MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 8 मातृभूमि का मान

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MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 8 मातृभूमि का मान (एकांकी, हरिकृष्ण प्रेमी

मातृभूमि का मान अभ्यास

 

मातृभूमि का मान अति लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1. 

बूंदी के राव मेवाड़ के अधीन नहीं रहना चाहते । क्यों ? 

उत्तर –

बूंदी के राव हेमू को किसी की भी गुलामी स्वीकार नहीं है । इसलिए वे मेवाड़ के अधीन नहीं रहना चाहते । 

प्रश्न 2. 

मुट्ठी भर हाड़ाओं ने किसे पराजित किया था ?

उत्तर – 

मुट्ठी भर हाड़ाओं ने महाराणा लाखा को पराजित किया था । 

प्रश्न 3. 

वीरसिंह का प्राणान्त कैसे हुआ ? 

उत्तर – 

वीरसिंह का प्राणान्त गोले के वार से हुआ था । 

प्रश्न 4.

अनुशासन का अभाव हमारे देश के टुकड़े किए हुए है । यह कथन किसका है ? 

उतर –

अनुशासन का अभाव हमारे देश के टुकड़े किए हुए है । यह कथन अभयसिंह का है । 

प्रश्न 5. 

महाराणा लाखा वीरसिंह के किस गुण से प्रसन्न हुए ? 

उत्तर – 

महाराणा लाखा वीरसिंह की वीरता देखकर प्रसन्न हुए । 

मातृभूमि का मान लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1. 

महाराणा लाखा ने कौन – सी प्रतिज्ञा की थी ? 

उत्तर – 

नीमरा के मैदान में बूंदी के राव हेमू से पराजित होने पर महाराणा लाखा स्वयं को धिक्कारते हैं । वे स्वयं को इस कलंक का दोषी मानते हैं । महारावल बाप्पा के वंशज महाराणा लाखा प्रतिज्ञा करते हैं कि ” जब तक बूंदी के दुर्ग में ससैन्य प्रवेश नहीं करूँगा, अन्न जल ग्रहण नहीं करूंगा ।

प्रश्न 2. 

चारणी ने राजपूत – शक्तियों के विषय में महाराणा से क्या कहा था ? 

उत्तर – 

चारणी प्रेमपूर्ण सम्बन्धों का समर्थन करने वाली है । महाराणा उससे कहते हैं कि मैं तो राजस्थान की एकता की श्रृंखला को तोड़ने जा रहा हूँ । तब वह बहुत दुःखी होती है । वह महाराणा से निवेदन करती है कि यदि हाड़ाओं से कोई धृष्टता बन पड़ी है तो आप उसे भुलाकर राजपूत शक्तियों में स्नेह का सम्बध बना रहने दें । 

प्रश्न 3. 

वीरसिंह ने जन्मभूमि की रक्षा के विषय में अपने साथियों से क्या कहा था ?

उत्तर – 

वीरसिंह कहते हैं कि हमें नकली बूंदी भी प्राणों से प्रिय है । जिस जन्मभूमि की धूल में हम खेलकर बड़े हुए हैं , उसका अपमान भी कैसे सहन किया जा सकता है । वे साथियों से कहते हैं कि ” मेरे वीरो | तुम अग्नि कुल के अंगारे हो । अपने वंश की आभा को क्षीण न होने देना । प्रतिज्ञा करो कि प्राणों के रहते हम इस नकली दुर्ग पर मेवाड़ की राज्य – पताका को स्थापित न होने देंगे । 

प्रश्न 4. 

महाराणा अपनी विजय को पराजय क्यों कहते हैं ? 

उत्तर – 

बूंदी का नकली दुर्ग बनवाकर उसे महाराणा फतह तो कर लेते हैं परन्तु उन्हें अनेक वीरों के रक्तपात का दुःख है । वे वीरसिंह जैसे बहादुर के प्राणान्त से आहत हैं । इसलिए वे सोचते हैं कि ” आज इस विजय में मेरी सबसे बड़ी पराजय हुई । व्यर्थ के दंभ ने आज कितने ही निर्दोष प्राणों की बलि ले ली ।

मातृभूमि का मान दीर्घ उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1. 

‘ वीरसिंह का चरित्र मातृभूमि के सम्मान की शिक्षा देता है । ‘ इस कथन को सिद्ध कीजिए । अथवा

‘ मातृभूमि का मान ‘ एकांकी के आधार पर वीरसिंह के चरित्र की कोई दो विशेषताएँ लिखिए ।

उत्तर – 

(1) वीरसिंह मातृभूमि के सच्चे सपूत हैं । महाराणा द्वारा अपनी प्रतिज्ञा की पूर्ति के लिए बनवाए गये बूंदी के नकली दुर्ग की रक्षा में वीरसिंह अपने प्राण गँवा देते हैं पर जीते जी अपनी मातृभूमि के नकली दुर्ग का भी अपमान नहीं होने देते हैं । 

(2) वीरसिंह सच्चे वीर हैं । उनका बलिदान मातृभूमि के प्रेम के प्रति जागरूक करता है । वीरसिंह द्वारा अपनी मातृभूमि के लिए किया गया बलिदान हमें मातृभूमि के सम्मान के लिए सब कुछ न्यौछावर करने की शिक्षा देता है । 

प्रश्न 2. 

महाराणा और अभयसिंह के चरित्र की दो – दो विशेषताएँ लिखिए । 

उत्तर- 

(अ) महाराणा – मेवाड़ के महाराणा लाखा महारावल बाप्पा वंशज हैं । उनमें वीर क्षत्रियों की सभी विशेषताएँ विद्यमान हैं । उनमें से दो चारित्रिक विशेषताएँ इस प्रकार हैं 

(1) स्वाभिमानी वीर – चित्तौड़ के महाराणा लाखा में स्वाभिमान का भाव कूट – कूटकर भरा है । बूंदी के हाड़ा द्वारा पराजित होने पर वे अपने वंश को कलंकित अनुभव करते हैं । उस कलंक से छुटकारा पाने के लिए प्रतिज्ञा करते हैं कि जब तक मैं बूंदी के दुर्ग में ससैन्य प्रवेश नहीं करूंगा , अन्न – जल ग्रहण नहीं करूंगा । 

(2) सहृदय मानव – महाराणा लाखा बड़े सहृदय व्यक्तित्व के धनी हैं । वे अपनी प्रतिज्ञा रखने के लिए बूंदी का नकली दुर्ग बनाकर उस पर विजय प्राप्त तो करते हैं परन्तु इस किले की रक्षा में मारे गये वीरसिंह और सिपाहियों के रक्तपात से वे द्रवित हो उठते हैं । वे सोचते हैं कि ” व्यर्थ के दंभ ने आज कितने ही निर्दोष प्राणों की बलि ले ली । (ब) अभयसिंह – मेवाड़ के सेनापति अभयसिंह एक कुशल प्रशासक हैं । उनके चरित्र की प्रमुख दो विशेषताएँ इस प्रकार हैं (1) कुशल सेनानायक – अभयसिंह अपने पद के अनुरूप कार्य सँभालने में निपुण हैं । वे महाराणा की प्रतिज्ञा – रक्षा के लिए बूंदी के नकली दुर्ग की व्यवस्था तुरन्त कराते हैं और मैनियों को उस पर विजय प्राप्त करने के लिए युद्ध करने को भेजते हैं । वे युद्ध का संचालन करने में भी समझदारी से काम लेते हैं । शत्रु की वीरता का वे आदर करते हैं परन्तु अपने देश की विजय में भूल नहीं करते । (2) राष्ट्रीयता से ओत – प्रोत – अभयसिंह में राष्ट्रीयता की भावना कूट – कूटकर भरी है । वे मेवाड़ के सेनापति हैं । मेवाड़ के सम्मान को बढ़ाने का वे हर प्रयास करते हैं । वे बूंदी के राव हेमू को मेवाड़ की अधीनता स्वीकार करने को प्रेरित करते हैं । जब महाराणा लाखा बूंदी के किले में ससैन्य प्रवेश की प्रतिज्ञा कर लेते हैं तो उसका पालन करने में भी वे चूक नहीं करते हैं । मेवाड़ उन्हें प्राणों से अधिक प्रिय है ।

मातृभूमि का मान पाठ सारांश 

हरिकृष्ण ‘ प्रेमी ‘ द्वारा लिखित ‘ मातृभूमि का मान ‘ एकांकी देश प्रेम की भावना व्यक्त करने में सफल रहा है । मेवाड़ के राजा महाराणा लाखा अपने सेनापति अभयसिंह को बूंदी भेजते हैं । अभयसिंह वहाँ जाकर बूंदी के राव हेमू के समक्ष मेवाड़ की अधीनता स्वीकार करने का प्रस्ताव रखते हैं ताकि राजपूतों की एकता कायम रह सके । राव स्पष्ट कह देते हैं कि बूंदी किसी की अधीनता स्वीकार नहीं करेगा । वह स्वतन्त्र रहकर मेवाड़ का आदर करता रहेगा । 

बूंदी प्रेम का अनुशासन मानती है, शक्ति का भय नहीं । मेवाड़ के महाराणा लाखा नीमरा के मैदान में हुई पराजय का कलंक धोने के लिए आतुर हैं । वे प्रतिज्ञा करते हैं कि बूंदी के दुर्ग में ससैन्य प्रवेश करके ही अन्न – जल ग्रहण करेंगे । उनको चारणी तथा अभयसिंह समझाते हैं तथा उनकी प्रतिज्ञा के निर्वाह के लिए मेवाड़ में ही बूंदी का नकली दुर्ग बनवाया जाता है । मेवाड़ की सेना में रह रहे हाड़ा वीरसिंह को बूंदी के नकली दुर्ग की पराजय भी अपनी मातृभूमि का अपमान लगती है । 

वह अपने साथियों सहित दुर्ग की रक्षा में वीरतापूर्वक संघर्ष करते हैं । युद्ध में वे अपनी जन्मभूमि के सम्मान की रक्षा करते हुए अपने प्राण गँवा देते हैं । यह देखकर महाराणा दुःखी होते हैं और इस विजय को अपनी पराजय मानते हैं क्योंकि अपने दम्भ के लिए उन्होंने कितने ही निर्दोषों के प्राण ले लिए । राव हेमू कहते हैं कि वीरसिंह के बलिदान ने हमें जन्मभूमि का मान करना सिखाया है । इस प्रकार एकांकी राष्ट्रीय एकता तथा मातृभूमि के मान की रक्षा का सन्देश देता है । 

मातृभूमि का मान पाठ के कठिन शब्दार्थ 

दंभ = अहंकार । पथ प्रतिरोध = रास्ता रोकना । व्यथित = दुःखी । धृष्टता – उदंडता । व्याघात बाधा , अड़चन । सायत – समय , लग्न । निष्प्राण – प्राण रहित । विपत्ति संकट । विध्वंश – विनाश । अनुरोध – प्रार्थना , निवेदन । पौरुष- पराक्रम , शौर्य । 

मातृभूमि का मान संदर्भ प्रसंग सहित गद्यांशों की व्याख्या 

(1) जिनकी खाल मोटी होती है उनके लिए किसी भी बात में कोई भी अपयश , कलंक या अपमान का कारण नहीं होता । किन्तु जो आन को प्राणों से बढ़कर समझते आए हैं , वे पराजय का मुख देखकर भी जीवित रहें , यह कैसी उपहासजनक बात है ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘मातृभूमि का मान’ पाठ से अवतरित है । इसके लेखक ‘हरिकृष्ण प्रेमी’ हैं । 

प्रसंग – 

जब बूंदी की पराजय से आहत महाराणा लाखा को सेनापति अभयसिंह समझाते हैं कि पराजय से आपका दुःखी होना उचित नहीं है । तब महाराणा उत्तर देते हैं 

व्याख्या – 

कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जिन पर मान – अपमान का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है । उनकी खाल मोटी होती है । हार, कलंक, निन्दा आदि उन्हें बेचैन नहीं करते हैं । परन्तु जो अपनी आन और शान को अपने जीवन से भी मूल्यवान मानते हैं , उन्हें पराजय व्याकुल कर देती है । हार के बाद उन्हें अपना जीवन उपहासकारक प्रतीत होता है । 

विशेष – 

(1) स्वाभिमान का भाव व्यक्त हुआ है । (2) शुद्ध साहित्यिक खड़ी बोली का प्रयोग हुआ है । (3) भाव – प्रधान शैली को अपनाया गया है ।

(2) धिक्कार है तुम्हें ! नकली बूंदी भी प्राणों से अधिक प्रिय है । जिस जगह एक भी हाड़ा है , वहाँ बूंदी का अपमान आसानी से नहीं किया जा सकता । आज महाराणा आश्चर्य के साथ देखेंगे कि यह खेल केवल खेल ही नहीं रहेगा , यहाँ की चप्पा – चप्पा भूमि सिसोदियों और हाड़ाओं के खून से लाल हो जायेगी । 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘मातृभूमि का मान’ पाठ से अवतरित है । इसके लेखक ‘हरिकृष्ण प्रेमी’ हैं । 

प्रसंग – 

यहाँ बूंदी के हाड़ा वंश में पैदा हुआ मेवाड़ का वीर सेनानी वीरसिंह अपनी मातृभूमि के स्वाभिमान की रक्षा हेतु बलिदान की घोषणा कर रहा है । 

व्याख्या – 

वीरसिंह को अपनी मातृभूमि से प्यार है । बूंदी के नकली दुर्ग को भी वह प्राणों से अधिक प्रिय मानता है । अपने साथियों को उत्साहित करते हुए वह कहता है कि तुमको धिक्कार है , तुम चुप हो । जिस स्थान पर एक भी हाड़ा मौजूद है उस स्थान पर बूंदी का अपमान करना सम्भव नहीं है । आत्म – विश्वास से भरकर वह घोषणा करता है कि आज महाराणा लाखा भी चकित होंगे । हम उनके इस विजय के खेल को भी खेल नहीं रहने देंगे । हम मातृभूमि के सम्मान की रक्षा के लिए संघर्ष करेंगे । यहाँ का प्रत्येक स्थान सिसोदियों और हाड़ाओं के रक्त से रंग जायेगा । 

विशेष – 

(1) मातृभूमि के सम्मान की रक्षा हेतु बलिदान को तत्पर हाड़ाओं का दृढ़ . निश्चय प्रकट हुआ है । (2) सरल , सुबोध भाषा का प्रयोग किया गया है । (3) भावात्मक शैली को अपनाया गया है । 

(3) हम युग – युग से एक हैं और एक रहेंगे । आपको यह जानने की आवश्यकता थी कि राजपूतों में न कोई राजा है , न कोई महाराजा ! सब देश , जाति और वंश की मान – रक्षा के लिए प्राण देने वाले सैनिक हैं । हमारी तलवार अपने ही स्वजनों पर न उठनी चाहिए । बूंदी के हाड़ा सुख और दुःख में चित्तौड़ के सिसोदियों के साथ रहे है और रहेंगे । हम सब राजपूत अग्नि के पुत्र हैं , हम सबके हृदय में एक ज्वाला जल रही है । हम कैसे एक – दूसरे से पृथक् हो सकते हैं । वीरसिंह के बलिदान ने हमें जन्मभूमि का मान करना सिखाया ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘मातृभूमि का मान’ पाठ से अवतरित है । इसके लेखक ‘हरिकृष्ण प्रेमी’ हैं । 

प्रसंग – 

यहाँ राजपूती एकता तथा जन्मभूमि के सम्मान के भाव व्यक्त हुए हैं । 

व्याख्या – 

बूंदी के राव हेमू कहते हैं कि हम राजपूत अनेक युगों से एक रहे हैं और भविष्य में भी एकता के सूत्र में बंधे रहेंगे । राजपूतों में न कोई राजा है और न कोई महाराजा ही है , ये सभी अपने देश , अपनी जाति तथा अपने कुल के सम्मान की रक्षा पर मर – मिटने वाले वीर सेनानी हैं । इसलिए हम ध्यान रखें कि अपनी तलवार अपने ही प्रिय लोगों पर न चले , हम आपस में न लड़ें । बूंदी का हाड़ा वंश सदैव चित्तौड़ के साथ रहा है । उसने सुख और दुःख में सहायता का हाथ बढ़ाया है और भविष्य में भी हम साथ रहेंगे । हम समस्त राजपूत वंशों के वीर आग के बेटे हैं । हम सबके हृदय में स्वाभिमान की आग दहकती रहती है । हम सभी आत्म – सम्मान के भाव से भरे हैं । अत : हम एक – दूसरे से अलग हो ही नहीं सकते हैं । वीरसिंह ने अपने प्राणों को न्यौछावर कर हमें जन्मभूमि के सम्मान की शिक्षा दी है । हमें उसका अनुसरण करना है ।

विशेष – 

(1) राजपूतों की एकता की दृढ़ता प्रकट हुई है । (2) राष्ट्रीय भावना की अभिव्यक्ति हुई है । (3) सरल , सुबोध भाषा में विषय का प्रतिपादन किया गया है । (4) भावात्मक शैली का प्रयोग हुआ है ।

हरिकृष्ण प्रेमी लेखक परिचय 

जीवन परिचय – 

प्रसिद्ध नाटककार हरिकृष्ण ‘ प्रेमी ‘ का जन्म मध्य प्रदेश के गुना नगर में सन् 1908 में हुआ था । प्रेमी जी को राष्ट्रीयता के संस्कार पारिवारिक परिवेश से प्राप्त हुए । जब आप दो वर्ष के हुए तो आपकी माता जी स्वर्ग सिधार गईं । माँ के प्रेम से जगी प्रीति ‘ प्रेमी ‘ नाम से विख्यात हुई । जब आप मैट्रिक कक्षा में पढ़ रहे थे तभी मात्र 16 वर्ष की आयु में ‘ आँखों में काव्य की रचना की । आपका मन पढ़ाई से उचट गया और आप कविता के प्रति समर्पित हो गये । मैट्रिक की पढ़ाई के समय ही आपका विवाह कर दिया गया । आपकी कविता से प्रभावित होकर एक बार ग्वालियर राज्य के तत्कालीन गृह मन्त्री ने आपको तहसीलदार पद देना चाहा किन्तु आपने स्पष्ट मना कर दिया । आपने स्वाधीनता आन्दोलन में भाग लिया । माखनलाल चतुर्वेदी के साथ ‘ त्यागभूमि ‘ में पत्रकार के रूप में कार्य करना प्रारम्भ कर दिया । ‘ कर्मवीर ‘ , ‘ भारती ‘ आदि पत्रिकाओं में भी सम्पादन कार्य किया । आप आकाशवाणी में हिन्दी दिग्दर्शक रहे । कुछ समय के लिए फिल्म क्षेत्र में भी कार्य किया । आपका निधन 22 जनवरी , सन् 1974 को इन्दौर (मध्य प्रदेश) में हो गया था । कृतियाँ – नाटककार , कवि , पत्रकार आदि रूपों में ‘ प्रेमी जी ‘ ने हिन्दी की सेवा की । आपका जीवन साहित्य को समर्पित रहा । 

आपकी प्रमुख रचनाएँ इस प्रकार हैं 

(1) नाटक – 

रक्षा बन्धन

शिवा साधना 

प्रतिशोध

आहुति

स्वप्न भंग

विषपान

शपथ

संवत

प्रवर्तन, आदि प्रमुख हैं

(2) एकांकी – 

बेड़ियाँ

प्रेमी

मन्दिर

बादलों के पार 

वामी 

नया समाज 

पाश्चात्य

यह भी खेल है 

रूप शिखा 

मातृभूमि का मान

निष्ठुर न्याय आदी प्रमुख हैं । 

साहित्य में स्थान – 

हिन्दी के नाटककारों में हरिकृष्ण ‘ प्रेमी ‘ का विशिष्ट स्थान है । उन्होंने ऐतिहासिक सन्दर्भ लेकर राष्ट्रीय जागरण , धर्मनिरपेक्षता , विश्वबन्धुत्व आदि का सन्देश अपने नाट्य साहित्य में दिया है । सामाजिक नाटकों में आक्रोश एवं विद्रोह का स्वर मुखर हुआ है । हिन्दी सेवा के लिए वे चिरकाल तक स्मरण किये जायेंगे ।

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