MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 9 परीक्षा

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MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions गद्य Chapter 9 परीक्षा (कहानी, प्रेमचन्द)

परीक्षा का मान अभ्यास

परीक्षा अति लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1. 

सुजान सिंह कौन थे ? 

उत्तर – 

सुजान सिंह देवगढ़ रियासत के दीवान थे । 

प्रश्न 2. 

देश के प्रसिद्ध पत्रों में विज्ञापन क्यों निकाला गया ? 

उत्तर – 

सुयोग्य उम्मीदवार का चयन करने के लिए देश के प्रसिद्ध समाचार – पत्रों में विज्ञापन निकाला गया ।

प्रश्न 3. 

रियासत देवगढ़ में आये हुए उम्मीदवारों ने कौन – सा खेल खेलने की योजना बनाई ? 

उत्तर – 

रियासत देवगढ़ में आए हुए उम्मीदवारों ने हॉकी खेलने की योजना बनाई । 

प्रश्न 4. 

किसान की गाड़ी कहाँ फंस गई थी ? 

उत्तर – 

किसान की गाड़ी नाले के कीचड़ में फंस गई थी । 

प्रश्न 5. 

‘ अच्छा , तुम गाड़ी पर जाकर बैलों को साधो , मैं पहियों को ढकेलता हूँ ‘ यह बात किसने कहीं ? 

उत्तर – 

यह बात पण्डित जानकीनाथ ने कही । 

प्रश्न 6. 

गाड़ी पर किसान के वेश में कौन था ? 

उत्तर – 

गाड़ी पर किसान के वेश में सरदार सुजान सिंह थे ।

परीक्षा लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1. 

राजा दीवान सुजान सिंह का आदर क्यों करते थे ? 

अथवा 

परीक्षा कहानी के आधार पर सुजान सिंह के चरित्र की कोई दो विशेषताएँ लिखिए ।

उत्तर – 

राजा दीवान सुजान सिंह का आदर इसलिये करते थे , क्योंकि उनके चरित्र में कई विशेषताएँ थीं- (1) सुजान सिंह ने रियासत की सेवा चालीस वर्षों तक ईमानदारी के साथ की थी । (2) वह जनता के साथ नीति का आचरण करते थे । (3) दीवान सुजान सिंह को प्रत्येक बात का अनुभव भी था । 

प्रश्न 2. 

बूढ़ा जौहरी आड़ में बैठा क्या देख रहा था ?

उत्तर – 

वह बूढ़ा जौहरी तो था लेकिन वह हीरे – जवाहरातों का जौहरी नहीं अपितु मनुष्यों का जौहरी था । वह जौहरी था सरदार सुजान सिंह जो सभी उम्मीदवारों को छिपकर परख रहे थे कि किसमें कर्त्तव्य की भावना अधिक बलवती है । जिस प्रकार जौहरी विभिन्न पत्थरों में से हीरे को पहचान लेता है , ठीक उसी प्रकार बूढ़ा जौहरी भी आड़ में योग्यता की पहचान कर रहा था । 

प्रश्न 3. 

खिलाड़ियों ने निराश और असफल किसान को किस भाव से देखा ? 

उत्तर – 

खिलाड़ियों ने किसान को बन्द आँखों से देखा , अर्थात् देखकर भी अनदेखा कर दिया । उन आँखों में केवल पद प्राप्त करने का स्वार्थ था , अहंकार था , परन्तु उदारता और प्रेम नाममात्र को भी नहीं था । उन्होंने बेरुखी से उस ओर देखा । 

प्रश्न 4. 

परेशान किसान की सहायता किसने की ? 

उत्तर – 

नाले में गाड़ी फंसने पर किसान परेशान था । परेशान किसान की सहायता चुटैल खिलाड़ी पण्डित जानकीनाथ ने की । 

प्रश्न 5. 

युवक को किसान की तरफ देखकर क्या सन्देह हुआ ? 

उत्तर – 

युवक ने जब किसान की तरफ गौर से देखा तो उसके मन में यह सन्देह हुआ कि क्या यह सुजानसिंह तो नहीं है ? क्योंकि गाड़ी वाले किसान का चेहरा और आवाज सरदार सुजान सिंह से मिलती – जुलती थी ।

परीक्षा दीर्घ उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1. 

‘जिससे बात कीजिए, वह नम्रता और सदाचार का देवता बना मालूम होता था’ इस उक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए ।

उत्तर – 

देवगढ़ रियासत के दीवान सरदार सुजान सिंह जब आवेदकों के रहने के लिए अच्छा प्रबन्ध कर देते हैं तो सभी इस प्रकार का आचरण करते हैं कि ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे वे नम्रता एवं सद्आचरण में सर्वश्रेष्ठ पद पर हों । ‘ देवता ‘ का अर्थ होता है – देवत्व को प्राप्त करने वाला अर्थात् महान् गुणों से युक्त । उन अभ्यर्थियों को देखकर ऐसा प्रतीत होता था कि जैसे संसार के सारे गुण इन्हीं में आ गये हों । 

प्रश्न 2. 

दीवान सुजान सिंह ने अपने उत्तराधिकारी का चयन किस प्रकार किया ? 

उत्तर – 

वर्तमान दीवान सुजान सिंह ने देश के मुख्य समाचार – पत्रों में विज्ञापन निकलवाया । आवेदकों की एक महीने तक परीक्षा (जाँच – पड़ताल) करने की कोशिश की । वह स्वयं गाड़ीवान का भेष धारण करके आये और जिस व्यक्ति ने अपनी चोट पर ध्यान न देकर , उनकी सहायता की , उसी को उन्होंने दीवान – पद पर नियुक्त किया अर्थात् दीवान सुजान सिंह ने विद्या की अपेक्षा कर्तव्यबोध को प्राथमिकता प्रदान करके अपने उत्तराधिकारी का चयन किया । 

प्रश्न 3. 

देवगढ़ रियासत के ‘ दीवान ‘ पद के लिए जानकीनाथ का चयन क्यों किया गया ? 

उत्तर – 

देवगढ़ रियासत के ‘ दीवान ‘ पद के लिए जानकीनाथ का चयन उसकी कर्तव्यपरायणता , दया , साहस एवं आत्मबल आदि गुणों के कारण हुआ । शारीरिक दृष्टि से भी वह हृष्ट – पुष्ट था । यही योग्यता आवेदक के लिए जरूरी मानी गयी थी । पं. जानकीनाथ अपने कष्ट को भुलाकर गाड़ीवान की मदद करता है । उसकी यही आत्मबल से युक्त कर्त्तव्य की भावना ही उसे उच्च पद के योग्य बनाती है । 

प्रश्न 4. 

‘परीक्षा’ कहानी के शीर्षक की सार्थकता सिद्ध कीजिये । 

उत्तर – 

‘परीक्षा’ कहानी का शीर्षक अपनी सार्थकता को स्वयं सिद्ध कर देता है । प्रस्तुत कहानी में बहुत से लोगों की परीक्षा ली जाती है , लेकिन परीक्षा का आधार सैद्धान्तिक न होकर व्यावहारिक होता है । परीक्षा वही सफल होती है , जिसमें व्यावहारिकता होती है । परीक्षा के लिए ही आवेदन मांगे जाते हैं , जब योग्य आवेदक की नियुक्ति हो जाती है तो ‘ कहानी ‘ खत्म हो जाती है । जिस शीर्षक के लिए कहानी लिखी जाये , जो शीर्षक कहानी में शुरू से अन्त तक अपनी क्रमशीलता बनाये रखे । जिस शीर्षक के कारण बगुलों में हंस का चुनाव हुआ ‘ उस शीर्षक की सार्थकता सिद्ध करने के लिए अब शेष रह गया है । 

परीक्षा पाठ – सारांश 

प्रेमचन्द द्वारा लिखित परीक्षा कहानी देवगढ़ रियासत में दीवान पद के उम्मीदवार के चयन की प्रक्रिया से सम्बन्धित है । सरदार सुजानसिंह वृद्धावस्था के कारण स्वयं पदमुक्त होना चाहते हैं । राजा साहब इस प्रार्थना को स्वीकार तो कर लेते हैं किन्तु एक शर्त के साथ कि नया दीवान उनको स्वयं खोजना होगा । देश के लोकप्रिय पत्रों में यह विज्ञापन दिया जाता है कि देवगढ़ के लिए एक योग्य दीवान की जरूरत है परन्तु योग्यता का आधार शिक्षा न होकर आचार – विचार एवं कर्त्तव्यशीलता को माना जायेगा । इस विज्ञापन को पढ़कर देश के विभिन्न राज्यों और सम्प्रदायों के लोग देवगढ़ में एकत्रित होने लगते हैं । 

सभी लोग यह सोचते हैं कि एक माह की ही तो बात है , अतः ‘ मुँह में राम , बगल में छुरी ‘ वाली कहावत चरितार्थ करने लगते हैं । नयी पीढ़ी के लोगों ने हॉकी खेलने का विचार प्रस्तुत किया जिसे सभी ने स्वीकार कर लिया । हॉकी खेल का आयोजन होता है । खेल के बाद सब थककर चूर हो जाते हैं । तभी शाम के घिरते ही एक गाड़ी कीचड़ में फंस जाती है । सभी खिलाड़ी उसे देखकर भी अनदेखा कर देते हैं लेकिन उन्हीं में से पण्डित जानकीनाथ नामक व्यक्ति गाड़ीवान की सहायता करने के लिए तत्पर हो जाता है । पं . जानकीनाथ का यह कार्य इसलिये भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि हॉकी खेलते समय उनके पैरों में चोट लग गई थी । फिर भी वह अपने कर्त्तव्य से विमुख नहीं होते हैं । 

यही बात गाड़ीवान , सरदार सुजान सिंह को प्रभावित कर जाती है और पं . जानकीनाथ का दीवान पद के लिए चयन कर देते हैं । एक तरफ तो सरदार सुजान सिंह की पारखी दृष्टि है जो ” बगुलों में हंस को पहचानने की शक्ति रखती है । ” दूसरी तरफ पण्डित जानकीनाथ का मानवीय आचरण है जो साहस , आत्मबल और उदारता जैसे गुणों से युक्त है । कहानी में संदेश देने की कोशिश की गयी है कि वही व्यक्ति उच्च पद पर आसीन होने योग्य होता है जो अपने कष्ट की परवाह न करते हुए , अपने कर्तव्य का पालन कर सके । ” कहानी पढ़ते समय दृश्य – विधान जीवन्त हो उठता है । भाषा सहज , सुबोध एवं प्रवाहमयी है ।

परीक्षा पाठ के कठिन शब्दार्थ 

विनय = प्रार्थना , निवेदन । ग्रेजुएट – स्नातक । मुल्क- देश । नसीब = भाग्य । तहलका = हलचल । नेकनामी = भले काम से मिलने वाला यश । आत्मबल = आत्मा की शक्ति । सनद = प्रमाण – पत्र । शिखर = चोटी । संकल्प = निश्चय । नास्तिक ईश्वर को न मानने वाले । गौर = ध्यान । निन्दा = बुराई । कीर्ति = यश । सत्कार = आदर । फरमाया – कहा । जख्मी । घायल । साहस – हिम्मत । सताएगा = दुःखी करेगा । दृढ़ = पक्का । 

परीक्षा संदर्भ, प्रसंग सहित गद्यांशों की व्याख्या

(1) देवगढ़ के लिए एक सुयोग्य दीवान की जरूरत है । जो सज्जन अपने को इस पद के योग्य समझें वे वर्तमान सरदार सुजानसिंह की सेवा में उपस्थित हों । यह जरूरी नहीं है कि ग्रेजुएट हों , मगर हृष्ट – पुष्ट होना आवश्यक है , मंदाग्नि के मरीज को यहाँ तक कष्ट उठाने की कोई जरूरत नहीं । एक महीने तक उम्मीदवारों के रहन – सहन , आचार – विचार की देखभाल की जायेगी । विद्या का कम , परन्तु कर्त्तव्य का अधिक विचार किया जायेगा । जो महाशय इस परीक्षा में पूरे उतरेंगे , वे इस उच्च पद पर सुशोभित होंगे । 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के परीक्षा ‘ नामक पाठ से लिया गया है । इसके लेखक श्री प्रेमचन्द हैं । 

प्रसंग – 

प्रस्तुत गद्य में दीवान के पद के लिये जो विज्ञापन निकाला गया उसका विवरण प्रस्तुत किया गया है ।

व्याख्या – 

राज्य की ओर से विज्ञापन निकाला गया कि देवगढ़ के लिए एक योग्यतापूर्ण दीवान की आवश्यकता है । जो अपने को इस योग्यता के अनुरूप मानता हो वह वर्तमान सरदार सुजान सिंह के समक्ष उपस्थित हो । उस समय ग्रेजुएट ( स्नातक ) बहुत बड़ी योग्यता थी लेकिन विज्ञापन में कहा गया कि आवेदक यदि स्नातक न हो तो भी वह आवेदन कर सकता है लेकिन उसका शारीरिक एवं मानसिक रूप से स्वस्थ होना आवश्यक है । एक दिन में किसी मनुष्य को परखा नहीं जा सकता है , अत : एक महीने तक उम्मीदवार को जाँचा – परखा जायेगा । आवेदक को पढ़ाई की नहीं अपितु कर्त्तव्य की कसौटी पर कसा जायेगा । जो इस कसौटी पर खरा उतरेगा उसी को इस उच्च पद की शोभा बढ़ाने | अवसर दिया जायेगा । 

विशेष – 

(1) देवगढ़ रियासत के दीवान की योग्यताओं के विषय में बताया गया है । (2) कर्तव्य के प्रति विशेष ध्यान दिया गया है । (3) सरल , सुबोध , विज्ञापन वाली भाषा का प्रयोग किया गया है । (4) वर्णनात्मक शैली को अपनाया गया है । 

(2) पण्डितों और मौलवियों को भी अपने – अपने भाग्य की परीक्षा करने का अवसर मिला । बेचारे सनद के नाम रोया करते थे , यहाँ उनकी कोई जरूरत नहीं थी । रंगीन एमामे , चोगे और नाना प्रकार के अंगरखे और कंटोप देवगढ़ में अपनी सज – धज दिखाने लगे लेकिन सबसे विशेष संख्या ग्रेजुएटों की थी , क्योंकि सनद की कैद न होने पर भी सनद से परदा तो ढंका रहता है । 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के परीक्षा ‘ नामक पाठ से लिया गया है । इसके लेखक श्री प्रेमचन्द हैं । 

प्रसंग – 

प्रस्तुत गद्यांश में विभिन्न प्रकार के आवेदकों के बारे में बताया गया है । 

व्याख्या – 

प्रस्तुत गद्यांश में मुख्यतया दो प्रकार के आवेदकों पर प्रकाश डाला गया है । प्रथम वे जो पढ़ाई का प्रमाण – पत्र न होने पर भी आवेदन को भाग्य की परीक्षा मानते थे । द्वितीय व , जो योग्यता उनके पास है , वह आवश्यक नहीं , फिर भी वह उसे अतिरिक्त लाभ के रूप में रखते थे । पण्डित और मौलवियों के पास कोई किताबी ज्ञान नहीं था , वे या तो खानदारी परम्परा के तहत इस क्षेत्र में आये या अपने स्वयं की रुचि एवं स्वाध्याय के बल पर । उन लोगों को इसी बात का दुःख था कि उनके पास कोई प्रमाण – पत्र नहीं है लेकिन जब उन्होंने देखा कि इस आवेदन के लिए प्रमाण – पत्र की अनिवार्यता नहीं है तो उन्हें ऐसा लगा कि उन्हें भाग्य से यह मौका प्राप्त हुआ है । विभिन्न प्रकार के रंगीन वस्त्र , टोपे , पूरे शरीर को ढंकने वाले नाना प्रकार के ऊपरी वस्त्र पहनकर लोग देवगढ़ आने लगे । कहने का तात्पर्य यह है कि कोई भी व्यक्ति स्वयं को मूर्ख तो समझता नहीं था , बल्कि स्वस्थ , चतुर समझता था , ज्ञान ( किताबी ) की अनिवार्यता थी नहीं , अतः अधिकांश लोग विभिन्न प्रकार की वेश – भूषाओं में आ रहे थे । सबसे ज्यादा संख्या स्नातकों की थी , हालांकि यह योग्यता आवश्यक नहीं थी लेकिन प्रमाण – पत्र एक प्रकार का परदा है जो उनकी अकर्त्तव्य – परायणता को ढंकने में समर्थ होता है । 

विशेष – 

(1) यहाँ प्रदर्शनपूर्ण व्यवहार का वर्णन करके लोगों के दोहरे चरित्र का पर्दाफाश किया गया है । (2) सरल , सुबोध एवं विषय के अनुरूप खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है । (3) विवरणात्मक शैली में विषय को रखा गया है । 

(3) महाशय नास्तिक थे , मगर आजकल उनकी धर्मनिष्ठा देखकर मन्दिर पुजारी को पदच्युत हो जाने की शंका लगी रहती थी । मि . ‘ ल ‘ को किताब से घृणा थी , परन्तु आजकल वे बड़े – बड़े ग्रन्थ देखने – पढ़ने में डूबे रहते थे । जिससे बात कीजिए , वह नम्रता और सदाचार का देवता बना मालूम होता था । शर्मा जी घड़ी रात से ही वेद – मन्त्र पढ़ने में लगते थे और मौलवी साहब को नमाज और तलावत के सिवा और कोई काम न था । लोग समझते थे कि एक महीने का झंझट है , किसी तरह काट लें , कहीं कार्य सिद्ध हो गया तो कौन पूछता है । लेकिन मनुष्यों का वह बूढ़ा जौहरी आड़ में बैठा हुआ देख रहा था कि इन बगुलों में हंस कहाँ छिपा हुआ है । 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के परीक्षा ‘ नामक पाठ से लिया गया है । इसके लेखक श्री प्रेमचन्द हैं । 

प्रसंग – 

प्रस्तुत गद्यांश में इस बात को स्पष्ट किया गया है कि दीवान पद के उम्मीदवार के चयन की प्रक्रिया में जो लोग आए थे , वे दिखावटी आचरण करने वाले थे । 

व्याख्या – 

यहाँ बताया गया है कि दीवान पद के उम्मीदवार कथनी – करनी में बहुत अन्तर रख रहे थे । ‘ क’महाशय नास्तिक होते हुए भी इस प्रकार के धर्मात्मा दिखते थे कि उनकी पूजा देखकर मन्दिर का पुजारी भी हटाये जाने की शक करने लगा था । मिस्टर ‘ ल ‘ किताबों से घृणा करते थे लेकिन देवगढ़ के दीवान पद पर नियुक्त होने के लिए वे बड़े – बड़े ग्रन्थ पढ़ने लगे । जो बुरी प्रवृत्ति वाले लोग थे , वे भी ऐसे दिखाई देने लगे , मानो वे देवताओं के समान अच्छे गुण वाले हों । शर्मा जी दिन निकलने का भी इन्तजार नहीं करते थे और रात से ही मन्त्रों का जाप करना शुरू कर देते थे । मौलवी साहब को देखकर ऐसा प्रतीत होता था , जैसे नमाज के अलावा उनके पास कोई कार्य करने को नहीं है । इस प्रकार के व्यवहार का एक कारण था कि लोग यह सोचते थे कि अब जितना अच्छा बन सकते हैं बन लें , एक महीने की अवधि में ही सब कार्य निपट जाना है ।

यदि एक बार दीवान पद पर नियुक्त हो जायें तो कौन पूछता है कि तुम्हारा व्यवहार कैसा है अथवा तुम्हारे आचार – विचार किस प्रकार के हैं । लेकिन सरदार सुजान सिंह ने चालीस वर्षों तक रियासत के दीवान – पद को सुशोभित किया था , जिस प्रकार जौहरी विभिन्न प्रकार के पत्थरों को देखकर बता सकता है कि ‘ हीरा ‘ कौन सा है , ठीक उसी प्रकार वर्तमान दीवान सरदार सुजान सिंह सभी प्रत्याशियों को परख रहे थे । वे बनावटी व्यवहार करने वाले बगुलों के मध्य में छिपे हुए हंस को पहचानने का प्रयास कर रहे थे । 

विशेष – 

(1) दोहरे चरित्र के लोगों की स्थिति का सटीक वर्णन हुआ है । (2) सरल , सुबोध तथा विषयानुरूप खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है । (3) वर्णनात्मक शैली का प्रयोग किया गया है । 

(4) इस पद के लिए ऐसे पुरुष की आवश्यकता थी जिसके हृदय में दया हो और साथ – साथ आत्मबल । हृदय वह जो उदार हो , आत्मबल वह जो आपत्ति का वीरता के साथ सामना करे और इस रियासत के सौभाग्य से हमें ऐसा पुरुष मिल गया । ऐसे गुण वाले संसार में कम हैं और जो हैं , वे कीर्ति और मान के शिखर पर बैठे हुए हैं , उन तक हमारी पहुँच नहीं है ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के परीक्षा ‘ नामक पाठ से लिया गया है । इसके लेखक श्री प्रेमचन्द हैं ।  

प्रसंग – 

इस गद्यांश में संध्या समय जब राजा साहब का दरबार सजाया जाता है तो सरदार सुजान सिंह दीवान पद से सम्बन्धित घोषणा करते हैं । 

व्याख्या – 

सरदार सुजानसिंह कहते हैं कि दीवान पद के लिए हमें एक ऐसे पुरुष की आवश्यकता थी , जिसके हृदय में दया एवं परोपकार की भावना हो । उस पुरुष के हृदय में दया के साथ आत्मबल का होना भी आवश्यक है क्योंकि कोई व्यक्ति भावना तो अच्छी रखे लेकिन उस भावना को आत्मा के बल की कमी से पूरी न कर सके तो ऐसी दया व्यर्थ है । यदि किसी पुरुष में आत्म – बल है तो वह उस आत्म – बल के सहारे विपत्ति से भी निकल सकता है । इस राज्य के सौभाग्य से हमें वह दया एवं आत्मबल से पूर्ण व्यक्ति मिल चुका है । संसार में ऐसे लोग विरले ही होते हैं और जो हैं भी वह अपनी योग्यतानुसार उच्च पदों पर प्रतिष्ठित हो चुके हैं अर्थात् हमारी उन तक पहुँच नहीं 

विशेष – 

(1) दीवान के जिम्मेदारीपूर्ण पद पर योग्यता को आधार बनाया गया है । (2) व्यक्ति के आन्तरिक बल पर विशेष ध्यान दिया गया है । (3) सरल , सुबोध , प्रवाहमयी खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है । (4) व्याख्यात्मक शैली को अपनाया गया है ।

प्रेमचन्द लेखक परिचय

जीवन परिचय – 

उपन्यास सम्राट प्रेमचन्द का जन्म 31 जुलाई , 1880 ई. को काशी के निकट ‘ लमही ‘ नामक ग्राम में हुआ था । इनकी माता का नाम आनन्दी देवी और पिता का नाम अजायबराय था । प्रेमचन्द जब आठ वर्ष के थे , तभी उनकी माँ का देहान्त हो गया । इनका वास्तविक नाम धनपतराय था , किन्तु साहित्य में ‘ प्रेमचन्द ‘ नाम से पदार्पण किया । आपकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी इसलिए परिवार का पालन – पोषण बड़ी मुश्किल से हो पाता था । किसी प्रकार आपने बी. ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की । इसके बाद आप नार्मल स्कूल के अध्यापक पद पर कार्य करने लगे । कुछ समय बाद आप स्कूलों के सब डिप्टी इन्सपेक्टर हो गये । सन् 1921 में नौकरी छोड़कर आप असहयोग आन्दोलन में कूद पड़े । आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के कारण आप पुन : अध्यापन कार्य करने लगे । यह सब होने पर भी आप हतोत्साहित नहीं हुए और साहित्य सृजन में लगे रहे । आप’मर्यादा ‘ और ‘ माधुरी ‘ पत्रों के सम्पादक भी रहे । आपने बाद में स्वयं ही काशी से ‘ हंस ‘ तथा ‘ जागरण ‘ का प्रकाशन किया । उर्दू में ‘ नवाबराय ‘ के नाम से अनेक कहानियाँ लिखीं । आपको आर्थिक संकट से मुक्ति न मिली तो कुछ समय बम्बई ( मुम्बई ) में फिल्मी कहानियाँ लिखना आरम्भ कर दिया । वहाँ का जीवन उन्हें पसन्द नहीं आया । अतः पुनः काशी आ गये । प्रेमचन्द दरिद्र – जीवन को लेकर ही जीवन – पथ पर अग्रसर हुए । अत्यन्त दयनीय स्थिति के फलस्वरूप आपका स्वास्थ्य खराब हो गया । सरस्वती का यह प्रतिभासम्पन्न सपूत सन् 1936 ई . में इस संसार से सदा – सदा के लिए विदा हो गया । 

आपकी प्रमुख कृतियाँ इस प्रकार हैं 

(1) कहानी – 

पंच परमेश्वर

बड़े भाई साहब

नमक का दारोगा

कफन

परीक्षा

शंखनाद 

शतरंज के खिलाड़ी

मन्त्र 

पूस की रात

(2) उपन्यास – 

गोदान

रंगभूमि

सेवा – सदन

प्रेमाश्रम 

निर्मला

गबन आदि 

साहित्य में स्थान – 

प्रेमचन्द भारतीय जनता के सच्चे साहित्यकार थे । आपने भाषा – शैली को नवीन रूप प्रदान किया तथा अपने युग की विशेषताओं , धड़कनों को शब्दों में उभारा । उन्होंने लोकमंगलकारी साहित्य की रचना की । आपका साहित्य प्रत्येक वर्ग की दृष्टि से उच्चकोटि का साहित्य है जिसमें ग्रामीण तथा शहरी समाज का यथार्थ चित्रण मिलता है ।

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