MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions पद्य Chapter 10 विविधा

Chapter 10 विविधा

चाँदनी चमकती है गंगा बहती जाती है (त्रिलोचन)

कुछ कविताएँ (अभिमन्यु अनंत) (अप्रवासी भारतीय)

 

MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions पद्य Chapter 10 विविधा

 

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विविधा अति लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1. 

आसमान में किस तरह के बादल उड़ रहे थे ? 

उत्तर – 

आसमान में झीने – झीने , कजरारे , चंचल बादल उड़ रहे थे । 

प्रश्न 2. 

रिमझिम – रिमझिम पानी बरसने के बाद क्या हुआ ? 

उत्तर – 

रिमझिम – रिमझिम पानी बरसने के बाद आकाश खुल गया और धूप हो गयी ।

प्रश्न 3. 

कवि के अनुसार हवा बार – बार क्या कर रही है ? 

उत्तर – 

कवि के अनुसार हवा बार – बार उनकी पत्नी के आँचल को उसी तरह खींच रही है जैसे छोटा देवर अपनी हठ मनवाने को खींचता है । 

प्रश्न 4.

कवि अभिमन्यु अनंत ने नयी सभ्यता का स्वरूपकैसा बतलाया है ?

अथवा 

गरि ‘ नयी सभ्यता ‘ कविता के कवि का नाम बताते हुए नयी सभ्यता के स्वरूप को बताइए । 

उत्तर – 

‘नयी सभ्यता’ के कवि अभिमन्यु अनंत ने बताया है कि स्वार्थ केन्द्रित नया सभ्यता में चमत्कार की प्रधानता है । इसका स्वरूप घातक है । 

प्रश्न 5. 

आक्रोश में आकर मजदूरों ने क्या किया ? 

उत्तर – 

आक्रोश में आकर मजदूरों ने शोषक साहूकार रूपी सूरज को निगल लिया । 

प्रश्न 6. 

‘खाली पेट’ से कवि का क्या आशय है ? 

उत्तर – 

‘ खाली पेट ‘ से कवि का आशय भूखे – नंगे गरीबों से है ।

 

विविधा लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1. 

बादलों के हटने पर तारे कैसे दिखलाई पड़ते हैं ? 

उत्तर – 

शरद ऋतु में ठण्डी हवा चल रही है । उस हवा ने आकाश में उड़ते बादलों को हटा दिया है । झीने – कजरारे बादलों ने आकाश को घेर रखा था तो तारे ढंके थे । अब जब बादल हट गये हैं तो छिपते तथा चमकते हुए तारे आकाश में बड़े स्वच्छ और चमत्कारपूर्ण लग रहे हैं । शरद मैं आकाश में धूल नहीं रहती है । उस निर्मल गगन में सुन्दर तारे झलमला रहे हैं । 

प्रश्न 2. 

कवि के अनुसार सम्पूर्ण दिन में किस तरह के बादल दिखलाई पड़ रहे थे ? 

उत्तर – 

सारे दिन आकाश में ऊदे , लाल , पीले , मटमैले बादलों के समूह के समूह इधर से उधर मँडराते रहे । मन्द हवा चल रही है अत : बादल एक स्थान पर नहीं टिक रहे हैं । वे विभिन्न रंगों के दिखाई दे रहे हैं । रंग – बिरंगे बादलों से आकाश इतना सुन्दर लग रहा है कि देखकर मन खिल उठता है । 

प्रश्न 3. 

कवि ने हरे खेतों के बारे में क्या कल्पना की है ? 

उत्तर – 

हरे – भरे खेतों के बारे में कवि ने अपनी पत्नी को सम्बोधित कर कहा है कि मैंने एवं तुमने खेतों को जोतकर बोया । धीरे – धीरे अंकुर निकलकर बड़े हुए । बादलों ने वर्षा कर उन्हें स्नान कराया तथा मन्द हवा ने उन्हें हिला – डुलाकर खेलकूद कराये , उनका मनोरंजन किया । इस तरह मन को मोहित करने वाली हरियाली चारों ओर फैल गयी । हरे – भरे खेतों से धरती माता की शोभा सुसज्जित होकर खिल उठी । 

प्रश्न 4. 

कवि के अनुसार मेहनत से कमाई हुई फसल का वास्तविक लाभ किसे प्राप्त होता है ? 

उत्तर – 

किसान मेहनत करके खेतों को जोतता है , बोता है । गुड़ाई – सिंचाई करके वह फसल तैयार करता है किन्तु फसल के अन्न को कोई और अर्थात् साहूकार ले जाता है । वह किसान की कमाई से पैदा हुए अनाज को ऊँचे दामों में बेचकर अपनी तिजोरी भरता है । इस प्रकार किसान के परिश्रम से तैयार फसल का वास्तविक लाभ साहूकार को मिलता है । 

प्रश्न 5. 

कवि नियति से क्या प्रश्न करते हैं ? 

उत्तर – 

नियति के अन्यान्य प्रकार के विषम कार्य दिखाई देते हैं । उसने गरीब को पेट तो ।। दिया है पर उसे भरने को अन्न नहीं दिया । वह अपने पेट में घुटने गाढ़कर या दूसरों के सामने हाथ फैलाकर अपना पेट भरता है । इस विषमता पर दुःखी कवि नियति से प्रश्न करता है कि जब तूने गरीब को खाली पेट दिया है तो घुटने तथा फैलाने के लिए हाथ देने की क्या आवश्यकता थी । 

प्रश्न 6. 

‘बुनियाद चरमराने’ से कवि का क्या तात्पर्य है ? 

उत्तर – 

हमारी सभ्यता तथा संस्कृति अत्यन्त प्राचीन है । हमें अपनी आदर्श भरी परम्पराओं पर गर्व है । इसने ही हमारे यशमय जीवन की नींव रखी है । हमारा संसार में महत्व इसी सभ्यता , संस्कृति के कारण है किन्तु आज बाहरी प्रभावों ने , हमारी जो गहरी नींव थी उसके चरमराने स्थिति पैदा कर दी है । आशय है कि बाहरी प्रभाव से हम अपनी सभ्यता को खो रहे हैं ।

 

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1. ‘त्रिलोचन’ की कविता में प्रस्तुत शरद – ऋतु के प्राकृतिक सौन्दर्य का वर्णन कीजिए । 

उत्तर – 

त्रिलोचन की ‘ चाँदनी चमकती है गंगा बहती जाती है ‘ कविता में शरद ऋतु के प्राकृतिक सौन्दर्य का मनोहर वर्णन किया गया है । शरद में आकाश में धूल नहीं रहती है । सर्दी तथा गर्मी का भी प्रकोप नहीं होता है । मौसम बड़ा सुहावना होता है । इसी प्रकार की प्राकृतिक शोभा को प्रस्तुत करते हुए वे लिखते हैं मन्द – मन्द शीतल वायु बह रही है । आकाश में झीने – झीने तथा कजरारे बादल इधर से उधर चंचलता से घूम रहे हैं । स्वच्छ आकाश में तारे लुकते – छिपते चमत्कृत होकर मन को आकर्षित कर रहे हैं । शरद की रात्रि का वर्णन करते हुए कवि लिखते हैं कि शरद की नवमी की तिथि है । सुहावनी ठण्डक वाली रात मन में बसती जा रही है । अभी तेज ठण्ड नहीं है । यह मनोरम रात शरीर तथा मन में उल्लास का भाव भर रही है । दिन भी बड़े सुहावने होते हैं । अभी – अभी रिमझिम – रिमझिम वर्षा हो रही है , फिर बादल छट जाते हैं । आकाश में धूप खिल उठती है । फिर रंग – बिरंगे बादल छा जाते हैं । इस प्रकार शरद ऋतु की प्रकृति के गत्यात्मक सौन्दर्य का बड़ा ही आकर्षक रूप त्रिलोचन ने प्रस्तुत किया है ।

प्रश्न 2. 

पठित कविता के आधार पर ‘ त्रिलोचन ‘ की कविता के कलापक्ष पर अपना मन्तव्य दीजिए । 

उत्तर – 

त्रिलोचन की ‘ चाँदनी चमकती है गंगा बहती जाती है ‘ कविता के आधार पर कहा जा सकता है कि उनकी कविता का कलापक्ष बहुत सशक्त है । सीधी , सरल , सपाट बात को व्यावहारिक भाषा में बड़े प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने की क्षमता उनमें है । वे खड़ी बोली के सहज रूप को अपनाते हैं । उनकी कविता में संस्कृतनिष्ठ शब्दों की दुरूहता के दर्शन नहीं होते हैं । लाक्षणिकता का स्वाभाविक पुट भाषा में हो सकता है पर बड़ा सरस एवं सुबोध । उन्होंने अपनी कविता में अलंकारों का चमत्कार पैदा करने का प्रयास नहीं किया है परन्तु अनेक स्थान पर पुनरुक्तिप्रकाश , वीप्सा , रूपक , अनुप्रास आदि अलंकारों का सौन्दर्य देखा जा सकता है । प्रसाद और माधुर्य गुणों के कारण काव्य में रोचकता आ गई है , क्योंकि त्रिलोचन को लोक – जीवन का गहरा ज्ञान रहा , उनका अन्तर लोक में रमा रहा इसलिए लोक की झाँकी प्रतीक और बिम्बों के माध्यम से प्रस्तुत की गई है । कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि त्रिलोचन में भाव के अनुरूप सशक्त अभिव्यक्ति से युक्त कलापक्ष है । 

प्रश्न 3. 

त्रिलोचन शास्त्री ने पवन के माध्यम से क्या संकेत दिया है, भाव व्यंजना कीजिए । 

उत्तर – 

प्रकृति के अनुपम चितेरे त्रिलोचन में विविध प्रकार की व्यंजनाएँ प्राकृतिक तत्वों के माध्यम से व्यक्त करने की अद्भुत क्षमता है । ‘ चाँदनी चमकती है गंगा बहती जाती है कविता में पवन के माध्यम से जीवन के बड़े सरस तथा सूक्ष्म सम्बन्ध की व्यंजना दी है । कवि पत्नी को सम्बोधित कर कहता है कि यह पवन आज तुम्हारा आँचल बार – बार वैसे ही खींच रहा है जैसे जब – तब छोटा देवर तुमसे अपनी इच्छा पूरी करने की जिद्द करता है । छोटे देवर से समता दिखाकर कवि ने वात्सल्य मिश्रित प्रेम की व्यंजना दी है । छोटा देवर अपनी बड़ी भाभी पर माँ की तरह का अधिकार मानता है । भाभी भी उसे स्नेह मिश्रित प्रेम करती है । लोक जीवन के इस सूक्ष्म सम्बन्ध की व्यंजना पवन के माध्यम से त्रिलोचन ने व्यक्त की है । 

प्रश्न 4. 

नयी और पुरानी सभ्यता में कवि ने क्या अन्तर बतलाया है ? 

उत्तर – 

‘नयी सभ्यता’ कविता में कवि अभिमन्यु अनन्त ने बताया है कि हमारी प्राचीन सभ्यता महान रही है । इसके कारण दुनिया भर में हमारी खास पहचान रही है । समय – समय पर हुए आताताइयों के आक्रमणों से भी यह विकृत नहीं हो सकी है । इसमें मानव मात्र के कल्याण का भाव विद्यमान है परन्तु आज इस सभ्यता को जो सभ्यता प्रभावित कर रही है इसके परिणाम घातक हैं । नयी सभ्यता में बाहरी चमत्कार और दिखावे की प्रधानता है जबकि प्राचीन सभ्यता का लगाव अन्दर से था । जिस प्राचीन सभ्यता के कारण हमारी महिमा रही उसमें नयी सभ्यता विकार पैदा कर रही है । भाव एवं व्यवहार दोनों स्तरों पर पुरानी सभ्यता से नयी सभ्यता भिन्न है । नयी सभ्यता व्यक्ति केन्द्रित है जबकि पुरानी सभ्यता समाज केन्द्रित थी । पुरानी सभ्यता सत्य , अहिंसा , परोपकार आदि की पोषक रही है जबकि नयी सभ्यता में स्वार्थ पूर्ति के लिए सभी माध्यम अपनाना सम्भव है । इस प्रकार कवि को पुरानी सभ्यता में दोष पैदा होने पर चिन्ता है । 

प्रश्न 5. 

‘खाली पेट’ कविता में निहित व्यंग्य को समझाइए ।

उत्तर – 

समसामयिक परिवेश से जन्म लेने वाली स्थितियों के सफल चितेरे अभिमन्यु अनन्त के व्यंग्य बड़े धारदार तथा चुटीले होते हैं । इस जगत में नाना प्रकार की विषमताएँ हैं । इसके मूल में नियति की भी महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है । गरीबों के प्रति नियति की असंगति पर प्रहार करते हुए कवि ने कहा है कि नियति ने गरीबों को कभी न भरा जाने वाला खाली पेट दिया यह तो ठीक किया परन्तु खाली पेट को दबाने वाले घुटने तथा माँगने के लिए फैलने वाले हार्थों को गरीब को देने की क्या आवश्यकता थी । जब गरीबों के पेट भरने लायक व्यवस्था न थी तो उन्हें भूखे ही मर जाने देना संगत था । यहाँ पर नियति के असंगत बँटवारे पर व्यंग्य है । कहीं आवश्यकता से भी अधिक दिया है और कहीं पेट भरने लायक भी नहीं । 

प्रश्न 6. 

‘तृप्ति’ कविता के माध्यम से कवि ने किस विसंगति को उजागर किया 

उत्तर – 

तृप्ति कविता में अभिमन्यु अनन्त ने असमान वितरण व्यवस्था की ओर ध्यान आकर्षित किया है । श्रम के अनुरूप प्राप्त न होने की विसंगति के कारण गरीब निरन्तर गरीब होते जाते हैं और धनवान और अधिक सम्पन्न होते जाते हैं । शोषक गरीबों का शोषण करते हैं । पसीना कोई बहाता है और लाभ दूसरा उठाता है । यह व्यवस्था ही आक्रोश को जन्म देती है । कवि ने ‘तृप्ति ‘ कविता के माध्यम से इसी भयानक विसंगति को उजागर किया है । 

चाँदनी चमकती है गंगा बहती जाती है भाव – सारांश 

लोक दृष्टि के सहारे अपने काव्य को सहज प्रभावी बनाने में कुशल त्रिलोचन की ‘ चाँदनी चमकती है गंगा बहती जाती है ‘ कविता में परिवर्तनशील प्रकृति के विविध रूपों का मनोरम अंकन हुआ है । शरद ऋतु में गंगा के किनारे होती वर्षा आदि के सौन्दर्य को भावमय रूप प्रदान करते हुए कहते हैं कि धीरे – धीरे हवा चल रही है जिसके साथ बादल आकाश में उड़ रहे हैं । बादलों के बीच स्वच्छ चाँदनी चमक रही है और गंगा बहती चली जा रही है । शरद ऋतु के प्रारम्भिक समय में ठण्ड थोड़ी – थोड़ी बढ़ रही है वर्षा हो रही है । दिन भर रंग – बिरंगे बादल आकाश में छाए रहे जिन्हें देखने को नेत्र लालायित रहे । सर्जनात्मकता की ओर संकेत करते हुए कवि ने खेतों की जुताई – बुवाई आदि का चित्रण किया है । हरे – भरे लहराते खेत सुखद अनुभूति का एहसास करा रहे हैं । छोटे देवर के प्रति वात्सल्य मिश्रित प्रेम का अंकन कर कवि ने मन की हरियाली का संकेत कर दिया है । समग्रतः उनकी यह कविता प्रकृति तथा मानव जीवन का प्रभावी अंकन करती है ।

 

चाँदनी चमकती है गंगा बहती जाती है सन्दर्भ, प्रसंग सहित पद्यांशों की व्याख्या

 

(1) चल रही हवा

धीरे-धीरे

सीरी-सीरी;

उड़ रहे गगन में

झीने-झीने

कजरारे

चंचल बादल!

छिपते-छिपते

जब-तब

तारे,

उज्ज्वल, झलमल

चाँदनी चमकती है गंगा बहती जाती है।

शब्दार्थ – 

गगन = आकाश । कजरारे = काले । चंचल = चलायमान । दिपते = चमकते । उज्ज्वल स्वच्छ । 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्यांश आधुनिक कवि त्रिलोचन की ‘ चाँदनी चमकती है गंगा बहती जाती है ‘ कविता से अवतरित है । 

प्रसंग – 

इस अंश में चंचल बादलों , मन्द – मन्द हवा तथा गंगा के प्रवाह का मनोरम अंकन हुआ है । 

व्याख्या – 

ठण्डी – ठण्डी हवा मन्द – मन्द गति से बह रही है । आकाश में हल्के छितराये काजल के से रंग वाले बादल चंचल गति से विचरण कर रहे हैं । बादलों के बीच तारे जब – तब छिपते हुए तथा चमकते हुए बड़े स्वच्छ तथा झिलमिलाते प्रतीत हो रहे हैं । इस प्रकार के सुन्दर परिवेश में चाँदनी चमत्कृत हो रही है और गंगा नदी अपनी सरस गति से बहती चली जा रही है । 

विशेष – 

(1) प्रकृति का आलम्बन रूप में मनोहारी अंकन हुआ है । (2) पुनरुक्तिप्रकाश , अनुप्रास अलंकारों की स्वाभाविक छटा अवलोकनीय है । (3) सरल , सरस एवं भावानुरूप खड़ी बोली का प्रयोग हुआ है । 

 

(2) ऋतु शरद और

नवमी तिथि है

है कितनी, कितनी मधुर रात

मन में बस जाती शीतलता है

अभी नहीं जाड़ा कोई

बस जरा-जरा रोएँ काँपे

तन-मन में भर आया उछाह

हाँ, दिन भी आज अजीब रहा

रिमझिम रिमझिम पानी बरसा

फिर खुला गगन

हो गयी धूप

दिन भर ऐसा ही रहा तार

शब्दार्थ – 

मधुर = सरस । शीतलता = ठण्डक । जरा – जरा = थोड़े – थोड़े । उछाह = उत्साह । अजीब = विचित्र , अनोखा । गगन आकाश । तार = क्रम । 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्यांश आधुनिक कवि त्रिलोचन की ‘ चाँदनी चमकती है गंगा बहती जाती है ‘ कविता से अवतरित है । 

प्रसंग – 

इस पद्यांश में शरद ऋतु की माधुर्यमय रात्रि की प्राकृतिक सरसता का रमणीय अंकन है । 

व्याख्या – 

शरद ऋतु है और तिथि नवमी है । यह रात्रि कितनी अधिक सरसता लिए है । इसकी ठण्डक इतनी आनन्ददायक है कि स्थायी रूप से मन में बस जाती है । अभी ठण्ड भी तेज नहीं हुई है । ठण्ड के कारण शरीर के रोओं में मात्र कम्पन हो रहा है । शरीर और हृदय में इस सुहावनी ऋतु ने उत्साह भर दिया है । आज का दिन भी विचित्र रहा पहले तो रिमझिम वर्षा हुई है । इसके बाद बादल छट गए और आकाश साफ हो गया । चारों ओर धूप फैल गयी । सारे दिन वर्षा – धूप का यही क्रम चलता रहा । 

विशेष – 

(1) वर्षा – धूप के क्रम से सरस शरद के दिन का मनोहारी वर्णन हुआ है । (2) सरल , सुबोध एवं व्यावहारिक भाषा का प्रयोग किया गया है । (3) आलम्बन रूप में प्रकृति का चित्रण हुआ है । (4) पुनरुक्तिप्रकाश , अनुप्रास अलंकारों की शोभा दर्शनीय है । 

 

(3) कपसीले, ऊदे, लाल और

पहले, मटमैले-दल के दल

आये बादल

अब रात

न उतना रंग रहा

काला-हलका या गहरा

या धुएँ-सा

कुछ उजला-उजला

किसके अतृप्त दृग देखेंगे

चाँदनी चमकती है गंगा बहती जाती है।

शब्दार्थ – 

कपसीले = कपास जैसे । मटमैले = मिट्टी के रंग वाले । अतृप्त = देखने की इच्छा वाले , प्यासे । दृग नेत्र ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्यांश आधुनिक कवि त्रिलोचन की ‘ चाँदनी चमकती है गंगा बहती जाती है ‘ कविता से अवतरित है ।

प्रसंग – 

शरद ऋतु में छाने वाले रंग – बिरंगे बादलों के सौन्दर्य का आकर्षक वर्णन किया गया है । 

व्याख्या – 

शरद ऋतु में छाये बादलों को इंगित करते हुए कवि कहते हैं कि कपसीले , उदे , लाल , पीले , मटमैले रंगों के बादलों के समूह उड़ते हुए चले आ रहे हैं । धीरे – धीरे दिन छिप गया और रात आ गयी । और फलस्वरूप बादलों की उतनी स्पष्ट रंग भिन्नता नहीं रह गई है । अब गहरे काले , हल्के काले , धुएँ के से रंग के , कुछ उजले – उजले से बादल आकाश में मँडरा रहे हैं । इनके इस सौन्दर्य को देखने की इच्छा किसके नेत्रों को नहीं होगी । आकाश में बादलों के परिवर्तनशील क्रम में चन्द्रमा की चाँदनी चमत्कृत हो रही है और गंगा बहती हुई चली जा रही है । 

विशेष – 

(1) शरद के मनोरम प्राकृतिक सौन्दर्य का आकर्षक वर्णन हुआ है । (2) सरल , सुबोध तथा विषय के अनुरूप खड़ी बोली का प्रयोग हुआ है । (3) वर्णनात्मक शैली । (4) प्रकृति के गत्यात्मक सौन्दर्य का वर्णन हुआ है । उपमा , अनुप्रास अलंकारों की छटा अवलोकनीय है । 

 

(4) कुछ सुनती हो

कुछ गुनती हो

यह पवन, आज यों बार-बार

खींचता तुम्हारा आँचल है

जैसे जब तब छोटा देवर

तुमसे हठ करता है जैसे

तुम चलो जिधर वे हरे खेत

वे हरे खेत

हैं याद तुम्हें?

शब्दार्थ – 

गुनती = विचार करती , मनन करती । पवन – हवा । हठ – जिद्द ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्यांश आधुनिक कवि त्रिलोचन की ‘ चाँदनी चमकती है गंगा बहती जाती है ‘ कविता से अवतरित है ।

प्रसंग – 

मानव जीवन से जोड़ते हुए प्रकृति की छटा का वर्णन किया गया है ।

व्याख्या – 

कवि पत्नी को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि तुम मेरी कुछ बात को ध्यान से सुनो , उस पर गहराई से मनन करो । आज लगातार बहने वाली यह हवा तुम्हारे आँचल को बार – बार वैसे ही खींच रही है जैसे कभी – कभी तुम्हारा छोटा देवर तुम्हारे आँचल को पकड़कर अपनी बात मनवाने की जिद्द करता है । तुम्हें याद है कि तुम जिधर भी चल देती हो उधर ही हरे – भरे खेत लहराने लगते हैं । 

विशेष – 

(1) पारिवारिक सम्बन्धों के पुट से हुआ मनोहर प्रकृति चित्रण अपने आप है । अनूठा है । (2) सरल , सुबोध व्यावहारिक खड़ी बोली में विषय का सहज प्रतिपादन हुआ (3) पुनरुक्तिप्रकाश , अनुप्रास अलंकारों का सौन्दर्य अवलोकनीय है । 

 

(5) जिनको नहलाते हैं बादल

जिनको बहलाती है बयार

वे हरे खेत कैसे होंगे

कैसा होगा इस समय ढंग

होंगे सचेत या सोये से

वे हरे खेत

चाँदनी चमकती है गंगा बहती जाती है।

शब्दार्थ – 

जोता = जुताई की । अंकुर = छोटे – छोटे पौधे । मनमोहन = मन को मोहित करने वाली । सलोने = सुन्दर । परम = अत्यधिक । बहलाती = खिलाती । सचेत – चेतनामय । 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्यांश आधुनिक कवि त्रिलोचन की ‘ चाँदनी चमकती है गंगा बहती जाती है ‘ कविता से अवतरित है ।

प्रसंग – 

हरे – भरे लहराते खेतों की सुन्दरता का वर्णन किया गया है । 

व्याख्या – 

कवि दम्पत्ति के सहयोग से लहरा रही खेती के विषय में कहता है कि इन खेतों की मैंने जुताई की थी और तुमने उनमें दाने बोये थे । इसके बाद धीरे – धीरे कुछ समय बाद ही अंकुर उगते हुए दिखाई देने लगे । वे अंकुर समय के साथ बड़े हुए । फिर उनकी हमने मिलकर सिंचाई की । आज उनकी मन को मोहित करने वाली ऐसी सुन्दर हरियाली चारों ओर फैल रही है कि माँ पृथ्वी का स्वरूप सुसज्जित हो उठा है । उन अत्यधिक सौन्दर्यशाली छोटे – छोटे पौधों को हम दोनों ने सींचकर निकाई , गुड़ाई कर और अधिक बड़ा कर दिया है । प्रकृति ने उनके विकास में बहुत सहयोग किया है । आकाश में छाने वाले बादल जलवर्षा कर उन पौधों को नहलाते हैं और शीतल , मन्द हवा उनको क्रीड़ा खेल कराके प्रसन्न करती है । वे हरे – भरे खेत अब किस प्रकार के होंगे , पता नहीं ? उनका हाल किस तरह का होगा इसका भी ज्ञान नहीं है । पता नहीं वे हरे खेत इस समय वे चेतनामय होंगे या अलसाये से , परन्तु चाँदनी चमक रही है और गंगा बहती चली जा रही है । 

विशेष – 

(1) कृषि के धन – धान्य उगाने वाले रूप का मोहक वर्णन किया गया है । (2) दाम्पत्य सहकारिता का फल रचनात्मक होता है । (3) सरल , सुबोध एवं व्यावहारिक भाषा का प्रयोग किया गया है । (4) पुनरुक्तिप्रकाश , अनुप्रास अलंकारों के सहज प्रयोजन ने भाव – सौन्दर्य की और वृद्धि कर दी है ।

कुछ कविताएँ भाव – सारांश 

अभिमन्यु अनन्त अपने समय के परिवर्तनों को बड़ी गहराई से देखते हैं । ‘नयी सभ्यता’ कविता में उन्होंने टूटती हुई परम्पराओं के प्रति चिन्ता व्यक्त की है । वे नवीनता को सोझ – समझकर स्वीकार करने का संकेत करते हैं । ‘ तृप्ति ‘ कविता में किसानों के शोषण के प्रति आक्रोश व्यक्त किया गया है । किसान द्वारा पसीना बहाकर उगाई गई फसल से किसी और की तिजोरी भरती है , यह नितान्त असहनीय है इसीलिए श्रम उग्र हो उठता है । नियति पर करारा प्रहार करती ‘ खाली पेट ‘ कविता गरीबी का सटीक चित्रण है ।

 

कुछ कविताएँ सन्दर्भ, प्रसंग सहित पद्यांशों की व्याख्या 

 

(1) नयी सभ्यता

कल हमारी कुटियों में बिन पूछे

तूफान दाखिल हो जाते थे

आज हमारे घरों में बिन दरवाजे खटखटाये

जो चले आ रहे हैं।

उनसे हमारी दीवारें और छतें नहीं

हमारी बुनियाद चरमरा रही है।

शब्दार्थ – 

कुटियों = झोंपड़ियों , घरों । दाखिल = घुस आते , प्रवेश करते । बुनियाद = नींव । चरमरा चटक , जर्जर । 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्य हमारी पाठ्य – पुस्तक के विविधा ‘ पाठ की ‘ नयी सभ्यता ‘ कविता से अवतरित है । इसके कवि अभिमन्यु अनन्त ‘ हैं । 

प्रसंग – 

यहाँ पर अतीत की परम्पराओं के टूटने पर गहरी चिन्ता व्यक्त की गई है । 

व्याख्या – 

अतीत में हुए बर्बर आक्रमणों की ओर ध्यान खींचते हुए कवि कहता है कि एक समय ऐसा था जब हमारे निवासों में आक्रमणकारी तूफान की तरह घुस आते थे और हमारी संस्कृति को नष्ट करते थे । आज स्थिति यह है कि बाहरी संस्कृति एवं सभ्यता सजग किये बिना हमारे अन्दर प्रवेश कर रही है । इससे हमारी पुरानी सुदृढ़ सभ्यता की नींव चटक रही है । ऐसी स्थिति में सोच – विचार कर नवीनता को स्वीकार करने की आवश्यकता है । 

विशेष – 

(1) सभ्यता और संस्कृति पर हो रहे आक्रमणों से सजग किया गया है । (2) सरल , सुबोध किन्तु भाव की अभिव्यक्ति में समर्थ खड़ी बोली का प्रयोग हुआ है । (3) दाखिल , बुनियाद आदि शब्दों को अपनाया गया है । (4) विनोक्ति , अनुप्रास अलंकारों का स्वाभाविक प्रयोग हुआ है । 

 

(2) तृप्ति

माथे की श्रम बूंदों को

खेत में पहुँचाकर मजदूर ने बो दिया।

लहलहाती फसल जब तैयार हुई

उन हरे-भरे दानों को किसी और ने

तिजोरी के लिए बटोर लिया

इसीलिए आक्रोश में आकर

मजदूर सूरज को निगल गया।

शब्दार्थ – 

श्रम = मेहनत । बटोर = समेट । आक्रोश – क्रोध ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत ‘ तृप्ति ‘ कविता हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘ विविधा ‘ पाठ से ली गयी है । इसके रचयिता अभिमन्यु अनन्त हैं । 

प्रसंग – 

इस कविता में किसान की मेहनत के शोषण पर आक्रोश प्रकट किया गया है 

व्याख्या – 

किसान ने अपना पसीना बहाकर खेतों की जुताई आदि की , उसने मेहनत से अपने खेतों में बीज बोया है किन्तु जब किसान के परिश्रम से फसल तैयार हुई तो उसके अन्न आदि को शोषण करने वाले साहूकार उठा ले गये । उसे ऊँचे दामों में बेचकर अपनी तिजोरी में समेट लिया । इस अन्याय से मजदूर क्रोधित हो उठा और उसने साहूकार रूपी सूरज को निगल लिया अर्थात् उसके अस्तित्व को ही समाप्त कर दिया । 

विशेष – 

(1) मजदूर के शोषण के प्रति तीव्र आक्रोश व्यक्त हुआ है । (2) सरल , सुबोध व्यावहारिक खड़ी बोली का प्रयोग हुआ है । (3) प्रगतिवादी दृष्टिकोण । 

 

(3) 

खाली पेट तुमने आदमी को खाली पेट दिया ठीक किया । पर एक प्रश्न हैरे नियति ! खाली पेट वालों को तुमने घुटने क्यों दिए ? फैलने वाला हाथ क्यों दिया ?

शब्दार्थ – 

नियति = भाग्य , प्रकृति ।

सन्दर्भ – 

यह पद्य हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘ विविधा ‘ पाठ की ‘ खाली पेट ‘ कविता से अवतरित है । इसके कवि अभिमन्यु अनन्त हैं 

प्रसंग – 

गरीबी की विडम्बना को उजागर करने वाली इस कविता में नियति के प्रति आक्रोश भरा है । 

व्याख्या – 

व्यंग्यात्मक लहजे में कवि कहता है कि हे नियति ! तुमने यह बहुत ठीक किया है कि गरीब को पेट भरने के साधन नहीं दिए , उसे खाली पेट रहने की विवशता प्रदान कर दी किन्तु मैं पूछना चाहता हूँ कि जिनको तुमने खाली पेट दिया है उनको भूखे पेट में फँसाने के लिए घुटने क्यों दिए और माँगने को , दूसरों के सामने फैलाने के लिए हाथ क्यों प्रदान किये । अच्छा था वह भूखे पेट अपने को समाप्त कर लेता । 

विशेष – 

(1) गरीबी की विडम्बना का स्वाभाविक अंकन । (2) नियति पर तीखा व्यंग्य । (3) सरल , सुस्पष्ट परन्तु गहरी भावानुभूति को प्रकट करने वाली सशक्त खड़ी बोली का प्रयोग हुआ है । (4) प्रगतिवादी दृष्टिकोण ।

त्रिलोचन कवि परिचय 

जीवन परिचय – 

हिन्दी के आधुनिक काल के कवियों में प्रतिष्ठित कवि त्रिलोचन का जन्म 20 अगस्त , सन् 1917 को उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले के चिरानी पट्टी – कटघरापट्टी स्थान पर हुआ था । आपने परिश्रमपूर्वक अपनी शिक्षा पूरी की तथा अध्यापन करने लगे । आप हिन्दी , अंग्रेजी , संस्कृत , उर्दू आदि भाषाओं के ज्ञाता थे । त्रिलोचन ने अंग्रेजी के प्रवक्ता के रूप में नेशनल इण्टर कॉलेज , जौनपुर में कार्य किया । आप अपने स्वभाव के अनुरूप दूसरों का सहयोग करने में लगे रहे । आपने विदेशी छात्रों को हिन्दी , उर्दू और संस्कृत पढ़ायी । त्रिलोचन ने कुछ वर्षों तक दिल्ली विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में चलने वाली हिन्दी – उर्दू द्विभाषिक कोश परियोजना में भी कार्य किया । आप सागर विश्वविद्यालय में मुक्तिबोध सृजनपीठ के अध्यक्ष भी रहे । आप 9 दिसम्बर , सन् 2007 को इस संसार से सदैव के लिए विदा हो गए ।

रचनाएँ –

(1) धरती

(2) दिगन्त

(3) गुलाब और बुलबुल

(4) शब्द

(5) ताप के तापे हुए दिन

(6) उस जनपद का कवि हूँ 

(7) तुम्हें सौंपता हूँ। साहित्य अकादमी ने आपको

काव्यगत विशेषताएँ 

(अ) भावपक्ष (भाव तथा विचार) -सहज अनुभूति को सरल अभिव्यक्ति प्रदान करने में कुशल त्रिलोचन के विषय अपने आसपास से ही लिए गए हैं । लोक – जीवन में उनका मन खूब रमा है , इसलिए जन – जीवन की जितनी सहज , स्वाभाविक प्रस्तुति आपके काव्य में हुई है उतनी अन्यत्र दुर्लभ है । 

(आ) कलापक्ष (भाषा तथा शैली) -चमत्कार , बनावटीपन तथा दुरूहता से मुक्त त्रिलोचन के काव्य का कलापक्ष अत्यन्त सरल , सुस्पष्ट और प्रभावी है । उन्होंने व्यावहारिक भाषा को महत्व दिया है । वे अलंकारों का सहज प्रयोग करते हैं । प्रतीक और बिम्ब भी उन्होंने लोक – जीवन से ही लिए हैं ! 

साहित्य में स्थान – 

आधुनिक काल के वरिष्ठ कवियों में प्रतिष्ठित त्रिलोचन का लोक जीवन से गहरा जुड़ाव रहा है , उनके काव्य में वह साकार हो उठा है । अपनी सरलता , सहजता , सपाटबयानी तथा सुस्पष्टता के लिए वे चिरकाल तक स्मरण किये जायेंगे । आधुनिक काल के रचनाकारों में त्रिलोचन का महत्वपूर्ण स्थान है ।

 

अभिमन्यु अनन्त कवि परिचय 

जीवन परिचय – 

अभिमन्यु अनन्त का जन्म 9 अगस्त , 1937 को त्रिओले , मॉरीशस में हुआ । आपके पूर्वज वर्षों पहले भारत से मॉरीशस चले गये थे , परन्तु उनके मन – मानस में भारत ही रचा बसा है । बालक अभिमन्यु पर भी उनके माता – पिता के भारत प्रेम का पूरा – पूरा प्रभाव रहा आपकी साहित्य साधना का प्रारम्भ किशोरावस्था से ही हो गया । आपने हिन्दी में रचनात्मक लेखन के साथ पत्रिकाओं , पुस्तकों के सम्पादन का भी कार्य किया है । आपकी हिन्दी सेवा के लिए उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान , हिन्दी अकादमी आदि ने आपको पुरस्कृत किया है । अभिमन्यु अनन्त आज भी साहित्य सृजन में संलग्न हैं । 

रचनाएँ –

(1) लाल पसीना

(2) गाँधी जी बोले 

(3) और नदी बहती रही

(4) एक बीघा प्यार

(5) आन्दोलन

(6) जम गया सूरज

(7) चुन – चुन चुनाव 

काव्यगत विशेषताएँ 

(अ) भावपक्ष (भाव तथा विचार) – सामाजिक चेतना के क्रान्तिवाहक अभिमन्यु अनन्त के साहित्य में जनमानस की समस्याएँ , उसका दर्द बड़े मार्मिक रूप में उभरा है । सामाजिक विषमता ने आपको अन्दर तक छुआ है । उनमें शोषण के प्रति आक्रोश है । प्रगतिशील विचारों से ओत – प्रोत अनन्त के काव्य में आसपास की हलचलों को प्राचीन परिवेश के पुट के साथ प्रभावशाली ढंग से रखा गया है । 

(आ) कलापक्ष (भाषा तथा शैली) – सरल , सहज किन्तु प्रभावी भाषा में अभिमन्यु अनन्त ने गम्भीर विषयों को अभिव्यक्त किया है । नवीन उपमानों , प्रतीकों का प्रयोग आपके काव्य में हुआ है । चमत्कार तथा आडम्बर से युक्त अनन्त के काव्य में अलंकारों का स्वाभाविक प्रयोग पाठकों को आकर्षित करता है । 

साहित्य में स्थान – 

हिन्दी की समृद्धि में सक्रिय विश्व के रचनाकारों में मॉरीशस के रचनाकारों का विशेष महत्वपूर्ण स्थान है । वे अपना उत्स भारत में देखते हैं । भारत का समृद्ध अतीत उन्हें गौरवान्वित करता है । अभिमन्यु अनन्त उन्हीं प्रबुद्ध रचनाकारों में से एक हैं जिन्होंने अपनी साधना के द्वारा हिन्दी के भण्डार को सम्पन्न किया है । आधुनिक युग के हिन्दी प्रवासी रचनाकारों में अभिमन्यु अनन्त का स्थान उत्कृष्ट है ।

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