MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions पद्य Chapter 2 वात्सल्य भाव

Chapter 2 वात्सल्य भाव

कवितावली (तुलसीदास)

सोए हुए बच्चे से (हरिनारायण व्यास)

MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions पद्य Chapter 2 वात्सल्य भाव

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वात्सल्य भाव अति लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1 . 

सखी प्रातःकाल किसके द्वार पर जाती है ? 

उत्तर – 

सखी प्रातःकाल अवध के राजा दशरथ के द्वार पार जाती है । 

प्रश्न 2. बालक राम किस वस्तु को माँगने की हठ करते हैं ? 

उत्तर – 

बालक राम चन्द्रमा को माँगने की हठ करते हैं ।

प्रश्न 3. बच्चे की आँखों की तुलना किससे की गई है ? 

उत्तर – 

बच्चे की आँखों की तुलना तितली के पंखों से की गई है । 

प्रश्न 4. 

तुलसीदास जी के मन – मंदिर में सदैव कौन विहार करता रहता है ? 

उत्तर – 

तुलसीदास जी के मन – मंदिर में अवध के राजा दशरथ के चारों बच्चे सदैव विहार करते रहते हैं । उनका मन हर क्षण उन्हीं में रमा रहता है ।

प्रश्न 5. 

ईश्वर ने रोगों को दूर करने के लिए मनुष्य को क्या दिया है ? 

उत्तर – 

ईश्वर ने रोगों को दूर करने के लिए मनुष्य को औषधियाँ दी हैं ।

वात्सल्य भाव लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1.

सखी ठगी सी क्यों रह गई ? 

उत्तर – 

सखी सबेरे ही अवध के राजा दशरथ के द्वार पर गई । तभी राजा दशरथ अपने पुत्र राम को गोद में लेकर बाहर निकले । चिंतामुक्त करने वाले बालक राम के अद्भुत सौन्दर्य को देखकर सखी ठगी – सी रह गई । उन राम के काजल लगे शिशु खंजन जैसे नेत्र बड़े मनोरंजक लग रहे थे । उनका मुख चन्द्रमा के समान सुन्दर प्रतीत हो रहा था और उस पर नवीन नीलकमल जैसी दो आँखें बरबस ही विमोहित कर रही थीं । इस विस्मयकारक सुन्दरता को देखकर ही सखी ठगी – सी देखती की देखती रह गई । 

प्रश्न 2. 

माताएँ बालक राम की कौन – सी चेष्टाओं से प्रसन्न होती हैं ? 

उत्तर – 

बालक श्रीराम कभी चन्द्रमा को माँगने की हठ करते हैं और कभी उसकी परछाई को देखकर डर जाते हैं । कभी वे ताली बजाकर नाचने लगते हैं और कभी क्रोधित होकर कहते हैं और जिस वस्तु की माँग पर अड़ जाते हैं उसे लेकर ही मानते हैं । बालक राम की इन्हीं चेष्टाओं से माताएँ प्रसन्न होती हैं । 

प्रश्न 3. 

बालक राम का मुख – सौन्दर्य कैसा है ? 

उत्तर – 

बालक राम का मुख कमल के समान है , उस पर विद्यमान सौन्दर्य के पराग का पान करके मदमस्त हुए दो नेत्र रूप भौरे विद्यमान हैं । उनके मुख की सुन्दरता देखने वाले को आश्चर्यचकित कर देती है । वे अनुपम सौन्दर्य के धनी मुख वाले हैं जो देखता है वह देखता ही रह जाता है । 

प्रश्न 4. 

बच्चे के रेशमी बालों को कवि हथेलियों से क्यों स्पर्श करना नहीं चाहता ? 

उत्तर – 

सांसारिक समस्याओं के संघर्ष में पराजित निरीह कवि की हथेलियों में दरारें पड़ गई हैं , वे पत्थर सी कठोर हो गई हैं । इसलिए कवि उन शुष्क , बिबाईदार हथेलियों से बच्चे के रेशमी बालों का स्पर्श नहीं करना चाहता है । उसे भय है कि कहीं उसकी इन हथेलियों के फटे हुए चमड़े में बच्चे के भविष्य के सतरंगे इरादे उलझ न जाएँ । इस उलझन से उसका सफल भविष्य कहीं बचपन में ही टूट न जाये । यदि ऐसा हो गया तो आगामी समय कवि को अपराधी ठहरायेगा । 

वात्सल्य भाव दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. 

तुलसीदास ने बालक राम के किस स्वभाव का चित्रण किया है ? 

उत्तर – 

तुलसीदास ने बालक राम के बाल – स्वभाव का चित्रण किया है । बच्चे चंचल स्वभाव के होते हैं । वे किलकारी मारकर मनोरंजन करते हैं । वे कभी चन्द्रमा को लाने की हठ करते हैं और कभी उसकी परछाई देखकर डर जाते हैं । कभी ताली बजाकर नाचने लगते हैं तो कभी क्रोधित होकर अपने मनमानी हठ पूरी कराते हैं । इस प्रकार का उनका बालोचित व्यवहार माता – पिता तथा अन्य सभी को प्रसन्न करता है । बच्चे सरल स्वभाव के होते हैं । उनमें छल – कपट नहीं होता है । वे संभव – असंभव से भी परिचित नहीं होते हैं । यही कारण है कि बालक राम आकाश में विद्यमान चन्द्रमा को माँगने की जिद्द करते हैं । उनका क्रोध सात्विक होता है । यदि वे अपनी हठ पर अड़ जाते हैं तो पूरा करके ही मानते हैं । तुलसीदास ने बालक राम के बाल स्वभाव का स्वाभाविक , सरस एवं रोचक अंकन किया है । 

प्रश्न 2. 

तुलसीदास ने ‘ बाल हठ ‘ का स्वाभाविक चित्रण किया है । इस उक्ति को पाठ के आधार पर सिद्ध कीजिए । 

उत्तर –

संसार में जो हठ मानी जाती हैं उनमें बाल हठ ‘ प्रसिद्ध है । बालक सरल स्वभाव के होते हैं परन्तु अपनी इच्छाओं की पूर्ति के प्रति उनका तीव्र आग्रह होता है । अगर वे किसी चीज की मांग करते हैं तो उसे पूरा कराके ही मानते हैं । समझाने , पुचकारने से भी वे अपनी हठ नहीं छोड़ते हैं । बच्चे प्रायः चन्द्रमा को चाहते हैं । तुलसीदास के बालक राम भी चन्द्रमा की माँग करते हैं और अपनी माँग पर अड़ जाते हैं । वे जिस चीज की माँग करते हैं उस पर अड़ जाते हैं । यदि मिलने में देर हो तो क्रोधित हो उठते हैं । वे अपनी माँग की चीज लेकर ही मानते हैं । तुलसी दास जी ने प्रसिद्ध बालहठ का बड़ा ही स्वाभाविक चित्रण किया है । इसमें बिल्कुल भी बनावटीपन या अस्वाभाविकता नहीं आ पाई है ।

प्रश्न 3. 

हरिनारायण व्यास ने अपने ख्यालों ‘ की किन कमियों की ओर संकेत किया है ? 

उत्तर – 

‘ सोए हुए बच्चे से ‘ कविता में कवि हरिनारायण व्यास ने वात्सल्य भाव की अभिव्यक्ति की है । जीवन के अनेक प्रकार के कष्टों ने उन्हें झुलसा दिया है । उनके जीवन की नाव पर्वत – सी समस्याओं से टकराकर छत – विछत हो गयी है । इसलिए उनके ख्याल भी सुन्दर नहीं रह गये हैं । हरिनारायण व्यास के ख्यालों में आक्रोश का ताप इतना तीव्र हो गया है कि वे झुलस गये हैं । उन ख्यालों ने विभिन्न प्रकार की चोटें खाई हैं इसलिए उनमें सर्जनात्मकता नहीं रही है । निराशा , कठोरता , रूखापन , वेदना आदि व्यास जी के ख्यालों में आ गयी है । इन कमियों के कारण वे मासूम बच्चों के योग्य नहीं रह गये हैं ।

कवितावली भाव सारांश

शिशु राम के साथ उनके भाइयों के सौन्दर्य का आकर्षक वर्णन प्रस्तुत अंश में हुआ है । उनके खंजन के से नेत्र अद्भुत सौन्दर्य से युक्त हैं । उनके पैरों में नूपुर हाथों में मनोहर कंजनि , हृदय पर मणियों की माला सुशोभित है । वे पीला अँगा पहने हैं । 

उनका कमल – सा मुख आनन्द के परास से दीप्तिवान है । श्रीराम के शरीर की कान्ति श्याम कमल के समान दमक रही है तथा उनके नेत्र कमल की मंजुलता का हरण कर रहे हैं । धूल से लिपटे श्रीराम सुन्दरता में काम को पराजित कर रहे हैं । जब वे बाल सुलभ विनोद करते हैं तो उनके दाँतों की कान्ति दमक उठती है । श्रीराम कभी हठपूर्वक चन्द्रमा माँगते हैं तो कभी उसकी परछाईं से डर जाते हैं । ताली बजाकर नाचते हैं और सभी माताओं को प्रसन्न करते हैं । कभी क्रोधित होकर जिद्द करते हैं तथा जो चाहते हैं , वही ले लेते हैं । इस प्रकार दशरथ के चारों पुत्र तुलसी के मन में सदा विहार करते रहते हैं ।

कवितावली संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

(1) अवधेस के द्वारें सकारें गई सुत गोद कै भूपति लै निकसे।

अवलोकि हौं सोच विमोचन को ठगि-सी रही, जे न ठगे धिक-से॥

तुलसी मन-रंजन रंजित-अंजन, नैनसुखंजन-जातकसे।

सजनी ससि में समसील उभै नवलील सरोरूह-से बिकसे॥

शब्दार्थ – 

अवधेस = अवध के राजा , दशरथ । सकारें = सबेरे । सुत = पुत्र । भूपति राजा । अवलोकिहौं = देलूँगी । सोचबिमोचन = चिन्ता दूर करना । धिक – से = धिक्कार । मन – रंजन = मन को प्रसन्न करने वाले । रंजित – अंजन = काजल लगाये हुए । जातक = शिशु , बच्चा । सजनी = सखी । ससि = चन्द्रमा । समसील = समान आचरण वाले । उभै = दोनों । नवनील = नये नील वर्ण वाले । सरोरुह = कमल । 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्य ‘ वात्सत्य भाव ‘ पाठ के ‘ कवितावली ‘ शीर्षक से अवतरित है । इसके रचयिता गोस्वामी तुलसीदास हैं ।

प्रसंग – 

इसमें शिशु श्रीराम के रूप सौन्दर्य का मोहक अंकन हुआ है । 

व्याख्या – 

बालक श्रीराम के स्वरूप से प्रभावित एक युवती कहती है कि हे सखी , मैं सबेरे ही अवध के राजा दशरथ के दरवाजे पर गई थी तभी राजा अपने पुत्र को गोद में लेकर महल से निकले । चिन्ताओं को दूर करने वाले शिशु राम के रूप सौन्दर्य को देखकर मैं ठगी – सी खड़ी रह गई । वे इतने सुन्दर लग रहे थे कि जो उनके सौन्दर्य को देखकर ठगे नहीं , आश्चर्यचकित नहीं हुए उन पर धिक्कार है । तुलसीदास जी कहते हैं कि मन को प्रसन्न करने वाले उन राम के काजल लगे नेत्र श्रेष्ठ खंजन पक्षी के बच्चे के नेत्रों के समान प्रतीत हो रहे थे । युवती बताती है कि हे सखी , उनके मुख पर दोनों नेत्र चन्द्रमा में समान आचरण ( शुद्ध स्वभाव ) वाले दो नवीन नील कमलों के समान खिल रहे थे । 

विशेष – 

(1) शिशु श्रीराम के मुख सौन्दर्य की प्रभावशीलता का मोहक अंकन हुआ है । (2) शुद्ध , साहित्यिक अवधी भाषा में विषय का प्रभावी प्रतिपादन हुआ है । (3) अनुप्रास , उपमा , रूपक आदि अलंकारों तथा पदमैत्री की छटा दर्शनीय है । (4) छन्द – सवैया । (5) रस – वात्सल्य । 

 

(2) पग नूपुर औ पहुँची कर कंजनि भंजु बनी मनिमाल हिएँ।

नवनील कलेवर पीत सँगा झलकै पुलकैं नृपु गोद लिएँ।

अरविन्दु सो आननु रूप मरंदु अनंदित लोचन भंग पिएँ।

मनमो न बस्यौ अस बालकु जौं तुलसी जग में फल कौन जिएँ।

शब्दार्थ – 

पग – पैर । नूपुर = घुघरू । करकंजनि = कमल रूपी हाथ । मंजु = सुन्दर । मनिमाल = मणियों की माला । हिएँ = हृदय । नवनील = नवीन नीला । कलेवर = शरीर । पीत = पीला । झंगा झगला = बच्चों का कुर्तानुमा वस्त्र । आननु = मुख । मरंदु = मकरंद , पराग । लोचन = नेत्र । अस = इस प्रकार के । 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्य ‘ वात्सत्य भाव ‘ पाठ के ‘ कवितावली ‘ शीर्षक से अवतरित है । इसके रचयिता गोस्वामी तुलसीदास हैं ।

प्रसंग – 

यहाँ पर शिशु श्रीराम के रूप सौन्दर्य का विस्तृत एवं प्रभावपूर्ण अंकन हुआ है । 

व्याख्या – 

शिशु श्रीराम के पैरों में धुंधरू , कमल रूपी हाथों में सुन्दर पहुंची तथा हृदय पर मणियों की माला सुशोभित है । उनके नवीन नीले कमल के समान कान्तिवान शरीर पर पीले झगले की आभा झलक रही है । इस प्रकार के सुन्दर बालक के रूप सौन्दर्य को देखकर गोद में लेने वाले राजा ( दशरथ ) रोमांचित ( प्रसन्न ) हो रहे हैं । श्रीराम के कमल से मुख पर विद्यमान स्वरूप के पराग मधु का पान कर भौरे रूपी नेत्र आनंदित हो रहे हैं अर्थात् उनके नेत्रों से मस्ती एवं उल्लास का भाव झलक रहा है । तुलसीदास कहते हैं कि इस प्रकार के विलक्षण सौन्दर्य वाले शिशु राम ने यदि मेरे हृदय में स्थायी निवास न बनाया तो इस संसार में किस फल की प्राप्ति के लिए जीवित रहें अर्थात् बालक राम को हृदय में स्थिर करना ही जीवन का परम फल है । 

विशेष- 

(1) शिशु राम के प्रभावी रूप सौन्दर्य को हृदय में स्थायी रूप से बसा लेना ही जीवन का परम प्राप्तव्य है (2) शुद्ध , साहित्यिक अवधी भाषा में रूप सौन्दर्य का प्रभावी अंकन हुआ है । (3) रूपक , उपमा , अनुप्रास अलंकारों तथा पद – मैत्री की छटा अवलोकनीय है ।

 

(3) तनकी,दुति स्याम सरोरुह लोचन कंज की मंजुलताई हरैं।

अति सुन्दर सोहत धूरि भरे छवि भूरि अनंग की दूरि धरैं।

दमकैं दतियाँ दुति दामिनि ज्यौं किलक कल बाल विनोद करें।

अवधेस के बालक चारि सदा तुलसी मन-मन्दिर में बिहरैं।

शब्दार्थ – 

तन = शरीर । दुति = कान्ति । सरोरुह = कमल । कंज = कमल । मंजुलताई = मनोहरता , शोभा । हरें = हरण करते हैं । धूरि भरे = धूल से भरे हुए । छवि = शोभा । अनंग = कामदेव । दमकै = चमकती हैं । दतियाँ = छोटे – छोटे दाँतों की पंक्ति । दामिनि = बिजली । किलक = किलकारी भरते हैं । कल = सुन्दर । मन – मंदिर = मन रूपी मंदिर । बिहर = विहार करें । 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्य ‘ वात्सत्य भाव ‘ पाठ के ‘ कवितावली ‘ शीर्षक से अवतरित है । इसके रचयिता गोस्वामी तुलसीदास हैं ।

प्रसंग – 

राजा दशरथ के पुत्र बालक राम के मनोहर रूप सौन्दर्य के साथ चारों भाइयों की क्रीड़ाओं के प्रभाव का सटीक वर्णन हुआ है । 

व्याख्या – 

शिशु राम के शरीर की कान्ति नीलकमल के समान दमक रही है । उनके नेत्र कमल की सुन्दरता का हरण कर रहे हैं अर्थात् कमल उनके नेत्रों के समक्ष हीन दिखाई देते हैं । धूल से लिपटे बालक राम अत्यन्त शोभायमान लग रहे हैं । उनकी सुन्दरता इतनी अधिक है कि उसके सामने सौन्दर्य के प्रतीक कामदेव को भी दूर रख दिया गया है अर्थात् बालक राम कामदेव से बहुत अधिक सुन्दर लग रहे हैं । उनके छोटे – छोटे दाँतों की पंक्ति ऐसे चमक रही है जैसे बिजली कौंधती है । वे किलकारी मार कर बाल सुलभ प्रसन्नता प्रगट करते हुए बड़े मनोहर लग रहे हैं । तुलसीदास जी कहते हैं कि अवध के राजा दशरथ के चारों पुत्र इसी सुन्दरता के साथ मेरे मन रूपी मंदिर में निरंतर विहार करते रहें ।

विशेष- 

(1) बालक राम के शरीर की कान्ति , नेत्रों की शोभा , स्वरूप की सुन्दरता , दाँतों की दमक , किलकारियों आदि का प्रभावी वर्णन हुआ है । (2) शुद्ध , साहित्यिक अवधी में सौन्दर्य का प्रभावोत्पादक अंकन हुआ है । (3) रूपक , उपमा , अनुप्रास आदि अलंकारों तथा पद – मैत्री का सौन्दर्य दर्शनीय है । (4) सवैया – छन्द । (5) वात्सल्य रस । 

 

(4) कबहूँससि माँगत आरिकरैं कबहूँप्रतिबिम्ब निहारि डरैं।

कबहूँ कर ताल बजाइ कैं नाचत मातु सबै मन मोद भरें।

कबहूँ रिसिआई कहैं हठिकै पुनिलेत सोई जेहिलागि अरैं।

अवधेस के बालक चारि सदा तुलसी मन-मन्दिर में बिहरैं।

शब्दार्थ – 

ससि = चन्द्रमा । आरि = हठ । निहारि = देखकर । करताल = हाथ की ताली । मोद = हर्ष , प्रसन्नता । रिसिआई = क्रोधित होकर । हठिक = जिद करके अरें अड़ जाते हैं । बिह = बिहार करें । 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्य ‘ वात्सत्य भाव ‘ पाठ के ‘ कवितावली ‘ शीर्षक से अवतरित है । इसके रचयिता गोस्वामी तुलसीदास हैं ।

प्रसंग – 

प्रस्तुत पद्य में बालक राम की पल – पल परिवर्तित बाल सुलभ चेष्टाओं का मनोरम अंकन किया गया है । 

व्याख्या – 

बालक राम कभी चन्द्रमा को माँगने की हठ करते हैं तो कभी उसकी परछाई ( आँगन के पानी में ) देखकर डर जाते हैं । कभी दोनों हाथों से ताली बजाकर नाचते हैं तो सभी माताएँ मन में प्रसन्नता का अनुभव करती हैं अर्थात् उन्हें ताली बजाकर नाचते हुए देखकर वे बहुत खुश होती हैं । कभी क्रोधित होकर हठपूर्वक कुछ कहते हैं और जिस वस्तु के लिए अड़ जाते हठ करते हैं वही लेकर मानते हैं । तुलसीदास जी कहते हैं कि अवध के राजा दशरथ के चारों पुत्र इसी रूप में मेरे मनरूपी मंदिर में सतत विहार करें । 

विशेष- 

(1) हठ करना , डरना , ताली बजाकर नाचना , क्रोधित होना , जो माँगे उस चीज को लेकर ही मानना आदि बालोचित चेष्टाओं की स्वाभाविक अभिव्यक्ति हुई है । (2) बच्चे के पल – पल बदलने वाले चंचल स्वभाव का सटीक अंकन किया गया है । (3) शुद्ध , साहित्यिक अवधी भाषा में विषय का प्रतिपादन किया गया है । (4) वात्सल्य रस । 

 

(5) वर दंत की पंगति कुंदकली अधराधर पल्लव खोलन की।

चपला चमकैंघन बीच जगै छवि मोतिन माल अमोलन की।

घुघरारि लटैं लटकै मुख ऊपर कुंडल लोल कपोलन की।

नेवछावरि प्रान करें तुलसी बलि जाऊँलला इन बोलन की।

शब्दार्थ – 

वर = श्रेष्ठ । दंत की = दाँतों की । पंगति = पंक्ति । कुन्द = एक पौधा जिसका फूल दाँतों का उपमान माना गया है । अधराधर = ऊपर तथा नीचे के दोनों ओष्ठ । पल्लव = कोमल पत्ते । चपला = बिजली । घन = बादल । अमोलन = अमूल्य , बहुमूल्य । घुघरारि = घुघराली । लोल = सुन्दर । कपोलन = गालों पर । नेवछावरि = न्यौछावर । बलि = बलिहारी । लला = लाल , पुत्र 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्य ‘ वात्सत्य भाव ‘ पाठ के ‘ कवितावली ‘ शीर्षक से अवतरित है । इसके रचयिता गोस्वामी तुलसीदास हैं ।

प्रसंग – 

इस पद्य में बालक राम के रूप सौन्दर्य का मोहक वर्णन किया है । 

व्याख्या – 

बालक श्रीराम के दाँतों की श्रेष्ठ पंक्ति कुंद की कली के समान सुन्दर है । उनके बोलने पर ऊपर तथा नीचे के दोनों ओष्ठ कोमल लाल – लाल पत्तों की तरह खुलते हैं । उनके श्याम वर्ण वाले वक्षस्थल पर शोभायमान बहुमूल्य मोतियों की माला ऐसी लग रही है जैसे बादलों के मध्य बिजली चमक रही हो । उनके मुख के ऊपर धुंघराली लटाएँ लटक रही हैं और उनके गालों पर कानों में पहने हुए कुण्डल लटक रहे हैं । लाल श्रीराम के तुतलाकर बोलने पर तुलसीदास अपने प्राण न्यौछावर करते हैं तथा बार – बार उन पर बलिहारी जाते हैं । 

विशेष- 

(1) शिशु राम की दंत पंक्ति , होठों , माला , लटाएँ , कुण्डल आदि की शोभा का मनोहारी अंकन हुआ है । (2) शुद्ध , साहित्यिक अवधी भाषा में विषय का प्रभावी प्रस्तुतीकरण हुआ है । (3) उपमा , अनुप्रास अलंकार तथा पद – मैत्री का सौन्दर्य सहज ही आकर्षित करता है।

सोए हुए बच्चे से भाव सारांश

सोए हुए बच्चे से ‘ कविता में हरिनारायण व्यास ने आज के संघर्षशील जीवन की विषमताओं के मध्य वात्सल्य भाव की बड़ी मार्मिक अभिव्यक्ति की है । बच्चे की फूलों – सी खूबसूरत पलकों को वे यथार्थ जीवन के ताप , टकराव और असफलता भरे ख्यालों से नहीं छूना चाहते हैं । वे तितली के पंखों – सी बच्चे की आँखों में उगने वाले रंगीन स्वप्नों को भंग नहीं करना चाहते हैं ।

जीवन की कठिनाइयों के कारण खुरदरी हुई कठोर हथेलियों से बच्चे के रेशमी बालों का स्पर्श करना संगत नहीं मानते हैं ताकि बालोचित सरलता बनी रहे और सफल भविष्य की रचना का इरादा टूट न जाये । मंगलमय भविष्य की रचना के लिए आतुर बाल मन को वे समुचित अवसर देना चाहते हैं क्योंकि बच्चे में मानव जीवन के अस्तित्व का आधार है । सुखद भविष्य के स्वप्नों भरी नींद में सोये बच्चे की मुस्कान को वे बनाये रखना चाहते हैं ताकि समय उसे विकसित होने का सुअवसर प्रदान करे ।

सोए हुए बच्चे से संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

(1) मेरे ख्याल इतने खूबसूरत नहीं हैं,

जिनको मैं फलों-सी खूबसूरत तुम्हारी पलकों को

छुआ दूँ और ये तुम्हारे लिए,

खूबसूरत सपने बन जाएँ। 

 

ये ख्याल इन दुनियादारी की 

लपटों से झुलस गए हैं 

पहाड़ों से टकराती नाव है , 

नाकामयाबी की चोट से 

ये लहूलुहान हैं । 

शब्दार्थ – 

ख्याल = विचार । खूबसूरत = सुन्दर । दुनियादारी सांसारिकता । झुलस = जल गये । नाकामयाबी = असफलता । लहूलुहान = खून से लथपथ ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘ वात्सल्य भाव ‘ में संकलित ‘ सोए हुए बच्चे से ‘ कविता से लिया गया है । इसके रचयिता श्री हरिनारायण व्यास हैं । 

प्रसंग – 

सांसारिकता से प्रताड़ित और जीवन संघर्षों में पराजित कवि ने बच्चे को कटु अनुभवों से परे रखने का भाव व्यक्त कर रहे हैं । 

व्याख्या – 

कवि सोए हुए बच्चे को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि मेरे विचार इतने सुन्दर नहीं हैं जिनको मैं तुम्हारी सुन्दर पलकों से छुआ हूँ और मेरे ये विचार तुम्हारे भावी जीवन के मधुर स्वप्न बन जायें अर्थात् मेरे विचार तुम्हारे भविष्य को सँवारने वाले नहीं होंगे । कवि कहता है कि मेरे विचार प्रारम्भ से ऐसे नहीं थे । उन्हें सांसारिकता की कठिनाइयों की आग की लपटों ने जला दिया है । संसार की पर्वत जैसी समस्याओं से टकराकर मेरी जीवन की नाव असफलताओं के प्रहारों से रक्तरंजित हो गई है । आशय यह है कि मुझे संसार में असफलताएँ ही मिली हैं अतः मेरा जीवन कष्टमय ही रहा है

विशेष – 

(1) अपनी सांसारिक यातनाओं और असफलताओं से कवि बच्चे को दूर रखना चाहता है । (2) खड़ी बोली में विषय को प्रस्तुत किया गया है । (3) छन्द मुक्त शैली में वात्सल्य रस की अभिव्यक्ति हुई है । 

 

(2) तितली की पाँखों – सी 

तुम्हारी आँखों में उगते हुए उजाले के 

इन्द्रधनुष सपने 

इनमें फंसकर बिखर जाएंगे । 

 

बिवाई वाली इन पथरीली हथेलियों से 

तुम्हारे रेशमी बालों की 

शैशवी लापरवाही को स्पर्श नहीं करूंगा ।

शब्दार्थ – 

पाँखों = पंखों । उजाले = प्रकाश । इन्द्रधनुष = सतरंगे धनुष । बिवाई = दरार । शैशवी = बचपन की । लापरवाही = अल्हड़ता । स्पर्श = छूना ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘ वात्सल्य भाव ‘ में संकलित ‘ सोए हुए बच्चे से ‘ कविता से लिया गया है । इसके रचयिता श्री हरिनारायण व्यास हैं । 

प्रसंग – 

यहाँ कवि ने रेशमी बालों वाले बच्चे को अपनी कठारे हथेली पर न छूने का भाव व्यक्त किया है । 

व्याख्या – 

बच्चे के प्रति स्नेह भाव से कवि कहता है कि तितली के पंखों जैसी तुम्हारी आँखों में उभरते हुए सुखद भविष्य की आकांक्षाओं के सतरंगी स्वप्न इस जीवन की विषमताओं में फंसकर टूट जायेंगे और इधर – उधर बिखर जायेंगे । कवि कहता है कि मेरी दरारों वाली पत्थर जैसी हथेलियों के छूने से तुम्हारे रेशम जैसे बालों की बचपन की जो अल्हड़ता है वह तहस – नहस हो जायेगी । इसलिए मैं अपनी हथेलियों से तुम्हारी रेशमी बालों को नहीं छूऊँगा । 

विशेष – 

(1) बच्चों के भोलेपन को बनाये रखने के भाव से कवि ने उसके रेशमी बालों को अपनी दरारों भरी हथेली से न छूने का भाव व्यक्त किया है । (2) शुद्ध , व्यावहारिक खड़ी बोली में विषय का प्रतिपादन हुआ है । (3) उपमा ,अनुप्रास अलंकारों का सहज प्रयोग हुआ है । 

 

(3) फटी हुई चमड़ी में उलझकर 

कोई बाल कोई रंगीन मनसूबा कोई 

कामयाब भविष्य 

टूट जाएगा 

आने वाला जमाना, 

मुझे दोषी ठहराएगा ।

शब्दार्थ – 

बाल = बच्चा । रंगीन = आनंददायक । मनसूबा = इरादा । कामयाब = सफल । जमाना = युग , समय । 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘ वात्सल्य भाव ‘ में संकलित ‘ सोए हुए बच्चे से ‘ कविता से लिया गया है । इसके रचयिता श्री हरिनारायण व्यास हैं । 

प्रसंग – 

यहाँ कवि अनुभव करता है कि सांसारिक विसंगतियों में असफल रहने से शुष्क शरीर के स्पर्श से बच्चे का भविष्य खण्डित हो जायेगा । 

व्याख्या – 

कवि जीवन की असफलताओं के कारण मिले कष्टों से सूखी दरारों भरी चमड़ी का स्पर्श भविष्य के मंगलमय इरादों वाले बच्चे से नहीं करना चाहता है । वह जानता है कि तो इरादों , आशाओं भरे बालक को यदि ये कटु अनुभव पता लग गये तो उसका मनोबल टूट जायेगा , वह सफल भविष्य का निर्माण नहीं कर पायेगा और फिर आने वाला समय इसके लिए कवि को ही दोषी मानेगा । 

विशेष – 

(1) सुखद भविष्य की मंगलमय कामना करने वाले बच्चे के प्रति स्नेह व्यक्त हुआ है । (2) बोलचाल की व्यावहारिक खड़ी बोली में विषय की मार्मिक अभिव्यक्ति हुई है । (3) मुक्त छन्द तथा वात्सल्य रस । 

 

(4) तुम्हारी पलको में तैरती 

उनींदी पुतलियों पर 

 

सेमल की रूई – सी 

सुबह की नींद 

जागने से पहले की खुमारी 

मँडरा रही है 

और तुम्हारा मन 

आतुर है कुलाँचें भरने । 

शब्दार्थ – 

उनींदी = नींद भरी । खुमारी = आँखों में भरा आलस्य । मँडरा = छा रही । आतुर = बेचैन , उत्सुक । कुलाँचें = छलांग ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘ वात्सल्य भाव ‘ में संकलित ‘ सोए हुए बच्चे से ‘ कविता से लिया गया है । इसके रचयिता श्री हरिनारायण व्यास हैं । 

प्रसंग – 

यहाँ मंगलमय भविष्य के प्रति बालक की आतुरता का अंकन किया गया है । 

व्याख्या – 

बच्चे के प्रति कवि का भाव है कि तुम्हारी शिशु अवस्था की पलकों में निदियारी पुतलियों पर सेमल की रूई के समान प्रातःकाल की हल्की नींद तैर रही है । जगने से पहले का आलस्य तुम पर छाया है लेकिन तुम्हारा मन सुखद भविष्य के निर्माण के लिए छलाँग लगाने को आतुर है ।

विशेष – 

(1) बालक के भोलेपन में उत्पन्न भविष्य की सुखद आकांक्षाओं की पूर्ति के प्रयास का स्पष्ट संकेत किया है । (2) विषयानुरूप सरल एवं सरस खड़ी बोली का प्रयोग हुआ है । (3) उपमा , अनुप्रास अलंकारों का सहज प्रयोग । (4) मुक्त छन्द तथा वात्सल्य रस । 

 

(5) हम तुम ही से तो अपनी अहमियत 

पहचानते हैं 

तुम हो इसीलिए तो हमारी ‘ भूख – प्यास

मकसद रखती है । 

 

मैं तुम्हारे गालों को

बीमार ओठों की छुअन से नहीं जलाऊँगा 

 

तुम इसी तरह मुस्कराते सोये रहो 

सूरज खुद तुमको जगाएगा । 

शब्दार्थ – 

अहमियत = महत्व , अस्तित्व । मकसद = मतलब , लक्ष्य । मुस्कराते = हास से युक्त होकर । सूरज = सूर्य ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य – पुस्तक के ‘ वात्सल्य भाव ‘ में संकलित ‘ सोए हुए बच्चे से ‘ कविता से लिया गया है । इसके रचयिता श्री हरिनारायण व्यास हैं । 

प्रसंग – 

यहाँ नींद में विभोर बच्चे के प्रति कवि आशापरक शुभ भावनाएँ अभिव्यक्त कर रहे हैं ।

व्याख्या – 

नींद में सोए बच्चे पर मुग्ध कवि कहते हैं कि हमारे अस्तित्व , महत्व का आधार तुम ही हो , तुम हो तभी हम हैं , तुम ही हमारी पहचान हो । तुम्हारे कारण ही हमारे जीने की आधार भूख और प्यास का कुछ मतलब , उद्देश्य है । यदि तुम न हो तो हमारे लिए खाना – पीना यहाँ तक कि जीने का कोई मतलब नहीं है । कवि कहते हैं कि तुम्हारे भोले , कोमल गालों का चुम्बन मैं अपनी रोगी ओठों से नहीं करूँगा अन्यथा वे जल जायेंगे । मेरी अभिलाषा है कि तुम इसी प्रकार की सुखद नींद में आनन्दमय भविष्य के स्वप्न देखते हुए मुस्कराते रहो । मेरा विश्वास है कि तुम्हें जगाने को सुखमय प्रकाश स्वयं आयेगा । तुम्हारा भविष्य उज्ज्वल एवं मंगलमय होगा । 

विशेष – 

(1) बालक के मंगलमय भविष्य की कामना व्यक्त हुई है । (2) मनुष्य बच्चों में अपना भविष्य देखता है । (3) उर्दू के शब्दों से युक्त खड़ी बोली में विषय को प्रस्तुत किया गया है । (4) मुक्त छन्द तथा वात्सल्य रस ।

तुलसीदास कवि परिचय 

जीवन परिचय – 

स्वान्तः सुखाय कविता करने वाले लोकनायक तुलसीदास ने राम नाम की पवित्र गंगा को जन – जन तक पहुँचाया । तुलसी के जन्म के सम्बन्ध में यह दोहा प्रसिद्ध है 

” पन्द्रह सौ चौवन विसे , कालिन्दी के तीर । श्रावणशुक्ला सप्तमी , तुलसी धर्यो शरीर ॥ “

 

तुलसीदास का जन्म संवत् 1554 ( सन् 1497 ) ठहराया गया है । तुलसीदास का जन्म स्थान बाँदा जिले के राजापुर नामक ग्राम को माना जाता है । कुछ लोग इनका स्थान सोरों , जिला एटा मानते हैं । तुलसीदास के पिता का नाम आत्माराम और माता का नाम हुलसी था । इनके विषय में यह कहा जाता है कि ये अशुभ नक्षत्र में पैदा हुए थे बचपन में माता – पिता का देहान्त हो जाने से उन्हें नरहरिदास ने पाला था राम की कथा तुलसी ने अपने गुरु नरहरिदास से ही सुनी । काशी में इन्होंने शास्त्रों का अध्ययन किया 

तुलसीदास अपने जीवन के अन्तिम दिनों में मुक्ति देने वाली काशी आ गये थे । संवत् 1680 ( सन् 1623 ) में उनका निधन हो गया । 

रचनाएँ – 

तुलसी ने विपुल साहित्य की रचना की जिनमें से प्रमुख कृतियाँ इस प्रकार 

(1) रामचरितमानस

(2) विनय पत्रिका

(3) कवितावली

(4) गितावली

काव्यगत विशेषताएँ – 

(अ) भावपक्ष ( भाव तथा विचार ) –

मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के अनन्य भक्त तुलसीदास के काव्य में भक्ति की प्रधानता है । शक्ति , शील एवं सौन्दर्य के साकार स्वरूप राम ही उनके स्वामी हैं । वे मानते हैं कि जिसे राम एवं वैदेही प्रिय नहीं है वह प्रियजन भी त्यागने योग्य है । तुलसी के काव्य में लोक मंगल , सत्संगति , समन्वय पर बल दिया गया है । वे राम के चरणों के दास हैं । तुलसी रससिद्ध कवि हैं । उनके काव्य में सभी रसों का परिपाक हुआ किन्तु मूल रस ‘ शान्त ‘ है । 

(ब) कलापक्ष ( भाषा तथा शैली ) –

तुलसीदास ने ब्रज एवं अवधी भाषाओं का साधिकार प्रयोग किया है । उनकी शुद्ध – साहित्यिक भाषा में राजस्थानी , भोजपुरी , बुन्देलखण्डी आदि के शब्द भी मिल जाते हैं । तुलसी ने स्वयं से पूर्व के कवियों द्वारा प्रयोग की गयी लगभग सभी शैलियों को अपनाया है । दोहा , चौपाई , कवित्त , पद , सवैया आदि 

साहित्य में स्थान – 

तुलसीदास को हिन्दी साहित्य में शीर्ष स्थान प्राप्त है । वे एक साथ भक्त , कवि , समाज – सुधारक , दार्शनिक , उपदेशक , लोकनायक , युग – दृष्टा हैं । भाषा पर उनका पूर्ण अधिकार है । 

हरिनारायण व्यास कवि परिचय 

जीवन परिचय – 

नयी कविता के कवियों में अपनी विशिष्ट पहचान रखने वाले हरिनारायण व्यास का जन्म 14 अक्टूबर , सन् 1923 को जिला शाजापुर के सुन्दरसी नामक ग्राम में हुआ । आप एक मध्यमवर्गीय परिवार में पैदा हुए इसलिए विविध प्रकार के अभावों को आपने सहन किया ।

हरिनारायण व्यास ने उज्जैन तथा बड़ौदा से उच्च शिक्षा प्राप्त की । आपके मामा श्री गोपी बल्लभ उपाध्याय विचारशील व्यक्ति के धनी थे । आप पर उनकी बौद्धिकता का गहरा प्रभाव पड़ा । इनकी काव्य रचना के प्रति बचपन से ही लगाव था जिसे उपाध्याय जी के निर्देशन से प्रोत्साहन मिला । मुक्तिबोध , गिरिजा कुमार माथुर , प्रभाकर माचवे के संसर्ग ने आपके कवि रूप को निखारने , सँवारने में बड़ी सहायता की ।

रचनाएँ – 

समर्थ रचनाकार हरिनारायण व्यास के सृजन का संसार व्यापक है । उनकी उल्लेखनीय काव्य – कृतियाँ ‘ मृग और तृष्णा ‘ , ‘ बरगद के चिकने पत्ते ‘ , ‘ त्रिकोण पर सूर्योदय ‘ , ‘ आउटर पर रुकी ट्रेन ‘ आदि हैं । ‘ मृग और तृष्णा ‘ काव्य संग्रह उनके जीवन को प्रतिबिम्बित करता है । 

काव्यगत विशेषताएँ – 

(अ) भावपक्ष ( भाव तथा विचार ) –

हरिनारायण व्यास का मानना है कि काव्य सृजन के लिए जीवन और प्रतीक का योग आवश्यक है । यद्यपि व्यास जी कवि को सपनों के संसार में विचरण करने वाला मानते हैं किन्तु आपके काव्य का विकास यथार्थ जीवन के खुरदरेपन से ही हुआ है । इन्होंने संघर्षशील संसार की विषमताओं तथा उसमें मिलने वाली असफलताओं से कटु साक्षात्कार कराया है ।

(ब) कलापक्ष ( भाषा तथा शैली ) -हरिनारायण व्यास मानते हैं कि व्यावहारिक जीवन में प्रयोग होने और विकसित होने वाली ‘ भाषा ‘ समाज तथा जीवन का एक सशक्त अस्त्र , होती है । उन्होंने अपने काव्य में इसी भाषा को अपनाया है । सीधी , सपाट बोलचाल की भाषा में बड़े गम्भीर विषयों का प्रतिपादन करने में व्यास जी को सफलता मिली है । अलंकारों के आडम्बर से दूर रहने पर भी आपके काव्य में अलंकारों का सटीक प्रयोग देखा जा सकता है । यथार्थ जीवन के प्रतीकों के माध्यम से आपने विषय को प्रभावी बनाया है । 

साहित्य में स्थान – 

स्वातंत्र्योत्तर काल के कवियों में हरिनारायण व्यास का स्थान बड़ा महत्वपूर्ण है । यथार्थ जीवन को स्वाभाविक अभिव्यक्ति देने वाले नयी कविता के कवियों में आपका नाम सम्मान के साथ लिया जाता है । आप विषमताओं के मध्य जीवन की रचनात्मकता में विश्वास रखते हैं ।

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