MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 7 सच्चा धर्म

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MP Board Class 10th Hindi Solutions गद्य Chapter 7 सच्चा धर्म (सेठ गोविन्ददास)

 

सच्चा धर्म अति लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1

पुरुषोत्तम कौन है ? 

उत्तर – 

पुरुषोत्तम एक महाराष्ट्रीयन कर्मकाण्डी ब्राह्मण है ।

प्रश्न 2. 

शिवाजी के पुत्र का क्या नाम था ?

उत्तर – 

शिवाजी के पुत्र का नाम शम्भाजी था । 

प्रश्न 3. 

शास्त्रों में किसकी व्याख्या बड़ी बारीकी से की गई है ? 

उत्तर – 

शास्त्रों में सत्य और असत्य की व्याख्या बड़ी बारीकी से की गई है । 

प्रश्न 4. 

पुरुषोत्तम किस कार्य को दुष्कर्म की संज्ञा देते हैं ? 

उत्तर – 

पुरुषोत्तम शरणागत के बलिदान को दुष्कर्म की संज्ञा देते हैं । 

प्रश्न 5. 

सत्य का आश्रय छोड़ने का क्या दुष्परिणाम होता है ? 

उत्तर – 

सत्य का आश्रय छोड़ने पर तरह – तरह के प्रश्न उठ खड़े होते हैं ।

 

सच्चा धर्म लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1. 

सत्य स्वयं ही सारे प्रश्नों का निराकरण कब करता है ?

उत्तर – 

सत्य का मार्ग कण्टक रहित , सीधा तथा सरल है । सत्य के रहते कोई प्रश्न खड़ा नहीं होता है । यदि मनुष्य सत्य का आचरण छोड़ दे तो तरह – तरह के प्रश्न उठ खड़े होते हैं । यदि वह सत्य का आश्रय लिए रहे तो सत्य स्वयं ही सारे प्रश्नों का निराकरण कर देता है । इस तरह सत्य सर्वोत्तम आश्रय प्रदान करता है । 

प्रश्न 2. 

असत्य किन परिस्थितियों में सत्य से बड़ा हो जाता है ?

उत्तर – 

सत्य बड़ा होता है और असत्य हेय किन्तु कुछ परिस्थितियाँ ऐसी होती हैं जब मिथ्या भाषण सत्य से भी बड़ा हो जाता है । शास्त्रों में सत्य और असत्य की व्याख्या बड़ी बारीकी से की गई है । यदि धर्म की रक्षा असत्य से होती है तो असत्य सत्य से भी बड़ा हो जाता है । 

प्रश्न 3. 

पुरुषोत्तम अपने किन गुणों के कारण सब के सम्मान के पात्र थे ? 

उत्तर – 

पुरुषोत्तम परम सत्यप्रिय हैं । वे असत्य भाषण नहीं करते हैं । इसलिए सभी उनका सम्मान करते हैं । वे धर्म का पालन करने वाले व्रती मानव हैं । वे संध्या – तर्पण , हवन इत्यादि सभी धार्मिक कार्य नियमपूर्वक करते हैं । वे शौच – अशौच का पूर्ण ध्यान रखते हैं । खाद्य – अखाद्य का वे पूरी तरह ध्यान रखते हैं । किसी के हाथ का जल तक ग्रहण नहीं करते हैं । इन्हीं गुणों के कारण सभी उन पर विश्वास करते हैं और उनका सम्मान करते हैं । 

प्रश्न 4

शम्भाजी पुरुषोत्तम के आश्रय में कैसे पहुँचे ?

उत्तर – 

पुरुषोत्तम दिल्ली में निवास करते हैं । वे धर्मनिष्ठ कर्मकाण्डी ब्राह्मण हैं । उन पर सभी को विश्वास है । शिवाजी दिल्ली से भागते समय अपने पुत्र शम्भाजी को मिठाई की टोकरी में रखकर पुरुषोत्तम के घर छोड़ जाते हैं । इस तरह शम्भाजी पुरुषोत्तम के आश्रय में पहुँचते हैं । 

प्रश्न 5. 

पुरुषोत्तम की दृष्टि में सबसे बड़ा पातक क्या है ? 

उत्तर – 

पुरुषोत्तम महाराष्ट्रीयन कर्मकाण्डी ब्राह्मण हैं । उनकी धर्म में गहरी निष्ठा है । वे सत्यवादी हैं । दिल्ली में सभी उनका सम्मान करते हैं । वे तीनों समय संध्या, तर्पण, हवन आदि धार्मिक कर्म का पालन करते हैं । इस प्रकार के सत्य एवं धर्म का पालन करने वाले पुरुषोत्तम से ” उनकी पत्नी शरण में आए शिवाजी के पुत्र शम्भाजी के बारे में सत्य भाषण करने को कहती हैं तो वे स्पष्ट कहते हैं- ” यह कभी नहीं हो सकता ………. यह विश्वासघात होगा । ऐसा पातक जिससे बड़ा पातक संभव ही नहीं , यह यह शरणागत का बलिदान होगा , ऐसा , ऐसा दुष्कर्म जिससे बड़ा हो ही नहीं सकता । ” 

प्रश्न 6. 

पुरुषोत्तम ने अहिल्या से सत्य और असत्य की क्या व्याख्या की ?

उत्तर – 

अहिल्या महाराष्ट्रीयन कर्मकाण्डी ब्राह्मण पुरुषोत्तम की पत्नी है । पुरुषोत्तम समय – समय पर उन्हें सत्य आदि के बारे में बताते रहे हैं । जब शिवाजी के भांजे शम्भाजी के विषय में मुगल सैनिकों के द्वारा पुरुषोत्तम से पूछा जाता है तो वे चिन्तित हो उठते हैं तब अहिल्या उन्हें ध्यान दिलाते हुए कहती है- ” तुम सदा कहते रहे हो कि जीवन में यदि मनुष्य एक सत्य का आश्रय लिए रहे तो वह सत्य स्वयं ही सारे प्रश्नों का निराकरण कर देता है पर जब मनुष्य सत्य का आश्रय छोड़ मिथ्या का आसरा लेता है , तभी तरह – तरह के प्रश्न उठ खड़े होते हैं । “

सच्चा धर्म दीर्घ उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1. 

पुरुषोत्तम के चरित्र की क्या विशेषताएं हैं ?

उत्तर – 

पुरुषोत्तम के चरित्र की विशेषताएँ इस प्रकार हैं (1) धर्मपरायण – महाराष्ट्रीयन कर्मकाण्डी ब्राह्मण पुरुषोत्तम अपनी पत्नी अहिल्या के साथ दिल्ली में रहता है । वह संध्या – तर्पण आदि में पूरी आस्था रखता है । वह खान – पान , व्यवहार आदि में बहुत सजग है । वस्तुत : वह धर्मपरायण ब्राह्मण है । (2) परम सत्यवादी – पुरुषोत्तम परम सत्यवादी हैं । इसके कारण समस्त दिल्ली उन्हें जानती है । दिल्ली दरबार में उनका सम्मान है । उनकी पत्नी कहती है कि ” आज तक मैंने तुम्हारे मुख से मिथ्या वाक्य तो क्या , मिथ्या शब्द तक ही नहीं , मिथ्या अक्षर तक नहीं सुना । ” (3) कर्त्तव्यपरायण – वह अपने कर्तव्य का पालक है । शिवाजी उन पर विश्वास करके अपने पुत्र को छोड़ जाते हैं । उनका मन द्वन्द्व में फंस जाता है कि एक ओर धर्म तथा कर्मकाण्ड की रक्षा का प्रश्न एवं दूसरी ओर शरणागत तथा राष्ट्र – प्रेम की रक्षा का दायित्व । उनकी पत्नी भी सत्य कथन की प्रेरणा देती है किन्तु अपने कर्त्तव्य को समझते हुए वे राष्ट्र – धर्म को श्रेष्ठ मानते हैं । विश्वासघात अधर्म है , इसलिए वे शम्भाजी की रक्षा करते हैं । (4) राष्ट्रीयता का समर्थक – पुरुषोत्तम पत्नी द्वारा दिये गये सभी प्रलोभनों से नहीं बहकते हैं । राज्यभय , धर्मभय तथा आर्थिक लाभ भी उन्हें सच्चे धर्म से नहीं डिगा पाते हैं । वे राष्ट्रभक्त शिवाजी के पुत्र शम्भाजी की रक्षा कर राष्ट्रीयता का सन्देश देते हैं । इस प्रकार पुरुषोत्तम का चरित्र महान् पण्डित तथा देशभक्त का चरित्र है । 

प्रश्न 2. 

पुरुषोत्तम के समक्ष कौन – सा धर्म संकट उपस्थित हुआ ?

उत्तर – 

पुरुषोत्तम सत्यवादी , धर्म का पालन करने वाले ब्राह्मण हैं । शिवाजी अपने पुत्र शम्भाजी को उनके पास छोड़ गए हैं । मुगल सैनिक उसके विषय में जानना चाहते हैं कि यह कौन है । पुरुषोत्तम बता चुके हैं कि यह उनका भांजा विनायक है किन्तु मुगल सैनिक शर्त रख देते हैं कि यदि यह तुम्हारा भांजा है तो इसके साथ एक ही थाली में भोजन करके दिखाओ । यह धर्म संकट पुरुषोत्तम को बेचैने किए हुए है कि वह उसके साथ भोजन कैसे करे । एक ओर अपने सत्य के पालन करने का प्रश्न है दूसरी तरफ शरणागत की रक्षा का । वे झूठ भी नहीं बोलना चाहते हैं तथा शरणागत को बचाना भी चाहते हैं । यही धर्म संकट उन्हें परेशान किये है ।

प्रश्न 3. 

” दिन भर का भूला – भटका यदि रात को भी घर लौट आए तो वह भूला नहीं कहलाता । ” इस कथन का भाव विस्तार कीजिए ।

उत्तर – 

यदि कोई प्रात : काल किसी कारण से रूठ जाए या भ्रमित हो जाए और घर छोड़कर बाहर चला जाए और रात्रि तक लौटकर घर आ जाए तो उसे भ्रमित या रूठा हुआ नहीं माना जाता है क्योंकि भावुकता में घर से अल्पकाल के लिए चला जाना स्वाभाविक है । व्यक्ति बहुत बार भाव प्रधान हो उठता है , कोई बात उसे उद्वेलित कर देती है । वह आक्रोश में घर छोड़कर चला जाता है । घर से बाहर जब उसका भावनाओं का आक्रोश कुछ शान्त होता है तो उसे पता चलता है कि उसने घर छोड़कर अच्छा नहीं किया । उसे अपनी भूल का अहसास हो जाता है । यह विचार आते ही वह घर को लौट आता है । इस प्रकार के भ्रमित व्यक्ति को दोषी नहीं मानते हैं , यह तो भावावेश हुई भूल होती है । आशय यह है कि भावावेश में अल्पकालिक भूल मनुष्य से हो सकती है । उसे गम्भीर नहीं माना जा सकता है । 

प्रश्न 4. 

‘ सच्चा धर्म ‘ एकांकी का केन्द्रीय भाव समझाइए । 

उत्तर – 

तिवारी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित ‘ सच्चा धर्म ‘ एकांकी मानव के सच्चे धर्म के स्वरूप को उद्घाटित करता है । इसका सारांश इस प्रकार है इस एकांकी का प्रथम दृश्य दिल्ली में पुरुषोत्तम के मकान के एक कमरे में खुलता है । पुरुषोत्तम महाराष्ट्रीयन ब्राह्मण हैं । वे अत्यन्त धर्मपरायण , कर्तव्यनिष्ठ एवं सत्यवादी होते हुए भी सत्यासत्य के द्वन्द्व में फंसकर अपना धर्म निश्चित नहीं कर पाते हैं । उनकी पत्नी अहिल्या समझाती है कि औरंगजेब के सामने उन्हें स्पष्टतः कह देना चाहिए कि विनायक उनका भांजा नहीं , वरन् शिवाजी के पुत्र शम्भाजी हैं । पुरुषोत्तम की अन्तरात्मा कहती है कि शरणागत का बलिदान सबसे बड़ा पाप और विश्वासघात है ।

 वह कैसे कह सकता है कि शिवाजी औरंगजेब की कैद से भागते समय अपने पुत्र को यहाँ छोड़ गये हैं , जिसे पुरुषोत्तम ने अपना भांजा विनायक घोषित कर दिया है । अहिल्या दूसरा धर्म – संकट प्रस्तुत करती है । औरंगजेब के गुप्तचर विभाग के सरदार दिलावर खाँ ने यह शर्त रखी है कि पुरुषोत्तम विनायक के साथ एक थाली में भोजन करें तो वह उसे पुरुषोत्तम का भांजा मान लेगा । महाराष्ट्रीयन ब्राह्मण पुरुषोत्तम एक अब्राह्मण के साथ भोजन कैसे कर सकता है ? 

अहिल्या उसे समझाती है कि जीवन भर के धर्म – सत्य पालन को वह नष्ट न करे , इसलिए सच – सच बता दे । द्वितीय दृश्य एक गली का है । दिलावर खाँ और रहमान बैग पुरुषोत्तम की सत्यवादिता और धार्मिक कर्मकाण्ड की तारीफ करते हुए कहते हैं कि यदि पुरुषोत्तम शम्भाजी के साथ एक ही थाली में भोजन कर लेता है तो वह निश्चय ही उसका भांजा होगा । वे पण्डित पुरुषोत्तम के घर की ओर चल पड़ते हैं । तीसरा दृश्य फिर पुरुषोत्तम के कमरे का है । वे व्याकुल हो , टहल रहे हैं । उनकी पत्नी अहिल्या कहती है कि उनका सत्य बोलने का निर्णय ही सर्वोत्तम है । वह तर्क देती है कि गैर के लिए अपना धर्म छोड़ना ठीक नहीं है । 

पुरुषोत्तम कोई उत्तर नहीं देता है , तभी दिलावर खाँ आवाज लगाता है । पुरुषोत्तम उसे बुलाकर बैठाते हैं । उनके मुख पर आभा और उल्लास दिखायी देता है । वे भीतर से एक थाली में भोजन और जल – कलश लेकर आते हैं । पुरुषोत्तम और शम्भाजी एक थाली में भोजन करते हैं । यह देखकर दिलावर खाँ और रहमान बेग चकित तथा लज्जित होते हैं ।

प्रश्न 5. 

एकांकी के तत्वों का नाम लिखकर ‘ सच्चा धर्म के संवादों पर टिप्पणी कीजिए । 

उत्तर – 

एकांकी के छः तत्व माने गए हैं – कथानक , पात्र एवं चरित्र – चित्रण , संवाद , देश – काल एवं वातावरण , भाषा – शैली एवं रंगमंचीयता और उद्देश्य । संवाद एकांकी का प्राण होते हैं । एकांकी के संवाद एवं पात्र अवसर के अनुरूप होने चाहिए । उनकी भाषा पात्र के शिक्षित – अशिक्षित , निम्नवर्गीय – उच्चवर्गीय आदि आधारों पर सटीक होनी चाहिए । संवाद कथा को आगे बढ़ाते हैं , एकांकी में सजीवता लाते हैं तथा पात्र का चरित्र – चित्रण करते हैं । एकांकी के संवाद चुस्त एवं प्रभावी होने चाहिए । लम्बे – लम्बे संवाद ऊब पैदा कर देते हैं । अतः संवादों के वाक्य छोटे – छोटे होने चाहिए ।

सच्चा धर्म पाठ – सारांश 

तिवारी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित ‘ सच्चा धर्म ‘ एकांकी मानव के सच्चे धर्म के स्वरूप को उद्घाटित करता है । इसका सारांश इस प्रकार है इस एकांकी का प्रथम दृश्य दिल्ली में पुरुषोत्तम के मकान के एक कमरे में खुलता है । पुरुषोत्तम महाराष्ट्रीयन ब्राह्मण हैं । वे अत्यन्त धर्मपरायण , कर्तव्यनिष्ठ एवं सत्यवादी होते हुए भी सत्यासत्य के द्वन्द्व में फंसकर अपना धर्म निश्चित नहीं कर पाते हैं । उनकी पत्नी अहिल्या समझाती है कि औरंगजेब के सामने उन्हें स्पष्टतः कह देना चाहिए कि विनायक उनका भांजा नहीं , वरन् शिवाजी के पुत्र शम्भाजी हैं । पुरुषोत्तम की अन्तरात्मा कहती है कि शरणागत का बलिदान सबसे बड़ा पाप और विश्वासघात है ।

 वह कैसे कह सकता है कि शिवाजी औरंगजेब की कैद से भागते समय अपने पुत्र को यहाँ छोड़ गये हैं , जिसे पुरुषोत्तम ने अपना भांजा विनायक घोषित कर दिया है । अहिल्या दूसरा धर्म – संकट प्रस्तुत करती है । औरंगजेब के गुप्तचर विभाग के सरदार दिलावर खाँ ने यह शर्त रखी है कि पुरुषोत्तम विनायक के साथ एक थाली में भोजन करें तो वह उसे पुरुषोत्तम का भांजा मान लेगा । महाराष्ट्रीयन ब्राह्मण पुरुषोत्तम एक अब्राह्मण के साथ भोजन कैसे कर सकता है ? 

अहिल्या उसे समझाती है कि जीवन भर के धर्म – सत्य पालन को वह नष्ट न करे , इसलिए सच – सच बता दे । द्वितीय दृश्य एक गली का है । दिलावर खाँ और रहमान बैग पुरुषोत्तम की सत्यवादिता और धार्मिक कर्मकाण्ड की तारीफ करते हुए कहते हैं कि यदि पुरुषोत्तम शम्भाजी के साथ एक ही थाली में भोजन कर लेता है तो वह निश्चय ही उसका भांजा होगा । वे पण्डित पुरुषोत्तम के घर की ओर चल पड़ते हैं । तीसरा दृश्य फिर पुरुषोत्तम के कमरे का है । वे व्याकुल हो , टहल रहे हैं । उनकी पत्नी अहिल्या कहती है कि उनका सत्य बोलने का निर्णय ही सर्वोत्तम है । वह तर्क देती है कि गैर के लिए अपना धर्म छोड़ना ठीक नहीं है । 

पुरुषोत्तम कोई उत्तर नहीं देता है , तभी दिलावर खाँ आवाज लगाता है । पुरुषोत्तम उसे बुलाकर बैठाते हैं । उनके मुख पर आभा और उल्लास दिखायी देता है । वे भीतर से एक थाली में भोजन और जल – कलश लेकर आते हैं । पुरुषोत्तम और शम्भाजी एक थाली में भोजन करते हैं । यह देखकर दिलावर खाँ और रहमान बेग चकित तथा लज्जित होते हैं । इस तरह यह एकांकी समाप्त हो जाता है

सच्चा धर्म पाठ के कठिन शब्दार्थ 

वक्षस्थल – छाती । यज्ञोपवीत = जनेऊ । त्रिकाल = प्रातः , दोपहर एवं संध्या तीन समय । शौच = शुद्धि । निराकरण = समाधान । भक्ष्याभक्ष = खाने योग्य , न खाने योग्य । मिथ्या असत्य , झूठ । व्यथित दुःखी । पशोपेश – द्विविधा , उहापोह । मानिन्द = भाँति , तरह । निस्तब्धता = शान्ति , सन्नाटा । इहलोक = इस लोक में । सियासी = राजनीतिक । मामलात = मामले । उत्कंठा = तीव्र इच्छा । उद्विग्नता = बेचैनी । 

सच्चा धर्म संदर्भ, प्रसंग सहित गद्यांशों की व्याख्या 

(1) कम-से-कम तुम सदृश सत्यवादी-व्यक्ति के लिए तो ऐसे प्रश्नों में असाधारणता नहीं होनी चाहिए। जन्म भर तुम्हारा सत्यव्रत अटल रहा। तुम सदा कहते रहे हो कि जीवन में यदि मनुष्य एक सत्य का आश्रय लिये रहे तो वह सत्य स्वयं ही सारे प्रश्नों का निराकरण कर देता है। पर जब मनुष्य सत्य का आश्रय छोड़ मिथ्या का आसरा लेता है, तभी तरह-तरह के प्रश्न उठ खड़े होते हैं।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक ‘ सच्चा धर्म ‘ पाठ से अवतरित है । इसके लेखक सेठ गोविन्ददास हैं । 

प्रसंग – 

यहाँ पत्नी अहिल्या पुरुषोत्तम को समझाती है कि तुम जैसे सत्य बोलने वाले को विचलित होना संगत नहीं है । 

व्याख्या – 

अहिल्या पुरुषोत्तम से कहती है कि तुम सदैव सत्य पर अटल रहे हो । तुम्हारे जैसे सत्यव्रती को सामान्य बातों के कारण चलायमान होना उचित नहीं है । तुम जीवन में सदैव सत्य पर अडिग रहे हो । तुम्हारी मान्यता रही है कि सत्यवादी के सभी प्रश्न सत्य के सहारे हल हो जाते हैं । सत्य त्यागने पर आदमी को विभिन्न प्रकार के प्रश्नों का सामना करना पड़ता है । इसलिए सत्य को नहीं त्यागना चाहिए । 

विशेष – 

(1) सत्य पर अटल रहने के प्रति सजग किया गया है । (2) सत्यवादी को समस्याएँ नहीं घेरती हैं । (3) सरल , सुबोध विषयानुरूप खड़ी बोली को अपनाया है । (4) तर्कपूर्ण विचारात्मक शैली में प्रभावी ढंग से विषय को प्रस्तुत किया गया है । 

(2) शास्त्रों में सत्य और असत्य की व्याख्या बड़ी बारीकी से की गई है । अनेक बार सत्य के स्थान पर मिथ्या भाषण सत्य से भी बड़ी वस्तु होती है । जीवन में धर्म से बड़ी कोई चीज नहीं है , धर्म की रक्षा यदि असत्य से होती है तो असत्य सत्य से बड़ा हो जाता है ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक ‘ सच्चा धर्म ‘ पाठ से अवतरित है । इसके लेखक सेठ गोविन्ददास हैं । 

प्रसंग – 

यहाँ बताया गया है कि धर्म की रक्षा हेतु बोला गया असत्य सत्य से भी बड़ा होता

व्याख्या – 

अपनी पत्नी अहिल्या को समझाते हुए पुरुषोत्तम कहते हैं कि शास्त्रों में सत्य और असत्य के विषय में बड़ी सूक्ष्म व्याख्या की गई है । बहुत बार ऐसी स्थिति होती है कि सत्य से झूठ अधिक श्रेष्ठ हो जाता है । मानव जीवन में धर्म सबसे महत्वपूर्ण होता है । यदि झूठ से धर्म सुरक्षित होता है तो वह झूठ सत्य से भी बड़ा बन जाता है । 

विशेष – 

(1) धर्म के हित में बोला गया असत्य भी सत्यं से बढ़कर होता है । (2) सरल , सुबोध , साहित्यिक खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है । (3) विवेचनात्मक शैली में विषय को समझाया गया है । 

(3) सारा हाल सच – सच कह देने से अच्छा निर्णय हो ही नहीं सकता था । परलोक बचा , क्योंकि किसी और के साथ खाने से जो धर्म जाता वह धर्म बच गया । इहलोक बचा क्योंकि राज्यभय नहीं रह जाएगा । 

संदर्भ –

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक ‘ सच्चा धर्म ‘ पाठ से अवतरित है । इसके लेखक सेठ गोविन्ददास हैं । 

प्रसंग – 

यहाँ सत्य कहने पर लोक – परलोक सुरक्षित होने का तर्क अहिल्या ने दिया है । 

व्याख्या – 

अहिल्या पुरुषोत्तम को समझाती है कि समस्त स्थिति को सत्य रूप में बता देना ही श्रेष्ठ निर्णय है । इससे यह लोक भी सुधरेगा तथा परलोक भी बन जाएगा । किसी के साथ खाने से जो धर्म नष्ट हो रहा था वह बच गया । राज्य से किसी प्रकार का भय नहीं रहेगा । अतः सत्य बता देना सबसे उत्तम है । 

विशेष – 

(1) सत्य कहने का आग्रह व्यक्त किया गया है । (2) शुद्ध , साहित्यिक भाषा का प्रयोग हुआ है । (3) विवेचनात्मक शैली में विषय का प्रतिपादन किया गया है ।

सेठ गोविन्ददास लेखक परिचय

जीवन परिचय – 

सेठ गोविन्ददास का जन्म जबलपुर (म. प्र.) के एक सम्पन्न धार्मिक परिवार में सन् 1896 ई . में हुआ था । सेठ जी ने घर पर ही अंग्रेजी और हिन्दी का गंभीर अध्ययन किया । बचपन से ही बल्लभ सम्प्रदाय में होने वाले उत्सवों , लीलाओं और नाटकों में आपकी विशेष रुचि थी । आपमें नाटक लिखने की प्रेरणा बचपन से ही जाग्रत हो गयी थी । आपने सन् 1919 में पहला नाटक ‘ विश्व – प्रेम ‘ अपने परिवार द्वारा स्थापित श्री शारदा – भवन पुस्तकालय के वार्षिकोत्सव के लिए लिखा था । इसी वर्ष गाँधीजी से प्रभावित होकर आप स्वतंत्रता आन्दोलन में सक्रिय हो गए । 

आपका अधिकांश जीवन भारत की सक्रिय राजनीति में व्यतीत हुआ । आप गाँधीजी के निकट सम्पर्क में रहे और अनेक बार जेल गये । आपकी अधिकांश रचनाएँ जेल में ही लिखी गयीं । भारत के स्वतंत्र होने पर आप संसद सदस्य हुए और आजीवन इस पद पर बने रहे । हिन्दी को राजभाषा बनाने में आपका महत्वपूर्ण योगदान रहा । सन् 1974 में आपका निधन हो गया । कृतियाँ – बाल्यावस्था से ही साहित्य के प्रति आकर्षित गोविन्ददास ने मात्र बारह वर्ष की आयु में ‘ चम्पावती ‘ उपन्यास लिखा । इस पर देवकीनन्दन खत्री के ‘ चन्द्रकान्ता ‘ उपन्यास का प्रभाव है । सेठ गोविन्ददास मूलत : नाटककार हैं । 

इनके प्रमुख नाटक एवं एकांकी इस प्रकार हैं 

(1) नाटक – 

विश्व प्रेम

कर्त्तव्य

कर्ण 

हर्ष

कुलीनता

शेरशाह

शशिगुप्त

अशोक 

विजय बेलि

सिंहल द्वीप 

सिद्धांत स्वतंत्र्य 

भूदान 

पति

सेवापथ

दलित कुसुम 

बड़ा पापी कौन

गरीबी और अमीरी

(2) एकांकी संग्रह – 

एकादशी

चतुष्पथ 

पंचभूत 

सप्त रश्मि

साहित्य में स्थान – 

आधुनिक काल के राष्ट्रीय चेतना से ओत – प्रोत साहित्य सृजन करने वाले साहित्यकारों में सेठ गोविन्ददास का महत्वपूर्ण है । आप जीवन भर हिन्दी साहित्य तथा हिन्दी भाषा के प्रति समर्पित रहे । हिन्दी साहित्य आपका सदैव ऋणी रहेगा ।

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