MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 6 मेरे गाँव की सुख और शांति किसने छीन ली?

In this article, we will share MP Board Class 10th Hindi Solutions गद्य Chapter 6 मेरे गाँव की सुख और शांति किसने छीन ली? Pdf, These solutions are solved subject experts from the latest edition books.

MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 6 मेरे गाँव की सुख और शांति किसने छीन ली? (संस्मरण रामनारायण उपाध्याय)

 

मेरे गाँव की सुख और शांति किसने छीन ली? अति लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1. 

गाँधी द्वारा स्थापित आश्रम का नाम लिखिए । 

उत्तर – 

गाँधी जी ने ‘ सेवाग्राम ‘ नामक आश्रम की स्थापना की । 

प्रश्न 2. 

लोक संस्कृति का जन्म कहाँ हुआ ? 

उत्तर – 

लोक संस्कृति का जन्म गाँवों में हुआ है ।

प्रश्न 3. 

लेखक ने संगीत का जन्म किससे माना है ? 

उत्तर – 

लेखक ने संगीत का जन्म श्रम से माना है । 

प्रश्न 4. 

ललित कलाओं का स्वभाव कैसा होता है ? 

उत्तर – 

ललित कलाओं का स्वभाव फूल जैसा होता है । 

प्रश्न 5. 

ग्रामीण समूचे गाँव को किस रूप में मानता आया है ? 

उत्तर – 

ग्रामीण समूचे गाँव को एक परिवार के रूप में मानता आया है । उसके मन में व्यक्तिगत स्वार्थ न होकर समस्त गाँव के प्रति हित का भाव होता है ।

 

मेरे गाँव की सुख और शांति किसने छीन ली? लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1. 

लेखक समाज से किन प्रश्नों को पूछना चाहता है ? 

उत्तर – 

प्रारम्भ से ही गाँव अपनी स्वाभाविकता, सरलता और प्राकृतिक छटा आदि के कारण आकर्षण का केन्द्र रहे हैं किन्तु आज की बदलती स्थिति से आहत लेखक समाज से पूछना चाहता है कि – (1) गाँवों के सुख एवं शान्ति से परिपूर्ण जीवन को किसने छीन लिया है ? (2) अपार सम्पदा के भण्डार गाँवों से अन्न , धन , सम्पत्ति आदि कहाँ पर चली गई ? (3) सुमधुर कंठ से सरस गीत गाने वाले किसान के गीत कहाँ विलीन हो गए ? (4) विभिन्न त्योहारों पर छाई रहने वाली गाँव की मस्ती को किसने चुरा लिया ? 

प्रश्न 2. 

लोक की जीवन्त रसधारा को किसने , कहाँ सुरक्षित रखा है ? 

उत्तर – 

लोक की जीवन्त रसधारा को गाँवों ने सुरक्षित रखा है । वहाँ का जीवन सरस गीतों के ताने – बाने पर आधारित रहा है । वहाँ की स्त्रियों की मधुर संगीत लहरी ने जीवन के अंधकार को मिटाने का अपूर्व कार्य किया है । मजदूरों की स्त्रियाँ , किसानों के सकारात्मक गीत जीवन का सृजन करते आए हैं । इस गीत – संगीत के आनन्द में गाँव का जीवन सुखद तथा शान्तिपूर्ण रहा है । 

प्रश्न 3. 

अँधेरे को सुहावने प्रभात में कौन , कैसे परिवर्तित करता है ? 

उत्तर – 

गाँव में स्त्रियाँ भोर में जगकर चक्की से आटा पीसती हैं । वे चक्की पीसते हुए सुमधुर गीत गाती जाती हैं । जीवन में विविध समस्याओं , दुःखों से छुटकारा पाने का माध्यम संगीत है । उस संगीत में उनका दु : ख विलीन हो जाता है और उनकी सहज सरलता उभरती है । उनके जीवन का नित्य प्रति नवीन प्रभात उसी समय होता है जब सूर्य की अरुण किरणें संसार में फैल रही होती हैं । इस प्रकार , चक्की पीसने वाली स्त्रियाँ अँधेरे को सुहावने प्रभात में परिवर्तित कर देती हैं । 

प्रश्न 4. 

गाँव के समृद्ध किसान की स्थिति अब कैसी हो गई है ? 

उत्तर – 

महँगाई और शोषण ने गाँव को बहुत प्रभावित किया है । यहाँ के जो समृद्ध किसान थेवे उसकी चपेट में सर्वाधिक आए हैं । महँगाई के कारण खर्चे बढ़ने से उनके खेत बिक गये हैं । आज वे भूमिहीन होकर खेतों में मजदूरी करने के लिए मजबूर हैं । उनका जीवन दयनीय हो गया है । 

प्रश्न 5. 

श्रम से किसका जन्म होता प्रतीत होता है ? 

उत्तर – 

गाँव की स्त्रियाँ भोर में जगकर चक्की से आटा पीसती हैं । वे आटा पीसते समय लोक संगीत की मधुर पंक्तियों को गाती जाती हैं । उनके इस संगीत को सुनकर ऐसा प्रतीत होता है मानो चक्की चलाने के श्रम से ही वे सुमधुर स्वर लहरियाँ जन्म ले रही हों । 

प्रश्न 6. 

माटी कुम्हार की हथेली के स्पर्श से किन नवीन रूपों को धारण करती थी ? 

उत्तर – 

पहले गाँवों में जो कुम्हार रहते थे वे बड़े कुशल शिल्पकार होते थे । उनकी हथेली का स्पर्श पाकर मिट्टी विभिन्न प्रकार के नवीन रूप धारण कर लेती थी । कभी वह गागर बनकर पनिहारिन के सिर पर इठलाती थी तो कभी खपरैल का रूप धारण कर झोंपड़ी की माँग सँवारती थी । कभी वह नन्हे से मिट्टी के दीपक की छौनी अँगुली बनकर आशा का संचार करती थी ।

 

मेरे गाँव की सुख और शांति किसने छीन ली? दीर्घ उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1.

ललित कलाओं का ग्रामीण जीवन में क्या महत्व है ? 

उत्तर – 

ललित कलाओं का स्वभाव फूल की तरह होता है । वे अपनी जमीन पर स्वयं के अनुसार खिलती , विकसित होती हैं । ग्रामीण जीवन ललित कलाओं का मूल स्थल है । वहीं से इनकी सहज उत्पत्ति होती है । ग्रामीण जीवन में स्वाभाविकता , सहजता तथा सरलता होती है । इन गुणों का विकास ललित कलाओं के स्पर्श से ही होता है । गीत , नृत्य , वाद्य , शिल्प आदि कलाओं का बहुत महत्व है । ये कलाएँ ही ग्रामीण जीवन में वह रसधारा प्रवाहित करती हैं जिसमें डुबकी लगाकर ग्रामीण कठोर परिश्रम करने पर सानन्द रहते हैं । 

प्रश्न 2. 

लोकगीत ग्रामीण जीवन में किस प्रकार रचे बसे हैं ? 

उत्तर – 

ग्रामीण जीवन की प्रत्येक साँस में लोकगीत रचे – बसे हैं । इन्हीं गीतों के ताने – बाने पर आधारित ग्रामीण जीवन का प्रारम्भ ही भोर की बेला में चक्की पीसती स्त्रियों के गीतों से होता है । वे इन गीतों से अंधकार को नष्ट कर सुहावना प्रभात लाती हैं । मजदूरिन लोकगीतों में ही प्रार्थना करती है कि हे धरती माता ! कुछ नरम हो जाओ ताकि कुदाली चलाने वाले मेरे प्रियतम के हाथों में छाले न पड़ें । यहाँ किसान भी लोकगीतों में ही सूर्य से प्रार्थना करता है कि हे सूरज ! तुम धीरे तपो ताकि मेरी प्रिया के सिर का कुमकुम पिघल न जाए । उसी प्रकार ग्रामीण जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में लोकगीत रचे – बसे हैं । 

प्रश्न 3. 

लेखक के अनुसार ” गोकुल से सहज सरल गाँव ” का आशय स्पष्ट कीजिये । 

उत्तर – 

गोकुल श्रीकृष्ण की बाल – लीला स्थली है । वे यहाँ गाय चराते , दूध पीते , मक्खन खाते , गीत गाते , वंशी बजाते एवं रास रचाते थे । गोकुल के समान ही सभी गाँवों में बड़ी सहजता तथा सरलता होती थी । यहाँ छल – कपट , झूठ फरेब , चालाकी का नाम – निशान भी नहीं था । यहाँ के जीवन में सुख एवं शान्ति व्याप्त थी । सभी प्रेमपूर्वक रहते थे । जाति , वर्ग या मान्यताओं से परे पूरा गाँव एक परिवार होता था । वहाँ के पर्व – त्योहार उल्लास भरे होते थे । कंठ में लोकगीतों की मधुर ध्वनि होती थी । अन्न एवं धन का भण्डार होता था । इस प्रकार गाँव सरसता से परिपूर्ण थे । 

प्रश्न 4. 

गाँव के सुसंस्कृत आदमी की पाँच विशेषताएँ लिखिए ।

उत्तर – 

गाँव का आदमी बड़ा सुसंस्कृत एवं सहज होता है । छल , कपट , झूठ आदि से वह कोसों दूर होता है । गाँव के सुसंस्कृत आदमी की पाँच विशेषताएँ इस प्रकार हैं (1) गाँव का आदमी विश्वास करता है और उसके लिए स्वयं को समर्पित करने को तैयार रहता है । गावागार (2) उसमें धर्म के प्रति विनम्रता का भाव होता है । (3) वह सभी को सहन करता है परन्तु किसी से कोई शिकायत नहीं करता है । (4) वह सभी की सुनता है और अपनी ओर से कुछ नहीं कहता है । (5) वह कभी भी थककर नहीं बैठता है और न कभी झुकना जानता है । 

प्रश्न 5. 

गाँव के कुटीर उद्योगों पर आधुनिकता का क्या प्रभाव पड़ा है ? 

उत्तर – 

आधुनिक वैज्ञानिक युग ने गाँव के कुटीर उद्योगों को चौपट कर दिया है । चीनी आदि के बर्तन आने से कुम्हार का , तेल मिल लगने से तेली का , आटा मशीन से बढ़ई का काम छिन गया है । जिन छोटे – छोटे उद्योगों से लाखों आदमी पलते थे , अब बंद हो गये हैं । इन कामों से रोजी – रोटी कमाने वाले अब मजदूरी करने को विवश हैं । इसका प्रभाव ऐसा पड़ा है कि ग्रामीण जीवन में गरीबी , दुःख और कलह स्थायी आवास बनते जा रहे हैं । 

प्रश्न 6. 

गाँव का आदमी अपने समग्र जीवन से क्या – क्या देने की क्षमता रखता है ?

उत्तर – 

गाँव के जीवन में प्राचीन काल से ही मानवीय गुणों का समावेश रहा है । यहाँ के जीवन में सरलता , सहजता , निश्छल भाव , ईमानदारी , परिश्रम करने की आदत , दिखावे से दूर रहकर कर्म में विश्वास आदि कितनी अच्छाइयाँ भरी पड़ी हैं । उसका जीवन एक खुली किताब की तरह है । उसका सादा रहन – सहन , मोटा खान – पान , वस्त्र – आभूषण , सरल आचरण , उत्तम रीति – रिवाज , पारस्परिक भाईचारा , आपसी विश्वास , सृजनशील मान्यताएँ आदि मानव समाज को बहुत कुछ देने की क्षमता रखती हैं । बस उससे प्राप्त करने के लिए उस तक पहुँचने की आवश्यकता है , वह सहज भाव से अपना सब कुछ लुटा देगा ।

 

मेरे गाँव की सुख और शान्ति किसने छीन ली ? पाठ – सारांश 

लोक जीवन से निकट से जुड़े रामनारायण उपाध्याय द्वारा लिखित ‘ मेरे गाँव की सुख और शान्ति किसने छीन ली ? ‘ निबन्ध में ग्रामीण जीवन की वर्तमान स्थिति का मार्मिक अंकन किया है । जो गाँव गांधी , टैगोर और कवियों के आकर्षण का केन्द्र थे । अब उनकी सुख – शान्ति पता नहीं किसने छीन ली है ? वहाँ की सम्पन्नता , लोक संस्कृति कहाँ लुप्त हो गये हैं जिनमें लोकगीत , लोक कलाओं के कारण सतत् रसधारा सुरक्षित थी । अब वैज्ञानिक साधनों के कारण वह सूख रही है । महँगाई और शोषण ने वहाँ समृद्धि समाप्त कर दी है । गांवों के कुम्हार , तेली , बढ़ई आदि के जो कुटीर उद्योग थे वे आधुनिकता के प्रवाह में बह गये हैं । अब ये सब मजदूरी करने के लिए विवश हैं । बाग – बगीचों की हरियाली , कोयल की कुहक , आदिवासियों को वंशी की मधुर ध्वनि पता नहीं कहाँ चली गई । आज का जीवन धुरीहीन हो गया है । फूल के समान कोमल , सरस और गंधवान लोक कलाओं के सम्बन्ध में आज शोध की आवश्यकता है ताकि सामाजिक विकास के उत्थान – पतन की सही – सही जानकारी हो सके । गाँव के अनपढ़ किन्तु सुसंस्कृत आदमी में विश्वास , धर्म – भावना , सहनशीलता , कर्मठता , स्वाभिमान , त्याग , श्रम आदि गुण कूट – कूटकर भरे हैं । समूचा गाँव उसके लिए एक परिवार है । गाँव के जीवन में समाज को देने के लिए सहजता , सरलता , ईमानदारी , सहनशीलता , कर्मठता आदि बहुत कुछ है । समाज को उसके गुणों को ग्रहण करना चाहिए । लोक संस्कृति में परिवर्तित परिवेश को ग्रहण करने की क्षमता है । वह स्वाभिमान के साथ सतत् प्रवाहमान रही है । 

 

पाठ के कठिन शब्दार्थ 

कार्यस्थल = काम करने का स्थान । कंठ = गले । लोक संस्कृति = ग्रामीण संस्कृति । रसधारा = आनन्द का प्रवाह । निर्मल = स्वच्छ । श्वास – प्रश्वास = साँस लेना और साँस छोड़ना । विलोने = मथना । फ्लोर मिल = आटा चक्की । समृद्ध = धनवान । आधिपत्य = स्वामित्व , अधिकार । शोषणकारी = सताने वाले , अनुचित लाभ लेने वाले । लोप = विलीन , समाप्त । खेतिहर = खेती करने वाला , किसान । स्निग्धता = चिकनाई । धुरीहीन = विना आधार का । अमराई = बागों में । अनादि काल = चिरकाल से , बहुत समय से । सुसंस्कृत = अच्छे व्यवहार वाला । इन्कार = मना । अपूर्व = अद्भुत । क्षमता = शक्ति । प्रवाहमान = गतिशील । 

 

मेरे गाँव की सुख और शान्ति किसने छीन ली ? संदर्भ, प्रसंग सहित गद्यांशों की व्याख्या 

 

(1) जिन गाँवों ने हिन्दी साहित्य को ‘हीरो’ और ‘गोबर’ जैसे पात्र दिये, जिन गाँवों के लिए गाँधी और रवीन्द्रनाथ टैगोर ने शहरों की समस्त सुविधाओं को त्यागकर ‘शान्ति निकेतन’ और ‘सेवाग्राम’ को अपना कार्यस्थल बनाया, जिन गाँवों में रहने के लिए साधारण नागरिक ही नहीं कवियों का मन भी ललचाया था, वे ही गाँव आज अशान्ति के घर हुए जा रहे हैं और जैसे किसी भी आँख से आँसू गिरे, ऐसे गाँवों के आँचल से एक-एक घर टूटते ही चले जा रहे हैं।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘ मेरे गाँव की सुख और शान्ति किसने छीन ली ? ‘ पाठ से लिया गया है । इसके लेखक पण्डित रामनारायण उपाध्याय हैं । 

प्रसंग – 

यहाँ पर लेखक ने आकर्षण के केन्द्र रहे गाँव के नष्ट होने की प्रक्रिया पर दुःख प्रकट किया है । 

व्याख्या – 

भारतीय ग्रामीण जीवन मानवता का साकार रूप रहा है । यहाँ के गाँवों से ही प्रेमचन्द ने ‘ होरी ‘ तथा ‘ गोबर ‘ जैसे पात्रों को दिया । महात्मा गांधी और रवीन्द्रनाथ टैगोर जैसी विभूतियों ने इन गांवों पर मोहित होकर ‘ सेवाग्राम ‘ और ‘ शान्ति निकेतन ‘ को अपने क्रियाकलापों का केन्द्र बनाया । जो इतने आकर्षित थे जिनमें जाने के लिए साधारण आदमी की बात तो अहिए , कवि भी लालायित रहते थे । वे आकर्षक गाँव आज अशान्ति और उपद्रवों के आवास बनते जा रहे हैं । दुःखद पथ यह है कि गाँव से एक – एक करके सभी पलायन करते जा रहे हैं । 

विशेष – 

(1) कभी आकर्षण का केन्द्र रहने वाले गाँव आज खाली हो रहे हैं । (2) सरल , सरस तथा प्रवाहमयी खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है । (3) भावात्मक शैली में विषय को प्रस्तुत किया गया है । 

 

(2) जिन गाँवों में लोक-संस्कृति का जन्म हुआ, जिसने लोक की जीवन्त रसधारा को, अपने हृदय में सुरक्षित रखा, वे ही गाँव आज टूटते जा रहे हैं, गाँव की वह पुरानी पीढ़ी भी समाप्त होती जा रही है जिसका सम्पूर्ण जीवन श्वास-प्रश्वास की तरह गीतों के ताने-बाने पर आधारित था। अब तो वे गोकुल से सहज-सरल गाँव नष्ट होते जा रहे हैं, जहाँ स्त्रियाँ भोर में उठकर आटे के साथ घने अँधेरे को भी पीसकर सुहावने प्रभात में बदल देती थीं। जहाँ चक्की के हर फेरे के साथ गीत की नई पंक्तियाँ उठती थीं। लगता था जैसे श्रम में से संगीत का जन्म हो रहा हो और संगीत लोरी बनकर श्रम को हल्का करने में अपना योगदान दे रहा हो।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘ मेरे गाँव की सुख और शान्ति किसने छीन ली ? ‘ पाठ से लिया गया है । इसके लेखक पण्डित रामनारायण उपाध्याय हैं । 

प्रसंग – 

लोक संस्कृति के सरस रूप के नष्ट होने के प्रति वेदना की अभिव्यक्ति की गई है । 

व्याख्या – 

लोक संस्कृति को जन्म देने वाले जीवन की सरसता को संजोए रखने वाले गाँव आज निरन्तर टूट रहे हैं । गाँव की वह पुरानी पीढ़ी धीरे – धीरे समाप्त हो रही है जिसके समस्त जीवन की प्रत्येक साँस में गीतों के ताने – बाने बुने थे । गायों के पालने वाले गोकुल जैसे स्वाभाविकता से भरे गाँव अब समाप्त हो रहे हैं । पहले गाँवों की महिलाएँ मनोरम भोर में जगकर आटा चक्की पीसती जाती थीं और जीवन के अस्वास्थ्य और गरीबी आदि के अँधेरे को नष्ट करती जाती थीं । वे चक्की पीसने के साथ सरस गीत गाती जाती थीं । उस समय यह प्रतीत होता था मानो परिश्रम से संगीत पैदा हो रहा है और संगीत अपनी सरस लोरियों से परिश्रम को हल्का कर रहा हो । जीवन की ये स्थितियाँ बड़ी सुखद थीं जिनका अब अभाव होता जा रहा है । 

विशेष – 

(1) गाँव की सरसतामय लोक संस्कृति के उजड़ने की पीड़ा की अभिव्यक्ति हुई है । (2) सरल , सरस तथा प्रवाहमयी खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है । (3) भावात्मक शैली को अपनाया गया है । 

 

(3) ललित कलाओं का स्वभाव फूल की तरह होता है । वे अपनी जमीन पर अपने मन से खिलती और बढ़ती आई हैं । लोक साहित्य का कार्य महज लोकगीत , लोककथाओं और लोक कहावतों के संकलन का कार्य नहीं है वरन् यह जो अनादि काल से अनंत काल तक मानव की जीवन यात्रा चली आ रही है , उसमें वह कहाँ गिरा , कहाँ उठा और कहाँ आगे बढ़ा , इस सबकी खोज शोध और अध्ययन का कार्य है । 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘ मेरे गाँव की सुख और शान्ति किसने छीन ली ? ‘ पाठ से लिया गया है । इसके लेखक पण्डित रामनारायण उपाध्याय हैं । 

प्रसंग – 

यहाँ लोक कलाओं पर शोध किये जाने पर बल दिया गया है ।

व्याख्या – 

लोक कलाओं का स्वभाव फूल के समान सरस , कोमल तथा सुगंधमय होता है । ये सहज ही जन्म लेकर जीवन की सरसता को बढ़ाती हैं । अत : लोक साहित्यकारों को मात्र लोकगीतों , लोक कथाओं , लोक की कहावतों का संग्रह ही नहीं करना चाहिए , अपितु उनमें समाहित सामाजिक उत्थान – पतन का भी शोधपरक अध्ययन करना चाहिए । लोक साहित्य चिरकाल से चली आ रही सतत् जीवन धारा के प्रमाण हैं । 

विशेष – 

(1) लोक साहित्य पर शोध किए जाने की आवश्यकता को उभारा गया है । (2) सरल , सुबोध तथा प्रवाहमयी भाषा में विषय का प्रतिपादन किया है । (3) विचारात्मक शैली का प्रयोग हुआ है ।

 

(4) गाँव का आदमी निरक्षर भले हो , लेकिन सुसंस्कृत रहा है । वह विश्वास पर बिक जाता है , धर्म पर झुक जाता है , सबको सहता है पर शिकायत नहीं करता , सबकी सुनता है पर अपनी ओर से कुछ नहीं कहता । वह कभी थक कर नहीं बैठता , झुक कर नहीं चलता और त्याग में से प्राप्ति तथा परिश्रम में से आनन्द पाता आया है । दुःख का पहाड़ आ जाये तो सुख की क्षीण रेखा वह सदा मुस्कुराता है और अकेला रह जाने पर भी अपनी राह चलना नहीं छोड़ता । विभिन्न जातियों , मतों और वर्गों में बँटे होने पर भी वह समूचे गाँव को एक परिवार मानता आया है ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘ मेरे गाँव की सुख और शान्ति किसने छीन ली ? ‘ पाठ से लिया गया है । इसके लेखक पण्डित रामनारायण उपाध्याय हैं । 

प्रसंग – 

इस गद्यांश में ग्रामवासियों की सहनशीलता तथा उदारता का चित्रण किया गया है । 

व्याख्या – 

बिना पढ़ा – लिखा होते हुए भी गाँव का निवासी संस्कारयुक्त एवं सरल रहा है । वह विश्वास करता है , धर्म के प्रति विनम्र है । जीवन के विविध प्रकार के कष्टों को सहन करते हुए भी उसे किसी से कुछ शिकायत नहीं होती है । उसमें अपनी बात कहे बिना ही औरों की सुनने की क्षमता है । वह बिना थके तथा बिना झुके सतत् कार्य में लीन रहता है । उसे त्याग और परिश्रम आनन्द देते हैं । भयंकर संकट आने पर भी वह सुख की हल्की रेखा से ही मुस्कुरा उठता है । उसमें अकेले ही सब कुछ सहते हुए आगे बढ़ने का साहस है । जाति , वर्ग या मत से परे रहकर वह समस्त गाँव को अपना परिवार मानता है । 

विशेष – 

(1) ग्रामीण जीवन के सद्गुणों को उजागर किया गया है । (2) सरल , सुबोध तथा प्रवाहमान खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है । (3) भावात्मक शैली में विषय का प्रतिपादन हुआ है । 

 

(5) गाँवों का आदमी जाने कब से बाट जोह रहा है कि कोई आए और उससे भी कुछ ले जाए । उसका समग्र जीवन एक अनपढ़ी खुली पुस्तक की तरह सामने बिछा है । उनका रहन – सहन , खान – पान , वस्त्राभूषण , आचार – विचार , रीति – रिवाज , विश्वास और मान्यताएँ , गीत और कथाएँ , नृत्य , संगीत और कलाएँ हमें कुछ न कुछ देने की क्षमता रखते हैं ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘ मेरे गाँव की सुख और शान्ति किसने छीन ली ? ‘ पाठ से लिया गया है । इसके लेखक पण्डित रामनारायण उपाध्याय हैं । 

प्रसंग – 

यहाँ के जीवन से कुछ सीखने तथा अनुकरण पर बल दिया गया है । 

व्याख्या – 

ग्राम का सहज , संतोषी निस्पृह जीवन मनुष्य को सद्मार्ग का संदेश दे सकता है परन्तु किसी का ध्यान उस ओर नहीं है । ग्रामवासी अनंतकाल से प्रतीक्षा कर रहा है कि कोई उनके पास आए और उनके उन्मुक्त जीवन की पुस्तक से कुछ ग्रहण करे । ग्रामीण जीवन का रहन – सहन , खान – पान , पहनावा , व्यवहार मानव को बहुत कुछ शिक्षा देने की क्षमता रखता है । वहाँ के रीति – रिवाज , मान्यताएँ , विश्वास आदि अनुकरणीय हैं । वहाँ की संगीत , नृत्य , कथाएँ एवं अन्यान्य कलाएँ जीवन को सरस बनाने में समर्थ हैं । बस उन्हें अपनाने की आवश्यकता है । 

विशेष – 

(1) ग्रामीण जीवन के अनुकरणीय पक्ष का ज्ञान कराया गया है । (2) किसी का गाँव की ओर ध्यान नहीं , इस पर पीड़ा की अभिव्यक्ति हुई है । (3) सरल , सरस एवं प्रवाहपूर्ण खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है । (4) लाक्षणिकता से युक्त भावात्मक शैली अपनाई है । 

 

(6) बदलते हुए समय में लोक संस्कृति के बदलते हुए रूप से इन्कार नहीं किया जा सकता । लोक साहित्य में युग के अनुकूल अपने को ढालने की और नया युग का मार्गदर्शन करने की अपूर्व क्षमता होती है । चुनौती के सामने सिर झुकाना लोक का स्वभाव नहीं है । लोक की गंगा तो युग – युग से प्रवाहमान रही है ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘ मेरे गाँव की सुख और शान्ति किसने छीन ली ? ‘ पाठ से लिया गया है । इसके लेखक पण्डित रामनारायण उपाध्याय हैं । 

प्रसंग – 

लोक जीवन और लोक साहित्य की परिवर्तन ग्राह्यता पर प्रकाश डालते हुए उसके स्वाभिमानी स्वभाव का निदर्शन कराया गया है । 

व्याख्या – 

युग परिवर्तन का प्रभाव ग्रामीण जीवन पर भी पर्याप्त मात्रा में पड़ा है । लोक साहित्य की अद्भुत क्षमता है कि वह युग के अनुरूप परिवर्तित होकर समाज का मार्गदर्शन कर सके । स्वाभिमान से परिपूर्ण लोक के स्वभाव को झुकना स्वीकार नहीं रहा है । वह अनंतकाल से प्रवाहमान है और सतत् गतिशील रहने का संकल्प उसने लिया हुआ है । 

विशेष – 

(1) लोक की सहज ग्रहणशीलता को इंगित करते हुए उसके स्वाभिमानी स्वभाव का चित्रण हुआ है । (2) शुद्ध , साहित्यिक भाषा का प्रयोग किया गया है । (3) विवेचनात्मक शैली को अपनाया है ।

 

पं.रामनारायण उपाध्याय 

जीवन परिचय – 

लोक संस्कृति पुरुष पण्डित रामनारायण उपाध्याय का जन्म मध्य प्रदेश के खण्डवा जिले के कालमुखी नामक ग्राम में 20 मई , सन् 1918 को हुआ था । इनकी माता का नाम श्रीमती दुर्गा देवी तथा पिता का नाम श्री सिद्धनाथ उपाध्याय था । रामनारायण उपाध्याय को संस्कृतनिष्ठ संस्कारों से युक्त शिक्षित वातावरण में विकसित होने का अवसर मिला । आपने शिक्षा – दीक्षा के साथ जीवन को फिर से देखने का भरपूर प्रयास किया । जन – सामान्य के प्रति प्रारम्भ से ही आपका झुकाव रहा । गाँव के किसान परिवेश में रचे बसे उपाध्याय जी के व्यक्तित्व में भावुकता , सहृदयता एवं कर्मठता के स्पष्ट दर्शन होते हैं । उपाध्याय जी के व्यक्तित्व में गाँव और गाँव की संस्कृति साकार हो उठी है । आपने साहित्य के विविध रूपों का गहन अध्ययन किया तथा गाँव के किसानों और आदिवासियों के लिए काम किया । आपने अपनी पत्नी श्रीमती शकुन्तला देवी की स्मृति में ‘ लोक संस्कृति ‘ नामक न्यास की स्थापना कर लोक साहित्य एवं संस्कृति के अध्ययन का मार्ग प्रशस्त किया । 27 नवम्बर , 1989 ई . से यह न्यास इस दिशा में कार्यरत है । आपने व्यापक जीवन दृष्टि का सतत् विकास किया । रामनारायण उपाध्याय ‘ राष्ट्रभाषा परिषद , भोपाल ‘ तथा मध्य प्रदेश आदिवासी लोककला परिषद , भोपाल के संस्थापकों में से हैं । आप जीवनपर्यन्त कई संस्थाओं से जुड़कर कार्य करते रहे । 20 जून , सन् 2001 ई . को आप इस संसार से सदैव के लिए विदा हो गए । 

कृतियाँ – 

रामनारायण उपाध्याय अपने आंचलिक परिवेश में रम कर साहित्य सृजन करते हैं । इनकी रचनाओं में लोक कल्याण का भाव तथा प्राकृतिक सहजता का सर्वत्र समावेश रहा उपाध्याय जी ने निमाड़ी लोक साहित्य का शोधपरक अध्ययन कर विस्तृत लेखन कार्य किया आपने निमाड़ी लोक साहित्य के विविध रूपों की खोज कर लोक साहित्य का संकलन किया है । इसके अतिरिक्त आपने व्यंग्य , ललित निबन्ध , संस्मरण , रिपोर्ताज आदि की रचना की है ।

साहित्य में स्थान – 

सादा जीवन उच्च विचार की प्रतिमूर्ति रहे श्री रामनारायण उपाध्याय नै लोक जीवन तथा लोक संस्कृति के लिए जो कार्य किया है वह सराहनीय है । आप अन्वेषक के साथ नवीन विधाओं के रचनाकार के रूप में विशेष स्थान रखते हैं ।

Leave a Comment