MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions पद्य Chapter 6 शौर्य और देश प्रेम

Chapter 6 शौर्य और देश प्रेम

वीरों का कैसा हो वसंत? (सुभद्राकुमारी चौहान)

उद्बोधन (रामधारी सिंह दिनकर)

MP Board Class 10th Hindi Solutions पद्य Chapter 6 शौर्य और देश प्रेम

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शौर्य और देश प्रेम अति लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1. 

सभी दिशाएँ क्या पूछ रही हैं ? 

उत्तर – 

सभी दिशाएँ पूछ रही हैं कि वीरों का बसन्त कैसा हो ? 

प्रश्न 2. 

किसके अंग – अंग पुलकित हो रहे हैं ? 

उत्तर – 

वसुधा रूपी वधू के अंग – अंग पुलकित हो रहे हैं । 

प्रश्न 3. 

बसन्त के आने पर कौन तान भरने लगती है । 

उत्तर – 

बसन्त के आने पर कोयल तान भरने लगती है । 

प्रश्न 4. 

कवि ‘ दिनकर ‘ चट्टानों की छाती से क्या निकालने के लिए कह रहा है ?

उत्तर – 

कवि ‘ दिनकर ‘ चट्टानों की छाती से दूध निकालने के लिए कह रहा है । 

प्रश्न 5. 

कवि ‘ दिनकर ‘ के अनुसार मनुष्य का भीतरी गुण क्या है ? 

उत्तर – 

कवि ‘ दिनकर ‘ के अनुसार मनुष्य का भीतरी गुण स्वातन्त्र्य है । 

प्रश्न 6. 

भ्रामरी किसका अभिनन्दन करती है ? 

उत्तर – 

भ्रामरी उसका अभिनन्दन करती है जिसके सिर पर असिंघात का रक्त चन्दन लगा होता है । वीरता ही नारी के आकर्षण का केन्द्र होती है ।

शौर्य और देश प्रेम लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1.

‘ऐ कुरुक्षेत्र ! अब जाग – जाग ‘ से कवि का क्या आशय है ? 

उत्तर – 

कुरुक्षेत्र में महाभारत का युद्ध हुआ था । वहाँ कौरवों और पाण्डवों की ओर से कितने ही वीर युद्ध करते हुए मारे गये थे । सारे भारत में हाहाकार मच गया था । इस युद्ध में पारिवारिक , सांस्कृतिक तथा सामाजिक सभी प्रकार से देश का पतन हुआ था । जन – धन आदि की अपार हानि हुई थी । कवयित्री सुभद्राकुमारी चौहान ने युद्ध के उन्हीं दुष्परिणामों की ओर संकेत करके कहा है कि महाभारत के युद्ध – स्थल कुरुक्षेत्र अब जाग जा और अपने घातक अनुभवों को बता दे । ताकि व्यक्ति तेरे अनुभवों को सुनकर स्वयं को सुधार सकें और स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष करें । 

प्रश्न 2. 

सिंहगढ़ दुर्ग एवं हल्दी घाटी में किसकी याद छिपी है ? 

उत्तर – 

राजस्थान वीरों की भूमि रही है यहाँ अनेक ऐसे वीर हुए हैं जिन्होंने राष्ट्रहित में अपना तन, मन, धन तथा सर्वस्व गँवाया है । सिंह की प्रचण्ड दहाड़ लगाने वाले सिंहगढ़ के तानाजी और हल्दी घाटी का ऐतिहासिक युद्ध लड़ने वाले राणा प्रताप उन्हीं वीरों में से है । अकबर उसे मुगल शासक की नाक में दम करने की क्षमता रखने वाले राणा प्रताप और तानाजी आज के युवकों की प्रेरणा के स्रोत बन सकते हैं । इन्होंने स्वतन्त्रता के लिए जीवन – पर्यन्त संघर्ष किया । आज भी स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिए यह संघर्ष एवं बलिदान आवश्यक है । 

प्रश्न 3. 

विजयी के सदृश्य बनने के लिए कवि ‘ दिनकर ‘ क्या – क्या करने को कह रहा है ? 

उत्तर – 

रामधारीसिंह ‘ दिनकर ‘ ओज के कवि हैं । वे मानते हैं कि व्यक्ति को अपने बाहुबल से ही सब कुछ पाकर वीरतापूर्ण जीवन जीना चाहिए । व्यक्ति को वैराग्य त्यागकर अपने भुजबल से कठोर चट्टानों को तोड़कर जीवन रस दूध निकालना चाहिए । उसे चन्द्रमा के अमृत को निचोड़कर सोम रस पीना चाहिए और ऊँचाइयों पर पहुँचकर जीवन के आनन्द को पाना चाहिए । इस तरह की वीरतापूर्ण सफलताएँ प्राप्त करके उसे विजयी सदृश्य बनना चाहिए । 

प्रश्न 4. 

स्वाधीन जगत में कौन जीवित रह सकता है ?

उत्तर – 

यद्यपि स्वतन्त्रता मानव का जन्मसिद्ध अधिकार है किन्तु यह उसी जाति या व्यक्ति को मिल पाती है जो स्वाभिमानपूर्वक बड़े से बड़े संकट का सामना करता है । स्वतन्त्रता मनुष्य का भीतरी गुण है जो जाति बिना झुके हुए वज्राघात को सहती है । कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी झुकने का नाम नहीं लेती है और हर समय संघर्ष को तैयार रहती है वही जाति स्वाधीन जगत में जीवित रह सकती है । 

प्रश्न 5. 

जीवन की परिभाषा क्या है ? कवि ‘ दिनकर ‘ के विचारों को लिखिए । 

उत्तर – 

गतिशीलता ही जीवन है और गतिहीन होना मृत्यु । इसलिए व्यक्ति को निरन्तर चलते रहना चाहिए । ‘ दिनकर ‘ जी का मानना है कि व्यक्ति गतिशील रहता है तो संकट आते हैं , बाधाएँ आती हैं एवं उनसे कष्ट भी होता है , व्याकुलता भी होती है किन्तु उससे घबराने की बजाय उनको हल करते हुए आगे बढ़ना ही जीवन है । धर्म निग्रह और शान्ति का उपदेश देकर मनुष्य के साथ धोखा करता है । वास्तव में जीवन प्रगति की लहरों की गर्जना है , सतत् गतिमान रहना है । अत : हमें अपनी सक्रियता को बनाए रखना है । 

प्रश्न 6. 

कवि ‘ दिनकर ‘ ने वीरता के कौन – से लक्षण बताये हैं ? 

उत्तर – 

कवि रामधारीसिंह ‘ दिनकर ‘ स्वाभिमानपूर्वक जीने के हिमायती हैं । उन्हें याचक या विनय वृत्ति स्वीकार नहीं है । वीरता को वे मनुष्य का गौरव मानते हैं और बड़े से बड़े संकट में निर्भीक रहकर संघर्ष करने का समर्थन करते हैं । उनके इच्छानुसार वीरता के दो लक्षण ये हैं (1) वीरता को छोड़कर अन्यायी के पैर न पकड़ना तथा (2) जो भी संकट आ पड़े , उसकी पीड़ा को स्वयं ही सहना । इन गुणों वाला वीर पुरुष ही महानता को प्राप्त करता है । 

शौर्य और देश प्रेम दीर्घ उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1. 

कवयित्री सुभद्राकुमारी चौहान वीरों के लिए किस तरह बसन्त का आयोजन करना चाहती हैं 

उत्तर – 

सुभद्राकुमारी चौहान वीरों के बसन्त आयोजन में प्राकृतिक उल्लास के साथ – साथ सम्मान और स्वाभिमान का भाव देखना चाहती हैं । चारों ओर सरसों फूल रही हो , पृथ्वी रूपी वधू का अंग – प्रत्यंग रोमांचित हो रहा हो । माधुर्य लेकर कामदेव आया हो । इस प्रकार के मनोरम वातावरण में भी पति वीरता के क्षेत्र में हो ऐसा बसन्त का आयोजन हो । इधर प्रकृति में मनोरम वातावरण हो । कोयल कुहक रही हो , मारू बाजे पर गीत हो रहे हों । ऐसे राग – रंग के समायोजन मैं सभी के मिलन का आनन्द छाया हो । वीरों को प्रेरक चरित्र उल्लसित करते रहें ताकि वे अपने अभिमान में आनन्द के साथ आगे बढ़ते जायें । राणा प्रताप का वीरतापूर्ण संघर्ष , तानाजी की दहाड़ युवाओं को उत्साहित करे । भूषण एवं चन्दरबरदाई जैसे वीर काव्य के ओजस्वी कवि प्रेरणा दें । लंका दहन का कारण याद रहे तथा महाभारत की घटनाएँ व उसके परिणाम बोध प्रदान करें । सभी प्रकार की सूझ – बूझ और शक्ति के द्वारा वीरों के आनदोत्सव बसन्त का आयोजन किया जाय । 

प्रश्न 2. 

बसन्त उत्सव के लिए प्रेरक पंक्तियों का उल्लेख कीजिए । 

उत्तर – 

सुभद्राकुमारी चौहान वीर रस की ओजस्वी कविता लिखने वाली महान कवयित्री र्थी । उन्होंने ‘ वीरों का कैसा हो बसन्त ? ‘ कविता में बसन्त उत्सव के प्रति प्रेरित करते हुए लिखा है कि बसन्त की प्रभा प्रकृति में सभी तरफ हैं ‘ फूली सरसों ने दिया रंग , न मधु लेकर आ पहुँचा अनंग , वधू – वसुधा पुलकित अंग – अंग , हैं वीर देश में, किन्तु कंत ।। ‘ बसन्त के समय कोयल का कुहकना , मारू बाजे पर गान आदि का विधान उत्साहित करने वाला होता है । इसी ओर संकेत देखा जा सकता है भर रही कोकिला इधर तान , ‘ मारू बाजे पर उधर गान , है रंग और रण का विधान , मिलने आए हैं आदि – अंत , वीरों का कैसा हो बसन्त ? ‘ इस प्रकार आनन्द के साथ प्रोत्साहन की प्रेरणा कवयित्री ने बसन्त के उत्सव के माध्यम से दी है । 

प्रश्न 3. 

कवि ‘दिनकर ‘ के अनुसार जब अहंपर चोट पड़ती है तब उसकी प्रतिक्रिया क्या होती है ?

उत्तर – 

कवि ‘ दिनकर ‘ मानते हैं कि स्वाभिमानी व्यक्ति अपने बल पर आगे बढ़ता है । यदि कभी भाग्य के विधान से उसके स्वाभिमान पर कोई प्रहार करता है तो वह घबराता नहीं है अपितु अपनी क्षमता का विस्तार करके उसका सामना करता है । उसके सम्मानजनक समाधान खोजता है । इस प्रकार उसकी शक्ति , साधन आदि बढ़ते हैं । उसमें संघर्षशील होने की नई शक्ति आती है । मनुष्य पर जब भी भयंकर संकट आता है तब वह कठिन परिस्थितियों से संघर्ष करने को प्रोत्साहित होता है । इस व्यक्तित्व का विकास चोटें खाकर ही होता है । स्वाभिमानी व्यक्ति चोटों से घबराता नहीं है अपितु साहसपूर्वक उनका मुकाबला करता है ।

प्रश्न 4. 

स्वतन्त्रता प्रेमी जाति के गुणों का वर्णन कीजिए ।

उत्तर – 

प्रत्येक जाति तथा व्यक्ति स्वतन्त्रता चाहता है । कोई भी परतन्त्र रहना नहीं चाहता है । स्वतन्त्रता की रक्षा में जाति को विविध प्रकार के आघात सहने पड़ते हैं । जो जाति इन आषातों , संकटों से घबरा जाती हैं और दूसरों के सामने झुक जाती है , उसकी स्वतन्त्रता समाप्त हो जाती है । किन्तु जो जाति स्वतन्त्रता प्रेमी होती है वह बिना झुके हुए कठोर वज्राघात सहन करती है । सभी संकटों का सामना करते हुए वह अपनी स्वतन्त्रता बनाए रखती है । संघर्षशील जाति ही स्वाधीन जगत में विचरण करती है । 

प्रश्न 5. 

रौद्र रस को समझाते हुए वीर एवं रौद्र रस में अन्तर स्पष्ट कीजिए । 

उत्तर – 

शत्रु या दुष्ट जन द्वारा किए गए अत्याचारों या गुरुजन की निन्दा आदि से उत्पन्न क्रोध स्थायी भाव , विभाव , अनुभाव तथा संचारी के संयोग से पुष्ट होकर रौद्र रस के रूप में परिणत होता है वीर एवं रौद्र रस में अन्तर – 

(1) वीर रस का स्थायी भाव उत्साह होता है जबकि रौद्र रस का स्थायी भाव क्रोध है । 

(2) दोनों के आलम्बन, अनुभाव, संचारी भाव आदि में अन्तर होता है । 

प्रश्न 8. 

अन्योक्ति अलंकार की उदाहरण सहित परिभाषा कीजिए । 

उत्तर – 

प्रस्तुत कथन के द्वारा अप्रस्तुत का बोध हो वहाँ अन्योक्ति अलंकार होता है । 

उदाहरण – 

नहिं पराग नहिं मधुर मधु , नहिं विकास एहि काल । अली कली ही सौ बिंध्यौ , आगे कौन हवाल ।।

वीरों का कैसा हो वसन्त भाव सारांश 

प्रेरक उद्बोधन गीतों की रचनाकार सुभद्राकुमारी चौहान ने इस गीत में वीर भावना का बासन्ती रूप अंकित किया है । वे कहती हैं – चारों ओर से एक ही प्रश्न उठ रहा है कि वीरों का बसन्त किस प्रकार का हो ? हिमालय पर्वत , सागर , धरती , आकाश और सभी दिशाओं में यही प्रश्न गूंज रहा है । चारों ओर बसन्त का साम्राज्य है । सरसों फूल रही है । सब तरफ पीला रंग फैला । हुआ है । नारी के नयन में कामदेव की चंचलता है । ऐसी अवस्था में वीर – वेश में सजा हुआ कन्त किसका वरण करे । वह मधुमय वातावरण में डूब जाय या देश के ऊपर प्राण न्यौछावर कर दे । आज कवि भाव प्रकट करने के लिए स्वच्छन्द नहीं है । भूषण या चन्द की तरह वीर या रौद्र काव्य लिखने की शक्ति आज उसमें नहीं है । प्राचीन इतिहास ही हमारा साक्ष्य है । हल्दीघाटी , कुरुक्षेत्र और सिंहगढ़ के प्रचण्ड युद्ध आज भी स्थिति स्पष्ट कर रहे हैं । अतीत की ये घटनाएँ ही इसका उत्तर हैं । इस तरह कवयित्री प्रोत्साहन देती हैं कि संकटकाल में हमें विलासिता त्यागकर देश – सेवा में जुट जाना चाहिए ।

वीरों का कैसा हो वसन्त संदर्भ प्रसंग सहित पद्यांशों की व्याख्या

(1) वीरों का कैसा हो वसन्त ?

आ रही हिमालय से पुकार,

है उदधि गरजतां बार-बार

प्राची,पश्चिम,भू,नभ,अपार,

सम पूछ रहे हैं, दिग् दिगन्त

वीरों का कैसा हो वसन्त ?

शब्दार्थ – 

उदधि = सागर । प्राची = पूर्व दिशा । अपार = विस्तृत । दिग् – दिंगत दिशाएँ । अनंग = कामदेव । वसुधा = धरती । पुलकित = रोमांचित । कंत = पति ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘शौर्य और देश – प्रेम’ पाठ के वीरों का कैसा हो बसन्त ? शीर्षक से अवतरित है । इसकी रचयिता सुभद्राकुमारी चौहान हैं । 

प्रसंग – 

इस अंश में वीरों के बसन्त के विषय में प्रश्न करते हुए युवाओं को सजग किया गया है । 

व्याख्या – 

वीर पुरुषों का बसन्त किस प्रकार का हो यह आवाज हिमालय से सागर तक , पूर्व से पश्चिम तक विशाल पृथ्वी और आकाश में गूंज रही है । समस्त दिशाएँ पूछ रही हैं कि वीरों का बसन्त कैसा हो । चारों ओर फूल उठी सरसों ने जो रंग बिखेर दिया है , उससे मधुर मधु लेकर कामदेव आ गया है । पृथ्वी रूपी वधू का प्रत्येक अंग रोमांचित हो रहा है लेकिन उसका पति वीरों के देश में है । वह जानना चाहती है कि वीरों का बसन्त कैसा होता है ? 

विशेष – 

(1) भावानुरूप प्रवाहवान भाषा का प्रयोग है । (2) अनुप्रास , पुनरुक्तिप्रकाश , रूपक अलंकार है । (3) रस – वीर ( स्थायी भाव – उत्साह ) । (4) गीत शैली ।

 

(2) फूली सरसों ने दिया रंग,

मधु लेकर आ पहुँचा अनंग,

वधू-वसुधा पुलकित अंग-अंग

हैं वीर देश में, किन्तु कंत

वीरों का कैसा हो वसन्त?

 

(3) भर रही कोकिला इधर तान,

मारू बाजे पर उधर गान,

है रंग और रण का विधान,

मिलने आए हैं आदि-अंत

वीरों का कैसा हो वसंत?

शब्दार्थ – 

मारू बाजा = युद्ध के समय बजाये जाने वाला बाजा । विधान = आयोजन । कृपाण = तलवार । गलबाँहें = गले में पड़ी बाँहें , आलिंगनबद्ध । चल – चितवन = तिरछी निगाहें । रस विलास = आनन्दमय विलास । त्राण = मुक्ति । दुरन्त = भयानक ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘शौर्य और देश – प्रेम’ पाठ के वीरों का कैसा हो बसन्त ? शीर्षक से अवतरित है । इसकी रचयिता सुभद्राकुमारी चौहान हैं । 

प्रसंग – 

इस अंश में संकेत दिया गया है कि जब राष्ट्र को आवश्यकता हो तो राग – रंग , विलास आदि छोड़कर वीरों को युद्ध का वरण करना चाहिए । 

व्याख्या – 

एक ओर कोयल की मधुर तान सुनायी दे रही है तो दूसरी ओर युद्ध के मारू बाजे (रणभेरी) पर गाने की ध्वनि सुनायी दे रही है । इस प्रकार एक तरफ राग और रंग है तो दूसरी तरफ युद्ध का आयोजन है । एक में राग – रंगमय जीवन की शुरूआत है तो दूसरे ( युद्ध में मरण ) में अन्त । अत : वीरों को इन दो पहलुओं में से किसी एक का चुनाव करना है । वीरों के लिए मृत्यु श्रेयस्कर है या विलास , इसका निर्णय तो वे स्वयं ही करेंगे । आज परतन्त्र भारत के सामने यह एक कठिन समस्या है कि देश के नवयुवकों के कण्ठों में प्रेयसियों की बाँहें हों अथवा हाथ में तलवार की चुनौती हो , वे युवतियों की तीखी दृष्टि से बिधे या धनुष – बाण से , उनके जीवन में विलास हो अथवा दीन – दुखियों की मुक्ति का संकल्प । आज इन दोनों में से किसी एक का चुनाव करने की कठिन समस्या है । वीरों को इनमें से किसी एक को चुनकर अपने जीवन का बसन्त मनाना होगा । 

विशेष – 

(1) भाषा सरल , सरस , सुबोध , प्रवाहपूर्ण एवं भावानुकूल है । (2) विलास एवं युद्ध दोनों पक्षों का बड़ा ही सजीव चित्रण किया गया है । (3) प्रतीकात्मकता का प्रयोग है । (4) रस – वीर ( स्थायी भाव उत्साह ) । (5) गीत शैली । 

 

(5) कह दे अतीत! अब मौन त्याग,

लंके! तुझमें क्यों लगी आग?

ऐ कुरुक्षेत्र! अब जाग, जाग,

बतला अपने अनुभव अनंत,

वीरों का कैसा हो वसंत?

शब्दार्थ – 

अतीत = भूतकाल , प्राचीन समय । मौन = मूक , चुप । अनंत = अन्त रहित , अनेक । शिलाखंड = पत्थर के टुकड़े । दुर्ग = किला । प्रचंड = तेज । ज्वलन्त = जलती हुई , प्रज्ज्वलित 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘शौर्य और देश – प्रेम’ पाठ के वीरों का कैसा हो बसन्त ? शीर्षक से अवतरित है । इसकी रचयिता सुभद्राकुमारी चौहान हैं । 

प्रसंग – 

यहाँ पर अतीत का सन्दर्भ देते हुए स्वतन्त्रता संघर्ष में कूद पड़ने की प्रेरणा दी गयी है । 

व्याख्या – 

हे इतिहास ! आज तू मौन को छोड़कर , मुखर बन जा और बता दे कि रावण की लंका में आग क्यों लगी ? महाभारत के युद्ध स्थल कुरुक्षेत्र ! अब तू जागकर युद्ध के अपने अगणित अनुभवों को बता दे । भाव यह है कि आज महाभारत जैसे युद्ध की पुन : आवश्यकता है । वीरों को अपने जीवन का बसन्त किस प्रकार मनाना चाहिए , यह कुरुक्षेत्र में हुए महाभारत के युद्ध के अनुभव से जाना जा सकता है । हल्दी – घाटी के अवशेष शिलाखण्ड ( पत्थर के टुकड़े ) और सिंह जैसी प्रचण्ड दहाड़ के समान सिंहगढ़ के किले दोनों ही आज राणाप्रताप और तानाजी जैसे अजेय वीरों का स्वाभिमान बता रहे हैं । अतीत की गरिमामय ज्वलन्त याद को एक बार पुनः जगाने की आवश्यकता है । उन स्मृतियों के माध्यम से परतन्त्र देशवासियों को बताना है कि वीरों के जीवन का बसन्त कैसा होता 

विशेष – 

(1) अलंकार – मानवीकरण , अनुप्रास , स्मरण । (2) उक्त अंश ओज गुण एवं वीर रस से युक्त है । (3) रस – वीर ( स्थायी भाव – उत्साह ) । (4) गीत – शैली । 

 

(7) भूषण अथवा कवि चन्द नहीं,

बिजली भर दे वह छन्द नहीं

है कलम बँधी, स्वच्छन्द नहीं

फिर हमें बतावै कौन? हंत!

वीरों का कैसा हो वसन्त?

शब्दार्थ – 

भूषण = रीतिकाल के वीर रस के कवि । चन्द = चन्दबरदाई , पृथ्वीराज चौहान के दरबारी कवि । छन्द कविता । स्वच्छन्द – स्वतन्त्र । हंत = खेद ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘शौर्य और देश – प्रेम’ पाठ के वीरों का कैसा हो बसन्त ? शीर्षक से अवतरित है । इसकी रचयिता सुभद्राकुमारी चौहान हैं ।  

प्रसंग – 

यहाँ अतीत के वीर रस के कवियों को उद्धृत करते हुए स्वतन्त्र अभिव्यक्ति की प्रेरणा दी गई है ।

व्याख्या – 

आज भारतवर्ष में वीर रस के प्रसिद्ध कवि भूषण अथवा चन्दबरदाई जैसे महाकवि नहीं हैं । आज ऐसे छन्दमय काव्य भी नहीं हैं जो देशवासियों में बिजली की शक्ति एवं चंचलता भर सकें । परतन्त्र भारत में लेखनी पर भी प्रतिबन्ध लगा हुआ है , वह भी लिखने के लिए स्वतन्त्र नहीं हैं । ऐसी खेदजनक स्थिति में हमें कौन मार्ग बताये ? हमें यह भी कौन बताये कि वीरों का बसन्त किस प्रकार का हो ? 

विशेष – 

(1) सरल , सुबोध एवं प्रवाहवान भाषा । (2) अनुप्रास अलंकार का सुन्दर प्रयोग है । (3) रस – वीर । (4) गीत शैली ।

उद्बोधन भाव सारांश 

राष्ट्रीय चेतना के ओजस्वी कवि रामधारीसिंह ‘ दिनकर ‘ ने अपने काव्य के माध्यम से जन – जागरण का सन्देश दिया है । ‘ उद्बोधन ‘ कविता में आत्म – गौरव के प्रति सजग किया गया है । ‘ दिनकर ‘ कहते हैं कि वैराग्य त्यागकर अपने बाहुबल से सफलता प्राप्त करो । एकान्तवास करने वाले योगियों की तरह न होकर बड़ी से बड़ी उपलब्धि प्राप्त करो और हर क्षेत्र में विजयी बनो । अपनी आन और शान के लिए संघर्ष करो , प्राणों का बलिदान करो पर झुको मता वज्राघात सहकर ही स्वतन्त्रता प्राप्त होती है । अत : वीरता का त्याग किए बिना मृत्यु के मुख में जाने से मत डरो । व्यक्ति संकटों में ही संघर्ष करना सीखता है , इसलिए आघातों से मत घबराओ । विनम्रता भी वीरता के आलोक में शोभा पाती है । दुष्टों के दमन से ही मानवता का मार्ग खुलता है । गतिशीलता का नाम ही जीवन है इसलिए हर प्रकार की बाधा को पार करते हुए बढ़े चले जाओ । आत्म – गौरव सर्वोपरि है , अत : उसकी सुरक्षा मानव का कर्तव्य है । 

 

उद्बोधन सन्दर्भ, प्रसंग सहित पद्यांशों की व्याख्या

(1) वैराग्य छोड़कर बाँहों की विभा सँभालो,

चट्टानों की छाती से दूध निकालो।

है रुकी जहाँ भी धार, शिलाएँ तोड़ो,

पीयूष चन्द्रमाओं को पकड़ निचोड़ो।

चढ़ तुंग शैल-शिखरों पर सोम पियो रे!

योगियों नहीं, विजयी की सदृश जियो रे!

शब्दार्थ – 

वैराग्य = वीतराग , लगाव रहित । विभा = आभा । शिलाएँ = पत्थर । पीयूष अमृत । तुंग = ऊँचे । शैल – शिखरों = पर्वत चोटियों । सोम = सोम रस । सदृश = समान ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘ शौर्य और देश – प्रेम ‘ पाठ के उद्बोधन ‘ शीर्षक से लिया गया है । इसके रचयिता रामधारीसिंह ‘ दिनकर ‘ हैं । 

प्रसंग – 

इसमें व्यक्ति को अपने बाहुबल पर विजयी बनने की प्रेरणा दी गई है । 

व्याख्या – 

दिनकर कहते हैं कि मनुष्य को वीतराग का भाव त्यागकर अपनी भुजाओं की आभा , शक्ति को संभालना चाहिए । अपनी बाँहों के बल से चट्टानों को भेदकर दूध जैसे सुख के साधन लाने चाहिए । इसमें कहीं पर बाधा आये तो उसको तोड़कर मार्ग खोल देना चाहिए । अपनी क्षमता से चन्द्रमा से भी अमृत निचोड़ लेना चाहिए । अपनी कर्मठता और शक्ति के बल पर मनुष्य को ऊँची – ऊँची पर्वत की चोटियों पर चढ़कर सोमरस का पान करना चाहिए अर्थात् योगी की तरह नहीं विजयी के समान जीना चाहिए ।

विशेष – 

(1) शुद्ध , साहित्यिक , मुहावरेदार खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है । (2) उपमा, अनुप्रास अलंकार एवं शब्द विधान का सौन्दर्य अवलोकनीय है । (3) रस – वीर । 

 

(2) छोड़ो मत अपनी आन, सीस कट जाए,

मत झुको अनय पर, भले व्योम फट जाए।

दो बार नहीं यमराज कंठ धरता है,

मरता है जो, एक ही बार मरता है।

तुम स्वयं मरण के मुख पर चरण धरो रे!

जीना हो तो मरने से नहीं डरो रे!

शब्दार्थ – 

आन = प्रतिज्ञा , व्रत । सीस = सिर । अनय = अनीति । व्योम = आकाश । कंठ – गला , जीवन ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘ शौर्य और देश – प्रेम ‘ पाठ के उद्बोधन ‘ शीर्षक से लिया गया है । इसके रचयिता रामधारीसिंह ‘ दिनकर ‘ हैं । 

प्रसंग – 

यहाँ प्रेरणा दी गयी है कि अपनी आन के लिए प्राणों को बलिदान करने में मत हिचको । 

व्याख्या – 

मनुष्य का चाहे सिर कट जाये पर उसे अपनी आन नहीं छोड़नी चाहिए । चाहे आकाश फट जाये अर्थात् बड़े से बड़ा कष्ट आ जाये पर अनीति के सामने नहीं झुकना चाहिए , क्योंकि मृत्यु का देवता यमराज एक बार ही जीवन लेता है , मृत्यु जो निश्चित है , एक ही बार आती है । इस संसार में हर प्राणी एक ही बार मरता है । अतः मनुष्य को निर्भीक होकर अपनी आन के लिए स्वयं को मृत्यु के मुख में झोंक देना चाहिए । तभी सम्मान का जीवन जीना सम्भव है । 

विशेष – 

(1) साहित्यिक खड़ी बोली का प्रयोग हुआ है । (2) सीस कटना , व्योम फटना , चरण धरना , मुहावरों का सटीक प्रयोग हुआ है । (3) अनुप्रास अलंकार एवं पदमेत्री की छटा अवलोकनीय हैं । (4) रस – वीर । (5) ओज गुण । 

 

(3) स्वातन्त्र्य जाति की लगन, व्यक्ति की धुन है,

बाहरी वस्तु यह नहीं, भीतरी गुण है।

नत हुए बिना जो अशनि-घात सहती है,

स्वाधीन जगत् में वही जाति रहती है।

वीरत्व छोड़, पर-का मत चरण गहो रे!

जो पड़े आन, खुद ही सब आग सहो रे!

शब्दार्थ – 

स्वातंत्र्य = स्वतन्त्रता । अशनि – घात = वज्र की चोट । पर दूसरे । गहो – ग्रहण करो । आग = कष्ट , दुःख ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘ शौर्य और देश – प्रेम ‘ पाठ के उद्बोधन ‘ शीर्षक से लिया गया है । इसके रचयिता रामधारीसिंह ‘ दिनकर ‘ हैं । 

प्रसंग – 

यहाँ पर स्वतन्त्रता के लिए बड़े से बड़ा कष्ट सहने के लिए तत्पर रहने की प्रेरणा दी गई है । 

व्याख्या – 

स्वतन्त्रता को प्रत्येक जाति चाहती है और हर व्यक्ति इस प्रयास में रहता है कि वह स्वतन्त्र रहे । यह भाव बाहर की वस्तु न होकर आन्तरिक गुण है । जो जाति बिना झुके वज्राघात सहन करती है वही स्वतन्त्रता के संसार में विचरण कर पाती है इसलिए हे मनुष्य ! तुम वीरता को त्यागकर किसी भी अन्यायी के पैरों को मत छुओ और जो संकट आ पड़े उनको स्वयं सहन करो । 

विशेष – 

(1) स्वतन्त्रता मानवी गुण है तथा स्वतन्त्र रहना हर जाति तथा मानव का जन्मसिद्ध अधिकार है । (2) विनोक्ति एवं अनुप्रास अलंकार । (3) वीर – रस । (4) ओजगुण । 

 

(4) जब कभी अहं पर नियति चोट देती है.

कुछ चीज अहं से बड़ी जन्म लेती है।

नर पर जब भी भीषण विपत्ति आती है,

वह उसे और दुर्घर्ष बना जाती है।

चोटें खाकर विफरो, कुछ अधिक तनो रे!

धधको स्फुलिंग में बढ़ अंगार बनो रे!

शब्दार्थ – 

अहं = स्वाभिमान । नियति = भाग्य , विधि – विधान । भीषण = भयंकर । विपत्ति = संकट । दुर्धर्ष = कठिन । बिफरो = फैलो । स्फुलिंग = चिंगारी ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘ शौर्य और देश – प्रेम ‘ पाठ के उद्बोधन ‘ शीर्षक से लिया गया है । इसके रचयिता रामधारीसिंह ‘ दिनकर ‘ हैं । 

प्रसंग – 

यहाँ सन्देश दिया गया है कि संकटों में विचलित नहीं होना चाहिए । 

व्याख्या – 

व्यक्ति के जीवन में जब कभी भी भाग्य उसके स्वाभिमान पर चोट करता है तब उसके संघर्षशील रहने पर स्वाभिमान से भी बड़ी वस्तु उत्पन्न होती है । मनुष्य पर जब भी भयंकर संकट आता है तो कठिनाई में वह और अधिक संघर्षशील बन जाता है । इसलिए हे मनुष्य ! चोटें खाकर फैलो तथा और अधिक तनकर रहो । हे मनुष्य ! संकट में धधक करके चिंगारी से बढ़कर अंगार . बनो । 

विशेष – 

(1) संघर्षशील रहकर व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का विकास करता है । (2) अनुप्रास अलंकार तथा भावानुरूप शब्दों का चयन प्रशंसनीय है । (3) वीर रस ।

 

(5) स्वर में पावक नहीं; वृथा वन्दन है।

वीरता नहीं, तो सभी विनय क्रन्दन है;

सिर जिसके असिंघात रक्त चन्दन है।

भ्रामरी उसी का करती अभिनन्दन है।

दानवी रक्त से सभी पाप धुलते हैं।

ऊँची मनुष्यता के पथ भी खुलते हैं।

शब्दार्थ – 

पावक = आग । वृथा = व्यर्थ । असिंघात = तलवार का आघात , प्रहार । रक्त – चन्दन = खून का चन्दन । भ्रामरी = दुर्गा , भांवर । अभिनन्दन = वन्दन । दानवी = राक्षसी । पाप धुलते = पाप नष्ट होते हैं ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘ शौर्य और देश – प्रेम ‘ पाठ के उद्बोधन ‘ शीर्षक से लिया गया है । इसके रचयिता रामधारीसिंह ‘ दिनकर ‘ हैं । 

प्रसंग – 

यहाँ बताया गया है कि बिना शक्ति के श्रेष्ठ मानवता प्राप्त करना सम्भव नहीं । व्याख्या – दिनकर स्पष्ट करते हैं कि यदि वाणी में क्रोध की आग नहीं है तो किसी का वन्दन करना व्यर्थ है । बिना शक्ति के वन्दन स्वीकार न होगा । इसी प्रकार यदि व्यक्ति में वीरता नहीं है तो प्रार्थना रुदन मात्र ही है । विनय भी शक्ति वाले का ही महत्व रखती है । जो अपने सिर पर तलवार के भयंकर आघातों से निकलने वाले खून रूपी चन्दन का लेप करता है , भांवर लेने वाली उसी वीर पुरुष का स्वागत करती है । राक्षसों का खून बहाने से व्यक्ति के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और इसी से महामानव बनने के रास्ते खुलते हैं । 

विशेष – 

(1) दुष्टों का दलन करने वाला ही महामानव बनता है । (2) शुद्ध , साहित्यिक खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है । (3) रूपक , अनुप्रास अलंकार का सौन्दर्य अवलोकनीय है । 

 

(6) जीवन गति है, वह नित अरुद्ध चलता है,

पहला प्रमाण पावक का, वह जलता है।

सिखला निरोध-निज्वलन धर्म छलता है।

जीवन तरंग गर्जन है, चंचलता है।

धधको अभंग, पाल-पिवल अरुण जलो रे!

धरा रोके यदि राह, विरुद्ध चलो रे!

शब्दार्थ – 

अरुद्ध = बिना रुके , लगातार । पावक = आग । निरोध = वश में करना , निग्रह । निचलन = ताप रहित , शीतल । छलता = ठगता । अभंग = लगातार । विपल = समय का अंश । विरुद्ध विपरीत ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘ शौर्य और देश – प्रेम ‘ पाठ के उद्बोधन ‘ शीर्षक से लिया गया है । इसके रचयिता रामधारीसिंह ‘ दिनकर ‘ हैं । 

प्रसंग – 

जीवन में निरन्तर गतिशील बने रहने का सन्देश दिया गया है

व्याख्या – 

गतिशीलता का नाम ही जीवन है । इसीलिए जीवन लगातार चलता ही रहता है । गतिशीलता का प्रथम प्रयाण, जलता है । वह चलकर ही संकटों तक पहुँचता है । धर्म तो निग्रह तथा शीतलत उगता वास्तविक जीवन तो आवेग की तरंगों की गर्जन तथा चंचलता का नाम है । हे मनुष्य ! हरपल संघर्षों की आग में धधकते रहो । यदि समस्त पृथ्वी भी आकर तुम्हारा मार्ग रोके तो तुम उसके भी विपरीत चल पड़ो परन्तु अपनी गति को मत रोको । 

विशेष – 

(1) जीवन का प्रमाण गति ही है अत : इसे किसी स्थिति में रुकने नहीं देना है । (2) शुद्ध साहित्यिक भाषा का प्रयोग किया है । (3) अनुप्रास अलंकार एवं पदमैत्री की शोभा दर्शनीय है । (4) वीर रस । (5) ओजगुण ।

 

सुभद्राकुमारी चौहान कवि परिचय 

जीवन परिचय – 

राष्ट्रीय चेतना की अमर गायिका सुभद्राकुमारी चौहान का जन्म सन् 1904 में प्रयाग के निहालपुर मोहल्ले में हुआ था । बचपन में ही काव्य में रुचि के कारण पन्द्रह वर्ष की आयु में इनकी प्रथम काव्य रचना प्रकाश में आई । राष्ट्रीय आन्दोलन में सक्रिय भूमिका निर्वाह करते हुए आपको कई बार जेल यात्राएँ भी करनी पड़ी । साहित्य , परिवार और राजनीतिक जीवन की त्रिधारा से गुजरते हुए अप्रैल सन् 1948 में अल्पायु में ही आपका देहावसान हो गया । सुभद्राकुमारी चौहान मूलतः वीर रस की कवयित्री थीं । इनकी कविताओं में पारिवारिक और राष्ट्रीय जीवन के सरोकारों का सफल चित्रांकन हुआ है । 

सुभद्राजी की कविताएँ – 

‘ मुकुल ‘ और ‘ त्रिधारा ‘ में संकलित हैं । कविताओं के अतिरिक्त आपने कहानियाँ और निबंध भी लिखे हैं । बिखरे मोती ‘ और ‘ उन्मादिनी ‘ आपकी कहानियों का संकलन हैं । सुभद्राकुमारी चौहान की रचनाओं में समसामयिक देश – प्रेम , भारतीय इतिहास एवं संस्कृति की गहरी छाप पड़ी है । उन्होंने अपनी काव्य प्रतिभा से ऐतिहासिक , सांस्कृतिक और राष्ट्रीय भावनाओं को तत्कालीन राजनीतिक सन्दर्भो से जोड़ कर नव जागरण का शंखनाद किया है । देश में नव चेतना , त्याग , बलिदान का अलख जगाने में आपके काव्य की महती भूमिका रही है । आप अपनी सहज , सरल और सामान्य बोल चाल की स्वाभाविक भाषा में जटिल से जटिल भावों को बड़ी सादगी से व्यक्त करती हैं । इन कविताओं में वीर एवं वात्सल्य रस प्रधान है । गीत और लोकगीतों की गायन शैली में अपने भावों को स्वर देने में आप सिद्ध हैं । अलंकार और प्रतीकों के मोह से मुक्त अनुभूतियों का सहज प्रकाशन ही आपकी काव्यगत विशेषता है । आपकी गद्य रचनाएँ छायावादी प्रवृत्ति की निर्मल झाँकी हैं जहाँ छायावाद का वही स्वप्नलोक , वही आदर्शवाद , वही उदात्तभाव आधारभूत रूप में विद्यमान हैं । जन – जन में देश – प्रेम और स्वाभिमान की भावना जगाने वाले कवियों में आपका स्थान प्रमुख है ।

 

श्री रामधारी सिंह ‘दिनकर’ कवि परिचय – 

जीवन परिचय – 

ओजस्वी काव्य का सृजन करने वाले कवि श्री रामधारी सिंह ‘ दिनकर ‘ का जन्म बिहार के मुंगेर जिले के सिमरिया धार ग्राम में हुआ था .। हिन्दी की सेवाओं पर आपको पद्मभूषण और साहित्य अकादमी और भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया । सन् 1974 में आपका स्वर्गवास हुआ ।

रचनाएँ – 

(1) काव्य – रेणुका , हुँकार , रसवन्ती , कलिंग विजय , बापू , नीम के पत्ते , कुरुक्षेत्र , नील कुसुम , उर्वशी । (2) गद्य – मिट्टी की ओर , अर्द्ध – नारीश्वर , संस्कृत के चार अध्याय । (3.) भाव पक्ष – दिनकर जी राष्ट्रीय भावनाओं के कवि हैं । इन्होंने देश की राजनैतिक व सामाजिक परिस्थितियों पर लेखनी चलाई । इनके विद्रोही स्वर ललकार व चुनौती के रूप में प्रस्फुटित होकर देश पर बलिदान होने की प्रेरणा देते हैं । इन्होंने समाज की अर्थव्यवस्था तथा आर्थिक असमानता के प्रति रोष प्रकट किया जो प्रगतिवादी रचनाएँ कहलायीं । इन्होंने शोषण , उत्पीड़न , वर्ग विषमता की निर्भीकता से निंदा की । 

 

4.कला पक्ष – 

दिनकर जी राष्ट्रीय कवि हैं , जो अतीत के सुख स्वप्नों को देखकर उनसे उत्साह व प्रेरणा ग्रहण करते हैं । वर्तमान पर तरस व उनके प्रति विद्रोह की भावना जाग्रत करते हैं । इसलिये उन्हें क्रान्तिकारी उपादानों से अलकृत किया है ।

भाषा – 

भाषा शुद्ध संस्कृत , तत्सम, खड़ी बोली सम्मिलित है । शैली ओज एवं प्रसाद गुण युक्त है । नवीन प्रयोगों द्वारा व्यंजना शक्ति भी बढ़ाई है । 

छंद – 

रचनाओं में मुक्तक एवं प्रबन्ध दोनों प्रकार की शैलियों का योग है । 

अलंकार – 

काव्य में उपमा , उत्प्रेक्षा , रूपक , अनुप्रास , श्लेष आदि अलंकारों का प्रयोग हुआ है । 

साहित्य में स्थान – 

अपनी बहुमुखी प्रतिभा के कारण ‘ दिनकर जी ‘ अत्यन्त लोकप्रिय हुए उन्हें भारतीय संस्कृति एवं इतिहास से अधिक लगाव था । राष्ट्रीय धरातल पर स्वतन्त्रता की भावना का स्फुरण करने वाले कवियों में ‘ दिनकर जी ‘ का अपना विशिष्ट स्थान है ।

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