MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 4 गेहूँ और गुलाब

Chapter 4 गेहूँ और गुलाब (रामवृक्ष बेनीपुरी)

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MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 4 गेहूँ और गुलाब (रामवृक्ष बेनीपुरी)

गेहूँ और गुलाब पाठ का अभ्यास 

 

गेहूँ और गुलाब अति लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1. 

पृथ्वी पर मानव अपने साथ क्या लेकर आया है ? 

उत्तर – 

मानव पृथ्वी पर अपने साथ भूख और प्यास लेकर आया है 

प्रश्न 2. 

मानव को मानव किसने बनाया ? 

उत्तर – 

मानव को मानव गुलाब ने बनाया । 

प्रश्न 3. 

मानव जीवन सुखी और आनन्दित कब होता है ? 

उत्तर – 

जब तक मानव के जीवन में गेहूँ और गुलाब का सन्तुलन बना रहता है , वह सुखी और आनन्दित होता है । इस संतुलन के बिगड़ने पर ही कष्ट होते हैं । अत : यह संतुलन बना रहना चाहिए । 

प्रश्न 4. 

गेहूँ और गुलाब किसका प्रतीक हैं ? 

उत्तर – 

गेहूँ भौतिकता का और गुलाब सूक्ष्म मानसिकता का प्रतीक बन गया है । 

प्रश्न 5. 

आज का मानव किस परम्परा से प्रभावित है ? 

उत्तर – 

आज का मानव भौतिकवादी परम्परा से प्रभावित है । 

प्रश्न 6. 

कामनाओं को स्थूल वासनाओं के क्षेत्र से ऊपर उठाकर हमारी प्रवृत्ति किस ओर होनी चाहिए ? 

उत्तर – 

कामनाओं को स्थूल वासनाओं के क्षेत्र से ऊपर उठाकर हमारी प्रवृत्ति सूक्ष्म भावनाओं की ओर प्रवृत्त होनी चाहिए ।

 

गेहूँ और गुलाब लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1. 

गेहूँ और गुलाब से मानव को क्या प्राप्त होता है ? 

उत्तर – 

इस संसार में जन्म लेने वाले मानव को गेहूँ से भोजन मिलता है । वह गेहूँ खाता है जिससे उसका शरीर पुष्ट होता है । गुलाब को मनुष्य सूंघता है । उससे उसे मानसिक तृप्ति मिलती है । उसका मन प्रसन्न होता है । वृत्तियाँ हर्षित होती हैं ।

प्रश्न 2. 

मनुष्य पशु से किस प्रकार भिन्न है ? 

उत्तर – 

खाने की प्रवृत्ति तो पशुओं और मनुष्यों में समान रूप में होती है किन्तु मानसिक , तृप्ति मात्र मनुष्य के लिए ही अपेक्षित है । अतीत से इस बात की पुष्टि होती है कि मनुष्य विविध प्रकार से भूख मिटाने पर कभी शान्त नहीं हुआ है । उसे भूख मिटाने वाले माँस , फल , अनाज के साथ ही ढोल , तुरही , वंशी , नृत्य आदि ने निरन्तर आकर्षित किया है । वास्तविकता यह है कि मनुष्य को मनुष्य गुलाब अर्थात् मानसिक तृप्ति ने बनाया । उषा की लालिमा , ओस की बूंदों , इन्द्रधनुष के अपार सौन्दर्य ने उसे भावविभोर कर दिया । अतः पशु को मात्र खाना चाहिए परन्तु मनुष्य को खाने के साथ मानसिक तृप्ति भी चाहिए । मनुष्य पशु से इसी प्रकार भिन्न है । 

प्रश्न 3. 

विज्ञान ने गेहूँ के बारे में क्या बतलाया है ? 

उत्तर – 

विज्ञान ने बता दिया कि गेहूँ क्या है ? उसने इसे भी स्पष्ट कर दिया कि मनुष्य चिरकाल से क्यों भूखा चला आ रहा है । आज ज्ञात हो गया है कि गेहूँ क्या है ? उसमें गेहूँपन कहा से आता है यह भी पता लग गया है । धरती और आकाश के कुछ तत्व एक विशेष प्रक्रिया से पौधों की बालियों में इकट्ठे होकर गेहूँ बन जाते हैं । उन तत्वों का अभाव ही हमारे शरीर में जाता है । विज्ञान गेहूँ की पैदावार बढ़ाने के लिए प्रयास कर रहा है । 

प्रश्न 4. 

गेहूँ और मानव शरीर का क्या सम्बन्ध है ? 

उत्तर – 

गेहूँ और मानव शरीर का बड़ा घनिष्ठ सम्बन्ध है । मानव जिस क्षण पृथ्वी पर आया , अपने साथ भूख लेकर आया । भूख मिटाने को उसने माँ का दूध , वृक्षों के फल , जीव – जन्तु आदि सभी का भक्षण किया , पर भूख शान्त न हुई । वह गेहूँ पर टूट पड़ा । गेहूँ उगाने का अभियान तेज हो गया । इस प्रकार , मानव के भौतिक शरीर की पुष्टि के लिए गेहूँ आवश्यक है । यही गेहूँ । और मानव शरीर का सम्बन्ध है । 

प्रश्न 5. 

वृत्तियों को वश में करने के लिए मनोविज्ञान ने कौन – से उपाय बतलाए 

उत्तर – 

वृत्तियों को वश में करने के लिए मनोविज्ञान ने दो उपाय बतलाए हैं । एक है इन्द्रियों का संयमन और दूसरा है वृत्तियों का उन्नयन । इन्द्रियों के संयमन का आशय है – इन्द्रियों को अपने वश में करना और वृत्तियों के उन्नयन का आशय है – वृत्तियों की उन्नति करना । स्थूल वासनाओं से ऊपर उठकर सूक्ष्म भावनाओं की ओर प्रवृत्त करना ।

प्रश्न 6. 

लेखक के अनुसार शुभ दिन का स्वरूप कैसा होगा ? 

उत्तर – 

लेखक के अनुसार वह शुभ दिन होगा जब मानव स्थूल शरीर की आवश्यकताओं के बंधन से मुक्त होकर , सूक्ष्म मानस – जगत के नये लोक की रचना करेंगे । उस समय गेहूँ से पीछा छूट जाएगा । मानव गुलाब की दुनिया में स्वतंत्र विचरण करेगा । उस रंगों और सुगन्ध की दुनिया में भौरों का नाच , गुंजन , फुलसुँघनी का फुदकना , चमकना होगा । नृत्य – संगीत व उत्साह – आनन्द का वातावरण होगा । गंदगी एवं कुरूपता का नाम भी नहीं होगा ।

 

गेहूँ और गुलाब दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

 

प्रश्न 1. 

‘गेहूँ और गुलाब’ में लेखक संतुलन क्यों स्थापित करना चाहते हैं ?

उत्तर – 

गेहूँ मनुष्य की भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति करता है । गुलाब मानसिक तृप्ति प्रदान करता है । मनुष्य के लिए स्थूल शरीर एवं मानसिक शान्ति दोनों ही आवश्यक हैं । बिना गेहूँ के शरीर पुष्ट नहीं होगा और पोषण के अभाव में क्षीण होते – होते नष्ट हो जायेगा । इसी प्रकार , यदि गुलाब न हो तो सुगन्ध और सुन्दरता के बिना मानव मन तृप्ति का अनुभव नहीं करेगा और धीरे – धीरे मानसिक विकार पैदा होने लगेंगे । अतः गेहूँ और गुलाब दोनों को सन्तुलित रूप में आवश्यकता है । न किसी का अभाव होना चाहिए और न किसी एक को बहुत अधिकता । दोनों के संतुलित प्रयोग से शरीर तथा मन दोनों स्वस्थ रहेंगे और मानव जीवन सुखी रहेगा ।

प्रश्न 2. 

वृत्तियों के उन्नयन का क्या आशय है ? स्पष्ट कीजिए । 

उत्तर – 

लेखक के अनुसार वृत्तियों को वश में करने का सबसे उत्तम उपाय वृत्तियों का उन्नयन है । वृत्तियों के उन्नयन का आशय है कि कामनाओं को स्थूल (भौतिक) वासनाओं के स्तर से ऊपर उठाकर सूक्ष्म भावनाओं की ओर प्रवृत्त करना । जब वृत्तियाँ भौतिक स्वादों से मुक्त हो जायेंगी तो उन्हें सूक्ष्म की ओर आकर्षित होने का अवसर मिलेगा । इस आकर्षण के बाद वृत्तियाँ सूक्ष्म अनुभूतियों में परिवर्तित होकर आन्तरिक आनन्द का अनुभव करने लगेंगी । शरीर का सुख नितान्त अस्थिर है , किन्तु सूक्ष्म वृत्तियों के ऊपर उठने पर मिलने वाली शान्ति आनन्दित करती है । 

प्रश्न 3. 

‘उसके श्रम के साथ संगीत बँधा हुआ था और संगीत के साथ श्रम’ इस पंक्ति का भाव – विस्तार कीजिए । 

उत्तर – 

जब तक मनुष्य के जीवन में शरीर की पुष्टि के लिए गेहूँ तथा मन की तृप्ति के लिए गुलाब का संतुलन रहा तब तक वह सुखी रहा । उसे दोनों से आनन्द की प्राप्ति होती रही । न उसे श्रम थकाता और न संगीत विलासी बनाता । वह कमाता हुआ गाता रहा और गाता हुआ कमाता रहा । वह धरती पर रहता , किन्तु उसे आकाश का भी स्मरण रहा । जब उसने आकाश पर दृष्टि लगायी तब वह नहीं भूलता कि वह धरती पर टिका है । दोनों के संतुलन ने उसे सुखी बनाए रखा । इसलिए सफल जीवन के लिए श्रम और संगीत का संतुलन आवश्यक है । 

 

गेहूँ और गुलाब पाठ – सारांश

प्रस्तुत भावात्मक निबन्ध के लेखक यशस्वी संस्मरण तथा निबन्धकार रामवृक्ष बेनीपुरी है । इसमें आर्थिक तथा राजनीतिक प्रगति और सांस्कृतिक प्रगति का वर्णन किया गया है । बेनीपुरी जी ने भूख को शान्त तथा शरीर को पुष्ट करने वाले गेहूँ को हमारे समाज की आर्थिक प्रगति का तथा मानसिक सन्तोष देने वाले गुलाब को सांस्कृतिक प्रगति का प्रतीक माना है । गेहूँ हमारी भूख को मिटाकर शरीर को पुष्ट करता है तथा गुलाब की गन्ध से हमें मानसिक तृप्ति मिलती है । मनुष्य संसार में भूख लेकर आया । उसने प्रारम्भ से ही माँ का दूध , फल , माँस , अनाज आदि सभी से अपनी भूख शान्त करने का प्रयत्न किया । 

 

फिर वह अतृप्तावस्था में गेहूँ पर टूट पड़ा है । उसने बाग – बगीचे आदि उजाड़कर गेहूँ उगाने के प्रयास में स्वयं को लगा रखा है । फलस्वरूप वह मानसिक तृप्ति की ओर से उदासीन हो गया है । विचारणीय बात यह है कि खाने की प्रवृत्ति तो पशुओं में भी होती है किन्तु मानसिक तृप्ति मात्र मनुष्य के लिए ही अपेक्षित है । अतीत से इस बात की पुष्टि होती है कि मनुष्य विविध प्रकार से भूख मिटने पर कभी शान्त नहीं हुआ है । उसे भूख मिटाने वाले माँस , फल , अनाज के साथ ही ढोल , तुरही , वंशी , नृत्य आदि ने निरन्तर आकर्षित किया है । वास्तविकता यह है कि मनुष्य को मनुष्य गुलाब अर्थात् मानसिक तृप्ति ने बनाया । 

 

उषा की लालिमा , ओस की बूंदों , इन्द्रधनुष के अपार सौन्दर्य ने उसे भावविभोर कर दिया । यही उनके अन्तर का आधार है । मनुष्य के शरीर में मस्तिष्क का स्थान सर्वोपरि है । पेट का स्थान हृदय से भी नीचे है । इसमें पशु के समान हृदय तथा पेट समानान्तर नहीं है । अतः मनुष्य को पेट से पूर्व हृदय तथा मस्तिष्क को तृप्त करना आवश्यक है । आदिकाल से मनुष्य की चेष्टा रही है कि वह अपनी भूख को शान्त कर सके किन्तु वह मन को भुला नहीं पाया है । उसने गेहूँ आदि से पेट का पोषण किया है तो संगीत , नृत्य , कला आदि से मन का । धीरे – धीरे यह सन्तुलन बिगड़ा । गेहूँ ( शारीरिक तृप्ति ) की जितनी दौड़ – धूप रही उतनी गुलाब ( मानसिक तृप्ति ) की नहीं रही । 

 

आज भी स्थिति यह है कि गेहूँ के लिए सुगंध वाले गुलाब के बाग – बगीचे उजाड़े जा रहे हैं । चारों ओर पेट की भूख की चिन्ता है । मानसिक तृप्ति की पूरी तरह उपेक्षा हो रही है जबकि दोनों का सन्तुलन ही आनन्ददायक हो सकता है । विज्ञान अभी तक मानव शरीर की भूख मिटाने में लगा है । इसके लिए उसने गेहूँ की खूब वृद्धि की है किन्तु यह आवश्यक है कि विज्ञान अपना रुख बदले । वह भौतिक पूर्ति के लिए होने वाले नरसंहार से हटकर मानव जीवन की समस्याओं पर ध्यान दे । भौतिक जंगल की वस्तुओं के उत्पादन की प्रचुरता से मानव को सुख शान्ति नहीं मिल सकती है । इससे मनुष्य राक्षस में बदल सकता है । सर्वविदित है कि सोने की लंका में राक्षस ही रहते थे । इससे बचने के लिए गेहूँ ( शारीरिक तृप्ति ) की अपेक्षा गुलाब ( मानसिक तृप्ति ) का उत्थान आवश्यक है । 

 

अब तक गेहूँ ने पर्याप्त परेशान किया है । अब उसकी दुनिया समाप्त हो रही है । गुलाब ( मानसिक विकास ) का युग आयेगा । आर्थिक तथा राजनीतिक खून – खराबे से मुक्त होकर सांस्कृतिक दुनिया का निर्माण होगा । यह दुनिया विविध गंधों , रंगों , कलाओं आदि के आनन्द से युक्त होगी । वहाँ गन्दगी , कुरूपता , नीचता आदि का लेशमात्र भी स्थान नहीं होगा । इसके लिए गेहूँ ( भौतिकता ) के मोटे पर्दे को हटाना होगा । फिर इसी पृथ्वी पर स्वर्गीय आनन्द का साम्राज्य मिल जायेगा । इस प्रकार बेनीपुरी जी ने सांस्कृतिक दृष्टि से उज्ज्वल भविष्य की कामना की है । 

 

पाठ के कठिन शब्दार्थ 

पुष्टि = पोषण । तृप्त = संतुष्ट । क्षुधा = भूख । पियासा = प्यास । कीट – पतंग = कीड़े – पतंगे । काफिला यात्रियों का दल । तरजीह महत्व । कामिनियाँ = स्त्रियाँ । उच्छ्वसित – उल्लसित । समिधा = हवन में जलाने वाली लकड़ी । आनन्द – विभोर = आनन्द में लीन । शनैः – शनैः = धीरे – धीरे । प्रस्फुटित = निकलने वाली । लक्ष – लक्ष = लाख – लाख । चेष्टा = प्रयास । साँवला – श्याम वर्ण वाला – श्रीकृष्ण । गलीज = गन्दा । चिरस्थायी = बहुत समय तक स्थिर । आकांक्षा = इच्छा । बुभुक्षा = भूख । इफरात = बहुत अधिक । प्रचुरता = बहुतायत . अधिकता । हस्तामलकवत = हथेली पर रखे हुए । अभक्ष्य – नखाने योग्य । अकाय – अशरीरी । संयमन – नियंत्रण । उन्नयन – उन्नति प्रवृत्त = संलग्न । प्रभुता = स्वामित्व । यंत्रणाएँ = कष्ट , पीड़ा । वासनाएँ – इच्छाएँ । 

 

गेहूँ और गुलाब संदर्भ, प्रसंग सहित गद्यांशों की व्याख्या 

 

(1) मानव को मानव बनाया गुलाब ने। मानव, मानव तब बना, जब उसने शरीर की आवश्यकताओं पर मानसिक वृत्तियों को तरजीह दी।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘ गेहूँ और गुलाब ‘ पाठ से अवतरित है । मानस तृप्त होता है । इसके लेखक रामवृक्ष बेनीपुरी है ।

प्रसंग – 

यहाँ पर गेहूँ एवं गुलाब की उपयोगिता बताई गई है । 

व्याख्या – 

इस जगत में आदिकाल से ही मन की तृप्ति तथा शरीर की पुष्टि दोनों का महत्व रहा है । मन की तृप्ति का प्रतीक रस गन्ध भरा हुआ गुलाब है तो मन की पुष्टि पौष्टिक गेहूँ करता है । इन दोनों का ही महत्व है । दोनों के समन्वय से ही मानव सुखी रह सकता है । एक को त्यागकर दूसरे को प्राप्त करने से सफलता सम्भव नहीं है । तन तथा मन दोनों का स्वस्थ होना अनिवार्य है और इसके लिए गेहूँ तथा गुलाब दोनों की अपेक्षा है । 

विशेष – 

(1) गेहूँ एवं गुलाब दोनों जीवन के लिए उपयोगी हैं । (2) शरीर एवं मन दोनों का समन्वय अपेक्षित है । (3) शुद्ध साहित्यिक खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है । (4) तर्कपूर्ण प्रतीकात्मक शैली को अपनाया गया है ।

 

(2) रात का काला – धुप्प पर्दा दूर हुआ , तब वह उच्छ्वसित हुआ सिर्फ इसलिए नहीं कि अब पेट – पूजा की समिधा जुटाने में उसे सहूलियत मिलेगी , बल्कि वह आनन्द – विभोर हुआ ऊषा की लालिमा से , उगते सूरज की शनैः – शनैः प्रस्फुटित होने वाली सुनहरी किरणों से , पृथ्वी पर चमचम करते लक्ष – लक्ष ओस – कणों से । आसमान में जब बादल उमड़े तब उनमें अपनी कृषि का आरोप करके ही वह प्रसन्न नहीं हुआ , उसके सौन्दर्य बोध ने उसके मन – मोर को नाच उठने के लिए लाचार किया । इन्द्रधनुष ने उसके हृदय को भी इन्द्रधनुषी रंगों में रंग दिया । 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘ गेहूँ और गुलाब ‘ पाठ से अवतरित है । मानस तृप्त होता है । इसके लेखक रामवृक्ष बेनीपुरी है ।

प्रसंग – 

यहाँ पर सांस्कृतिक चेतना की प्रारम्भिक अवस्था का चित्रण किया गया है । 

व्याख्या – 

अज्ञान के काले पर्दे के हटते ही चेतना का चतुर्मुखी विकास हुआ । अब मनुष्य की भूख शान्त करने के साधन एकत्रित हुए तथा उसने जीवन जीना प्रारम्भ किया । उसकी सांस्कृतिक भावभूमि तैयार हुई इसमें आनन्द अनुभव हुआ । यह आनन्द मात्र भूख मिटाने के कारण नहीं अपितु प्रकृति के अपार सौन्दर्य से परिपूर्ण होने के कारण मिला । उषाकालीन उगते सूर्य की लाली , प्रात : पृथ्वी पर विकसित उसकी किरणें , झलमलाती ओस की बूंदें आदि देखकर वह भावमग्न हो गया । आकाश में उमड़ते हुए बादल उसे बड़े प्रिय लगे । इनके प्रिय लगने का आधार उसकी खेती – बाड़ी ही नहीं अपितु सौन्दर्य का ज्ञान है । घिरते बादलों के मध्य फूटने वाले इन्द्रधनुष को देखकर उसका मन विविध प्रकार के हर्ष उल्लास से भर गया । वह जगत तथा भावना दोनों के स्तर पर प्रसन्न हुआ । 

विशेष – 

(1) इस अवतरण में मानव की चेतनावस्था की भौतिक भावात्मक स्थिति का सुन्दर वर्णन हुआ है । (2) मानव में पेट की भूख के समान प्रारम्भ से ही सौन्दर्यानुभूति की लालसा रही है । (3) सरल , सुबोध तथा भावात्मक शैली को अपनाया है । (4) विषय के अनुरूप लाक्षणिक तथा आलंकारिक भाषा है । 

 

(3) मानव – शरीर में पेट का स्थान नीचे है , हृदय का ऊपर और मस्तिष्क का सबसे ऊपर ! पशुओं की तरह उसका पेट और मानस समानान्तर रेखा में नहीं है । जिस दिन वह सीधे तनकर खड़ा हुआ , मानस ने उसके पेट पर विजय की घोषणा की । 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘ गेहूँ और गुलाब ‘ पाठ से अवतरित है । मानस तृप्त होता है । इसके लेखक रामवृक्ष बेनीपुरी है ।

प्रसंग – 

यहाँ पर मनुष्य में भाव , विचार आदि की स्थितियों का ज्ञान कराने के लिए शरीर में हृदय , मस्तिष्क तथा पेट की स्थिति का सहारा लिया गया है ।

व्याख्या – 

मनुष्य की शारीरिक रचना में सबसे ऊपर मस्तिष्क उसके नीचे हृदय तथा सबसे नीचे पेट है । ये तीनों क्रमशः विचार , भाव तथा भूख के आश्रय हैं । पशुओं में मस्तिष्क तो होता ही नहीं है तथा उनके हृदय तथा पेट भी समानान्तर होते हैं । यही कारण है कि पशु भूख तथा भाव में समान हैं , किन्तु मनुष्य जब सजग होकर खड़ा हुआ तो उसका पेट नीचे रह गया मानस . ऊपर पहुँच गया । फलस्वरूप भूख पर भाव ने विजय प्राप्त कर ली । भाव की विजय के कारण ही उसमें सौन्दर्यानुभूति आदि का विकास हुआ । 

विशेष – 

(1) इस अंश में भौतिक भूख से भावना को श्रेष्ठ माना है । (2) बात की पुष्टि को प्रत्यक्ष रूप देने हेतु शरीर की रचना का सहारा लिया है । (3) तर्कपूर्ण , भावात्मक शैली तथा सरल , सुबोध भाषा अपनायी है ।

 

(4) गेहूँ की आवश्यकता उसे है , किन्तु उसकी चेष्टा रही है गेहूँ पर विजय प्राप्त करने की । प्राचीन काल के उपवास , व्रत , तपस्या आदि उसी चेष्ट भन्न – भिन्न रूप रहे हैं । 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘ गेहूँ और गुलाब ‘ पाठ से अवतरित है । मानस तृप्त होता है । इसके लेखक रामवृक्ष बेनीपुरी है ।

प्रसंग – 

लेखक ने बताया है कि दुनिया में जिन्दा रहने के लिए उदरपूर्ति करना परमावश्यक है लेकिन मात्र उदर पूर्ति करना ही जीवन का एकमात्र लक्ष्य नहीं है । 

व्याख्या – 

मानव को उदरपूर्ति हेतु गेहूँ की आवश्यकता पड़ती है । इससे स्वास्थ्य तथा शरीर की रक्षा भी होती है । दु : ख का विषय यह है कि आज का मानव पेट भरने में ही अपनी समस्त शक्तियों का अपव्यय कर रहा है । मानव को उदरपूर्ति को सिद्धि न मानकर साधन के रूप में स्वीकार करना चाहिए । आदिकाल से मानव व्रत तथा उपवास का सहारा लेता रहा है । यह उसकी भूख पर विजय पाने का प्रमाण है । प्राचीन काल के लोग उदरपूर्ति को ही सब कुछ न मानकर उससे मन तथा मस्तिष्क को श्रेष्ठ ठहराते थे । वे मन तथा मस्तिष्क की भूख के शमन का भी प्रयास करते थे । इनको वे यथा – योग्य संतोष देने की चेष्टा करते थे । 

विशेष – 

(1) लेखक ने गेहूँ को भौतिकता का प्रतीक स्वीकारा है । (2) व्रत एवं उपवास आत्मिक उन्नति के साधन हैं । (3) भाषा प्रवाहमय एवं चित्रात्मक है । (4) शैली भावात्मक एवं सरस है । 

 

(5) जब तक मानव के जीवन में गेहूँ और गुलाब का सन्तुलन रहा , वह सुखी रहा , सानन्द रहा । 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘ गेहूँ और गुलाब ‘ पाठ से अवतरित है । मानस तृप्त होता है । इसके लेखक रामवृक्ष बेनीपुरी है ।

प्रसंग – 

इस गद्यांश में गेहूँ और गुलाब के सन्तुलन का महत्व बताया है । 

व्याख्या – 

गेहूँ से तन का पोषण मिलता है और गुलाब के अवलोकन से मन सन्तुष्ट होती है । स्वस्थ जीवन के लिए तन और मन दोनों की आवश्यकता होती है । पूर्व में यह सन्तुलन बना रहा इसीलिए मानव सुखी एवं आनन्दमय रहा । 

विशेष – 

(1) सुखी जीवन के लिए तन एवं मन का सन्तुलन परमावश्यक है । (2) शुद्ध , साहित्यिक भाषा का प्रयोग किया गया है । (3) सहज प्रवाहमान शैली को अपनाया है । 

 

(6) किन्तु गेहूँ प्रतीक बन गया हड्डी तोड़ने वाले , थकाने वाले , उबाने वाले , नारकीय यन्त्रणाएँ देने वाले श्रम का – उस श्रम का , जो पेट की क्षुधा भी अच्छी तरह शान्त न कर सके ।और गुलाब बन गया प्रतीक विलासिता का – भ्रष्टाचार का , गन्दगी और गलीज का ! वह विलासिता – जो शरीर को नष्ट करती है और मानस को भी । 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘ गेहूँ और गुलाब ‘ पाठ से अवतरित है । मानस तृप्त होता है । इसके लेखक रामवृक्ष बेनीपुरी है ।

प्रसंग – 

यहाँ बताया गया है कि गेहूँ सांसारिक सुखों का तथा गुलाब आन्तरिक आनन्द के प्रतीक थे । दोनों के सन्तुलन से जीवन सुखी था किन्तु सांसारिक इच्छाओं के बढ़ जाने से यह सन्तुलन बिगड़ गया और गेहूँ तथा गुलाब के रूप भी बदल गये । 

व्याख्या – 

भूख शान्त करने वाला गेहूँ अब भयंकर परिश्रम तथा कष्टों का प्रतीक हो गया । वह अन्दर तथा बाहर के भीषण संकटों को देने के साथ – साथ पेट की भूख शान्त करने में असमर्थ रहा । यह मात्र शोषण का संकेत बनकर रह गया । दूसरी ओर गुलाब जो आन्तरिक स्वच्छ अनुभूतियों का प्रतीक था , वह भोग – विलास , नीचता , दुराचार , भ्रष्टाचार का चिह्न बन गया । इसके कारण व्यक्ति के मन तथा कार्य व्यवहार सभी भ्रष्ट हो गये । वस्तुत : वह स्वार्थी प्रकृति का प्रतीक हो गया । 

विशेष – 

(1) गेहूँ तथा गुलाब के पूँजीवादी व्यवस्था में ग्रहण किये जाने वाले अर्थों को बताया है । (2) अर्थ – प्रधान युग के रूप को प्रतीकों के माध्यम से व्यक्त किया गया है । (3) भावानुकूल , सशक्त एवं प्रवाहमान शैली तथा सरल – सुबोध भाषा का प्रयोग हुआ है । 

 

(7) गेहूँ सिर धुन रहा है खेतों में , गुलाब रो रहा है बगीचों में – दोनों अपने – अपने पालनकर्ताओं के भाग्य पर , दुर्भाग्य पर ? 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘ गेहूँ और गुलाब ‘ पाठ से अवतरित है । मानस तृप्त होता है । इसके लेखक रामवृक्ष बेनीपुरी है । 

प्रसंग – 

यहाँ गेहूँ और गुलाब के असन्तुलन से उत्पन्न भयावह स्थिति का परिचय कराया गया है । 

व्याख्या – 

वह समय बीत गया जब गेहूँ तथा गुलाब में समन्वय दृष्टिगोचर होता था । आज का मानव अतिवादी दृष्टिकोण का शिकार है । वह संसार ( भौतिकता ) के पीछे बुरी तरह दौड़ रहा है । सुषमा , कला तथा संस्कृति से अपना सम्बन्ध विच्छेद करके आज का मनुष्य भोग – वासना में बुरी तरह लिप्त है । उसके परिणामस्वरूप दोनों ही कष्टों में आबद्ध हैं । आज उदरपूर्ति करने का साधन गेहूँ खेतों में सिर धुन रहा है तथा सरसता एवं सुषमा का प्रतीक गुलाब बगीचों में रुदन कर रहा है , दोनों अपने पालनकर्ताओं के दुर्भाग्य पर अश्रुपात कर रहे हैं । 

विशेष – 

(1) लेखक ने गुलाब को मानसिक एवं सौन्दर्य सन्तुष्टि का प्रतीक तथा गेहूँ को भौतिकता का प्रतीक ठहराया है । (2) गेहूँ एवं गुलाब के असन्तुलन की दुःखद स्थिति का संकेत दिया है । (3) शुद्ध साहित्यिक खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है । (4) प्रवाहमयी भावात्मक शैली को अपनाया है ।

 

(8) हाँ , यह अनहोनी बात , यूटोपिया तब तक बनी रहेगी , जब तक विज्ञान संहार – काण्ड के लिए ही आकाश – पाताल एक करता रहेगा । ज्योंही उसने जीवन की समस्याओं पर ध्यान दिया , यह हस्तामलकवत् सिद्ध होकर रहेगी । और विज्ञान को इस ओर आना है , नहीं तो मानव का क्या , सारे ब्रह्माण्ड का संहार निश्चित है । 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘ गेहूँ और गुलाब ‘ पाठ से अवतरित है । मानस तृप्त होता है । इसके लेखक रामवृक्ष बेनीपुरी है ।

प्रसंग – 

यहाँ पर लेखक ने परामर्श दिया है कि भौतिकता के मोह से छुटकारा पाकर ही मानसिक विराम की ओर अग्रसर हो सकते हैं । 

व्याख्या – 

इस जगत के साधनों की प्राप्ति के लिए मानव की कल्पना निरन्तर बढ़ती जा रही है । यह प्रवृत्ति तब तक बढ़ेगी ही जब तक कि विज्ञान विध्वंसपरक कार्यों में संलग्न रहेगा । विज्ञान अपनी शक्ति का प्रयोग मानव जीवन की समस्याओं को सुलझाने में नहीं कर रहा है । वह जैसे ही इस दिशा में ध्यान देगा वैसे ही हाथ पर रखे आँवले के समान बिल्कुल स्पष्ट सफलता मिलेगी । अभी कुछ समय की बात है , अन्त में विज्ञान को मानव समस्याओं की ओर उन्मुख होना है । यदि यह नहीं होगा तो मनुष्य ही नहीं समस्त सृष्टि का नाश होकर रहेगा । 

विशेष – 

(1) विज्ञान का ध्यान मात्र भौतिक समृद्धिपरक न होकर जीवन की समस्याओं की तरफ होना चाहिए , तभी मनुष्य शान्ति प्राप्त कर सकता है । (2) सरल , सुबोध एवं लाक्षणिक भाषा शैली का प्रयोग किया गया है ।

 

(9) गेहूँ की दुनिया खत्म होने जा रही है – वह स्थूल दुनिया , जो आर्थिक और राजनीतिक रूप से हम सब पर छाई हुई है । जो आर्थिक रूप में रक्त पीती रही है , राजनीतिक रूप में रक्त की धारा बहाती रही अब वह दुनिया आने वाली है , जिसे हम गुलाब की दुनिया कहेंगे ! गुलाब की दुनिया – मानव का संसार – सांस्कृतिक जगत् । अहा , कैसा वह शुभ दिन होगा , जब हम स्थूल शारीरिक आवश्यकताओं की हर जंजीर तोड़कर सूक्ष्म मानव – जगत् का नया लोक बसायेंगे ! 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘ गेहूँ और गुलाब ‘ पाठ से अवतरित है । मानस तृप्त होता है । इसके लेखक रामवृक्ष बेनीपुरी है । 

प्रसंग – 

इस गद्यांश में आशा व्यक्त की गई है कि निकट भविष्य में भौतिकता पर मानसिकता का राज्य हो जायेगा । 

व्याख्या – 

अब तक जगत में भौतिकता के प्रतीक गेहूँ का प्रभुत्व रहा है किन्तु अब वह समय आ गया है जब भौतिकता समाप्त होने जा रही है । अब तक यह भौतिकता आर्थिक अथवा राजनीतिक रूप से जगत में व्याप्त हो रही है । इसी के कारण मानव अपनी शारीरिक पूर्तियों तक ही सीमित हो गया है । अत : स्वार्थ से प्रेरित होकर धन संचय के लिए शोषण तथा राजनीतिक लाभ के लिए खून की नदियाँ बहती रही हैं । अब यह सब चरमोत्कर्ष पर पहुँच गया है । इसके बाद मानसिकता के प्रतीक गुलाब की दुनिया आने वाली है । इसमें मनुष्य शरीर की चिन्ता न करके मन की तृप्ति करेगा तथा इससे संस्कृति का विकास होगा । वास्तव में यह जगत बड़ा कल्याणकारी होगा क्योंकि हम सभी शारीरिक भोगों के बन्धनों से मुक्त होकर सांस्कृतिक चेतना में रत होंगे । हम मनौजगत का निर्माण करके परम सुख एवं सन्तोष प्राप्त करेंगे । 

विशेष – 

(1) लेखक नै मानव संस्कृति तथा मन की सुख – शान्ति से युक्त जगत की कामना की है । (2) भविष्य की सुखद कल्पना करके लेखक ने आशावादी दृष्टि दी है । (3) लाक्षणिकता एवं प्रतीकात्मकता से युक्त भावात्मक शैली अपनायी है । (4) सरल, स्पष्ट एवं विषयानुकूल भाषा का प्रयोग हुआ है ।

 

रामवृक्ष बेनीपुरी लेखक परिचय

जीवन परिचय – 

हिन्दी साहित्य के महान साधक , प्रसिद्ध देशभक्त , शैलीकार सम्पादक श्री रामवृक्ष बेनीपुरी का जन्म 1902 ई . में बिहार में मुजफ्फरपुर जिले के बेनीपुर गाँव में हुआ था । आपके पिता श्री फुलवन्त सिंह एक साधारण किसान थे । बचपन में बेनीपुरी के माता – पिता का देहान्त गया और इनका लालन – पालन इनकी मौसी की देख – रेख में हुआ । आपकी प्रारम्भिक शिक्षा बेनीपुर में ही हुई । मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण करने के पूर्व ही सन् 1920 में आपने अध्ययन छोड़ दिया और महात्मा गाँधी के असहयोग आन्दोलन में कूद पड़े । बेनीपुरी जी राष्ट्र सेवा के साथ – साथ साहित्य की साधना में भी संलग्न रहे । इन्होंने पत्र – पत्रिकाओं में लिखकर और सम्पादन करके मनुष्यों के हृदय में देश – भक्ति की भावना को जाग्रत किया । आपको कई बार जेलयात्रा भी करनी पड़ी । रामवृक्ष बेनीपुरी की साहित्य के प्रति अभिरुचि बचपन से ही थी । ये पन्द्रह वर्ष की अल्पायु से ही पत्र – पत्रिकाओं में लिखने लगे थे । बालक , तरुण भारती , युवक , किसान , मित्र , कैदी , योगी , जनता , हिमालय आदि पत्र – पत्रिकाओं का आपने सफल सम्पादन किया और पत्रकार के रूप में विशेष ख्याति प्राप्त की । सन् 1968 ई . में स्वतन्त्रता के पुजारी बेनीपुरी जी इस संसार से सदैव के लिए विदा हो गये । प्रेरणाप्रद साहित्य के लेखक बेनीपुरी के प्रतीकात्मक निबन्ध उनकी विशेष देन हैं । इन निबन्धों में जो लाक्षणिकता तथा वक्रता दिखायी पड़ती है , वह अन्यत्र दुर्लभ है । भावुक हृदय के तीव्र उच्छ्वास की छाया आपके प्रायः सभी निबन्धों में विद्यमान है । इन्होंने जो कुछ लिखा है , वह स्वतन्त्र भाव से लिखा है । विधान सभा , सम्मेलन , किसान सभा , राष्ट्रीय आन्दोलन , विदेश यात्रा आदि के बीच रमे हुए बेनीपुरी जी ने हिन्दी साहित्य को अनेक सुन्दर ग्रन्थ प्रदान किये । वस्तुतः आप उत्कृष्ट कोटि के साहित्यकार थे । 

साहित्य में स्थान –

 स्वतन्त्रता सेनानी रामवृक्ष बेनीपुरी हिन्दी साहित्य की महान विभूति हैं । आपके गद्य में गहन अनुभूतियों और उत्कृष्ट कल्पनाओं की स्पष्ट झाँकी मिलती है । महान निबन्धकार , सशक्त रेखाचित्रकार , प्रबुद्ध , आलोचक , श्रेष्ठ नाट्य शिल्पी , उपन्यासकार रामवृक्ष बेनीपुरी का हिन्दी साहित्य में मूर्धन्य स्थान है । 

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