MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions पद्य Chapter 9 जीवन दर्शन

Chapter 9 जीवन दर्शन

चिर सजग आँखें उनींदी (महादेवी वर्मा)

मैंने आहुति बनकर देखा (अज्ञेय)

 

MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions पद्य Chapter 9 जीवन दर्शन

 

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अति लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1

कवि नाश पथ पर कौन से चिह्न छोड़ जाना चाहता है ?

उत्तर – 

कवि नाश पथ पर अपनी विशेष पहचान के चिह्न छोड़ जाना चाहता है । 

प्रश्न 2. 

मधुप की मधुर गुनगुन विश्व पर क्या प्रभाव डालेगी ? 

उत्तर – 

मधुप की मधुर गुनगुन मन को आनन्दित करने वाली होती है । गुनगुन की सरस ध्वनि विश्व का करुण क्रन्दन भुला देगी । 

प्रश्न 3. 

तितलियों के रंग से कवि का क्या तात्पर्य है ? 

उत्तर – 

तितलियों के रंग से कवि का तात्पर्य रंग – बिरंगे वस्त्राभूषणों से सुसज्जित चंचल बालाओं से है । 

प्रश्न 4. 

कवि अज्ञेय के अनुसार काँटे की मर्यादा क्या है ?

उत्तर – 

कवि के अनुसार काँटे की मर्यादा उसकी कठोरता तथा तीखापन है । 

प्रश्न 5. 

कवि ने ‘मुर्दे होंगे’ किसे कहा है ? 

उत्तर – 

कवि ने प्रेम को सम्मोहनकारी हाला मानने वालों को ‘मुर्दे होंगे’ कहा है । 

 

जीवन दर्शन लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1. 

कवि की आँखें उनींदी क्यों हैं ? 

उत्तर – 

भारत के निवासी जागरूक, दूरदर्शी तथा सक्रिय माने जाते रहे हैं, इसलिए भारत को विश्व का अग्रणी माना गया है किन्तु आज वह सजगता समाप्त हो रही है । स्वार्थपरता की नींद से आँखें भरी हैं । वेशभूषा भी अस्त – व्यस्त हो गई है । भविष्य के प्रति उदासीन होने के कारण कवि की आँखें उनींदी हैं । 

प्रश्न 2.

‘मोम के बंधन सजीले ‘ से कवि का क्या आशय है ? 

उत्तर – 

इस संसार के मोह – ममता जनित आकर्षण व्यक्ति को बाँध लेते हैं । यद्यपि सांसारिक आकर्षण अस्थायी है । ठीक उसी प्रकार है जैसे मोम पिघलकर समाप्त हो जाता है । ये बंधन भी क्षणिक हैं । इसलिए ‘ मोम के बंधन सजीले ‘ से कवि आशय क्षणिक सांसारिक आकर्षणों से है । 

प्रश्न 3. 

कवयित्री महादेवी कर्मा का ‘ चिर सजग ‘ से क्या आशय है ?

उत्तर – 

भारत विश्व गुरु माना जाता रहा है । ज्ञान का रास्ता संसार को भारत ने ही दिखाया है । भारतीय चिरकाल से जागरूक रहे हैं । उन्होंने नये स्रोतों की खोज की है । अन्यान्य ज्ञान के आधार तैयार किये हैं । भारतवासियों की इसी जागरूकता के लिए ‘ चिर सजग ‘ का प्रयोग किया गया है । 

प्रश्न 4.

कवि ने अन्तिम रहस्य के रूप में क्या पहचान लिया है ? 

उत्तर – 

सामान्यतः प्रेम के प्रति भाव होता है कि इससे मानव का ह्यस होता है । प्रेम वियोग की आग में जलाकर मानव का क्षय करता है, प्रेम के जाल में फंसने पर मानव का पतन हो जाता आदि बातें प्रेम के विषय में कही जाती हैं । इसलिए बहुत से लोग प्रेम को कटु मानते हैं परन्तु कवि का मानना है कि इस प्रकार के लोग मानसिक रूप से रोगी हैं । वे कहते हैं कि प्रेम की आग में जलकर मैंने जान लिया है कि प्रेम की आग यज्ञ की आग के समान है जो पवित्र बनाती है । 

प्रश्न 5. 

कुचला जाकर भी कवि किस रूप में उभरता है ? 

उत्तर – 

व्यक्ति में आगे बढ़ने की ललक होनी चाहिए फिर उसे रोक पाना सम्भव नहीं है । वह चलता हुआ , बढ़ता हुआ शीर्ष पर पहुँच जायेगा । यदि शीर्ष से गिरा दिया और कुचल दिया गया तो वह पुनः पूरी ऊर्जा के साथ धूल भरी तेज आँधी की तरह उमड़ता हुआ शीर्ष की ओर उभरता हुआ चला जायेगा । 

प्रश्न 6. 

‘निर्मम रण में पग – पग पर रुकना’ किस प्रकार प्रतिफलित होता है ? 

उत्तर – 

संसार में जो भी बढ़ना चाहता है उसके मार्ग में विविध प्रकार की बाधाएँ आती हैं । ये बाधाएँ , रुकावटें उसे आगे बढ़ने से रोकती हैं । कुछ लोग ऐसे होते हैं जो इन बाधाओं से डरकर आगे नहीं बढ़ पाते हैं किन्तु कवि की इच्छा यह है कि इस निर्मम संसार के युद्ध में पग – पग पर आने वाली बाधाएँ ही मेरा प्रहार बन जाएँ वे और तेज संघर्ष के रूप में प्रतिफलित हों ।

 

जीवन दर्शन दीर्घ उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1.

‘जाग तुझको दूर जाना ‘ से कवि का क्या आशय छिपा है ? 

उत्तर – 

मानव के जीवन का कुछ लक्ष्य होना आवश्यक है । उस लक्ष्य को तभी प्राप्त किया जा सकता है जब व्यक्ति सभी प्रकार से सजग होकर सतत् कर्ममय रहे । किसी भी प्रकार का आलस्य , हताशा , लापरवाही या उदासीनता व्यक्ति को लक्ष्य तक पहुँचने से रोक सकती है । इस संसार में जो भी आगे बढ़ने का प्रयास करता है उसके मार्ग में विभिन्न प्रकार के तूफान, संकट या विपदाएँ आती हैं । नाना प्रकार की समस्याएँ उसे आगे चलने ही नहीं देती हैं । सांसारिक आकर्षण उसको अपनी ओर खींचते हैं । रूप , सौन्दर्य , चांचल्य उसको मोहित करता है । सच्चे मानव को इन सभी से मुक्त रहकर बाधाओं को पार करते हुए बढ़ना चाहिए । यह तभी सम्भव है जब वह पूरी तरह जागरूक होकर लम्बी यात्रा पर निकल पड़े । इस प्रकार कवयित्री ‘ जाग तुझको दूर जाना ‘ के माध्यम से कहना चाहती है कि मानव तू सजग होकर निरन्तर चलता रह तभी लक्ष्य तक पहुँच पायेगा । 

प्रश्न 2. 

‘ पंथ की बाधा बनेंगे तितलियों के पर – रंगीले ‘ में निहित भाव को स्पष्ट कीजिए । 

उत्तर – 

मनुष्य सांसारिक प्राणी है । उसके समाज में नाना प्रकार के लगाव होते हैं । उसमें जगत के प्रति मोह – ममता होती है । सुसज्जित चंचल नव – युवतियाँ, नाना प्रकार के स्वाद, रहन – सहन के आकर्षण व्यक्ति को अपनी ओर खींचते हैं । वह इनके आकर्षण में फंसकर अपने लक्ष्य से भटक जाता है । मनुष्य का लक्ष्य इस जगत के भोगों में लीन होना नहीं है । ये तो उसे भ्रमित करते हैं , भटकाते हैं और ये आकर्षण मनुष्य की प्रगति मार्ग की सबसे बड़ी बाधा बनते हैं । सांसारिक रंगीनियाँ ही मनुष्य को दिशाहीन बनाती हैं । वह उनकी रंगरेलियों के चक्कर में पड़कर अपने उद्देश्य को भूल जाता है ।

प्रश्न 3.

‘तून अपनी छाँहको अपने लिए कारा बनाना’ द्वारा कवयित्री क्या सन्देश 

उत्तर – 

कवयित्री महादेवी वर्मा जीवन के आदर्शों के प्रति समर्पित रही हैं । वे दुर्लभ मानव जीवन के अधिकाधिक सदुपयोग की समर्थक रही हैं । मनुष्य के जीवन का लक्ष्य महान् होना चाहिए । उस तक पहुँचने के लिए सतत् कर्म तथा लगन की आवश्यकता है । लक्ष्य की ओर बढ़ना पर बहुत – सी बाधाएँ, समस्याएँ भी आयेंगी ही । जगत् के बहुविध आकर्षण अपनी ओर खींच गति को रोकने का प्रयास करेंगे । पारिवारिक, सामाजिक सम्बन्ध, मोह, ममता, रूप, चांचल्य, यौवन के आकर्षण बाधा बनेंगे । जीवन की रंगीनियाँ मनुष्य को मुग्ध करके उसके प्रगति पथ में बाधक बनेंगी । इस प्रकार की स्थिति में कवयित्री सन्देश देना चाहती हैं कि मनुष्य को इन आकर्षणों में बन्दी नहीं होना है । यदि वह इनके कारागार में चला गया तो उसे लक्ष्य प्राप्त नहीं हो सकेगा । 

प्रश्न 4. 

‘मैंने आहुति बनकर देखा’ कविता का मूल भाव लिखिए ।

उत्तर – 

इस प्रश्न के उत्तर के लिए इस पाठ से ‘ मैंने आहुति बनकर देखा ‘ कविता का ” भाव – सारांश ‘ शीर्षक पढ़िए । 

प्रश्न 5. 

प्रस्तुत कविताओं से हमें क्या सीख मिलती है ?

उत्तर – 

मानव जीवन की गतिशीलता में भाव एवं विचार का महत्वपूर्ण योगदान है । विचार जीवन की चेतना को सतत् विकासशील बनाता है, भाव उसमें समरसता का संचार करता है । प्रस्तुत दोनों कविताएँ मानव के जीवन दर्शन से सम्बन्धित हैं । संसार में सामंजस्य स्थापित करते हुए मानव प्रगति पथ पर बढ़ता रहे और अपने लक्ष्य को प्राप्त कर ले , यह भाव इन कविताओं में समाहित है । ये दोनों ही कविताएँ मानव जीवन के रचनात्मक विकास को दिशा देने वाली हैं । ये कविताएँ व्यक्तित्व के विकास का, कर्मठता का, समर्पण का, त्याग का, तपस्या का महत्व प्रतिपादित करती हैं जिससे कि मानव अपने जीवन में उन गुणों को उतार सके । संघर्षशील प्राणी ही ऊर्जा के द्वारा जीवन का विस्तार कर लक्ष्य तक पहुँच सकता है , यह सीख इन कविताओं से मिलती है । 

प्रश्न 6. 

हास्य रस की परिभाषा देते हुए किसी उदाहरण द्वारा समझाइए । 

उत्तर – 

हास्य रस – परिभाषा – हास स्थायी भाव, विभाव, अनुभाव तथा संचारी भाव के संयोग से पुष्ट होकर रस के रूप में परिणत होता है । 

उदाहरण- हँसि हँसि भरने देखि दूलह दिगम्बर को, पाहुनी जे आवें हिमाचल के उछाह में । कहै पदमाकर सु काहु सों कहै को कहा, जोई जहाँ देखै सो हँसोई तहाँ राह में । मगन भएई हँसे नगन ठाढ़े , और हँसे बेऊ हँसि हँसि के उमाह में । सीस पर गंगा हँसे भुजनि भुजंगा हँसें , हास ही को दंगा भयो , नंगा के विवाह में ।। यहाँ पर शिव आलम्बन हैं । उनकी विचित्र आकृति नंगा रूप इत्यादि उद्दीपन हैं । देखने वालों का हँसना , हँसकर भागना आदि अनुभाव हैं । 

चिर सजग आँखें उनींदी आज कैसा व्यस्त बाना भाव सारांश 

छायावाद की आधार स्तम्भ महादेवी वर्मा के ‘ चिर सजग आँखें उनींदी आज कैसा व्यस्त बाना ‘ गीत में प्रोत्साहन की अद्भुत क्षमता विद्यमान है । जीवन में चाहे अटल पर्वत प्रकम्पित हो उठे , प्रलय का रुदन होने लगे , प्रकाश को अन्धकार घेर ले या भयंकर बिजलियों के तूफान आएँ परन्तु इस नश्वर जगत में अपनी पहचान छोड़कर जाने का उत्कट भाव होना आवश्यक है । इस भाव की पूर्ति के लिए विविध प्रकार के बन्धनों , बाधाओं को पार करना होगा । संकुचित सीमाओं से मुक्त होकर अपने व्यक्तित्व का विकास करना होगा । जागरूक होकर ही दूरस्थ लक्ष्य तक पहुँचना सम्भव है ।

 

चिर सजग आँखें उनींदी आज कैसा व्यस्त बाना! संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

 

(1) चिर सजग आँखें उनींदी आज कैसा व्यस्त बाना!

जाग तुझको दूर जाना!

अचल हिमगिरि के हृदय में आज चाहे कम्प हो ले,

या प्रलय के आँसुओं में मौन अलसित व्योम रो ले,

आज पी आलोक को डोले तिमित की घोर छाया,

जाग या विद्युत-शिखाओं में निठुर तूफान बोले

पर तुझे है नाश-पथ पर चिन्ह अपने छोड़ जाना!

जाग तुझको दूर जाना!

शब्दार्थ – 

उनींदी = नीद भरी । व्यस्त कार्य में लगा । बाना = पहनावा, रूप । अचल = स्थिर , न चलने वाला । हिमगिरि = बर्फ का पर्वत । कम्प = थरथराहट । प्रलय = विनाश । अलसित = अलसाया । व्योम = आकाशा । आलोक = प्रकाश । तिमिर = अन्धकार । घोर = घनी । विद्युत = बिजली । शिखाओं = चोटियों । निदुर कठोर स्वभाव का । पथ = नश्वर जगत ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक ‘जीवन दर्शन’ पाठ की ‘चिर सजग आँखें उनींदी आज कैसा व्यस्त बाना’ कविता से अवतरित है । इसकी रचयिता महादेवी वर्मा हैं । 

प्रसंग – 

यहाँ पर जीवन में संघर्ष कर बाधाओं को पार कर लक्ष्य तक पहुँचने की प्रेरणा दी गई है । 

व्याख्या – 

महादेवी वर्मा मानव को सम्बोधित करते हुए कहती हैं कि प्राचीनकाल से जागरूक रहने वाले हे मानव ! आज तेरी आँखों में नींद क्यों भरी है और तेरा रूप अस्त – व्यस्त कैसे है ? तुझको तो जाग्रत हो जाना चाहिए क्योंकि तुझे अपना लक्ष्य प्राप्त करने के लिए बहुत दूर जाना है । भले ही स्थिर रहने वाले बर्फ के पहाड़ों के हृदयों में थरथराहट हो जाये अथवा अलसाया शान्त आकाश प्रलय के आँसू बहाते हुए रो पड़े । चाहे प्रकाश को पीकर अन्धकार की घनी छाया मदमस्त होकर डोले या बिजली की चोटियों में कठोर आघात करने वाले तूफान जाग उठे अर्थात् भले तुझ पर विनाशकारी शक्तियों के भयंकर आक्रमण हों किन्तु तुझको इस नाशवान जगत में अपनी पहचान छोड़नी है । इसलिए तू जाग जा क्योंकि तेरा लक्ष्य दूर तक जाने का है । इसलिए वहाँ तक पहुँचने की तैयारी कर । 

विशेष – 

(1) महानता की ओर अग्रसर होने की प्रेरणा दी गई है । (2) शुद्ध , साहित्यिक भाषा में विषय का प्रतिपादन हुआ है । (3) मानवीकरण , अनुप्रास अलंकारों का सौन्दर्य अवलोकनीय है । (4) गीत शैली । 

 

(2) बाँधे लेंगे क्या तुझे यह मोम के बन्धन सजीले?

पंथ की बाधा बनेंगे तितलियों के पर रँगीले?

विश्व का क्रन्दन भुला देगी मधुप की मधुर गुनगुन,

क्या डुबो देंगे तुझे यह फूल के दल ओस-गीले?

तू न अपनी छाँह को अपने लिए कारा बनाना!

जाग तुझको दूर जाना!

शब्दार्थ – 

सजीले = सुसज्जित । पंथ = मार्ग । रँगीले = रंग – बिरंगे । क्रन्दन = रुदन , पीड़ा युक्त होना । मधुप = भौंरा । मधुर = मीठी । गुनगुन = जार । दल = समूह । कारा = कारागार , 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक ‘जीवन दर्शन’ पाठ की ‘चिर सजग आँखें उनींदी आज कैसा व्यस्त बाना’ कविता से अवतरित है । इसकी रचयिता महादेवी वर्मा हैं । 

प्रसंग – 

यहाँ सांसारिक आकर्षणों को छोड़कर लक्ष्य तक पहुँचने की प्रेरणा दी गई है । 

व्याख्या – 

कवयित्री महादेवी वर्मा कहती हैं कि लक्ष्य की ओर बढ़ने वाले हे मनुष्य ! क्या तुझे इस संसार के सुसज्जित मोम जैसे क्षणिक बंधन बाँध लेंगे ? क्या रंग – बिरंगी तितलियों जैसी चंचल नायिकाएँ तुम्हारे मार्ग की बाधा बन जायेंगी ? क्या भौरे की मीठी गुंजार संसार के करुण रुदन के भाव को भुला देगी अर्थात् क्या तुम नश्वर आकर्षणों में फंसकर जगत की पीड़ाओं का ध्यान नहीं रख सकोगे ? क्या ओस से भीगे फूलों के समूह तुमको अपने आकर्षण में डुबो देंगे ? नहीं हे मनुष्य , ये सब तेरी परछाईं मात्र हैं । इसलिए तुम इनको बन्धन मत बनाना अर्थात् इन सभी आकर्षणों से मुक्त रहना क्योंकि तेरा लक्ष्य बहुत दूर तक जाना है । 

विशेष – 

(1) नाशवान जगत की बाधाओं से युक्त रहकर उच्च आदर्श तक पहुँचने का प्रोत्साहन दिया गया है । (2) शुद्ध , साहित्यिक खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है । (3) रूपकातिशयोक्ति , अनुप्रास अलंकार एवं पदमैत्री की सुन्दरता दर्शनीय है । (4) गीत शैली ।

मैंने आहुति बनकर देखा भाव – सारांश 

जीवन की व्यापकता को अपने काव्य में प्रस्तुत करने वाले अज्ञेय की ‘ मैंने आहुति बनकर देखा ‘ कविता में अंकित है कि जीवन में सब कुछ अपने अनुरूप नहीं होता । पराजय भी मिलती है । जीवन की गति में अनेक बाधाएँ हैं । कवि कहते हैं कि मैं महान बनने का इच्छुक नहीं हूँ । मैं इस बात के लिए भी बेचैन नहीं हूँ कि लोग मुझे ससम्मान याद करें । मैं अपने सँजोये गये जीवन को विकसित कर सरसता की ओर ले जाना चाहता हूँ । जीवन दुःख ही नहीं यह प्रेम के यज्ञ की आग है । इसमें चढ़ना , बढ़ना फिर गिरना सम्भव है पर असफलता को सफलता का आधार बनाना है । इस निर्मम जगत में रुकना नहीं है । सब कुछ स्वाहा करके भी जीवन को निखारना है ।

 

मैंने आहुति बनकर देखा सन्दर्भ, प्रसंग सहित पद्यांशों की व्याख्या 

 

(1) मैं कब कहता हूँ जग मेरी दुर्धर गति के अनुकूल बने,

मैं कब कहता हूँजीवन-मरुनन्दन-कानन का फूल बने?

काँटा कठोर है, तीखा है, उसमें उसकी मर्यादा है,

मैं कब कहता हूँ, वह घटकर प्रांतर का ओछा फूल बने?

शब्दार्थ – 

जग = संसार । दुर्धर = कठिनाई से धारण करने योग्य । जीवन – मरु = जीवन रूपी रेगिस्तान । प्रान्तर = क्षेत्र । ओछा = छोटा ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘जीवन दर्शन’ पाठ के ‘मैंने आहुति बनकर देखा’ शीर्षक कविता से लिया गया है । इसके रचयिता ‘अज्ञेय’ हैं । 

प्रसंग – 

यहाँ बताया गया है कि संसार में सब कुछ मनोनुकूल होना आवश्यक नहीं है । 

व्याख्या – 

कवि अज्ञेय कहते हैं कि मैं यह नहीं कहता हूँ कि समस्त संसार मेरी कठिनाई से धारण करने योग्य गति के अनुकूल बन जाए । मैं यह भी नहीं कहता हूँ कि मेरा जीवनरूपी मरुस्थल देवताओं का नन्दन वन – बन जाये । मेरी धारणा है कि कौंटा कठोर है , वह तीखा भी है परन्तु इन रूपों में ही उसका महत्व है । इसलिए मैं यह नहीं कहता हूँ कि कठोरता और तीखेपन के लिए प्रसिद्ध काँटा किसी जगह का छोटा – सा फूल बन जाये । आशय यह है कि सभी का अपना – अपना अस्तित्व एवं महत्व है । 

विशेष – 

(1) सब कुछ अपने अनुसार होना आवश्यक नहीं है । (2) शुद्ध , साहित्यिक खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है । (3) रूपक , अनुप्रास अलंकारों का सहज प्रयोग हुआ है । 

 

(2) मैं कब कहता हूँ, मुझे युद्ध में कहीं न तीखी चोट मिले?

मैंकबकहताहूँ, प्यार करुतो मुझे प्राप्तिकीओटमिले?

मैं कब कहता हूँ विजय करूँ-मेरा ऊँचा प्रासाद बने?

या पात्र जगत की श्रद्धा की मेरी धुंधली सी याद बने?

शब्दार्थ – 

युद्ध = संघर्ष । तीखी = करारी । प्रासाद = महल । याद = स्मृति । 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘जीवन दर्शन’ पाठ के ‘मैंने आहुति बनकर देखा’ शीर्षक कविता से लिया गया है । इसके रचयिता ‘अज्ञेय’ हैं । 

प्रसंग – 

यहाँ कवि ने संकेत दिया है कि वे स्मरणीय बनने के इच्छुक नहीं हैं । 

व्याख्या – 

कवि कहते हैं कि मेरी यह इच्छा नहीं है कि मुझे इस संसार के जीवन संघर्ष में कभी करारे प्रहार न झेलने पड़ें । मैं छिपकर प्यार करने की भी कामना नहीं करता हूँ । मैं यह भी नहीं चाहता कि संघर्ष में विजय प्राप्त कर ऊँचे – ऊँचे महल बनवाऊँ । मेरी यह भी इच्छा नहीं है कि मैं महान् सुपात्रों की कोटि में पहुँच जाऊँ ताकि लोग मुझे याद करें । 

विशेष – 

(1) शुद्ध , साहित्यिक भाषा का प्रयोग किया गया है । (2) अनुप्रास अलंकार एवं शब्द – सौन्दर्य का मणिकांचन योग देखा जा सकता है । 

 

(3) पथ मेरा रहे प्रशस्त सदा क्यों विकल करे यह चाह मुझे?

नेतृत्व न मेरा छिन जावे, क्यों इसकी हो परवाह मुझे?

मैं प्रस्तुत हूँ चाहे मेरी मिट्टी जनपद की धूल बने

फिर उस धूली का कण-कण भी मेरा गति-रोधक शूल बने।

शब्दार्थ – 

पथ = मार्ग प्रशस्त = सुचारु रूप से अग्रसर । विकल – व्याकुल , बेचैन । परवाह चिन्ता । गति – रोधक चाल रोकने वाला ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘जीवन दर्शन’ पाठ के ‘मैंने आहुति बनकर देखा’ शीर्षक कविता से लिया गया है । इसके रचयिता ‘अज्ञेय’ हैं । 

प्रसंग – 

यहाँ विविध प्रकार के कष्टों , बाधाओं की ओर से निश्चितता का भाव व्यक्त हुआ है । 

व्याख्या – 

कवि कहते हैं कि मुझे यह इच्छा बेचैन क्यों करे कि मेरे जीवन का मार्ग सदैव सुचारु रूप से अग्रसर होता रहे । मुझे अपने नेतृत्व के छिन जाने की चिन्ता क्यों हो । मैं तो जनपद की धूल में मिलने को तैयार हूँ । मैं उसके लिए भी तैयार हूँ मेरी मिट्टी से बनी धूल का प्रत्येक कण मेरी गति को रोकने वाला काँटा बनकर मार्ग में प्रस्तुत हो जाए । किसी भी विरोधी स्थिति का सामना करने को मैं तत्पर हूँ । 

विशेष – 

(1) बाधा या संघर्षों के प्रति निर्भीकता का भाव प्रकट हुआ है । (2) शुद्ध , साहित्यिक खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है । (3) पुनरुक्तिप्रकाश , अनुप्रास अलंकारों की शोभा दर्शनीय है । 

 

(4) अपने जीवन को रस देकर जिसको यत्नों से पाला है

क्या वह केवल अवसाद-मलिन झरते आँसूकी माला है?

वे रोगी होंगे प्रेम जिन्हें अनुभव-रस का कटु प्याला है

वे मुर्दे होंगे प्रेम जिन्हें सम्मोहन-कारी हाला है।

शब्दार्थ – 

यत्नों = प्रयासों । अवसाद = दु : ख । कटु = कड़वा । हाला = मदिरा , शराब ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘जीवन दर्शन’ पाठ के ‘मैंने आहुति बनकर देखा’ शीर्षक कविता से लिया गया है । इसके रचयिता ‘अज्ञेय’ हैं । 

प्रसंग – 

यहाँ मानव जीवन तथा प्रेम की महत्ता बताई गई है । 

व्याख्या – 

कवि कहते हैं कि मैंने अपने जिस जीवन को रस प्रदान कर बड़े प्रयासों से पाल – पोसकर बड़ा किया है क्या यह जीवन मात्र दु : ख के कारण गिरते हुए आँसुओं की श्रृंखला मात्र है । नहीं यह जीवन – दुःख नहीं हर्ष , उल्लास और उमंग से भरा है । कवि का मत है कि जो अपने अनुभव के आधार पर प्रेम को कडुवा प्याला मानते हैं वे निश्चय ही रोगी होंगे और वे अचेतन मुर्दे ही कहे जायेंगे जो प्रेम को मदहोश बनाने वाली मदिरा मानते हैं । प्रेम तो आनन्द – प्रदान करने वाला है 

विशेष – 

(1) जीवन के महत्व तथा प्रेम के आनन्द का प्रतिपादन हुआ है । (2) शुद्ध , साहित्यिक खड़ी बोली में विषय का प्रभावी प्रतिपादन किया गया है । (3) रूपक , अनुप्रास अलंकारों की शोभा अवलोकनीय है ।

 

(5) मैंने विदग्ध हो जान लिया, अन्तिम रहस्य पहचान लिया

मैंने आहुति बनकर देखा यह प्रेम यज्ञ की ज्वाला है।

मैं कहता हूँ, मैं बढ़ता हूँ, नभ की चोटी चढ़ता हूँ,

कुचला जाकर भी धूली-सा आँधी और उमड़ता हूँ।

शब्दार्थ – 

विदग्ध = जलकर । रहस्य = भेद । नभ = आकाश ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘जीवन दर्शन’ पाठ के ‘मैंने आहुति बनकर देखा’ शीर्षक कविता से लिया गया है । इसके रचयिता ‘अज्ञेय’ हैं । 

प्रसंग – 

यहाँ प्रेम के मर्म को पहचानने की बात कही गई है । 

व्याख्या – 

कवि कहते हैं कि मैंने प्रेम की आग में जलकर प्रेम के मूल रहस्य को पहचान लिया है । मैंने स्वयं को स्वाहा करके देख लिया है कि प्रेम की आग यज्ञ की आग के समान पवित्र बनाने वाली है । हजार मैं कहते हुए निरन्तर आगे बढ़ता जाता हूँ और आकाश के शिखर पर पहुँच जाता हूँ और फिर गिरकर कुचला जाता हूँ लेकिन कुचले जाने के बाद भी धूल भरी आँधी के समान फिर उमड़ पड़ता हूँ । जीवन में पराजय स्वीकार करना सम्भव नहीं है । 

विशेष – 

(1) प्रेम की तपन पवित्र बनाती है । (2) शीर्ष से गिरकर धूल में मिलने पर भी उमड़ना सच्चे मानव का स्वभाव है । (3) शुद्ध , साहित्यिक खड़ी बोली का प्रयोग हुआ है । (4) रूपक , अनुप्रास अलंकारों की छटा दर्शनीय है । 

 

(6) मेरा जीवन ललकार बने, असफलता की असि-धार बने

इस निर्मम रण में पग-पग का रुकना ही मेरा वार बने।

भव सारा तुझको है स्वाहा सब कुछ तपकर अंगार बने।

तेरी पुकार-सा दुर्निवार मेरा यह नीरव प्यार बने।

शब्दार्थ – 

असि – धार = तलवार की धार । निर्मम = कठोर । वार = प्रहार , वार करना । भव संसार । दुर्निवार = जिसका निवारण बड़ी कठिनाई से हो । नीरव = शान्त ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘जीवन दर्शन’ पाठ के ‘मैंने आहुति बनकर देखा’ शीर्षक कविता से लिया गया है । इसके रचयिता ‘अज्ञेय’ हैं । 

प्रसंग – 

संघर्षशील जीवन के द्वारा सफलता की कामना की गई है ।

व्याख्या – 

कवि कहता है कि संसार में मिलने वाली पराजय के विरुद्ध मेरा जीवन युद्ध की ललकार के संघर्ष का रूप धारण कर ले । जीवन में मिली असफलता ही मेरे संघर्ष की तलवार की धार बन जाये जिससे मैं जूझकर सफलता की ओर बढ़ सकूँ । संसार सागर में जो भी है वह सब स्वाहा करके इस कठोर संसार के संघर्ष में कदम – कदम पर आने बाधाएँ मेरा प्रहार बन जायें अर्थात् बाधा आने पर मैं और तीव्र प्रयास करूं । प्रज्ज्वलित आग में तपकर अंगार बन जाऊँ । मेरा यह शान्त प्यार कठिनता से निवारण पाने वाली तुम्हारी पुकार के समान बन जाए । अर्थात् मैं भयंकर कष्ट सहकर भी प्यार करता रहूँ । 

विशेष – 

(1) विषमताओं में भी प्रेम पालन की भावना व्यक्त हुई है । (2) शुद्ध , साहित्यिक खड़ी बोली में विषय का प्रभावपूर्ण प्रतिपादन हुआ है । (3) रूपक , अनुप्रास , उपमा अलंकारों का सौन्दर्य दर्शनीय है ।

महादेवी वर्मा कवि परिचय

जन्म परिचय आपका जन्म एक कायस्थ परिवार में सन 1907 में हुआ था । आपके पिता श्री गोविन्द सहाय वर्मा तथा माता का नाम हेमरानी देवी संक्षिप्त जीवनी – आधुनिक युग की मीरा, महादेवी वर्मा का जन्म उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद के । था । आपके पति का नाम स्वरूप नारायण वर्मा था । महादेवी जी ने प्रयाग विश्वविद्यालय से संस्कृत में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की । संगीत दर्शन और चित्रकला में आपकी प्रगाढ़ रुचि रही है । साहित्यकार ‘ तथा ‘ चाँद ‘ मासिक पत्रिका को आप सम्पादिका रह चुकी । आपने प्रयाग में साहित्यकार संसद ‘ तथा देहरादून में उत्तरायण ‘ नामक साहित्यिक आश्रम की स्थापना की है । आपदा प्रयाग में प्रसारमाहला विद्यापीठ में प्राचार्य पद पर कार्यरत रही द्वारा पद्मभूषण की उपाधि से अलंकृत किया गया है । 1 सितम्बर 1987 ई . को इन्होंने अपनी इहलीला समाप्त की । 

रचनाए – 

नीहार, रश्मि, नीरजा, सान्ध्यगीत, दीप शिखा, यामा । 

साहित्य में स्थान – 

आपको आधुनिक हिन्दी साहित्य की मीरा कहा जाता पीड़ा व्यक्तिगत होते हुए भी समष्टि को समेटे हुए हैं । कविता और संस्मरण दोनों में मानव समाज ही नहीं अपितु आपके साहित्य में वर्णित पशु – पक्षी भी सम्मिलित हैं । वे सबके सुख – दुःख में सहभागिनी होने का प्रयास करती हैं । छायावाद और रहस्यवाद की चाहे जैसी भी कल्पना की जाए महादेवी जी को छोड़ा नहीं जा सकता ।

 

सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ कवि परिचय 

जीवन परिचय – ‘अज्ञेय’ का जन्म मार्च 1911 में पंजाब के करतारपुर नगर में हुआ । आपका पूरा नाम सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘ अज्ञेय ‘ था । बाल्यावस्था में आप अपने पिता के साथ लखनऊ , कश्मीर , बिहार और मद्रास में रहे । पुरातत्व के अवशेषों के मध्य रहने के कारण आपका स्वभाव कुछ विशिष्ट प्रकार का बन गया । संस्कृत से शिक्षा प्रारम्भ करके फारसी की शिक्षा प्राप्त की । आपकी शिक्षा मद्रास तथा लाहौर में हुई । बी.एस – सी. करने के बाद एम . ए . ( अंग्रेजी ) के अध्ययन काल में ही क्रान्तिकारी आन्दोलन में फरार हो गये । चार वर्ष तक बन्दी तथा दो वर्ष तक नजरबन्द रहे । आपने विविध स्थानों पर कार्य किया । आकाशवाणी में रहे तथा सेना में भर्ती हुए । आपने यूरोप, जापान तथा पूर्वेशिया की यात्राएँ की । कुछ समय तक अमेरिका में भारतीय साहित्य और संस्कृति के अध्यापक रहे । जोधपुर विश्वविद्यालय में तुलनात्मक साहित्य तथा भाषा अनुशीलन विभाग के निदेशक रहे । अज्ञेय को साहित्य के उत्कृष्ट सम्मान ‘ भारतीय ज्ञानपीठ ‘ और ‘ साहित्य अकादमी ‘ पुरस्कार दिये गये । उत्तर प्रदेश के हिन्दी संस्थान ने आपको मरणोपरान्त ‘ भारत – भारती ‘ ‘ पुरस्कार प्रदान किया । 4 अप्रैल , 1987 को आपका निधन हो गया ।

रचनाएँ – 

आँगन के पार द्वार, अरी ओ करुणा प्रभामय, हरी घास पर क्षण भर, इन्द्रधनुष रौंदे हुए ये, पूर्वा, बाबरा अहेरी । 

काव्यगत विशेषताएँ 

(अ) भावपक्ष (भाव तथा विचार) – प्रयोगवाद के जनक अज्ञेय के काव्य में वैचारिकता , प्रेम और सौन्दर्य का अद्भुत सम्मिश्रण है । आपकी रचनाओं में अनेक स्थलों पर सिद्धान्त दृष्टिगोचर होते हैं । आधुनिक हिन्दी साहित्य में आप अद्वितीय रचनाकार के रूप में उभरे । आपके काव्य में जीवन व्यापक रूप में प्रस्तुत हुआ है । 

(आ) कलापक्ष (भाषा तथा शैली) – भाषा और अभिव्यक्ति को नवीन आधार प्रदान करने वाले अज्ञेय ने खड़ी बोली में काव्य रचना की है । आपकी भाषा में साहित्यिकता के सभी गुण विद्यमान हैं । विषय के अनुरूप आपकी भाषा के रूप भी बदलते चलते हैं । अज्ञेय ने नवीन उपमानों एवं प्रतीकों को अपनाया है । बिम्ब – विधान द्वारा अभिव्यंजना को प्रभावपूर्ण बनाने में आप कुशल हैं । 

साहित्य में स्थान – 

बहुमुखी प्रतिभा के धनी अज्ञेय मानवता के पोषक थे । आपने अनेक पुरानी मान्यताओं को नकारते हुए नवीन काव्य – धारा का उन्नयन किया । आपने काव्य में सामाजिक जीवन की विषमता को नूतन सौन्दर्य बोध के रूप में अंकित किया । विविध प्रयोगों के माध्यम से काव्य रचना करने वाले अज्ञेय का आधुनिक हिन्दी साहित्य में उत्कृष्ट स्थान है ।

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