MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions पद्य Chapter 7 सामाजिक समरसता

Chapter 7 सामाजिक समरसता

कबीर की साखियाँ (कबीर)

जीवन संदेश (राम नरेश त्रिपाठी)

 

MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions पद्य Chapter 7 सामाजिक समरसता

सामाजिक समरसता अभ्यास

 

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सामाजिक समरसता अति लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1. 

लोहा किसकी स्वाँस से भस्म हो जाता है ? 

उत्तर – 

मरी खाल से लोहे को तपाने वाली धौंकनी बनाई जाती है । लोहा मरी खाल की उसी धौंकनी की स्वाँस से भस्म हो जाता है । 

प्रश्न 2. 

भक्ति किस प्रकार के प्राणियों से नहीं हो सकती है ? 

उत्तर – 

भक्ति कामी , लोभी और लालची प्राणियों से नहीं हो सकती है । 

प्रश्न 3. 

गुण लाख रुपये में कब बिकता है ? 

उत्तर – 

जब गुण को उसका पारखी ग्राहक मिल जाता है तो गुण लाख रुपये में बिकता है । 

प्रश्न 4. 

संसार में विद्यमान सचर – अचर प्राणी क्या कर रहे हैं ? 

उत्तर – 

संसार में विद्यमान सचर – अचर प्राणी कर्म में लगे रहते हैं । 

प्रश्न 5. 

दयामयी माता के तुल्य किसे माना गया है ? 

उत्तर – 

दयामयी माता के तुल्य मातृभूमि को माना गया है । 

प्रश्न 6. 

जीवन को सफल बनाने के लिए कवि क्या निर्देश देता है ? 

उत्तर – 

जीवन को सफल बनाने के लिए कवि ने निर्देश दिया है कि मनुष्य को सदैव लोक कल्याण के कार्यों में संलग्न रहना चाहिए । 

 

सामाजिक समरसता लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1. 

कबीरदास जी ईश्वर से क्या माँगते हैं ?

उत्तर – 

कबीरदास जी संतोषी सन्त थे । उन्हें मात्र जीवन व्यतीत करने के लिए धन आदि की आवश्यकता थी । वे जानते थे कि अधिक सम्पत्ति मनुष्य में दोष पैदा करती है । इसलिए वे ईश्वर से इतना ही माँगते हैं कि जिसमें उनके परिवार की पूर्ति हो जाये और जो अतिथि उनके यहाँ आयें वे भी भूखे न रहें । आशय यह है कि कबीर ईश्वर से मात्र अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ही धन आदि माँगते हैं । 

प्रश्न 2. 

कवि के अनुसार किस प्रकार के वृक्ष के नीचे विश्राम करना चाहिए ? 

उत्तर – 

कबीरदास जी मानते हैं कि उसी वृक्ष के नीचे विश्राम करना चाहिए जो बारह महीने फल देता हो । उसके फलों से पेट भरता रहेगा । उस वृक्ष से ठंडी छाया मिलेगी और पर्याप्त फल मिलते रहेंगे । उस वृक्ष के फल खाकर तथा ठंडी छाया में बैठकर पक्षी भी क्रीड़ा करते रहेंगे । कबीरदास जी कहना चाहते हैं कि गम्भीर व्यक्ति का सहारा लेना चाहिए ताकि किसी प्रकार का कष्ट न हो ।

प्रश्न 3. 

साधु से किस प्रकार के प्रश्न नहीं करने चाहिए ? 

अथवा 

कबीरदास के अनुसार हमें साधु से क्या नहीं पूछना चाहिए ?

उत्तर – 

साधु संसार के कल्याण हेतु कार्य करते हैं । उनका किसी एक जाति , वर्ण , धर्म आदि से ही सम्बन्ध नहीं होता है । वे तो मानवता के हितकारी कार्य करते हैं । अत : साधु से उसकी जाति नहीं पूछनी चाहिए । वे तो सभी जाति , वर्ण तथा धर्म के लोगों के उपकार के लिए होते हैं । वे सीमित न होकर व्यापक दृष्टि वाले होते हैं । अतः साधु से जाति का प्रश्न नहीं पूछना चाहिए । 

प्रश्न 4.

‘लोक – कल्याण कामना ‘ से कवि का क्या आशय है ? 

उत्तर – 

‘ लोक – कल्याण कामना ‘ का अर्थ है संसार के हितकारी कार्यों को करने की इच्छा रखना । मानव का जन्म स्वार्थ – पूर्ति के लिए नहीं हुआ है । वह जगत के हितकारी कार्यों का सम्पादन करने के लिए पैदा हुआ है । स्वार्थ की वृत्ति तो पशु , पक्षी आदि सभी में होती है । विवेकशील मनुष्य को परोपकार की इच्छा रखनी चाहिए । लोक – कल्याण कामना का आशय है कि जगत के मंगल के लिए काम करने की इच्छा रखनी चाहिए । यही सच्ची लोक सेवा है जिसके लिए व्यक्ति पैदा होता है । 

प्रश्न 5. 

कवि जग की विषम आँधियों के सम्मुख किस प्रकार के स्वभाव की अपेक्षा कर रहा है ? 

उत्तर – 

यह संसार समस्याओं , संकटों और दुःखों की आँधियों के झोंकों से चंचल बना रहता है । विविध प्रकार के दुःखों की आँधियाँ व्यक्ति को परेशान करने का प्रयत्न करती रहती हैं । व्यक्ति को इनसे भयभीत हुए बिना साहस के साथ इनका सामना करना चाहिए तथा बड़े – से – बड़े संकट पर विजय पानी चाहिए । कवि की अपेक्षा है कि मनुष्य को निर्भीक होकर विपरीत परिस्थितियों का बहादुरी से सामना करना चाहिए । 

प्रश्न 6. 

कर्मच्युत होने से क्या परिणाम होगा ? 

उत्तर – 

मानव को यह जन्म कल्याणकारी कार्य करने के लिए मिला है । उसे जनहित को ध्यान में रखकर निरन्तर काम में लगे रहना चाहिए । इस संसार रूपी कर्मभूमि में जो प्राणी कर्म से विमुख हो जाता है , वह स्वयं के साथ छल करता है तथा एक दुर्लभ अवसर को अपने आप गँवा देता है । मानव जन्म के अतिरिक्त अन्य किसी जन्म में श्रेष्ठ कार्य करने का अवसर नहीं मिलता है इसलिए इस अवसर को नहीं खोना चाहिए । निरन्तर कर्म में संलग्न रहकर अपने जीवन को सफल बनाना चाहिए ।

 

सामाजिक समरसता दीर्घ उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1. 

दुर्बल को सताने का क्या दुष्परिणाम होता है ?

अथवा 

कबीरदास ने अपनी कविता में दुर्बल को सताने का क्या परिणाम समझाया है ? 

उत्तर – 

संसार में निर्बल व्यक्ति को सताया जायेगा तो वह प्रत्यक्ष विरोध तो पायेगा , क्योंकि उसमें विरोध करने का बल ही नहीं है परन्तु उसके हृदय से दर्द भरी आह निकलेगी जो सताने वाले को उसी प्रकार भस्म कर देगी जिस प्रकार मरी खाल से बनी धौंकनी लोहे की जलाकर राख बना देती है । लोहा बहुत कठोर होता है और खाल मरी हुई निर्जीव होती है परन्तु वह लोहे को भस्म कर देती है वैसे ही निर्बल में बल के आधार पर संघर्ष करने की शक्ति भले ही न हो परन्तु पीड़ा का दर्द उसे व्याकुल करेगा तो उसके मुँह से दीर्घ नि : स्वास अपने आप ही निकलेगी जो सताने वाला के अहंकार को जलाकर खाक बना देगी । अत : दुर्बल को सताने का परिणाम बड़ा घातक होता है 

प्रश्न 2. 

अवगुण का निवास कहाँ है ? 

उत्तर – 

परमपिता परमात्मा सभी गुणों का भण्डार हैं । उसमें कोई भी दोष नहीं है । यदि अवगुणों का निवास कहीं है तो सर्वाधिक मनुष्य में ही है । काम , क्रोध , मोह , लोभ , अहंकार आदि दोषों से मनुष्य भरा है । यदि मनुष्य अपने अन्दर झाँककर देखे तो उसे पता चलेगा कि संसार भर के अवगुण उसी के अन्दर हैं । वही स्वार्थ से प्रेरित होकर अनाचार , अत्याचार , अन्याय आदि करता रहता है । जाति , वर्ण , धर्म की संकुचित वृत्तियाँ उसी के अन्दर हैं । अपने अहंकार से प्रेरित होकर मार – काट में भी वह संकोच नहीं करता है । सभी बुराइयों से युक्त होकर भी वह यह दिखाने का प्रयास करता रहता है कि उसमें कोई अवगुण नहीं है । किन्तु जब उसमें विवेक जाग जाता है , सत्य को जानने की इच्छा होती है तथा वह अपने अन्तर में झाँकने का सच्चा प्रयास करता है तब पता लगता है कि सभी अवगुण मनुष्य में ही निवास करते हैं । 

प्रश्न 3. 

किन विशेषताओं को खोकर भक्ति की जा सकती है ? 

उत्तर – 

सांसारिक व्यक्ति जाति , वर्ण , कुल आदि के संकुचित दायरों में बँटा है । उसमें जाति , वंश आदि का अहंकार भरा है । इन संकुचित दोषों के कारण उसमें सरलता , विनम्रता , उदारता आदि मानवीय गुणों का विकास नहीं हो पाता है । मोह , ममता , अभिमान आदि उसे सहज नहीं होने देते हैं । संसार के प्रति उसमें समभाव नहीं आ पाता है । यही कारण है कि वह भक्त नहीं हो पाता है । भक्त के लिए सरल हृदय होना पहली शर्त है । छल – कपट रहित सरल हृदय में ही भक्ति का निवास होता है । जब तक व्यक्ति जाति को मानेगा तो अन्य जातियाँ उसे पराई लगेंगी , वर्ण को मानेगा तो अपने वर्ण के अतिरिक्त अन्य वर्ण उसे विरोधी प्रतीत होंगे । इसी प्रकार जब तक अपने कुल का अहं विद्यमान रहेगा तब तक वह अपने कुल के अतिरिक्त अन्य कुलों को हीन मानता रहेगा , जबकि वास्तविकता यह है कि संसार के सभी प्राणी समान हैं । सभी एक ब्रह्म का ही अंश हैं । सभी में एक तरह का ही रक्त , हाड़ – मांस आदि हैं फिर जाति , कुल आदि का बँटवारा मानना अनुचित है । सार रूप में कहा जा सकता है कि जाति , वर्ण , कुल आदि की विशेषताओं को खोकर ही भक्ति की जा सकती है । 

प्रश्न 4. 

मनुष्य किन – किन शक्तियों से सम्पन्न है ? संसार में जीने का उसका उद्देश्य लिखिए । 

उत्तर – 

संसार में अनेक प्राणी हैं किन्तु किसी के पास सोचने , समझने की शक्ति नहीं है । मात्र मनुष्य में ही विचार करके सही निर्णय लेने की क्षमता है । बुद्धि की शक्ति से वह विविध समस्याओं के समाधान कर सकता है । असंभव को संभव बना सकता है । शेर , हाथी , चीते जैसे शक्तिशाली जंगली जानवरों को बुद्धि के बल पर ही मनुष्य ने अपने वश में कर लिया है । कृषि, विज्ञान, तकनीक आदि के सहारे हमारे जीवन के विभिन्न पथ सम्पन्न हुए हैं । इसके पीछे बुद्धि का ही बल है । ज्ञान के अनेक स्रोत खोजने में बुद्धि की ही महत्वपूर्ण भूमिका रही है । यदि ध्यान देकर देखा जाये तो बुद्धि का बल ही मानव की चहुँमुखी समृद्धि तथा विकास का आधार है । ईश्वर ने मनुष्य को जो बुद्धि का बल प्रदान किया है यह बिना किसी निश्चित उद्देश्य के नहीं दिया है । इसके पीछे महान उद्देश्य है कि मनुष्य को अपनी बुद्धि के बल से निरन्तर रचनात्मक लोक – हितकारी कार्य करते रहना चाहिए । दुर्लभ मनुष्य जीवन का हर क्षण काम में व्यस्त रहकर व्यतीत करने पर ही मानव जीवन का लक्ष्य पूरा हो सकता है । यदि वह कर्म नहीं करता है तो उसका मानव जन्म ही व्यर्थ जायेगा । इसलिए मनुष्य को अपने जीवन के मूल उद्देश्य को पूरा करने के लिए लगातार कर्म करने में संलग्न रहना चाहिए । कर्मरत रहना ही उसके जीवन का वास्तविक उद्देश्य है । 

प्रश्न 5. 

‘जीवन सन्देश’ कविता का केन्द्रीय भाव लिखिए । 

उत्तर – 

समाज की गहरी जानकारी रखने वाले कबीर ने अपनी कविता में समाज एवं मानव जीवन के मंगलकारी सन्देश दिए गए हैं । व्यक्ति आ आचरण ही सामाजिक समरसता को आधार प्रदान करता है । संतोष वृत्ति को महत्व देते हुए वे कहते हैं कि हे ईश्वर हमें मात्र इतना ही धन – दौलत देना जिससे मेरे घर का तथा अतिथियों का गुजारा हो सके । करुणा से प्रेरित होकर वे कहते हैं कि दुर्बल व्यक्ति को सताना नहीं चाहिए । वे मानते हैं कि व्यक्ति की जाति बड़ी नहीं होती है , उसका कर्म बड़ा होता है क्योंकि संसार में सभी प्राणी एक से ही हैं । जाति , वर्ग आदि से ऊपर उठकर ही ईश्वर की भक्ति करना संभव है । गुण का पारखी ही गुण के महत्त्व को पहचानता है । सर्प तो दूध पीकर विष को ही बढ़ाते हैं जबकि आवश्यकता विष को नष्ट करने वाले की है । मनुष्य अपने अन्तर में झाँकेगा तो पता चलेगा कि सारे दोष उसी में हैं । ‘

प्रश्न 6. 

संसार मनुष्य के लिए एक परीक्षा स्थल है ऐसा कवि ने क्यों कहा है ? 

उत्तर – 

मानव का जन्म दुर्लभ है । उसके जीवन का उद्देश्य निरन्तर काम करते रहना है । लोक – मंगलकारी कामों के द्वारा ही वह अपने ऊपर किए गए उपकारों के ऋण को चुका सकता है । पृथ्वी , सूर्य , चन्द्रमा , वायु आदि प्राकृतिक तत्वों ने मनुष्य को जन्म देकर पाला – पोसा है , बड़ा किया है । मातृभूमि को मानव से बहुत अपेक्षाएँ हैं । इनको पूरा करने के लिए उसे नाना प्रकार के संकटों का सामना करना है । इन सब में सफलता पर अपने सिर पर विजयश्री का मुकुट पहनाना है । इस प्रकार मनुष्य के लिए यह संसार एक कठिन परीक्षा की स्थली है । मनुष्य इस परीक्षा में तभी सफल हो सकता है जब वह सत्कर्तव्यों में संलग्न रहे । 

कबीर की साखियाँ भाव – सारांश

समाज की गहरी जानकारी रखने वाले कबीर ने अपनी कविता में समाज एवं मानव जीवन के मंगलकारी सन्देश दिए गए हैं । व्यक्ति आ आचरण ही सामाजिक समरसता को आधार प्रदान करता है । संतोष वृत्ति को महत्व देते हुए वे कहते हैं कि हे ईश्वर हमें मात्र इतना ही धन – दौलत देना जिससे मेरे घर का तथा अतिथियों का गुजारा हो सके । करुणा से प्रेरित होकर वे कहते हैं कि दुर्बल व्यक्ति को सताना नहीं चाहिए । वे मानते हैं कि व्यक्ति की जाति बड़ी नहीं होती है , उसका कर्म बड़ा होता है क्योंकि संसार में सभी प्राणी एक से ही हैं । जाति , वर्ग आदि से ऊपर उठकर ही ईश्वर की भक्ति करना संभव है । गुण का पारखी ही गुण के महत्त्व को पहचानता है । सर्प तो दूध पीकर विष को ही बढ़ाते हैं जबकि आवश्यकता विष को नष्ट करने वाले की है । मनुष्य अपने अन्तर में झाँकेगा तो पता चलेगा कि सारे दोष उसी में हैं । 

 

कबीर की सखियां सन्दर्भ, प्रसंग सहित पद्यांशों की व्याख्या 

(1) साईं इतना दीजिए, जामैं कुटुम समाय।

मैं भी भूखा न रहूँ, साधु न भूखा जाय॥ 

शब्दार्थ –

सांई स्वामी , ईश्वर । जामैं – जिसमें । कुटुम- परिवार । समाय – पूर्ति हो सके । साधु – सज्जन , अतिथि ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्य हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘ सामाजिक समरसता ‘ पाठ के ‘ कबीर की साखियाँ ‘ शीर्षक से लिया गया है । इसके रचयिता कबीरदास जी हैं । 

प्रसंग – 

यहाँ बताया गया है कि धन आदि साधन मात्र गुजारे लायक ही होने चाहिए, अधिक की आवश्यकता नहीं है । 

व्याख्या – 

हे स्वामी (ईश्वर) ! मुझे मात्र इतना ही (धन आदि) देना जिससे मेरे परिवार की पूर्ति हो सके । मैं और मेरा परिवार खा सके तथा आने वाले अतिथि भी भूखे न जा पाएँ । इससे अधिक की आवश्यकता मुझे नहीं है । 

विशेष –

(1) यहाँ संतोषी वृत्ति को उजागर किया गया है । (2) सरल , सुबोध एवं सधुक्कड़ी भाषा का प्रयोग हुआ है । (3) अनुप्रास अलंकार तथा दोहा छन्द का प्रयोग हुआ है । 

 

(2) दुर्बल को न सताइए, जाकी मोटी हाय।

मरी चाम की स्वांस से, लौह भसम है जाय॥

शब्दार्थ – 

दुर्बल = कमजोर । सताइए = दु : खी कीजिए । जाकी = जिसकी । हाय = दर्द भरी साँस । चाम = चमड़ी , खाल । भसम = भस्म , राख ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्य हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘ सामाजिक समरसता ‘ पाठ के ‘ कबीर की साखियाँ ‘ शीर्षक से लिया गया है । इसके रचयिता कबीरदास जी हैं ।  

प्रसंग – 

यहाँ पर कमजोर आदमी को दु : खी न करने की बात कही गई है । 

व्याख्या – 

कबीर कहते हैं कि कमजोर व्यक्ति को दुःखी नहीं करना चाहिए । निर्बल की दर्द भरी साँस का भयंकर प्रभाव होता है । जैसे मरे हुए पशु की खाल से बनने वाली धौंकनी से कठोर लोहा भी राख हो जाता है । वैसे ही कमजोर की आह बड़े – बड़ों का अहंकार चूर कर देती है । 

विशेष – 

(1) समरसता की पुष्टि की गई है । (2) दृष्टान्त एवं अनुप्रास अलंकार । (3) दोहा – छन्द । (4) रस – शांत । 

 

(3) जाति न पूछो साधु की, पूछि लीजिए ज्ञान।

मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान॥

शब्दार्थ – 

साधु – सज्जन । मोल = मूल्य , कीमत । म्यान = तलवार रखने की चीज ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्य हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘ सामाजिक समरसता ‘ पाठ के ‘ कबीर की साखियाँ ‘ शीर्षक से लिया गया है । इसके रचयिता कबीरदास जी हैं । 

प्रसंग – 

यहाँ पर सज्जन व्यक्ति की जाति की अपेक्षा उसके ज्ञान पर बल दिया गया है । 

व्याख्या – 

सज्जन की जाति आदि पूछना अनुचित है , व्यर्थ है । उसके तो ज्ञान की महिमा है इसलिए उससे ज्ञान की बात पूछनी चाहिए । तलवार का मोल भाव करना व्यर्थ है उसे तो म्यान में ही पड़ा रहने देना उचित है । वैसे ही साधु से जाति आदि की बात न पूछकर शान्त रहना ही उचित है ।

विशेष – 

(1) संत किसी जाति , वर्ग के नहीं होते । उनके ज्ञान से सभी को लाभ मिलता है । (2) सरल , सुबोध भाषा का प्रयोग हुआ है । (3) दृष्टान्त , अनुप्रास अलंकारों का प्रयोग । 

 

(4) जाति हमारी आतमा, प्रान हमारा नाम।

अलख हमारा इष्ट है, गगन हमारा ग्राम॥

शब्दार्थ – 

आत्मा । अलख दिखाई न देने वाला , निराकार ब्रह्म । इष्ट आराध्य । गगन आकाश । 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्य हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘ सामाजिक समरसता ‘ पाठ के ‘ कबीर की साखियाँ ‘ शीर्षक से लिया गया है । इसके रचयिता कबीरदास जी हैं । 

प्रसंग – 

यहाँ जाति , नाम आदि की संकुचित वृत्ति का विरोध करते हुए सभी को समान मानने का समर्थन किया है । 

व्याख्या – 

कबीरदास जी कहते हैं कि हमारी अपनी विशेष पहचान नहीं है । हमारी जाति आत्मा है और प्राण हमारा नाम है । दिखाई न देने वाला निराकार ब्रह्म हमारा आराध्य है तथा ( सभी प्राणियों से भरा ) आकाश हमारा गाँव है ।

विशेष – 

(1) विश्वबंधुत्व का भाव प्रकट हुआ है । (2) सरल , सुबोध भाषा में गम्भीर विषय का प्रतिपादन हुआ है । (3) छन्द दोहा । 

 

(5) कामी क्रोधी लालची, इन पै भक्ति न होय।

भक्ति करै कोई शूरमाँ, जाति वरण कुल खोय॥

शब्दार्थ – 

कामी = काम – वासना से भरा । लालची = लालच करने वाला । पै = पर । शूरमाँ = बहादुर । जाति वरण कुल = जाति , वर्ण एवं वंश ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्य हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘ सामाजिक समरसता ‘ पाठ के ‘ कबीर की साखियाँ ‘ शीर्षक से लिया गया है । इसके रचयिता कबीरदास जी हैं । 

प्रसंग – 

यहाँ पर बताया गया है कि भक्ति के लिए अपने जाति , वर्ण , कुल आदि का अहंकार समाप्त करना आवश्यक है । 

व्याख्या – 

काम – वासनाओं से भरे , क्रोध करने वाले तथा लालच करने वाले व्यक्ति पर भक्ति नहीं हो सकती है । भक्ति की साधना तो वही बहादुर कर सकता है जिसने जाति , वर्ण , कुल आदि का अहंकार खो दिया हो । 

विशेष – 

(1) विषय – वासनाएँ भक्ति में बाधक होती हैं । (2) रस – शान्त । (3) दोहा छन्द । 

 

(6) ऊँचै कुल का जनमियाँ, जे करणी ऊँच न होइ।।

सोवन कलस सुरै भऱ्या, साधू निंद्या सोई॥

शब्दार्थ – 

जनमियाँ = पैदा हुआ । जे = जो । करनी = कर्म । सोवन = सोने का । सुरै = शराब । निद्या -निन्दा , बुराई ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्य हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘ सामाजिक समरसता ‘ पाठ के ‘ कबीर की साखियाँ ‘ शीर्षक से लिया गया है । इसके रचयिता कबीरदास जी हैं ।  

प्रसंग – 

यहाँ पर कुल आदि से बड़ा व्यक्ति के कर्म को बताया गया है ।

व्याख्या – 

कबीर कहते हैं कि यदि कर्मच , श्रेष्ठ नहीं हैं तो उच्च कुल में जन्म लेने से क्या लाभ ? जिस प्रकार शराब से भरे सोने के कलश की भी सज्जनों के द्वारा निन्दाही की जायेगी वैसे ही निम्न कर्म करने वाला निन्दा का ही पात्र बनेगा । 

विशेष – 

(1) कर्म के महत्व का प्रतिपादन किया गया है । (2)दोहा छन्द , अनुप्रास अलंकार एवं शान्त रस ।

 

(7) तरवर तास बिलंबिए, बारह मास फलंत।

सीतल छाया गहर फल, पंधी केलि करत॥

शब्दार्थ – 

तरवर – श्रेष्ठ वृक्षा तास- उस । बिलंबिए – विश्राम कीजिए । मास सीतल छाया गहर फल , पंषी कोलि करत । फलंत = फलीभूत होता है , फल देता है । गहर = गहरे , खूब । पंषी = पक्षी । कल क्रीड़ा । करत करते हैं । 

सन्दर्भ –

प्रस्तुत पद्य हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘ सामाजिक समरसता ‘ पाठ के ‘ कबीर की साखियाँ ‘ शीर्षक से लिया गया है । इसके रचयिता कबीरदास जी हैं ।

प्रसंग – 

यहाँ बताया गया है कि जिस प्रकार फलदार वृक्ष से पक्षियों को आनन्द मिलता है उसी प्रकार श्रेष्ठ जन के साथ रहने से व्यक्ति को भी आनन्द प्राप्त होता है । 

व्याख्या – 

कबीरदास जी कहते हैं कि प्राणियों ( पक्षियों ) को उसी श्रेष्ठ वृक्ष पर विश्राम चाहिए जो बारह महीने फलता हो । ऐसे वृक्ष से ठंडी छाया तथा खूब मात्रा में फल मिलते हैं । इसी प्रकार के वृक्ष पर पक्षी आनन्द से क्रीड़ा करते रहते हैं । 

विशेष – 

(1) सत्संगति का महत्व प्रतिपादित किया है । (2) सरल , सुबोध भाषा में गम्भीर विषय को रखा गया है । (3) अन्योक्ति , अनुप्रास अलंकारों की छटा दर्शनीय है । 

 

(8) जब गुण कँगाहक मिलै, तब गुण लाख बिकाइ।

जब गुण कौं गाहक नहीं, कौड़ी बदले जाइ॥

शब्दार्थ – 

गाहक = खरीददार । बिकाइ = बिकता है 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्य हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘ सामाजिक समरसता ‘ पाठ के ‘ कबीर की साखियाँ ‘ शीर्षक से लिया गया है । इसके रचयिता कबीरदास जी हैं ।  

प्रसंग – 

गुण के महत्व का ज्ञान परखने वाला ही जानता है । 

व्याख्या – 

कबीरदास जी कहते हैं कि जब गुण के महत्व को समझने वाला खरीददार आता है तब गुण का मूल्य लाखों में मिल जाता है किन्तु जब ग्राहकों में गुण के महत्व को जानने वाला ही न हो , उसके चाहने वाला न हो तो गुण कौड़ियों में , बहुत कम मूल्य में ही बिकता है । आशय है कि गुण का मूल्य हर समय नहीं होता है । 

विशेष – 

(1) गुण का महत्व समझने वाले के लिए ही होता है । (2) सरल , सुबोध व्यावहारिक भाषा का प्रयोग किया है । (3) दोहा – छन्द । 

 

(9) सरपहि दूध पिलाइये, दूधैं विष है जाइ।

ऐसा कोई नां मिलै, सौं सरपैं विष खाइ॥

शब्दार्थ – 

है= हो । सरपैं = सर्प का ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्य हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘ सामाजिक समरसता ‘ पाठ के ‘ कबीर की साखियाँ ‘ शीर्षक से लिया गया है । इसके रचयिता कबीरदास जी हैं । 

प्रसंग – 

इस साखी में कुसंगति के प्रभाव का संकेत करते हुए दोष के विनाश व्यक्त किया गया है ।

व्याख्या – 

कबीरदास जी कहते हैं कि यदि साँप को दूध जैसा गुणदायक पदार्थ पिलाया जाय तो साँप के कारण वह दूध भी विष हो जाता है । संसार में इस प्रकार के व्यक्ति नहीं मिलते हैं जो साँप के विष को खा जायें अर्थात् साँप के विपैलेपन (बुराइयों) को नष्ट कर दें ।

विशेष – 

(1) बुराई के विनाश की आवश्यकता का संकेत दिया है । (2) सरल , सुबोध , मिश्रित भाषा का प्रयोग हुआ है । (3) दोहा छन्द ।

 

(10) करता करे बहुत गुण, आगुण कोई नांहि।

जे दिल खोजौं आपणौं, तो सब औगुण मुझ माहि॥

शब्दार्थ – 

केरे = के । गुण = अच्छाइयाँ । आगुण – अवगुण , बुराई । जे = जो । खोजौं = तलाश करूँ , परख करूँ । आपणौं = अपना । मुझ माहि = मुझ में ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्य हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘ सामाजिक समरसता ‘ पाठ के ‘ कबीर की साखियाँ ‘ शीर्षक से लिया गया है । इसके रचयिता कबीरदास जी हैं । 

प्रसंग – 

मनुष्य को अपने दोषों की ओर ध्यान आकर्षित करने का प्रयास किया गया है । 

व्याख्या – 

कबीरदास जी कहते हैं कि करतार (ईश्वर) के तो अनेक गुण हैं , उनमें कोई भी अवगुण नहीं है । यदि मैं अपने अन्दर झाँक कर दे तो पता चलता है कि सभी अवगुण मुझ में ही हैं । 

विशेष – 

(1) मानव अवगुणों का भण्डार है , अतः उसे अवगुणों को दूर कर गुण के भण्डार ईश्वर में ध्यान लगाना चाहिए । (2) सरल , सुबोध एवं मिश्रित भाषा को अपनाया है । (3) छन्द दोहा ।

जीवन संदेश भाव सारांश भाव 

द्विवेदी युगीन कवि रामनरेश त्रिपाठी एक आदर्श कवि थे जिन्होंने अपने काव्य के द्वारा मंगलकारी भाव व्यक्त किये हैं । ‘ जीवन सन्देश ‘ कविता में उन्होंने बताया है कि संसार के सभी प्राणी कर्म में लीन रहते हैं । सूर्य, चन्द्रमा आदि प्रकृति के सभी तत्व सतत् कर्म में लगे रहते हैं । इसलिए मनुष्य को कर्मरत रहना चाहिए । कर्त्तव्य से विमुख होकर वह उचित नहीं करता है । उसे ध्यान रखना चाहिए कि जिस मातृभूमि ने उसे चलना , फिरना , बोलना , खेलना आदि सिखाया है , उसके प्रति उसका बहुत बड़ा दायित्व है । अतः मनुष्य को संसार के हितकारी कार्य करते रहना चाहिए । विषम परिस्थितियों में संयम बरतते हुए उसे कर्त्तव्य का ध्यान रखना चाहिए । बाधा , भय , द्विविधा आदि से मुक्त रहकर उसे निश्चयपूर्वक दृढ़ निष्ठा से कर्म के प्रति समर्पित रहना चाहिए । इस संसार में जन्म लेकर और कर्त्तव्य से विमुख रहना एक दुर्लभ अवसर को खोना है । 

 

जीवन संदेश सन्दर्भ, प्रसंग सहित पद्यांशों की व्याख्या 

(1) जग में सचर अचर जितने हैं सारे कर्म निरत हैं।

धुन है एक न एक सभी को सबके निश्चित व्रत हैं।

जीवनभर आतप सह वसुधा पर छाया करता है।

तुच्छ पत्र की भी स्वकर्म में कैसी तत्परता है।

शब्दार्थ – 

जग = संसार । सचर = चलायमान । अचर = अचल । कर्म = निरत = काम में लगे । आतप = ताप । वसुधा – पृथ्वी । तुच्छ = छोटे से । पत्र = पत्ते । स्वकर्म = अपना कार्य । तत्परता = जागरूकता 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के सामाजिक समरसता ‘ पाठ के जीवन सन्देश ‘ शीर्षक से अवतरित है । इसके रचयिता रामनरेश त्रिपाठी हैं ।

प्रसंग – 

यहाँ बताया गया है कि सृष्टि में सभी अपने कर्म के प्रति सजग हैं ।

व्याख्या – 

संसार में जितने भी चेतन और अचेतन तत्व हैं वे सभी अपने – अपने कार्य में निष्ठापूर्वक संलग्न हैं । इन सभी का कुछ न कुछ निश्चित उद्देश्य है जिसके अनुसार ये कर्मरत रहते एक छोटे से पत्ते को भी अपने कर्म के प्रति कितनी जागरूकता है कि वह समस्त जीवन भर भयंकर ताप , धूप को सहकर भी पृथ्वी पर छाया करता है । 

विशेष – 

(1) सभी तत्वों की कर्म संलग्नता पर प्रकाश डाला है । (2) सरल , सुबोध एवं शुद्ध खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है । (3) अनुप्रास अलंकार एवं पद मैत्री का सौन्दर्य अवलोकनीय है । (4) रचनात्मक कर्मशीलता के महत्व का प्रतिपादन ।

 

(2) रवि जग में शोभा सरसाता सोम सुधा बरसाता।

सब हैं लगे कर्म में कोई निष्क्रिय दृष्टि न आता॥

हैं उद्देश्य नितान्त तुच्छ तृण के भी लघु जीवन का।

उसी पूर्ति में वह करता है अन्त कर्ममय तन का॥

शब्दार्थ – 

रवि = सूर्य । सरसाता = बढ़ाता । सुधा = अमृत । निष्क्रिय = काम न करते हुए । नितान्त = पूरी तरह । तुच्छ = छोटा , महत्वहीन । तृण = तिनका । कर्ममय = कामयुक्त । तन = शरीर । 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के सामाजिक समरसता ‘ पाठ के जीवन सन्देश ‘ शीर्षक से अवतरित है । इसके रचयिता रामनरेश त्रिपाठी हैं ।

प्रसंग – 

प्रकृति के तत्वों की कर्मशीलता का वर्णन हुआ है ।

व्याख्या – 

अपने कर्म में लगा हुआ सूर्य चारों ओर प्रकाश फैलाकर संसार के सौन्दर्य को बढ़ाता है । चन्द्रमा अपनी शीतल किरणों से अमृत की वर्षा करता है । इस तरह समस्त सृष्टि के तत्व जागरूक होकर काम में लगे हैं । कर्महीन कोई भी दिखाई नहीं देता है । तिनके के जीवन का भी पूर्णत : छोटा – सा , महत्वहीन ही सही पर कुछ उद्देश्य है और उसी उद्देश्य की पूर्ति में वह अपने कर्ममय शरीर का अन्त कर देता है । आशय है कि अपने छोटे उद्देश्य में ही अपना सारा जीवन लगा देता है । 

विशेष – 

(1) कर्म – निष्ठा के महत्व का प्रतिपादन (2) शुद्ध , साहित्यिक भाषा का प्रयोग किया गया है । (3) अनुप्रास अलंकार का प्रयोग स्वाभाविक है । 

 

(3) तुम मनुष्य हो, अमित बुद्धिबल-विलसित जन्म तुम्हारा।

क्या उद्देश्य रहित है जग में तुमने कभी विचारा?

बुरा न मानो, एक बार सोचो तुम अपने मन में।

क्या कर्त्तव्य समाप्त कर लिए तुमने निज जीवन में॥

शब्दार्थ – 

अमित = अत्यधिक । विलसित = सुशोभित । समाप्त = पूर्ण ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के सामाजिक समरसता ‘ पाठ के जीवन सन्देश ‘ शीर्षक से अवतरित है । इसके रचयिता रामनरेश त्रिपाठी हैं ।

प्रसंग – 

यहाँ मनुष्य को कर्त्तव्य के प्रति सजग किया गया है । 

व्याख्या – 

कवि कहते हैं कि मनुष्य को विचार करना चाहिए कि उसका जीवन अत्यधिक विवेक शक्ति से सुशोभित है । क्या तुमने कभी विचार किया है कि अपार बुद्धि के बल से युक्त तुम्हारा यह जीवन बिना किसी उद्देश्य के है ? इसका निश्चय ही कर्म करते रहना उद्देश्य है । बुरा न मानते हुए तुम्हें एक बार अपने अन्तर में विचार कर जानने का प्रयास करना चाहिए कि क्या तुमने मानव जीवन के सभी दायित्व पूर्ण कर लिए हैं । आशय है कि तुमको अपने दायित्वों को पूरा करने के लिए लगातार काम में लगे रहना आवश्यक है । 

विशेष – 

(1) मनुष्य को अपने कर्म के प्रति सजग किया गया है । (2) शुद्ध साहित्यिक खड़ी बोली का प्रयोग हुआ है । (3) अनुप्रास अलंकार एवं पद – मैत्री की छटा दर्शनीय है । 

 

(4) वह सनेह की मूर्ति दयामयि माता-तुल्य मही है।

उसके प्रति कर्त्तव्य तुम्हारा क्या कुछ शेष नहीं है।

हाथ पकड़कर प्रथम जिन्होंने चलना तुम्हें सिखाया।

भाषा सिखा हृदय का अद्भुत रूप स्वरूप दिखाया।

शब्दार्थ – 

सनेह – स्नेह, प्यार । दयामयि = दया से युक्त । तुल्य = समान । अद्भुत = अनोखा ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के सामाजिक समरसता ‘ पाठ के जीवन सन्देश ‘ शीर्षक से अवतरित है । इसके रचयिता रामनरेश त्रिपाठी हैं ।

प्रसंग – 

दया की मूर्ति जन्मभूमि के उपकारों की ओर मनुष्य का ध्यान आकर्षित किया 

व्याख्या – 

हे मनुष्य ! स्नेह की प्रतिमा दयायुक्त माता के समान जिस जन्म भूमि ने सबसे पहले तुम्हारा हाथ पकड़कर अपने ऊपर चलना सिखाया और तुम्हें बोलना सिखाकर हृदय के भावनामय अनोखे रूप का दर्शन कराया, उस मातृभूमि के प्रति क्या तुम्हारे सभी कर्त्तव्य पूरे हो गये हैं । क्या अब करने को कुछ भी शेष नहीं बचा है ? 

विशेष – 

(1) मातृभूमि के प्रति कर्मों के लिए सजग किया है । (2) साहित्यिक भाषा में विषय का प्रभावी प्रतिपादन हुआ है । (3) अनुप्रास अलंकार का स्वाभाविक , सहज प्रयोग दर्शनीय है । 

 

(5) जिनकी कठिन कमाई का फल खाकर बड़े हुए हो।

दीर्घ देह की बाधाओं में निर्भय खड़े हुए हो॥

जिनके पैदा किए, बुने वस्त्रों से देह ढके हो।

आतप-वर्षा-शीत-काल में पीडित हो न सके हो॥

शब्दार्थ – 

दीर्घ = बड़ी, विशाल । निर्भय = भय रहित । देह – शरीर । आतप = धूप । = दुःखी ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के सामाजिक समरसता ‘ पाठ के जीवन सन्देश ‘ शीर्षक से अवतरित है । इसके रचयिता रामनरेश त्रिपाठी हैं । 

प्रसंग – 

यहाँ पर पृथ्वी के विविध उपकारों का बोध मानव को कराया गया है । 

व्याख्या – 

हे मनुष्य ! जिनकी मेहनत की कमाई का अन्न आदि खाकर तुम इतने बड़े हो गये हो और इस विशाल शरीर के साथ जीवन की विविध बाधाओं का बिना डरे हुए सामना कर रहे हो , उनके प्रति क्या तुम्हारे सभी दायित्व पूरे हो गए हैं ? जिनके द्वारा पैदा किए गये कपास और उससे कातकर , बुनकर बनाए गये वस्त्रों से तुम अपना शरीर ढके हुए हो । इन वस्त्रों के कारण ही तुम्हें धूप (गर्मी), वर्षा एवं ठंड के समय में कभी कष्ट नहीं सहना पड़ा है । थोड़ा सोचो , उनके प्रति क्या तुम्हारा कोई कर्त्तव्य बाकी नहीं है ? 

विशेष – 

(1) पृथ्वी के उपकारों का उल्लेख कर मानव को कर्तव्य बोध कराया गया है । (2) भाव के अनुरूप साहित्यिक भाषा का प्रयोग हुआ है । (3) अनुप्रास अलंकार का सह सौन्दर्य अवलोकनीय है । 

 

(6) क्या उनका उपकार-भार तुम पर लवलेश नहीं है।

उनके प्रति कर्तव्य तुम्हारा क्या कुछ शेष नहीं है।

सतत् ज्वलित दुःख दावानल में जग केदारुण रन में।

छोड़ उन्हें कायर बनकर तुम भाग बसे निर्जन में।

शब्दार्थ – 

उपकार भार = एहसान का बोझ । लवलेश = थोड़ा । सतत् = लगातार । दुःख दावानल = दुःख रूपी जंगल की आग । दारुण = भयंकर । रन = युद्ध । निर्जन = एकांत ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के सामाजिक समरसता ‘ पाठ के जीवन सन्देश ‘ शीर्षक से अवतरित है । इसके रचयिता रामनरेश त्रिपाठी हैं । 

प्रसंग – 

मानव का हित करने वाले तत्वों के प्रति उसके कर्त्तव्य की ओर ध्यान आकर्षित किया गया है । 

व्याख्या – 

हे मनुष्य ! नाना प्रकार से तुम्हारी भलाई करने वाले तत्वों के एहसानों का क्या थोड़ा भी भार तुम पर शेष नहीं है । उनके प्रति क्या तुम्हारा कुछ भी कर्त्तव्य शेष नहीं रह गया है । इस संसार के भयंकर युद्ध में लगातार दुःखों की आग में उन्हें जलते हुए छोड़कर तुम एकान्त में जा बसे हो । क्या यह उचित है ? आशय यह है कि कष्टों को सहकर भी तुम्हें अपने कर्तव्य का पालन करते हुए उनके उपकारों का बदला चुकाना चाहिए । 

विशेष – 

(1) मानव को कर्त्तव्य बोध कराया गया है । (2) शुद्ध , साहित्यिक खड़ी बोली में काव्य रचना हुई है । (3) रूपक , अनुप्रास अलंकारों की छटा दर्शनीय है । 

 

(7) यही लोक-कल्याण-कामना यही लोक-सेवा है।

यही अमर करने वाले यश-सुरतरु की मेवा है।

जाओ पुत्र! जगत् में जाओ, व्यर्थ न समय गँवाओ।

सदालोक-कल्याण-निरतहोजीवनसफलबनाओ।

शब्दार्थ – 

लोक कल्याण = संसार की भलाई । कामना = इच्छा । अमर = न मरने साला । यश – सुरतरु = यश रूपी कल्पवृक्ष । व्यर्थ = बेकार । गँवाओ = नष्ट करो । निरत = 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के सामाजिक समरसता ‘ पाठ के जीवन सन्देश ‘ शीर्षक से अवतरित है । इसके रचयिता रामनरेश त्रिपाठी हैं । 

प्रसंग – 

समाज सेवा के कार्यों के प्रति प्रेरित किया गया है ।

व्याख्या – 

कवि कहते हैं कि हे पुत्र ! यह संसार की भलाई की तीव्र इच्छा ही सच्ची समाज – सेवा है । यह लोक – सेवा ही मानव को अमर बनाने वाले यश रूपी कल्पतरु की मधुर सेवा है । इसलिए तुम बिना समय नष्ट किए तुरन्त जाग जाओ और सदैव जनहित के कार्यों में संलग्न होकर अपने जीवन को सफल बना लो । 

विशेष – 

(1) शुद्ध , साहित्यिक खड़ी बोली को अपनाया है । (2) रूपक , अनुप्रास अलंकारों तथा पद – मैत्री की शोभा अवलोकनीय है । 

 

(8) जनता के विश्वास कर्म मन ध्यान श्रवण भाषण में।

वास करो, आदर्श बनो, विजयी हो जीवन-रण में।

अति अशांत दुखपूर्ण विश्रृंखल क्रान्ति उपासक जग में।

रखना अपनी आत्म शक्ति पर दृढ़निश्चय प्रति पग में।

शब्दार्थ – 

श्रवण = सुनना । जीवन रण = जीवन रूपी युद्ध । विश्रृंखल = बिखरी । क्रान्ति – उपासक उपद्रव करने वाले । दृढ़ = पक्का ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के सामाजिक समरसता ‘ पाठ के जीवन सन्देश ‘ शीर्षक से अवतरित है । इसके रचयिता रामनरेश त्रिपाठी हैं । 

प्रसंग – 

मानव को आत्मशक्ति के आधार पर आदर्श स्थापित करने की प्रेरणा दी गई है । 

व्याख्या – 

हे मनुष्य ! तुम ऐसे बनो कि जनता के कर्म , मन , ध्यान , श्रवण तथा भाषण में निवास करने लगो अर्थात् जनता तुम पर सभी तरह विश्वास करने लगे । तुम महान कार्य करो और जन – जन के आदर्श बन जाओ । इस तरह इस जीवन रूपी युद्ध के विजयोवीर बन जाओ । अत्यन्त अशान्ति से भरे , दुःखमय , बिखरावयुक्त और उपद्रव के पुजारी इस संसार में तुम्हें प्रत्येक कदम पर अपनी आत्मा के बल पर पक्का विश्वास रखना है । तुम्हें तुम्हारे कार्यों में अवश्य सफलता मिलेगी । 

विशेष – 

(1) शुद्ध , साहित्यिक खड़ी बोली का प्रयोग हुआ है । (2) रूपक , अनुप्रास अलंकारों का स्वाभाविक सौन्दर्य दर्शनीय है ।

 

(9) जग की विषम आँधियों के झोंके सम्मुख हो सहना।

स्थिर उद्देश्य-समान और विश्वास सदृश दृढ़ रहना।

जाग्रत नित रहना उदारता-तुल्य असीम हृदय में।

अन्धकार में शान्त, चन्द्रसा, ध्रुव-सा निश्चय भय में।

शब्दार्थ – 

विषम = विपरीत । सम्मुख = सामने । स्थिर = दृढ़ । सदृश = समान । नित = नित्य प्रति । तुल्य = समान । असीम = विशाल । निश्चल = अटल । 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के सामाजिक समरसता ‘ पाठ के जीवन सन्देश ‘ शीर्षक से अवतरित है । इसके रचयिता रामनरेश त्रिपाठी हैं । 

प्रसंग – 

यहाँ पर संकटों का सामना करते हुए सहनशील बनने की प्रेरणा दी गई है । 

व्याख्या – 

मनुष्य तुम इस जगत के विपरीत चलने वाली संकटों की आँधियों के झोंकों का सामना करते हुए सहन करना । तुम निश्चित उद्देश्य के समान दृढ़ रहना तथा विश्वास की तरह अडिग रहना । तुम्हारे विशाल हृदय में नित्यप्रति उदारता का भाव जाग्रत होता रहे । तुम अन्धकार में भी शान्त चन्द्रमा के समान बनना और इस संसार में निश्चय के प्रति ध्रुव के समान अटल बनना।

विशेष – 

(1) मानव को महान भावों से युक्त होने की प्रेरणा दी गई है । (2) उपमा, अनुप्रास , अलंकारों की शोभा अवलोकनीय है । (3) शुद्ध , साहित्यिक भाषा का प्रयोग किया गया है । 

 

(10) जगन्नियंता की इच्छा से यह संसार बना है।

उसकी ही क्रीड़ा का रूपक यह समस्त रचना है।

है यह कर्म-भूमि जीवों की यहाँ कर्मच्युत होना।

धोखे में पड़ना अलभ्य अवसर से है कर धोना॥

शब्दार्थ – 

जगन्नियंता = संसार को नियंत्रित करने वाले । क्रीड़ा = खेल । रचना = सृष्टि । कर्मच्युत = कर्म से विमुख । अलभ्य = दुर्लभ । कर धोना = हाथ धोना, खो देना ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के सामाजिक समरसता ‘ पाठ के जीवन सन्देश ‘ शीर्षक से अवतरित है । इसके रचयिता रामनरेश त्रिपाठी हैं । 

प्रसंग – 

परमात्मा की इच्छा के फलस्वरूप रचे गये इस संसार में कर्म से विमुख होना एक सुअवसर को गँवाना है । 

व्याख्या – 

परमपिता परमात्मा की इच्छा से यह सृष्टि (जगत) बनी है । इस समस्त संसार की रचना उसी परमात्मा की क्रीड़ा का ही स्वरूप है । यह जगत कर्म की भूमि है , यहाँ कर्म का ही महत्व है । इसलिए कर्म से विमुख होना भ्रम में रहना है तथा एक दुर्लभ अवसर को गँवाना है । 

विशेष – 

(1) ब्रह्म की कामना के फलस्वरूप बने इस लोक में कर्म की ही महिमा है । (2) शुद्ध , साहित्यिक खड़ी बोली का प्रयोग हुआ है । (3) कर्मच्युत होना , धोखे में पड़ना तथा हाथ धोना मुहावरों का सहज प्रयोग हुआ है । (4) अनुप्रास अलंकार एवं पद – मैत्री का सौन्दर्य दर्शनीय है । 

 

(11) पैदा कर जिस देश जाति ने तुमको पाला पोसा।

किए हुए वह निजहित का तुमसे बड़ा भरोसा।

उससे होना उऋण प्रथम है सत्कर्त्तव्य तुम्हारा।

फिर दे सकते हो वसुधा को शेष स्वजीवन सारा॥

शब्दार्थ – 

भरोसा = विश्वास । उऋण = कर्ज चुकाना , ऋण मुक्त होना । सत्कर्तव्य = श्रेष्ठ कर्म । वसुधा = पृथ्वी । स्वजीवन = अपना जीवन ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के सामाजिक समरसता ‘ पाठ के जीवन सन्देश ‘ शीर्षक से अवतरित है । इसके रचयिता रामनरेश त्रिपाठी हैं । 

प्रसंग – 

राष्ट्र तथा जाति के प्रति कर्त्तव्य को निभाने की प्रेरणा दी गई है । 

व्याख्या – 

जिस देश और जाति ने तुम्हें जन्म देकर तथा पाल – पोसकर बड़ा किया है वह तुमसे अपने उपकार का बड़ा विश्वास तुम पर किए हुए है । इसलिए उस देश एवं जाति के कर्ज से मुक्त होना तुम्हारा पहला श्रेष्ठ कार्य है । इसके पश्चात् अपने समस्त जीवन को पृथ्वी की भलाई में लगा सकते हो । 

विशेष –

(1) राष्ट्रहित में कर्मरत रहने को प्रेरित किया है । (2) साहित्यिक भाषा में विषय का प्रभावी प्रतिपादन किया है । (3) अनुप्रास अलंकार तथा पद – मैत्री की शोभा अवलोकनीय है ।

कबीरदास कवि परिचय 

जीवन परिचय – 

कबीरदास के जन्म स्थान के विषय में तीन मत हैं मगहर, काशी और आजमगढ़ । कबीर ने स्वयं को अनेक स्थानों पर काशी का जुलाहा कहा है । अतः उनका जन्म- स्थान काशी ( बनारस ) ही मानना उचित है । इस महापुरुष की जन्म तिथि के सम्बन्ध में यह दोहा प्रसिद्ध है 

“चौदह सौ पचपन साल गये , चन्द्रवार एक ठाठ भये । जेठ सुदी बरसाइत को , पूरनमासी प्रकट भये ।। 

दोहे के आधार पर कबीर का जन्म ज्येष्ठ सुदी पूर्णिमा सं. 1455 अर्थात् सन् 1398 माना गया है, जनश्रुति के आधार पर कबीरदास का जन्म रामानन्द के आशीर्वाद से एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से हुआ था जो इनको जन्म देते ही समाज के भय से लहरतारा तालाब के पास छोड़ आयी थी । नीरू और नीमा नामक जुलाहा दम्पत्ति को यह बालक पड़ा मिला और इन्होंने इनका पालन – पोषण किया । कबीरदास ने स्वामी रामानन्द को अपना गुरु बनाया । प्रारम्भ में रामानन्द ने कबीर को अपना शिष्य बनाने से इन्कार कर दिया । कहा जाता है कि गंगा नदी की सीढ़ियों पर  लेट जाने से रामानन्द का पैर कबीर पर पड़ गया । रामानन्द ने कबीर से कहा – ‘ राम – राम कहो , बेटा चोट तो नहीं लगी है । इस प्रकार रामानन्द ने कबीर को अपना शिष्य बना लिया । सन्त कबीर ने सफल गृहस्थ जीवन व्यतीत किया । उनकी स्त्री का नाम लोई तथा पुत्र का नाम कमाल और पुत्री का ‘ नाम कमाली था । कबीर सत्संग तथा भ्रमण चाहने वाले संत थे । उन्होंने समाज – सुधार का सराहनीय कार्य किया । कहा जाता है कि काशी में मरने से स्वर्ग और मगहर में मरने पर नरक मिलता है । अन्धविश्वासों के विरोधी कबीर मृत्यु के समय मगहर चले गये । उन्होंने 120 वर्ष की आयु में संवत् 1575 मगहर में अपने प्राण त्याग दिये । उनकी मृत्यु के सम्बन्ध में यह दोहा प्रसिद्ध है 

” सम्वत् पन्द्रह सौ पिचतरा , कियौ मगहर को गौन । माघ सुदी एकादशी , रह्यौ पौन में पौन ।। ” रचनाएँ- ” मसि कागद छूयौ नहि , कलम गही नहि हाथ ” 

कहने वाले कबीर अधिक पढ़े – लिखे नहीं थे , फिर भी उनमें अद्भुत प्रतिभा थी । वे अनुभव के आधार पर जो कुछ भी गा उठते थे , उनके शिष्य उसे लिख लेते थे । कबीर के शिष्य धर्मदास ने सर्वप्रथम 1521 वि . में उनकी रचनाओं का संग्रह बीजक ‘ नाम से किया । कबीर का अन्य ग्रन्थ ‘ कबीर ग्रन्थावली के नाम से काशी नागरी – प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित किया गया है । 

रचनाएं –

(1) साखी – साखियाँ

(2) सबद

(3) रमैनी

काव्यगत विशेषताएँ –

(अ) भावपक्ष (भाव तथा विचार) – 

भक्तिकाल की निर्गुण ज्ञानमार्गी शाखा के प्रतिनिधि कवि कबीर ने सामाजिक विकारों को दूर करने का भरसक प्रयास किया । अंधविश्वास , छुआछूत , वर्गभेद , जाति – पाँति आदि का विरोध करते हुए समतामूलक समाज की अवधारणा को पुष्ट करने का प्रयास कबीर ने किया है । समाज सुधारक के रूप में विख्यात इस कवि ने निर्भीकतापूर्वक सत्य का उद्घाटन किया है । गुरु महिमा , सदाचार , इन्द्रिय निग्रह , आडम्बरहीनता पर आपने बल दिया है । आपके काव्य का भावपक्ष प्रबल है । 

(ब) कलापक्ष (भाषा तथा शैली) – 

सीधी , सरल व्यावहारिक भाषा में कबीर ने काव्य रचना की है । आपकी भाषा में अरबी , फारसी , राजस्थानी , ब्रज आदि के शब्दों का मिश्रण है । कबीर स्थान – स्थान पर भ्रमण करते रहते थे , अतः विभिन्न क्षेत्रों की भाषाओं के शब्द मिलने से उनकी भाषा खिचड़ी बन गई । यद्यपि कबीर ने अलंकारों के चमत्कार विधान का प्रयास नहीं किया है फिर भी आपके काव्य में रूपक , उपमा , अनुप्रास आदि सभी अलंकार स्वाभाविक रूप में प्रस्तुत हुए हैं । उनके प्रतीक , बिम्ब तथा अन्योक्तियाँ अद्भुत हैं । 

साहित्य में स्थान – 

हिन्दी साहित्य के स्वर्ण युग माने जाने वाले भक्तिकाल के महान कवि कबीर अपने काव्य की सहजता , उत्कृष्टता के कारण उच्च स्थान के अधिकारी हैं । आप रचनाकारों के आदर्श रहे हैं ।

 

रामनरेश त्रिपाठी कवि परिचय 

जीवन परिचय – 

पं . रामनरेश त्रिपाठी का जन्म सन् 1889 ई . को जौनपुर जिले के कोइरीपुर नामक ग्राम में हुआ था । आपके पिता पंडित रामदत्त त्रिपाठी धार्मिक एवं कर्मनिष्ठ ब्राह्मण थे । इनकी स्कूली शिक्षा नवीं कक्षा तक ही चल सकी । इन्होंने स्वाध्याय से ज्ञानार्जन किया । जीवन के प्रारम्भिक काल से ही ये हिन्दी की सेवा करने लगे थे । उन्होंने साहित्य सेवा को ही जीवन का लक्ष्य बनाया । त्रिपाठी जी का काव्य आदर्शवाद की ओर उन्मुख है । छायावादी काव्य के सौन्दर्य की सूक्ष्म झलक भी यत्र – तत्र कविता में विद्यमान है । देश – प्रेम आपके काव्य का मूल आधार है । ग्राम्य – गीतों का संकलन आपके श्रम तथा निष्ठा का प्रतीक है । मानव प्रेम के आप पक्षधर हैं । प्रकृति चित्रण के कुशल चितेरे हैं । त्रिपाठी जी ने लोकगीतों का संग्रह किया था । सन् 1962 में इनका स्वर्गवास हो गया । 

रचनाएँ –

पथिक, मिलन, स्वप्न, मिल 

काव्यगत विशेषताएँ –

(अ) भावपक्ष (भाव तथा विचार) – रामनरेश त्रिपाठी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे । देशभक्ति , माधुर्य , ग्राम्य जीवन , त्याग , बलिदान , प्रकृति , मानवता आदि आपके काव्य – विषय रहे हैं । उन्होंने आदर्शवादी काव्य की रचना करके देश को उत्थान की ओर प्रेरित किया है । वे रचनात्मक विचारधारा के पोषक कवि थे । 

(ब) कलापक्ष (भाषा तथा शैली) – रामनरेश त्रिपाठी की भाषा शुद्ध , साहित्यिक खड़ी बोली है । इसमें व्याकरण सम्बन्धी त्रुटियों का अभाव ही है । इनकी भाषा विषयानुरूप बदलती रहती है । संस्कृत की तत्सम शब्दावली का पर्याप्त प्रयोग किया है । आपकी शैली में माधुर्य एवं प्रवाह का अद्भुत संयोग है । वर्णनात्मकता एवं उपदेशात्मकता आपकी शैली की विशेषताएँ हैं । अलंकारों , प्रतीकों का स्वाभाविक प्रयोग आपके काव्य की प्रमुख विशेषता है । 

साहित्य में स्थान – 

भ्रमण तथा स्वाध्याय में संलग्न रहने वाले रामनरेश त्रिपाठी आधुनिक हिन्दी कवियों में विशिष्ट स्थान रखते हैं । इन्होंने देश प्रेम , संस्कृति , भारतीयता , ग्राम जीवन पर दुर्लभ साहित्य उपलब्ध कराया है । हिन्दी साहित्य को सम्पन्न बनाने में इनका महत्वपूर्ण योगदान है । राष्ट्रीयता के पोषक साहित्यकार के रूप में उन्हें चिरकाल तक स्मरण किया जायेगा ।

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