MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions पद्य Chapter 8 कल्याण की राह

Chapter 8 कल्याण की राह

पथ की पहचान (हरिवंशराय बच्चन)

चरैवेति-जनगरबा (नरेश मेहता)

MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions पद्य Chapter 8 कल्याण की राह

In this article, we will share MP Board Class 10th Hindi Solutions पद्य Chapter 8 कल्याण की राह Pdf, These solutions are solved subject experts from the latest edition books.

 

कल्याण की राह अति लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1. 

चलने से पूर्व बटोही को क्या करना चाहिए ? 

उत्तर – 

चलने से पूर्व बटोही को सही पथ की पहचान कर लेनी चाहिए ।

प्रश्न 2. 

कवि के अनुसार व्यक्ति को किस रास्ते पर चलना चाहिए ?

उत्तर – 

कवि के अनुसार व्यक्ति को महापुरुषों के द्वारा छोड़े गए पग चिह्नों वाले रास्ते पर चलना चाहिए । 

प्रश्न 3. 

प्रत्येक सफल राहगीर क्या लेकर आगे बढ़ा है ?

उत्तर – 

प्रत्येक सफल राहगीर अपने रास्ते को अच्छा मानने का विश्वास लेकर आगे बढ़ा 

प्रश्न 4. 

नरेश मेहता अपनी कविता में किसके साथ चलने की बात कह रहे हैं ? 

उत्तर – 

नरेश मेहता अपनी कविता में कर्ममय गति के साथ निरन्तर चलते रहने की बात कह रहे हैं । 

प्रश्न 5. 

नदियाँ आगे चलकर किस रूप में परिवर्तित हो जाती हैं ? 

उत्तर – 

नदियाँ आगे चलकर समुद्र के रूप में परिवर्तित हो जाती हैं ।

प्रश्न 6. 

कवि ने रुकने को किसका प्रतीक माना है ?

उत्तर – 

कवि ने रुकने को मृत्यु का प्रतीक माना है ।

 

कल्याण की राह लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. 

स्वप्न पर मुग्ध न होने की राय कवि क्यों देता है ? 

उत्तर – 

कवि हरिवंशराय बच्चन मानते हैं कि जीवन में आगे बढ़ने के लिए भविष्य के स्वप्न देखना आवश्यक है परन्तु इन स्वप्नों को मूर्त रूप देना तभी संभव है जब स्वप्न के साथ सत्य का सही सामंजस्य हो । यथार्थ के सहयोग से ही स्वप्न का साकार होना संभव है । बिना सत्य के कोरे स्वप्न देखकर प्रसन्न होना मूर्खता है । इसीलिए कवि स्वप्न पर मुग्ध न होने की राय देता है 

प्रश्न 2. 

कवि ने जीवन पथ में क्या – क्या अनिश्चित माना है ?

उत्तर – 

कवि हरिवंशराय बच्चन मानते हैं कि जीवन में बहुत – सी अनिश्चितताएँ हैं । पता नहीं किस स्थान पर नदी, पर्वत और गुफाओं जैसी दुर्गम कठिनाइयों से भरा मार्ग मिल जाये । यह भी अज्ञात है कि किस स्थान पर सुन्दर बाग, वन आदि मिल जायेंगे । यह अनिश्चित है कि जीवन पथ की यात्रा किस स्थान पर समाप्त हो जायेगी । इस बात को भी दृढ़तापूर्वक नहीं कहा जा सकता है कि जीवन के मार्ग में कब फूल जैसे कोमल स्वभाव वाले व्यक्ति मिलेंगे और कब काँटों के बाण जैसे तीखे स्वभाव वाले दुष्टजन मिल जायेंगे । इस जीवन पथ पर हमसे अचानक कौन – सी वस्तु छूट जायेगी और कौन – सी नई मिल जायेगी । यह सब अनिश्चित है । 

प्रश्न 3. 

कवि के अनुसार जीवन पथ के यात्री को पथ की पहचान क्यों आवश्यक है ?

उत्तर – 

कवि हरिवंशराय बच्चन मानते हैं कि मानव को जीवन का मार्ग सोच – विचार कर अपनाना चाहिए । जीवन में महान बनने का निश्चित लक्ष्य लेकर, उसी के अनुरूप जीवन पथ अपनाना आवश्यक है । जीवन पथ का चयन महापुरुषों की जीवनियों के आधार पर निश्चित किया जा सकता है । जीवन पथ निश्चित कर उसमें अच्छे – बुरे का द्वन्द्व नितान्त अनुचित है क्योंकि हर सफल पंथी दृढ़ विश्वास के सहारे ही मार्ग पर चलता जाता है । महान जीवन जीने का भाव आते ही तन – मन में उत्साह भर जाता है । उस समय सही जीवन पथ की पहचान न हुई है । असफलता हाथ लग सकती है । अत : जीवन पथ के यात्री को जीवन पथ की पहचान होना आवश्यक है । 

प्रश्न 4. 

कवि के अनुसार क्षितिज के उस पार कौन बैठा है और क्यों ? 

उत्तर – 

कवि नरेश मेहता मानते हैं कि मनुष्य को लगातार गतिशील रहना चाहिए । मानव को रत्नों से परिपूर्ण इस धरती पर चलते रहने के लिए ही दो पैर दिए गये हैं । यदि मनुष्य चलता रहे तो उसे सभी प्रकार की सम्पदाएँ प्राप्त होंगी । धन की देवी लक्ष्मी पूरी तरह सुसज्जित होकर क्षितिज के उस पार बैठी है । वह गतिशील मानव को मनमाना वरदान देना चाहती है । आवश्यकता इस बात की है कि मानव गतिशील होकर उसके निकट तक पहुँच जाये । 

प्रश्न 5. 

मानव जिस ओर गया उधर क्या – क्या हुआ ?

उत्तर – 

मानव अपार क्षमता – सम्पन्न है । बस आवश्यकता इस बात की है । वह जीवन में गतिशील हो । कर्ममय गति के साथ मनुष्य जिस ओर भी गया उस ओर सृजन होते चले गये । नगर बसे , तीर्थ आदि बने । कर्मशील मानव से बड़ा कोई भी नहीं है । उसने अपनी सक्रियता से नभ लोक तथा पाताल लोक पर विजय पा ली है । समुद्र के गर्भ से उसने अपार सम्पदा प्राप्त कर ली है । आकाश में इसकी विजय पताका फहरा रही है । इस प्रकार जिस ओर भी मानव गया उधर सृजन होता गया है , उसकी विजय हुई है । 

प्रश्न 6. 

‘चरैवेति जनगरबा’ कविता में कवि ने लोगों को क्या – क्या सलाह दी है ?

उत्तर – 

‘चरैवेति जनगरबा’ कविता में कवि ने लोगों को निरन्तर चलते रहने की सलाह दी है । प्रकृति सूर्य, चन्द्रमा, नदियों, बादलों की गतिशीलता का उदाहरण देते हुए बताया है कि ये गतिशील हैं इसीलिए महान हैं । मानव धन – सम्पदा चाहता है वह भी सक्रिय होकर ही पा सकता है । अपार रत्नों की भण्डार धरा से भी कर्ममय गति से सब कुछ पा सकते हैं । इस प्रकार कवि ने मानव को काम करते हुए निरन्तर आगे बढ़ने की सलाह दी है ।

कल्याण की राह दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. 

कवि चलने से पूर्व बटोही को किन – किन बातों के लिए आगाह कर है ?

उत्तर – 

चलने से पूर्व बटोही को कवि ने विविध बातों के लिए आगाह किया है । वे कहते हैं कि जीवन पथ का चयन पुस्तकों से या अन्य लोगों के बताने से नहीं किया जा सकता है क्योंकि असंख्य लोगों ने जीवन जिया है । सावधान करते हैं अच्छे या बुरे का विचार करना भी जीवन पथ में उचित नहीं है । जो मार्ग चुन लिया जाय उसे ही श्रेष्ठ मानने से सफलता मिलती है । अनिश्चितताओं के प्रति आगाह करते हुए कवि बताते हैं कि मार्ग में कहाँ नदी , पर्वत , गुफा आदि मिलेंगी और कहाँ बाग , सुन्दर वन मिलेंगे यह निश्चित नहीं है । यह भी पता नहीं है कि यात्रा कब समाप्त हो जायेगी । यह भी अनिश्चित है कि पथ में कब आसानी होगी और कब कठिनाई । मार्ग में क्या छूट जायेगा और क्या मिलेगा यह भी अज्ञात है । इस अनिश्चय की स्थिति में रुकना नहीं है । जीवन के भविष्य के स्वप्न देखना स्वाभाविक है परन्तु उन पर प्रसन्न होने की आवश्यकता नहीं । यथार्थ के सामंजस्य से ही ये सफल होते हैं । तुम्हारी दृष्टि भले ही स्वर्ग में हो पर तुम्हारा आधार यह धरती ही होनी चाहिए । इस प्रकार चलने से पूर्व बटोही को इन सभी बातों के प्रति जागरूक रहना आवश्यक है । 

प्रश्न 2. 

स्वप्न और यथार्थ में संतुलन किस तरह आवश्यक है ? स्पष्ट करें ।

उत्तर – 

जीवन के सफल भविष्य के लिए स्वप्न देखना नितान्त स्वाभाविक है । यदि स्वप्न न देखेंगे तो प्रयास किसके लिए किया जायेगा । कवि हरिवंशराय बच्चन स्पष्ट कहते हैं कि मात्र स्वप्न देखना पर्याप्त नहीं है । स्वप्न के साथ सत्य का , यथार्थ का संतुलन आवश्यक है । स्वप्न अपने साथ कुछ लक्ष्य लेकर आते हैं । उस लक्ष्य पर मनन – चिन्तन करना आवश्यक है । यह देखना है कि इसमें कितनी संभावनाएं हैं । यथार्थ का ठोस आधार ही स्वप्न को साकार कर सकता है । स्वप्न और यथार्थ का संतुलन ही सिद्धि का कारण बनता है । इसलिए इनमें संतुलन स्थापित करना आवश्यक है । 

प्रश्न 3.

‘चरैवेति – जनगरबा’ कविता का मूल आशय क्या है ? 

उत्तर – 

काव्य लोक कल्याण की प्रेरणा का स्रोत रहा है । इसी भावना से प्रेरित बच्चन जी ने ‘पथ की पहचान’ कविता में मंगलमय पथ अपनाने का आग्रह किया है । कवि का उद्बोधन है कि जीवन के रहस्य को जानने के लिए ऐसी जीवनियों को समझना आवश्यक है जिन्होंने लोकमंगल के विधान में अपना जीवन लगा दिया । जब व्यक्ति दृढ़ संकल्प के साथ चल पड़ता है तो उसका विश्वास बढ़ता जाता है और मार्ग की कठिनाइयाँ स्वत : ही समाप्त होती जाती हैं । जीवन के मार्ग में कौन, कैसे मिलेगा या बिछड़ जायेगा यह भी निश्चित नहीं है किन्तु मार्ग पर चलते ही रहना है । जीवन में स्वप्नों की बड़ी महिमा है । स्वप्न ही महानता का मार्ग दर्शाते हैं परन्तु स्वप्न के साथ कर्म का सत्य होना आवश्यक है । दोनों का समुचित समन्वय ही सफलता की ओर अग्रसर करता है । स्वप्नों को साकार करना तभी संभव है जब यथार्थ कर्म का दृढ़ सम्बल पास हो । अतः मानव को अटल संकल्प के साथ अपने जीवन पथ को पहचानकर चलने की आवश्यकता है ।

प्रश्न 4. 

कवि युग के संग – संग चलने की सीख क्यों दे रहा है ? 

उत्तर – 

कवि नरेश मेहता ने ‘चरैवेति – जनगरबा’ कविता में जीवंतता का लक्षण गतिशीलता को बताया है । व्यक्ति की कर्ममय गति ही जीवन को सफल बनाती है । गति भी अपने समय के अनुरूप होनी चाहिए । हर युग की परिस्थितियाँ भिन्न – भिन्न होती हैं । मान्यताएँ , जीवन शैली , व्यवहार आदि भी समय – समय पर बदलते रहते हैं । किसी महापुरुष ने जिस समय में एक विशेष प्रकार की गतिशीलता और कर्मठता से सफलता प्राप्त कर ली यह आवश्यक नहीं कि उसी प्रकार की गतिशीलता दूसरे युग में भी सफलता प्रदान करा सके । कवि गति के महत्व को रेखांकित करते हुए कहते हैं कि गतिहीनता मरण का लक्षण है । इसीलिए अपने युग के साथ – साथ चलते रहने की सीख कवि दे रहा है । 

पथ की पहचान भाव – सारांश 

काव्य लोक कल्याण की प्रेरणा का स्रोत रहा है । इसी भावना से प्रेरित बच्चन जी ने ‘पथ की पहचान’ कविता में मंगलमय पथ अपनाने का आग्रह किया है । कवि का उद्बोधन है कि जीवन के रहस्य को जानने के लिए ऐसी जीवनियों को समझना आवश्यक है जिन्होंने लोकमंगल के विधान में अपना जीवन लगा दिया । जब व्यक्ति दृढ़ संकल्प के साथ चल पड़ता है तो उसका विश्वास बढ़ता जाता है और मार्ग की कठिनाइयाँ स्वत : ही समाप्त होती जाती हैं । जीवन के मार्ग में कौन, कैसे मिलेगा या बिछड़ जायेगा यह भी निश्चित नहीं है किन्तु मार्ग पर चलते ही रहना है । जीवन में स्वप्नों की बड़ी महिमा है । स्वप्न ही महानता का मार्ग दर्शाते हैं परन्तु स्वप्न के साथ कर्म का सत्य होना आवश्यक है । दोनों का समुचित समन्वय ही सफलता की ओर अग्रसर करता है । स्वप्नों को साकार करना तभी संभव है जब यथार्थ कर्म का दृढ़ सम्बल पास हो । अतः मानव को अटल संकल्प के साथ अपने जीवन पथ को पहचानकर चलने की आवश्यकता है । 

 

पथ की पहचान सन्दर्भ, प्रसंग सहित पद्यांशों की व्याख्या 

(1) पूर्व चलने के बटोही

बाट की पहचान कर ले।

पुस्तकों में है नहीं छापी

गयी इनकी कहानी,

हाल इनका ज्ञात होता

हैन औरों की जुबानी।

अनगिनत राही गए इस

राह से, उनका पता क्या,

पर गए कुछ लोग इस पर

छोड़ पैरों की निशानी,

यह निशानी मूक होकर

भी बहुत कुछ बोलती है,

खोल इसका अर्थ, पंथी

पंथ का अनुमान कर ले।

पूर्व चलने के बटोही

बाट की पहचान कर ले।

शब्दार्थ – 

बटोही = राहगीर । बाट = पथ । निशानी = चिह्न । मूक = चुप , मौन । अनगिनत = असंख्य । राही पंथी, राहगीर ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के कल्याण की राह पाठ के ‘पथ की पहचान’ शीर्षक से अवतरित है । इसके रचयिता हरिवंशराय बच्चन हैं।

प्रसंग – 

यहाँ पर मनुष्य को जीवन का उचित मार्ग चुनने का परामर्श दिया गया है । 

व्याख्या – 

हे राहगीर ! तू चलने से पहले सही जीवन पथ का ज्ञान प्राप्त कर ले । उचित मार्ग का उल्लेख बड़े – बड़े ग्रन्थों में नहीं छपा है । इसका सही ज्ञान दूसरों के कहने पर भी नहीं हो जाता है । असंख्य व्यक्तियों ने इस जीवन को जिया और वे इस संसार से विदा हो गये । आज उनका कुछ भी अता – पता नहीं है , किन्तु कुछ महापुरुष जीवन को आदर्श रूप से जीकर अपने चरण यह छोड़ गये हैं । उनके आदर्श जीवन – मार्ग चुप रहते हुए भी एक उपदेश दे रहे हैं । आवश्यकता इस बात की है कि हे राहगीर ! तू उनके जीवन के रहस्य को समझकर और सही का अनुमान करके उसका अनुसरण कर । हे राहगीर ! मार्ग पर चलने से पूर्व सही पथ की पहचान कर ले । 

विशेष – 

(1) महापुरुषों के आदर्श जीवन से प्रेरणा लेने का परामर्श दिया गया है । (2) सरल , शुद्ध साहित्यिक खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है । (3) विरोधाभास , अनुप्रास अलंकार तथा पद – मैत्री की सहजता अवलोकनीय है । (4) वीर रस । 

 

(2) यह बुरा है या कि अच्छा,

व्यर्थ दिन इस पर बिताना,

अब असम्भव, छोड़ यह पथ

दूसरे पर पग बढ़ाना,

तू इसे अच्छा समझ,

यात्रा सरल इससे बनेगी,

सोच मत केवल तुझे ही,

यह पड़ा मन में बिठाना,

हर सफल पंथी,

यही विश्वास ले इस पर बढ़ा है।

तू इसी पर आज अपने

चित्त का अवधान कर ले।

पूर्व चलने के बटोही

बाट की पहचान कर ले।

शब्दार्थ – 

व्यर्थ = बेकार । असम्भव = न हो सकने वाला । पग = कदम , पैर । चित्त – मन । अवधान = ध्यान , निश्चय ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के कल्याण की राह पाठ के ‘पथ की पहचान’ शीर्षक से अवतरित है । इसके रचयिता हरिवंशराय बच्चन हैं।

प्रसंग – 

यहाँ बताया गया है कि विश्वास के साथ अपने कर्म मार्ग पर बढ़ना ही श्रेयस्कर है । 

व्याख्या – 

बुरे – भले का द्वन्द्व व्यर्थ है । यह अच्छा है या बुरा इसमें समय व्यर्थ करना बेकार है ? इसे विचार करके मानना चाहिए । इससे जीवन – यात्रा आसान बन जायेगी । यह विचार भी मन से निकाल दे कि यह चल देने की धारणा भी ठीक नहीं है । इसलिए जो मार्ग अपना लिया है उसे ही विश्वासपूर्वक अच्छा मानना चाहिए इससे जिवन यात्रा आसान बन जाएगी । यह विचार भी मन से निकाल दे की यह धारणा मात्र तुझे ही मन में बिठानी पड़ी है । प्रत्येक सफल ( जीवन ) इसी भरोसे के सहारे गतिवान हुआ है । इसलिए हे पथिक ! तू भी अपने मन में उसी का स्थिर ध्यान कर ले । हे राहगीर ! तुझे किसी मार्ग पर चलने से पूर्व उस मार्ग की पूरी तरह जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए । 

विशेष – 

(1) प्रवाहवान भाषा में विषय को प्रभावकारी ढंग से प्रस्तुत किया गया है । (2) अनुप्रास अलंकार तथा पद – मैत्री । (3) गीत शैली । 

 

(3) है अनिश्चित किस जगह पर,

सरित, गिरि, गह्वर मिलेंगे,

है अनिश्चित किस जगह पर,

बाग, वन, सुन्दर मिलेंगे।

किस जगह यात्रा खत्म हो

जाएगी, यह भी अनिश्चित,

है अनिश्चित कब सुमन, कब

कंटकों के शर मिलेंगे,

कौन सहसा छूट जाएंगे,

मिलेंगे कौन सहसा,

आ पड़े कुछ भी, रुकेगा

तू न, ऐसी आन कर ले।

पूर्व चलने के, बटोही

बाट की पहचान कर ले।

शब्दार्थ – 

सरित = नदी । गिरि = पर्वत । गह्वर = गुफाएँ । कंटक = काँटे । शर = बाण । सहसा = अचानक । आन = प्रतिज्ञा । बटोही = राहगीर ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के कल्याण की राह पाठ के ‘पथ की पहचान’ शीर्षक से अवतरित है । इसके रचयिता हरिवंशराय बच्चन हैं।

प्रसंग – 

कवि पथिक को परामर्श देता है कि इस जीवन रूपी पथ का कोई भरोसा नहीं है कि कब क्या घटना घटित हो जाये । 

व्याख्या – 

जीवनरूपी पथ अनिश्चयों से भरा हुआ है , ज्ञात नहीं है कि किस स्थान पर नदी , पर्वत और गुफाओं जैसी दुर्गम कठिनाइयाँ मिल जायें । यह भी अनिश्चित है कि बाग और सुन्दर वन जैसी सरलता और सौन्दर्य की किसी स्थान पर प्राप्ति हो जाये । जीवन के किस स्थान पर , किस मोह पर जीवन – पथ की यात्रा समाप्त हो जायेगी यह भी नहीं कहा जा सकता है । इस बात को भी हम दृढ़तापूर्वक नहीं कह सकते कि कब फूल जैसे कोमल मनुष्य और कब काँटों के बाण की तरह दुष्टजन मिल जायेंगे । इस जीवन – पथ पर न जाने कौन – सी वस्तु अचानक हमसे छूट जायेगी और कौन – सी अचानक प्राप्त हो जायेगी – कुछ भी निश्चयपूर्वक कहा नहीं जा सकता । हे पथिक ! तू इस बात की दृढ़ प्रतिज्ञा कर ले कि चाहे जो प्राप्त हो जाये या कुछ भी न मिले , परन्तु तू रुकेगा नहीं , विश्राम नहीं लेगा , चलता ही चलेगा । अतः हे जीवन रूपी पथ के पथिक ! तू चलने से पहले अपने पथ को अच्छी तरह पहचान ले । भाव यह है कि जीवन के पथिक को यहाँ कडुआ – मीठा सभी कुछ सहना पड़ता है ।

विशेष – 

(1) जीवन – पथ अनिश्चित है , इसके बारे में पहले से कुछ कहा नहीं जा सकता । (2) भाषा सरल , सरस और प्रवाहपूर्ण है । (3) अलंकार – क्रमालंकार , अनुप्रास , रूपकातिशयोक्ति । (4) गीत शैली ।

 

(4) कौन कहता है कि स्वप्नों,

को न आने दे हृदय में,

देखते सब हैं इन्हें

अपनी उमर, अपने समय में.

और तू कर यत्न भी तो

मिल नहीं सकती सफलता,

ये उदय होते, लिए कुछ

ध्येय नयनों के निलय में

किंतु जग के पंथ पर यदि

स्वप्न दो तो सत्य दो सौ,

स्वप्न पर ही मुग्ध मत हो,

सत्य का भी ज्ञान कर ले।

पूर्व चलने के, बटोही

बाट की पहचान कर ले।

शब्दार्थ – 

उमर = आयु । ध्येय = उद्देश्य । यल = प्रयत्न , प्रयास । उदय = उगते । नयनों = नेत्रों । निलय = आवास , मध्य । मुग्ध = प्रसन्न । 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के कल्याण की राह पाठ के ‘पथ की पहचान’ शीर्षक से अवतरित है । इसके रचयिता हरिवंशराय बच्चन हैं।

प्रसंग – 

यहाँ सत्य पर आधारित सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी गयी है । 

व्याख्या – 

हे जीवन – पथ के पथिक ! तुझे हृदय में भविष्य के सुखद स्वप्न सँजोने से कौन रोक रहा है ? इन स्वप्नों को तो जीवन की उठती उम्र में तथा युवाकाल में सभी देखते हैं । यदि तू चाहे प्रयत्न भी करे कि तेरे सभी स्वप्न साकार हो जायें तो यह सम्भव नहीं है । इसमें तुझे सफलता नहीं मिल पायेगी । ये स्वप्न नेत्रों के मध्य कुछ उद्देश्य लेकर पैदा होते हैं । यह लक्ष्य ही महत्वपूर्ण हे पथिक ! तू यह भी जान ले कि यह संसार सत्य पर आधारित है । यहाँ स्वप्न यदि दो हैं तो सत्य दो सौ हैं । इसलिए तू स्वप्न सँजोकर उन्हीं पर प्रसन्न मत हो । सत्य का ज्ञान प्राप्त कर लेना भी तेरे लिए आवश्यक है । अत : हे राहगीर ! जीवन मार्ग पर चलने से पूर्व सही पथ की 

विशेष – 

(1) सत्य पर आधारित स्वप्न ही सफलता की सीढ़ी है । अत : सफल जीवन के लिए सत्य की पहचान आवश्यक है । (2) मुहावरों से युक्त लाक्षणिक भाषा है । (3) रूपक . अनुप्रास अलंकारों का सहज सौन्दर्य दर्शनीय है । (4) गीत शैली ।

 

(5) स्वप्न आता स्वर्ग:का; द्रग

कोरकों में दीप्ति आती,

पंख लग जाते पगों को

ललकती उन्मुक्त छाती,

रास्ते का एक काँटा

पाँव का दिल चीर देता,

रक्त की दो बूंद गिरती

एक दुनिया डूब जाती,

आँख में ही स्वर्ग लेकिन

पाँव पृथ्वी पर टिके हों,

कंटकों की इस अनोखी

सीख का सम्मान कर ले।

पूर्व चलने के, बटोही

बाट की पहचान कर ले।

शब्दार्थ – 

दृग = कोरक आँखों के कोनों । दीप्ति = चमक । पंख लगना = उड़ने की इच्छा होना । पगों = पैरों । रक्त = खून । उन्मुक्त = खुली हुई । ललकती = उत्साही । अनोखी विचित्र । 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के कल्याण की राह पाठ के ‘पथ की पहचान’ शीर्षक से अवतरित है । इसके रचयिता हरिवंशराय बच्चन हैं। 

प्रसंग –

यहाँ कवि जीवन – पथ के पथिक को आदर्श और यथार्थ के उचित सामंजस्य हेतु सचेत करता है । 

व्याख्या – 

हे जीवन – पथ के पथिक ! जब तू आदर्शों के ऊँचे – ऊँचे सपनों को सँजोता है , तब तेरे नेत्रों के कोनों में प्रसन्नता की एक विशेष प्रकार की चमक आ जाती है । तू उन आदर्शों की प्राप्ति के लिए उत्सुक हो उठता है और तेरा वक्षस्थल उमंग से भर उठता है । तेरे पैर ऐसी तीव्रता से उठने लगते हैं , मानो उनमें पंख लग गये हों परन्तु जीवन – पथ का एक ही काँटा अर्थात् यथार्थ का एक ही झटका आदर्शों की प्राप्ति के लिए तीव्र गति से दौड़ते हुए पैरों का हृदय चीर देता है । इस प्रकार पैर से दो बूँद रक्त की गिरती हैं और सपनों का संसार नष्ट हो जाता है । फिर ऐसा लगने लगता है , मानो यथार्थ की कठिनाइयाँ आदर्शों को साकार नहीं होने देंगी । किन्तु यह कंटकाकीर्ण राह – पथ के दृढ़ निश्चयी को रोकती नहीं है , अपितु उसे सचेत करती है कि तुम्हारी आँख में आदर्शों के ऊँचे – ऊँचे सपने तो हों लेकिन यह भी आवश्यक है कि तुम यथार्थ से जुड़े रहो , अर्थात् आदर्शों के साथ – साथ यथार्थ की भूमि से पैर नहीं हटने चाहिए । यथार्थ जीवन में आने वाली कठिनाइयाँ ( कंटक ) यही अद्भुत शिक्षा देती हैं । हे जीवन – पथ के पथिक ! तू पहले ठीक प्रकार से अपने जीवन – पथ को पहचान तब आगे बढ़ अर्थात् पथ पर चलने से पहले तू पथ को अच्छी प्रकार पहचान ले । 

विशेष – 

(1) कवि ने जीवन में आदर्श और यथार्थ के समन्वय हेतु सलाह दी है । (2) भाषा में संगीतात्मकता , प्रवाह और भावों को वहन करने की शक्ति है । (3) अनुप्रास , उपमा , रूपकातिशयोक्ति , लोकोक्ति , विशेषण – विपर्यय अलंकारों का सौन्दर्य अवलोकनीय है ।

चरैवेति जनगरबा भाव सारांश

रचनात्मक सृजनशीलता के धनी नरेश मेहता ने इस कविता में सतत् कर्मठ बने रहने का परामर्श दिया है । चलते रहने में ही मानव का हित है । जिस तरह सूर्य निरन्तर चलते रहकर अंधकार की कारा से मुक्ति दिलाता है , पृथ्वी को रंगीन बनाता है और ऋतुओं का शृंगार करता है । उसी प्रकार कर्मशील रहकर ही व्यक्ति सम्पन्न बन सकता है । गतिशीलता के कारण ही नदियाँ सागर का रूप ग्रहण करती हैं , बादल धरती के भण्डार को भरते हैं । रुकना ही मृत्यु है । मनुष्य ने सक्रिय रहकर ही सागर से आकाश तक अपनी विकास यात्रा का ध्वज फहराया है । सर्वोत्तम पाने के लिए नवीनता को ग्रहण कर गतिशील रहना आवश्यक है । गतिशीलता ही मानव को विजय पथ पर अग्रसर करती रहेगी ।

 

चरैवेति जनगरबा सन्दर्भ, प्रसंग सहित पद्यांशों की व्याख्या

(1) चलते चलो, चलते चलो।

सूरज के संग-संग चलते चलो, चलते चलो॥

तम के जो बन्दी थे

सूरज ने मुक्त किये

किरनों से गगन पोंछ

धरती को रंग दिये

सूरज को विजय मिली, ऋतुओं की रात हुई

कह दो इन तारों से चन्दा के संग-संग चलते चलो॥

शब्दार्थ – 

तम = अंधकार । बन्दी = बंधनों से युक्त । मुक्त आजाद , स्वतंत्र । रंग दिये = शोभा दी ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘कल्याण की राह’ पाठ के ‘चरैवेति – जनगरबा’ शीर्षक से लिया गया है । इसके रचियता नरेश मेहता हैं । 

प्रसंग – 

यहाँ सूर्य की कर्मशीलता के द्वारा मनुष्य को सक्रिय रहने का परामर्श दिया गया 

व्याख्या – 

हे मनुष्य ! निरन्तर चलते रहो । तुम्हें कभी न रुकने वाले सूर्य के साथ चलते ही रहना चाहिए । अंधकार ने जिनको अभी तक अपने बंधन में बंद कर रखा था , सूर्य की गतिशीलता से वे सभी स्वतंत्र हो गये । सूर्य की प्रकाश किरणों ने आकाश को साफ कर दिया और धरती को रंगीन बना दिया है । गति धर्म का पालन करने वाला सूर्य विजयी हो गया । चन्द्रमा की गतिशीलता के कारण रात्रि सुसज्जित हो उठी , तारे आकाश में चमकने लगे हैं । मनुष्य को भी चन्द्रमा के समान चलते ही रहना चाहिए ।

विशेष – 

(1) शुद्ध , साहित्यिक भाषा का प्रयोग किया है । (2) पुनरुक्तिप्रकाश , अनुप्रास अलंकार तथा पद – मैत्री की शोभा अवलोकनीय है । (3) प्रकृति का प्रेरक रूप में चित्रण ।

 

(2) रत्नमयी वसुधा पर

चलने को चरण दिये

बैठी उस क्षितिज पार

लक्ष्मी, श्रृंगार किये।

आज तुम्हें मुक्ति मिली, कौन तुम्हें दास कहे

स्वामी तुम ऋतुओं के, संवत् के संग-संग चलते चलो!! 

शब्दार्थ – 

रलमयी = रत्नों से युक्त । वसुधा = पृथ्वी । क्षितिज = किनारे , जहाँ धरती और आकाश मिले हुए प्रतीत होते हैं । दास = गुलाम , पराधीन 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘कल्याण की राह’ पाठ के ‘चरैवेति – जनगरबा’ शीर्षक से लिया गया है । इसके रचियता नरेश मेहता हैं । 

प्रसंग – 

यहाँ मनुष्य को कर्म के सहारे समस्त सम्पदा पाने का परामर्श दिया गया है । 

व्याख्या – 

हे मानव ! रत्नों से भरी इस पृथ्वी पर चलने के लिए परमात्मा ने पैर दिये हैं । अत : तुम्हें लगातार चलते रहकर पृथ्वी के उस किनारे सज – धज कर बैठी धन की देवी लक्ष्मी को प्राप्त करना है । सम्पन्नता मिलने पर तुम बंधन मुक्त होंगे । तुम्हें कोई भी गुलाम नहीं कह पायेगा । कर्म के द्वारा गतिशील रहकर तुम ऋतुओं के स्वामी हो जाओगे , बस तुम सम्वत् के साथ चलते रहो । 

विशेष – 

(1) परामर्श दिया गया है कि स्वाधीन तथा सम्पन्न बनने के लिए समय के साथ चलना आवश्यक है । (2) पुनरुक्तिप्रकाश , अनुप्रास अलंकारों का स्वाभाविक प्रयोग दर्शनीय है । 

 

(3) नदियों ने चलकर ही

सागर का रूप लिया

मेघों ने चलकर ही

धरती को गर्भ दिया

रुकने का मरण नाम, पीछे सब प्रस्तर है।

आगे है देवयान, युग केही संग-संग चलते चलो!!

शब्दार्थ – 

मेघों = बादलों । मरण = मृत्यु । प्रस्तर = पत्थर । देवयान = देवताओं के बैठने का वाहन ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘कल्याण की राह’ पाठ के ‘चरैवेति – जनगरबा’ शीर्षक से लिया गया है । इसके रचियता नरेश मेहता हैं ।  

प्रसंग – 

यहाँ बताया गया है कि गतिशील रहकर मानव देवत्व तक पा सकता है । यदि वह रुक गया तो मृत्यु ही मिलेगी । 

व्याख्या –

गति का महत्व बताते हुए कवि कहता है कि क्षीण आकार की नदियों ने गतिशीलता के द्वारा ही विशाल समुद्र का रूप प्राप्त कर लिया है । गति को अपनाकर ही बादलों ने धरती को गर्भ प्रदान किया है अर्थात् बादलों से पानी गिरते हो धरती के गर्भ से अनेक वनस्पतियाँ उग जाती हैं । हे मनुष्य ! तू स्पष्ट जान ले कि जीवन में रुकने का , कर्महीन होने का नाम मृत्यु है । मृत्यु के पश्चात् मात्र पत्थर ही शेष रहते हैं , कुछ प्राप्त नहीं होता है । यदि तुम गतिशील रहकर कर्म करते रहोगे तो तुम्हारे स्वागत के लिए देवताओं के रथ तैयार खड़े हैं । इसलिए तुम समय के साथ चलते ही चलो । 

विशेष – 

(1) गति को देवत्व पाने का साधन तथा रुकने को मरण का मार्ग बताया गया है । (2) शुद्ध साहित्यिक खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है । (3) पुनरुक्तिप्रकाश , अनुप्रास अलंकारों का स्वाभाविक प्रयोग दर्शनीय है । 

 

(4) मानव जिस ओर गया

नगर बसे, तीर्थ बने

तुमसे है कौन बड़ा

गगन सिन्धु मित्र बने

भूमा का भोगो सुख, नदियों का सोम पियो।

त्यागो सब जीर्ण बसन, नूतन के संग-संग चलते चलो!!

शब्दार्थ – 

मानव = मनुष्य । सिंधु = समुद्र । भूमा = पृथ्वी । सोम = अमृत । जीर्ण = पुराने । वसन – वस्त्र । नूतन = नवीन ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘कल्याण की राह’ पाठ के ‘चरैवेति – जनगरबा’ शीर्षक से लिया गया है । इसके रचियता नरेश मेहता हैं । 

प्रसंग – 

गति के फलस्वरूप हुई मानव की विकास यात्रा की ओर संकेत करते हुए नवीनता को अपनाकर आगे बढ़ने का परामर्श दिया गया है । 

व्याख्या – 

कर्म करते हुए मनुष्य ने जिस तरफ भी कदम बढ़ाए उसी तरफ नगर , तीर्थ आदि बनते चले गये । हे गतिशील मनुष्य ! तुमसे बड़ा कोई नहीं है , भूलोक ही नहीं आकाश तथा पाताल भी तुम्हारे अपने प्रिय हो गए हैं । हे मानव ! तुम नदियों का जल रूपी अमृत पीयो और पृथ्वी के सभी आनन्दों का उपयोग करो । तुम पुराने वस्त्र त्याग दो और नवीनता के साथ – साथ चलते चले जाओ । आशय है कि पुरानी महत्त्वहीन परम्पराओं को छोड़कर नवीन जीवन पथ ग्रहण कर आगे बढ़ते जाओ । 

विशेष – 

(1) कर्म के द्वारा हुए रचनात्मक विकास से प्रेरित हो सभी आनन्द प्राप्त करने की प्रेरणा दी गई है । (2) शुद्ध साहित्यिक भाषा में विषय का प्रभावी प्रतिपादन किया गया है । (3) रूपक , पुनरुक्तिप्रकाश , अनुप्रास अलंकारों की छटा अवलोकनीय है ।

हरिवंशराय बच्चन कवि परिचय 

जीवन परिचय – 

‘हरिवंशराय बच्चन’ का जन्म 17 नवम्बर, सन् 1907 ई. को इलाहाबाद में हुआ । आपके पिता श्री प्रतापनारायण साहित्यिक रुचि सम्पन्न व्यक्ति थे । माताजी धार्मिक संस्कार प्राप्त थीं । बालक हरिवंशराय पर दोनों का प्रभाव पड़ा । ‘ बच्चन ‘ ने काशी तथा प्रयाग में शिक्षा प्राप्त की । आपने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बी . ए . एवं एम . ए . की परीक्षाएँ उत्तीर्ण की । सक्रिय परिस्थितियोंवश आपको कुछ समय नौकरी करनी पड़ी । कुछ समय सम्पादन कार्य किया । सन् 1954 में आपने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की , फिर प्रयाग विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के प्रवक्ता हो गये । इसके पश्चात् आपने आकाशवाणी में कार्य किया । बाद में भारत सरकार के विदेश – विभाग में आपकी नियुक्ति हुई । आपने वहीं से अवकाश ग्रहण किया । सन् 1966 में आपको राज्यसभा का सदस्य होने का सम्मान प्राप्त हुआ । हरिवंशराय बच्चन ‘ युवावस्था में ही पढ़ाई छोड़कर राष्ट्रीय आन्दोलन में कूद पड़े थे । आर्थिक दशा ठीक न होने के कारण आपकी पत्नी असाध्य रोग से ग्रस्त होकर चल बसीं । आरम्भ में इन पर उमर – खैयाम के जीवन – दर्शन का अत्यधिक प्रभाव था । पत्नी के वियोग ने इन्हें निराशा एवंदुःख से भर दिया । कुछ समय बाद श्रीमती तेजी बच्चन से शादी हो गई । 18 जनवरी , 2003 को आप स्वर्ग सिधार गये । रचनाएँ – हरिवंशराय बच्चन ‘ की प्रथम कृति ‘ तेरा हार ‘ सन् 1932 में प्रकाशित हुई । तब से जीवन भर आप काव्य साधना में लीन रहे हैं ।

रचनाएं –

(1) तेरा हार

(2) खैयाम की मधुशाला

(3) विकल विश्व

(4) दो चट्टान 

(5) त्रिभंगिमा

(6) आरती तथा अंगारे

काव्यगत विशेषताएँ 

(अ) भावपक्ष (भाव तथा विचार) – हरिवंशराय बच्चन ‘ के काव्य में आत्मविश्वास, संघर्षशीलता तथा पुनर्निर्माण की प्रेरणा का स्वर प्रधानत : व्यक्त है । आपने मध्यम वर्ग के आहत मन की क्षोभ जनित वेदना को अभिव्यक्त किया है । अभावग्रस्त पीड़ा, खोखला परिवेश और विवश मानव की दयनीय स्थिति को आपने काव्य का विषय बनाया है । सौन्दर्य , प्रेम और मादकता की स्वर लहरियों से आपका काव्य ओत – प्रोत है । 

(ब) कलापक्ष (भाषा तथा शैली) – हरिवंशराय बच्चन ‘ के काव्य की भाषा सहज , सरल और जीवंत है । अपनी बात को पाठक तक पहुँचाने में वे निपुण हैं । बच्चन ने बोलचाल की व्यावहारिक भाषा में पूर्ण साहित्यिकता भर दी है । कवि सम्मेलनों की परम्परा आपके काव्य पाठ से पुष्ट हुई है । स्वाभाविक अलंकारों , प्रतीकों को आपने अपने काव्य में स्थान दिया है । 

साहित्य में स्थान – 

छायावाद के बाद के रचनाकारों में हरिवंशराय बच्चन ‘ की पहचान एक प्रमुख गीतकार के रूप में है । आपने जनसामान्य की अनुभूति को वाणी प्रदान की है तथा मध्यम वर्ग को कविता से जोड़ा है । अपनी विशिष्ट पहचान रखने वाले बच्चन आधुनिक काल के कवियों में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं ।

 

नरेश मेहता कवि परिचय 

जीवन परिचय – 

आधुनिक काल के प्रयोगवादी कवि नरेश मेहता का जन्म सन् 1922 में मध्य प्रदेश के शाजापुर जिले में हुआ । आपके ऊपर वैष्णव संस्कारों की गहरी छाप है । प्रारम्भिक शिक्षा के पश्चात् आपने माधव कॉलेज , उज्जैन में अध्ययन किया । तत्पश्चात् हिन्दू विश्वविद्यालय , बनारस से उच्च शिक्षा ग्रहण की । आप पर स्वतन्त्रता संग्राम का गहरा प्रभाव पड़ा । सन् 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन में आपने बढ़ – चढ़कर भाग लिया । नरेश मेहता का जुड़ाव आकाशवाणी से भी रहा । आपने वहाँ कार्यक्रम अधिकारी के रूप में कार्य किया । ट्रेड यूनियनों की साप्ताहिक पत्रिका के आप सम्पादक रहे । इस प्रकार आपके बहुआयामी व्यक्तित्व का विकास जन – चेतना के प्रति समर्पित हो गया । आप निरन्तर राष्ट्र , समाज और मानव के हित के लिए सक्रिय हैं । रचनाएँ – आधुनिक काल के सजग रचनाकार नरेश मेहता की पहचान कवि एवं उपन्यासकार के रूप में है । आपने प्रयोगवाद से होते हुए नयी कविता के कवि के रूप में विशिष्ट स्थान बनाया है । ‘ दूसरा सप्तक ‘ में आपको स्थान मिला । 

रचनाएं –

बोलने दो चीड़ को

तुम मेरा मौन हो प्रमुख काव्य संग्रह हैं ।

संशय की एक रात

महाप्रस्थान

शबरी

काव्यगत विशेषताएँ

(अ) भावपक्ष (भाव तथा विचार) – विभिन्न वादों, वर्गों तथा मत – मतान्तरों से अलग रहकर अपनी अनुभूति को सहज रूप में व्यक्त करने वाले नरेश मेहता के काव्य का उद्गम सौन्दर्य , प्रेम , करुणा तथा आनन्द से है । क्षोभ , आक्रोश आदि से वे मुक्त रहे हैं । आपकी दृष्टि रचनात्मक रही है । मेहता जी तात्विक दृष्टि से आधुनिक होते हुए भी आधुनिकतावादी नहीं कहे जा सकते हैं । मानव – मूल्यों के प्रति उनका समर्पण रहा है । 

(ब) कला पक्ष (भाषा तथा शैली) – अत्यन्त सहजता के साथ प्रभावी अभिव्यक्ति में निपुण नरेश मेहता ने सरल , सुबोध , साहित्यिक खड़ी का प्रयोग काव्य में किया गया है । विषय के अनुरूप आपकी भाषा की भंगिमाएँ भी बदलती चलती हैं । अलंकारों के प्रति आपका आग्रह भले ही न हो पर आपके काव्य में विभिन्न अलंकारों का स्वाभाविक प्रयोग हुआ है । मुहावरों, उक्तियों का आपने सटीक प्रयोग किया है । 

साहित्य में स्थान – 

आधुनिक काल की नयी कविता के प्रतिष्ठित कवि नरेश मेहता गम्भीर, चिन्तनशील व्यक्तित्व के धनी है । इसी कारण उनकी अलग पहचान है । उनमें अभिव्यक्ति की नवीनता स्पष्ट दिखाई देती है । उनके काव्य के विषय उनके अपने ढंग के हैं । वर्तमान काल के हिन्दी रचनाकारों में नरेश मेहता का स्थान अत्यन्त महत्वपूर्ण है ।

1 thought on “MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions पद्य Chapter 8 कल्याण की राह”

Leave a Comment