नवीन सन्दर्भो में देखने की दृष्टि है । आधुनिकता ज्ञान की नवीनतम उपलब्धियों के रूप ग्रहण करने का प्रयत्न करती है । इस प्रकार आधुनिकता का अर्थ बड़ा व्यापक है । 

प्रश्न 3. 

साहित्य के क्षेत्र में इतिहास किस प्रकार मदद करता है ? 

उत्तर – 

यह विचार उचित नहीं है कि मनुष्य कभी भी अतीत के विचारों को ज्यों – का – त्यों अपना लेगा । वर्तमान के समाधान अतीत में नहीं सोचे जा सकते हैं । स्पष्ट है कि इतिहास अन्य किसी क्षेत्र में भले ही दोहराता हो पर विचारों के क्षेत्र में विचार गये सो गये । वे पुनः यथावत् लौटकर नहीं आते हैं । फिर भी इतिहास साहित्यकार की मदद करता है । प्राचीन काल के मानवीय अनुभव साहित्य को पुनः – पुनः अभिव्यक्ति के लिए आतुर करते हैं । वह प्राचीन अनुभवों के सहारे वर्तमान के सन्दर्भो को वाणी देता है । इस तरह इतिहास के अनुभव साहित्यकार को सृजन प्रेरणा देकर मदद करते हैं । 

प्रश्न 4. 

आधुनिकता अपने आप में कोई मूल्य नहीं है । ‘ इस कथन को स्पष्ट कीजिये । 

उत्तर – 

आधुनिकता स्वयं में कोई जीवन मूल्य नहीं है । यह तो मनुष्य के अनुभवों के द्वारा उपलब्ध महान् मूल्यों को नवीन सन्दर्भो में देखने की दृष्टि है । काल गतिमान है , परिस्थितियाँ भी निरन्तर बदलती रहती हैं , जीवन मूल्यों में भी परिवर्तन होता रहता है इसलिए उन्हें देखने की दृष्टि भी नवीन प्रकार की होती जाती है । इस तरह आधुनिकता एक सतत् गतिशील प्रक्रिया है । परिवर्तन का यह क्रम निरन्तर चलता रहता है और आधुनिकता भी गतिमान रहती है । यह स्वयं मूल्य होती है । 

प्रश्न 5. 

विचार विस्तार कीजिये – ‘ कोई भी आधुनिक विचार आसमान में पैदा नहीं होता है ‘।

उत्तर – 

कोई भी विचार सर्वथा नवीन नहीं होता है । हर विचार की जड़ें अतीत की गहराई में समाई होती हैं । जिस तरह फूल पेड़ से अलग होने का दावा नहीं कर सकता है और कोई भी वृक्ष मिट्टी से अलग होने का दावा नहीं कर सकता है । उसी तरह कोई भी आधुनिक विचार यह दावा करने में असमर्थ है कि वह परम्परा से पूरी तरह कटा हुआ है । कार्य – कारण और आधार – आधेय के रूप में परम्परा की एक सतत् शृंखला बीते हुए समय की गहराई में गढ़ी हुई है । आशय यह है कि प्रत्येक विचार का सूत्र अतीत में समाया हुआ होता है ।

परम्परा बनाम आधुनिकता पाठ – सारांश 

आधुनिक काल के महान् विचारक हजारी प्रसाद द्विवेदी ने परम्परा बनाम आधुनिकता ‘ निबन्ध में तर्कपूर्ण दृष्टि से विचार किया है । ऊपरी तौर पर प्राचीन सभी बातों को परम्परा कह देते हैं जबकि परम्परा एक से दूसरे , दूसरे से तीसरे को दिया जाने वाला क्रम होता है । इसमें समूचा अतीत नहीं होता है , उसका निखरता , परिवर्तित रूप आगे जीवन पद्धति को आकार प्रदान करता है । इस तरह परम्परा जीवन्त गतिशील प्रक्रिया है । आधुनिकता भी शाब्दिक रूप में अधुना अर्थात् इस समय है , लगती है परन्तु आधुनिक का यह अर्थ इसलिए ठीक नहीं है क्योंकि जो उस समय उसमें भी कुछ बातें अतीत की हैं । पुराने संस्कार और नवीन अनुभव के साथ सभी भाव प्रस्तुत है।आचार – विचार निरन्तर बदलते रहते हैं । उन्हीं के साथ नवीन मूल्य भी बनते हैं । आज यह भाव शिथिल हो गया है कि निम्न वर्ग में जन्म लेना पूर्व पापों का परिणाम है आज यह मान्यता है कि यह समाज की अव्यवस्था के फलस्वरूप हुआ है । आधुनिकता तथा परम्परा ठीक उसी प्रकार हैं जैसे विद्वान् का एक पैर स्थिर रहता है और एक चलता रहता है । मनुष्य कभी भी प्राचीन विचारों को यथावत् नहीं अपनाता है । अतीत वर्तमान हल नहीं है । इतिहास साहित्यकारों की मदद करता है पर वह विचारों के बारे में संगत नहीं है । आधुनिक समाज ने मानव की महिमा को स्वीकार किया है इसीलिए समता और मानव मुक्ति का मार्ग प्रशस्त हुआ है । व्यष्टि की अपेक्षा समष्टि की प्रधानता हुई है । इससे नवीन आदर्श व्यापक रूप ले रहे हैं । सम्प्रदाय में किसी आचार – विचार को प्रयासपूर्वक सुरक्षित रखते हैं । इसलिए परम्परा सम्प्रदाय से भिन्न है । परम्परा सहज है सम्प्रदाय सप्रयत्न । आधुनिकता अपने आप में मूल्य नहीं है परन्तु जीवन मूल्यों को देखने की नवीन दृष्टि है । नवीन परिवेश में मानव मूल्य परिवर्तित हो रहे हैं किन्तु परम्परा हमें पुराने सन्दर्भो में बने मूल्यों का बोध कराती है । आधुनिक विचार आसमान से नहीं आते हैं , वे अतीत की गहराई से ही जन्म लेते हैं । उन्हें आधुनिकता अत्याधुनिक के आलोक के ग्रहण करने का प्रयास करती है । शाम इस प्रकार परम्परा आधुनिकता का आधार है । वह शुष्क , नीरस और अनियन्त्रित बुद्धिविलास से बचाती है । परम्परा और आधुनिकता एक – दूसरे के पूरक हैं । 

 

पाठ के कठिन शब्दार्थ 

पुंजीभूत = इकट्ठा किया हुआ । राशि भण्डार । हुबहू = ज्यों का त्यों । पूर्ववर्ती = पहले का । निरन्तर लगातार । अतीत = बीता हुआ समय । बोधक = बोध कराने वाली । काल – प्रवाह = समय की गति । असंयुक्त = बिना जुड़ी । सर्वदा = सदैव । अप्रतिम = अनुपम , बेजोड़ । आवश्यंभावता = अवश्य होने वाली । बद्धमूल = बँधे । अभिलाषा = इच्छा । प्रबल = शक्तिशाली । विकृत = दोषपूर्ण । जिज्ञासु – जानने के इच्छुक । अपरिहार्य = न त्यागने योग्य । अवांछनीय = न चाहने योग्य । वात्याचक्र = भँवर । मुखर = बोलने वाली । उन्मुक्तता = खुलापन , स्वतन्त्रता । व्यष्टि = व्यक्ति । समष्टि = समाज । महनीय = महान । बहु – समादृत = बहुत बड़े समाज द्वारा आदर प्राप्त । शाश्वत = नित्य , निरन्तर । घृणास्पद – घृणा के योग्य । आधेय = जो स्थापित किया जाय । अविच्छेद्य – विच्छेद रहित । श्रृंखला कड़ियाँ । आलोक – प्रकाश । प्रयोजन – उद्देश्य । विनोदिनी – मनोरंजक । अन्यथा – विपरीत । उन्माद = पागलपन । पूरक = पूर्ति करने वाली । 

 

परम्परा बनाम आधुनिकता संदर्भ, प्रसंग सहित गद्यांशों की व्याख्या 

 

(1) हमने अपनी पिछली पीढ़ी से जो कुछ प्राप्त किया है, वह समूचे अतीत की पुंजीभूत विचार राशि नहीं है। सदा नए परिवेश में कुछ पुरानी बातें छोड़ दी जाती हैं और नई बातें जोड़ दी जाती हैं। एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को हूबहू वही नहीं देती, जो अपनी पूर्ववर्ती पीढ़ी से प्राप्त करती है। कुछ-न-कुछ छंटता रहता है, बदलता रहता है, जुड़ता रहता है। यह निरन्तर चलती रहने वाली प्रक्रिया ही परम्परा है।।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘परम्परा बनाम आधुनिकता’ पाठ से अवतरित है । इसके लेखक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी हैं । 

प्रसंग – 

इस गद्यांश में परम्परा के विषय में बताया गया है कि यह एक सतत् चलने वाली प्रक्रिया है । 

व्याख्या – 

मानव जो कुछ अपनी से पूर्व पीढ़ी से प्राप्त करता है वह बीते हुए समय का एकत्रित विचार – भण्डार नहीं होता है । सदैव बदलते जाते नवीन परिवेश में कुछ पुराने समय की बातों का त्याग कर दिया जाता है और कुछ नवीन बातें जोड़ दी जाती हैं । इस तरह एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को ज्यों – का – त्यों नहीं देती है । उसने जो पहले की पीढ़ी से प्राप्त किया था उसमें से कुछ काट – छाँट होती रहती है तथा कुछ नया जुड़ता जाता है । इस प्रकार परिवर्तन का निरन्तर चलते रहने वाला यह क्रम ही परम्परा कहा जाता है SE 

विशेष – 

(1) परम्परा निरन्तर चलते रहने वाली प्रक्रिया है । (2) शुद्ध साहित्यिक भाषा में विषय को प्रस्तुत किया गया है । (3) विवेचनात्मक शैली का प्रयोग किया गया है । 

 

(2) परम्परा ‘ का शब्दार्थ है , एक से दूसरे को , दूसरे से तीसरे को दिया जाने वाला क्रम । कभी – कभी गलत ढंग से इसे अतीत के सभी आचार – विचारों का बोधक मान लिया जाता है , पर परम्परा से हमें समूचा अतीत नहीं प्राप्त होता । उसका निरन्तर निखरता , छंटता , बदलता रूप प्राप्त होता है । उसके आधार पर हम आगे की जीवन पद्धति को रूप देते हैं ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘परम्परा बनाम आधुनिकता’ पाठ से अवतरित है । इसके लेखक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी हैं । 

प्रसंग – 

निरन्तर आने वालों को दिये जाने वाली जीवन पद्धति परम्परा कहलाती है ।

व्याख्या – 

परम्परा शब्द का अर्थ एक के द्वारा दूसरे को , दूसरे को द्वारा तीसरे को और तीसरे के द्वारा चौथे को दिये जाने का क्रम होता है । अज्ञानवश कभी – कभी परम्परा का अर्थ बीते हुए समय का आचरण , विचार आदि का बोध कराने वाला मान लेते हैं , जबकि बीते हुए समय को समग्र रूप में हम प्राप्त नहीं करते हैं । अतीत के रूप में लगातार परिमार्जन , काट – छाँट , परिवर्तन आदि होने के बाद नवीन रूप ही हमें प्राप्त होता है । इस प्राप्त रूप से ही हम आगामी जीवन शैली का निर्माण करते हैं । यह क्रम निरन्तर चलता ही रहता है जिसे हम परम्परा कहते हैं ।

विशेष – 

(1) अतीत के परिवर्तित रूप से वर्तमान जीवन पद्धति निर्मित होती है । (2) परम्परा में यथावत् ग्रहण नहीं होता है , कुछ परिवर्तन होते जाते हैं । (3) शुद्ध साहित्यिक खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है । (4) विवेचनात्मक शैली में विषय को स्पष्ट किया है । 

 

(3) इस प्रकार परम्परा का अर्थ विशुद्ध अतीत नहीं है , बल्कि एक निरन्तर गतिशील जीवन्त प्रक्रिया है । उसमें हमें जो । कुछ मिलता है , उस पर खड़े होकर आगे के लिए कदम उठाते हैं ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘परम्परा बनाम आधुनिकता’ पाठ से अवतरित है । इसके लेखक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी हैं । 

प्रसंग – 

यहाँ बताया गया है कि परम्परा एक लगातार गतिशील प्रक्रिया है ।

व्याख्या – 

परम्परा पूर्णरूपेण बीते हुए समय वाले यथावत् रूप को नहीं कहते । वास्तव में , यह एक लगातार गतिवान सजीव प्रक्रिया है । इसमें हम मिले हुए आधार पर खड़े होकर आगे दम बढ़ाते हैं । यह क्रम निरन्तर चलता रहता है । 

विशेष – 

(1) परम्परा निरन्तर गतिवान प्रक्रिया है जिसमें नव निर्माण की जीवंतता बनी रहती है । (2) शुद्ध साहित्यिक खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है । (3) विवेचनात्मक शैली को अपनाया गया है । 

 

(4) आधुनिकता ‘ क्या है ? शब्दार्थ पर विचार करें , तो ‘ अधुना ‘ या इस समय जो कुछ है वह आधुनिक है । पर ‘ आधुनिक ‘ का यही अर्थ नहीं है । हम बराबर देखते हैं कि कुछ बातें इस समय भी ऐसी हैं , जो आधुनिक नहीं हैं , बल्कि मध्यकालीन हैं । सभी भावों के मूल में कुछ पुराने संस्कार और नये अनुभव होते हैं । 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘परम्परा बनाम आधुनिकता’ पाठ से अवतरित है । इसके लेखक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी हैं । 

प्रसंग – 

यहाँ आधुनिकता का अर्थ समझाया गया है । 

व्याख्या – 

आधुनिकता शब्द के अर्थ पर विचार किया जाय तो प्रतीत होगा कि इसका अर्थ अधुना अर्थात् जो कुछ इस समय है वह आधुनिक है लेकिन यह सत्य नहीं है । आधुनिक अर्थ इसी में निहित नहीं है । इस समय में भी हमें कुछ बातें मध्यकाल की दिखाई देती हैं । सत्य यह है कि समस्त भावों का आधार प्राचीन संस्कार तथा नवीन अनुभव होते हैं । इसी से आधुनिकता का निर्माण होता है । 

विशेष – 

(1) अतीत से प्राप्त संस्कारों और नवीन अनुभवों से आधुनिकता की रचना होती है । (2) शुद्ध साहित्यिक भाषा में विषय का प्रतिपादन किया गया है । (3) व्याख्यात्मक शैली का प्रयोग किया गया है । 

 

(5) यह समझना गलत है कि किसी देश के मनुष्य सर्वदा किसी विचार या आचार को ही समान मूल्य देते आये हैं । पिछली शताब्दी में हमारे देशवासियों ने अपने अनेक पुराने संस्कारों को भुला दिया है और बचे संस्कारों के साथ नये अनुभवों को मिलाकर नवीन मूल्यों की कल्पना की है । 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘परम्परा बनाम आधुनिकता’ पाठ से अवतरित है । इसके लेखक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी हैं । 

प्रसंग – 

यहाँ समझाया गया है कि अतीत के संस्कारों को आधार मानकर नये अनुभव मूल्यों को बनाते हैं । 

व्याख्या – 

मानव जीवन सतत् गतिशील है । इसलिए यह मान लेना ठीक नहीं है कि किसी देश के मनुष्य सदैव किसी एक प्रकार के आचार – विचार को ही समान मूल्यवान मानते रहते हैं । वस्तुतः पुराने अपने संस्कार भुला दिये जाते हैं और शेष संस्कारों का नवीन अनुभवों के साथ संयोग करके नये जीवन मूल्यों का निर्माण करते आये हैं । हमारे देश में पिछली शताब्दी में ऐसा ही हुआ है ।

विशेष – 

(1) जीवन मूल्यों का निर्माण पुराने संस्कारों के साथ नये अनुभवों को मिलाकर होता जाता है । (2) शुद्ध साहित्यिक खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है । (3) विवेचनात्मक शैली को अपनाया है ।

 

(6) साहित्य के जिज्ञास को इन परिवर्तित और परिवर्तमान मूल्यों की ठीक – ठीक जानकारी नहीं हो , तो वह बहुत – सी बातों को समझने में गलती कर सकता है और फिर परिवर्तित और परिवर्तमान मूल्यों की ठीक – ठीक जानकारी प्राप्त करके ही हम यह सोच सकते हैं कि परिस्थितियों के दबाव से जो परिवर्तन हुए हैं , उनमें कितना अपरिहार्य है कितना अवांछनीय है और कितना ऐसा है , जिसे प्रयत्न करके वांछनीय बनाया जा सकता है । 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘परम्परा बनाम आधुनिकता’ पाठ से अवतरित है । इसके लेखक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी हैं । 

प्रसंग – 

यहाँ इस बात पर बल दिया गया है कि साहित्यकार को परिवर्तमान मूल्यों के बारे समय में पूरा ज्ञान होना चाहिए । 

व्याख्या – 

यह आवश्यक है कि जानने के इच्छुक साहित्यकार को बदले हुए और बदलने के लिए तत्पर जीवन मूल्यों के विषय में हर प्रकार की जानकारी हो । यदि ऐसा नहीं है तो इस समझने में उससे भूल हो सकती है । इन परिवर्तित और परिवर्तमान मूल्यों की सही – सही जानकारी प्राप्त होने पर ही यह ज्ञान हो पायेगा कि सामयिक परिस्थितियों के कारण जो बदलाव हुए हैं वे कितने अनिवार्य रूप से होने संगत हैं और कितने न चाहने योग्य हैं । यह जानने में भी कठिनाई नहीं होगी कि कितनों को प्रयासपूर्वक उपयोगी बनाया जा सकता है ।

विशेष – 

(1) जागरूक साहित्यकार को जीवन मूल्यों के बदलाव की ठीक – ठीक जानकारी होना आवश्यक है । (2) शुद्ध , साहित्यिक खड़ी बोली में विषय को स्पष्ट किया गया है । (3) विवेचनात्मक शैली का प्रयोग हुआ है । 

 

(7) यह गलत धारणा है कि मनुष्य कभी पीछे लौटकर हूबहू उन्हीं विचारों को अपनायेगा जो पहले थे । जो लोग मध्ययुग की भाँति सोचने की आदत को एक भयंकर वात्याचक्र की उलझन से निकलने का साधन समझते हैं, वे गलती करते हैं । इतिहास चाहे और किसी क्षेत्र में अपने को दोहरा लेता हो, विचारों के क्षेत्र में जो गया, सो गया । उसके लिए अफसोस करना बेकार है । 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘परम्परा बनाम आधुनिकता’ पाठ से अवतरित है । इसके लेखक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी हैं ।  

प्रसंग – 

इसमें बताया गया है कि पुराने विचार फिर से हूबहू लौटकर नहीं आते हैं । 

व्याख्या – 

मानव चिन्तनशील प्राणी है । उसके विचार निरन्तर गतिमान रहते हैं । इसलिए यह मानना कि मनुष्य पूर्व में अपनाये गये विचार को फिर से हूबहू अपना लेगा , गलत है । जिन लोगों की यह धारणा है कि जीवन की भयावह भंवरों से निकालने में मध्ययुगीन चिन्तन सहायक होगा , यह भी एक भूल ही है । वास्तविकता यह है कि अन्य किसी क्षेत्र में भले ही इतिहास की पुनरावृत्ति होती हो किन्तु विचारों के बारे में यह लागू नहीं होता है । विचार तो गये सो गये । वे फिर यथावत् लौटकर नहीं आते हैं । 

विशेष – 

(1) विचार सतत् परिवर्तनशील हैं , अत : वे पुराने रूप में फिर लौटकर नहीं आते हैं । (2) शुद्ध , साहित्यिक खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है । (3) चिन्तनयुक्त विचारात्मक शैली में विषय को समझाया गया है । 

 

(8) आधुनिक समाज ने निश्चित रूप से मनुष्य की महिमा स्वीकार कर ली है । अगला कदम सामूहिक मुक्ति का है – सब प्रकार के शोषणों से मुक्ति का । अगली हैं । मानवीय संस्कृति मनुष्य की समता और सामूहिक मुक्ति की भूमिका पर खड़ी होगी । मातहास – अनुभव इसी की सिद्धि के साधन बनकर कल्याणकर और जीवनप्रद हो सकते 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘परम्परा बनाम आधुनिकता’ पाठ से अवतरित है । इसके लेखक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी हैं । 

प्रसंग – 

यहां बताया गया है कि वर्तमान में मानव की महिमा को स्वीकार कर लिया गया है । इससे स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि मानवीय संस्कृति समानता मूलक मुक्ति प्राप्त कर मंगल का 

व्याख्या – 

आधुनिक समाज के चिन्तन में एक सकारात्मक परिवर्तन आया है कि उसने मनुष्य के महत्व को स्वीकार कर लिया है । इससे सामूहिक मुक्ति का मार्ग खुल रहा है । सभी तरह शोषणों से मुक्ति मिलने की सम्भावना उभर रही है । भविष्य में जो मनुष्य की संस्कृति विकसित होगी वह समानता तथा सामूहिक स्वतन्त्रता को आधार बनाकर तैयार होगी । अतीत के अनुभव उस सिद्धि के उपयोगी साधन होंगे । इससे मानव के मंगलमय जीवनदायक विधान हो सकते हैं । विधान करने वाली होगी । यह एक शुभ लक्षण है । 

विशेष – 

(1) आधुनिक समाज में मानवता के महत्व को स्वीकार कर उसके कल्याण के लिए मानव संस्कृति का विकास करने का भाव एक शुभ लक्षण है । (2) शुद्ध साहित्यिक भाषा का प्रयोग किया गया है । (3) विवेचनात्मक शैली को अपनाया है । 

 

(9) आधुनिकता ‘ सम्प्रदाय ‘ का विरोध करती है , क्योंकि आधुनिकता गतिशील प्रक्रिया है , ‘ सम्प्रदाय ‘ स्थिति – संरक्षक । परन्तु परम्परा से आधुनिकता का वैसा विरोध नहीं होता । दोनों की गतिशील प्रक्रियाएँ हैं । दोनों में अन्तर केवल यह है कि परम्परा यात्रा के बीच पड़ा हुआ अन्तिम चरण है , जबकि आधुनिकता आगे बढ़ा हुआ गतिशील कदम है । 

प्रसंग – 

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘परम्परा बनाम आधुनिकता’ पाठ से अवतरित है । इसके लेखक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी हैं । 

प्रसंग –

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘परम्परा बनाम आधुनिकता’ पाठ से अवतरित है । इसके लेखक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी हैं । 

व्याख्या – 

आधुनिकता निरन्तर गतिशील प्रक्रिया है , इसलिए यह सम्प्रदाय विरोधी होती है । सम्प्रदाय जिस स्थिति में होता है , उसकी रक्षा करता है किन्तु परम्परा से आधुनिकता का विरोध सम्प्रदाय जैसा नहीं होता है । ये दोनों ही लगातार गतिमान रहने वाली प्रक्रियाएँ हैं । इन दोनों में मात्र इतना भेद है कि परम्परा तो यात्रा के मध्य पड़ने वाला अन्तिम चरण होता है और आधुनिकता आगे की ओर चलते रहने वाला गतिमान कदम होता है । आधुनिकता रुकती नहीं है । 

विशेष – 

(1) परम्परा यात्रा के बीच का अन्तिम पड़ाव होता है तो आधुनिकता सतत् गतिशील कदम । (2) शुद्ध , साहित्यिक भाषा में विषय का प्रतिपादन किया गया है । (3) विवेचनात्मक शैली का प्रयोग किया गया है । 

 

(10) आधुनिकता अपने आप में कोई मूल्य नहीं है । मनुष्य के अनुभवों द्वारा जिन महनीय मूल्यों को उपलब्ध किया है , उन्हें नये सन्दर्भो में देखने की दृष्टि आधुनिकता है । यह एक गतिशील प्रक्रिया है । सन्दर्भ बदल रहे हैं , क्योंकि नई जानकारियों से नये साधन और नये उत्पादन सुलभ होते जा रहे हैं । बहुत – सी पुरानी बातें भुलाई जा रही हैं , नई सामग्रियाँ और नये कौशल नवीन सन्दर्भ की रचना कर रहे हैं । उनमें बहु – समादृत मानवीय मूल्यों का रूप कुछ बदला नजर आ रहा है परन्तु फिर भी उनका शाश्वत रूप बना रहता है । परम्परा से हमें इन मूल्यों का वह रूप प्राप्त होता है , जो अतीत के सन्दर्भ में बना था ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘परम्परा बनाम आधुनिकता’ पाठ से अवतरित है । इसके लेखक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी हैं । 

प्रसंग – 

यहाँ समझाया गया है कि अनुभवों के द्वारा जो महान मूल्य बने हैं उन्हें नवीन सन्दर्भो में देखने की दृष्टि ही आधुनिकता कहलाती है ।

व्याख्या – 

आधुनिकता जीवन मूल्य नहीं होती है । अपितु यह तो मानव के अनुभवों के आधार पर उपलब्ध किये गये महान मूल्यों को नवीन सन्दर्भो में देखने वाली दृष्टि है । आधुनिकता सतत् गतिशील प्रक्रिया होती है । इसलिए परिस्थिति , परिवेश एवं सन्दर्भ बदलेंगे तो आधुनिकता भी बदलेगी । हम अनेक पुरानी बातों को भूल रहे हैं , नवीन सामग्रियाँ , नवीन साधन , नवीन ज्ञान स्रोत मिल रहे हैं और नये – नये सन्दर्मों का निर्माण किया जा रहा है । ऐसी स्थिति में बहुत बड़े समाज द्वारा आदर की दृष्टि से देखे जाने वाले मूल्यों का रूप भी परिवर्तित होता दिखाई पड़ रहा है । इस परिवर्तन के बाद भी उन मूल्यों का सदैव विद्यमान रहने वाला रूप बराबर बना रहता है । परम्परा इन मूल्यों के उस रूप का ज्ञान करा देती है जो प्राचीन काल में निर्मित हुए थे । अत : आधुनिकता के साथ परम्परा का भी अपना महत्व है । 

विशेष – 

(1) आधुनिकता अनुभवजन्य मूल्यों को देखने वाली नवीन दृष्टि होती है । (2) परम्परा उन मूल्यों के अतीत के रूपों का ज्ञान कराती है । (3) शुद्ध , साहित्यिक खड़ी बोली का प्रयोग हुआ है । (4) विवेचनात्मक शैली को अपनाया गया है । 

 

(11) कोई भी आधुनिक विचार आसमान से नहीं पैदा होता है । सबकी जड़ परम्परा में गहराई तक गई हुई है । सुन्दर – से – सुन्दर फूल यह दावा नहीं कर सकता कि वह पेड़ से भिन्न होने के कारण उससे एकदम अलग है । कोई भी पेड़ दावा नहीं कर सकता कि वह मिट्टी से भिन्न होने के कारण उससे एकदम अलग है । इसी प्रकार कोई भी आधुनिक विचार यह दावा नहीं कर सकता कि वह परम्परा से कटा हुआ है । कार्य – कारण के रूप में , आधार – आधेय के रूप में परम्परा की एक अविच्छेद्य श्रृंखला अतीत में गहराई तक – बहुत गहराई तक गई हुई है । 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘परम्परा बनाम आधुनिकता’ पाठ से अवतरित है । इसके लेखक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी हैं । 

प्रसंग – 

इस गद्यांश में स्पष्ट किया गया है कि आधुनिकता का जन्म पराम्परा में से ही होता है ।

व्याख्या – 

परम्परा और आधुनिकता सतत् सम्बद्ध रहती हैं क्योंकि कोई भी भाव – विचार आकाश से नहीं आता है । सभी विचारों का जन्म परम्परा से ही होता है । प्रत्येक विचार की जड़ परम्परा में अति गहराई तक गई हुई है । जैसे बाहर दिखाई देने वाले सुन्दर फूल के बारे में यह नहीं कहा जा सकता है कि वह वृक्ष से एकदम अलग है अथवा वृक्ष के बारे में भी नहीं कहा जा सकता कि वह मिट्टी से अलग है , इसलिए उससे भिन्न हो गया वैसे ही कोई आधुनिक विचार भी अतीत की परम्परा से नितान्त अलग होने का दावा नहीं कर सकता है । ये विचार कार्य एवं कारण और आधार एवं आधेय के रूप में परम्परा से अभिन्न कड़ियों के रूप में अत्यन्त गहरे तक जुड़े रहते हैं । 

विशेष – 

(1) आधुनिकता का मूल परम्परा में ही होता है । (2) शुद्ध , साहित्यिक भाषा का प्रयोग किया गया है । (3) तर्क – प्रधान विवेचनात्मक शैली में विषय को स्पष्ट किया गया है । 

 

(12) परम्परा इतिहास – सम्मत नहीं हो सकती , पर भूले इतिहास को खोज निकालने का सूत्र देती है । इस इतिहास से निखरी दृष्टि आधुनिकता की पहली शर्त है । जिसे इतिहास की नई दृष्टि प्राप्त नहीं है , वह हजारों वर्षों के मानवीय प्रयासों का रसास्वाद नहीं कर सकता , भविष्य के मानव – चित्र को सरस – कोमल बनाने वाले प्रयासों की कल्पना नहीं कर सकता । 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘परम्परा बनाम आधुनिकता’ पाठ से अवतरित है । इसके लेखक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी हैं ।  

प्रसंग – 

यहाँ पुष्ट किया गया है कि इतिहास की नवीन दृष्टि के द्वारा ही मानव जीवन के भविष्य को सरस बनाया जा सकता है । 

व्याख्या – 

परम्परा इतिहास के अनुरूप नहीं होती है । यह तो इतिहास को ढूँढने के सूत्र प्रदान करने का माध्यम हो सकती है । परम्परा के द्वारा खोजे गये इतिहास की जो निर्मल नवीन दृष्टि है वह आधुनिकता का पहली सीढ़ी है । इतिहास की इस नवीन दृष्टि के बिना अतीत में मानव द्वारा किये गये प्रयत्नों का पूरा आनन्द प्राप्त नहीं कर सकता है । ऐसा व्यक्ति मानव जीवन के भविष्य की आनन्दमय मृदुल कल्पना करने में भी असमर्थ रहेगा । 

विशेष – 

(1) परम्परा के सहारे प्राप्त नवीन इतिहास दृष्टि ही मानव के अतीत , वर्तमान और भविष्य के लिए मंगलकारी प्रयास को प्रेरणा दे सकती है । 

 

(13) परम्परा आधुनिकता को आधार देती है , उसे शुष्क और नीरस बुद्धि – विलास बनने से बचाती है । उसके प्रयासों को अर्थ देती है , उसे असंयत और विशृंखल उन्माद से बचाती है । परम्परा और आधुनिकता ये दोनों परस्पर विरोधी नहीं , परस्पर पूरक हैं । 

संदर्भ – 

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘परम्परा बनाम आधुनिकता’ पाठ से अवतरित है । इसके लेखक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी हैं ।  

प्रसंग – 

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘परम्परा बनाम आधुनिकता’ पाठ से अवतरित है । इसके लेखक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी हैं ।  

व्याख्या – 

परम्परा और आधुनिकता बाहर से देखने में भले ही अलग – अलग या विरोधी लगती हों परन्तु यथार्थ में ऐसा नहीं है । आधुनिकता का आधार परम्परा ही होती है । परम्परा ही आधुनिकता को सरस तथा हृदय – सम्मत बनाती है । यही आधुनिकता को अर्थवान बनाती है । परम्परा ही आधुनिकता को अनियन्त्रित बिखराव से बचाती है । आशय यह है कि परम्परा से उत्पन्न होने वाली आधुनिकता में संयमन और नियन्त्रण परम्परा से प्राप्त अनुभवों से ही आता । इस तरह परम्परा और आधुनिकता एक – दूसरे की पूर्ति करने वाली हैं । ये परस्पर विरोधी नहीं होती हैं । 

विशेष – 

(1) परम्परा और आधुनिकता एक – दूसरे की पूरक होती हैं । (2) शुद्ध , साहित्यिक भाषा का प्रयोग किया गया है । (3) विवेचनात्मक शैली में विषय को समझाया गया है ।

हजारी प्रसाद द्विवेदी लेखक परिचय

जीवन परिचय – 

भारतीय साहित्य , संस्कृति एवं दर्शन के प्रकाण्ड पण्डित आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का जन्म एक विद्वान ब्राह्मण परिवार में जिला बलिया के ‘ दुबे का छपरा ‘ में हुआ था । आपके पिता पं. अनमोल दुबे ज्योतिष के प्रकाण्ड पण्डित थे । उन्होंने अपने पुत्र को भी ज्योतिष के अध्ययन की ओर प्रेरित किया । द्विवेदी जी ने काशी विश्वविद्यालय से ज्योतिषाचार्य तथा साहित्याचार्य की परीक्षाएँ उत्तीर्ण की । आप सन् 1940 ई . में शान्ति निकेतन में हिन्दी भवन के निदेशक नियुक्त हुए । सन् 1949 ई . में लखनऊ विश्वविद्यालय ने इन्हें डी . लिट् की उपाधि से सम्मानित किया । सन् 1950 ई . में द्विवेदी जी काशी विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के प्रोफेसर और अध्यक्ष नियुक्त हुए । सन् 1957 ई . में इन्हें पदम् – भूषण की उपाधि से विभूषित किया गया । सन् 1958 ई . में आप राष्ट्रीय ग्रन्थ न्यास के सदस्य बने । इसके बाद ये पंजाब विश्वविद्यालय , चण्डीगढ़ में हिन्दी विभाग के प्रोफेसर और अध्यक्ष रहे । जीवनपर्यन्त हिन्दी की सेवा करता हुआ हिन्दी साहित्याकाश का यह दैदीप्यमान नक्षत्र मई , 1979 ई . में सदैव के लिए विलीन हो गया । हजारी प्रसाद द्विवेदी प्रबुद्ध विचारक , चिन्तक एवं सृजनशील साहित्यकार थे । हिन्दी साहित्य में आपकी ख्याति आलोचक , निबन्धकार तथा उपन्यासकार के रूप में है । आपने आलोचना के नवीन दृष्टिकोण को प्रस्तुत किया है । उनका साहित्यिक व्यक्तित्व इतना व्यापक और विशाल है कि उसमें एक निबन्धकार की समस्त विशेषताएँ समाहित हो गयी हैं । 

साहित्य में स्थान – 

भारतीय संस्कृति एवं दर्शन प्रकाण्ड पण्डित आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की हिन्दी सेवाएँ अपरिमित हैं । इतिहास , निबन्ध , समीक्षा के माध्यम से आपने रचनाकार के उत्कृष्ट मानदण्ड स्थापित किये हैं । हिन्दी साहित्य आपका सदैव ऋणी रहेगा ।

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