MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions पद्य Chapter 1 भक्ति धारा

Chapter 1 भक्ति धारा

विनय के पद (सूरदास)

स्तुति खण्ड (मलिक मुहम्मद जायसी)

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भक्ति धारा अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. 

पद में मीठे फल का आनंद लेने वाला कौन है ?

उत्तर – 

पद में मीठे फल का आनंद लेने वाला गूंगा व्यक्ति है । 

प्रश्न 2. 

अवगुणों पर ध्यान न देने के लिए सूरदास ने किससे प्रार्थना की है ? 

उत्तर –

सूरदास ने भगवान कृष्ण से अवगुणों पर ध्यान न देने की प्रार्थना की है । 

प्रश्न 3. 

पारस में कौन – सा गुण पाया जाता है ?

उत्तर – 

पारस में यह गुण पाया जाता है कि वह लोहे को छूकर शुद्ध सोना बना देता है । 

प्रश्न 4. 

जायसी के अनुसार संसार की सृष्टि किसने की है ? 

उत्तर – 

जायसी के अनुसार संसार की सृष्टि ईश्वरीय सत्ता ने की है । 

प्रश्न 5. 

ईश्वर ने रोगों को दूर करने के लिए मनुष्य को क्या दिया है ? 

उत्तर – 

ईश्वर ने रोगों को दूर करने के लिए मनुष्य को औषधियाँ दी हैं । 

प्रश्न 6. 

स्तुति खण्ड ‘ में जायसी ने कितने द्वीपों और भुवनों की चर्चा की है ? 

उत्तर – 

‘स्तुति खण्ड’ में जायसी ने सात द्वीपों तथा चौदह भुवनों की चर्चा की है । 

प्रश्न 7. 

जायसी ने कथा किसका स्मरण करते हुए लिखी है ? 

उत्तर – 

जायसी ने सृष्टिकर्ता ( ईश्वरीय ) सत्ता का स्मरण करते हुए कथा लिखी है ।

भक्ति धारा लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. 

सूरदास ने निर्गुण की अपेक्षा सगुण को श्रेयस्कर क्यों माना है ?

 उत्तर – 

सूरदास निर्गुण की अपेक्षा सगुण भक्ति को श्रेयस्कर मानते हैं क्योंकि निर्गुण ब्रह्म की स्थिति के विषय में कुछ कह पाना संभव नहीं है। निराकार भक्ति मन और वाणी के लिए अंगमनीय है। निर्गुण ब्रह्म का न कोई स्वरूप है , न पहचान है , उसकी जाति , गुण आदि का भी पता नहीं है । उसे पाने की कोई युक्ति भी नहीं है। बिना आकार के , आधार के मेरा मन कहाँ दौड़े । इसलिए सूरदास के साकार भगवान की भक्ति श्रेष्ठ प्रतीत होती है।

प्रश्न 2. 

गूंगा फल के स्वाद का अनुभव किस तरह करता है ?

उत्तर – 

गूंगा व्यक्ति मीठा फल खाता है तो उसे वह फल बड़ा स्वादिष्ट लगता है। उसका आनंद वह अपने हृदय में अनुभव करता है। आनन्द अनुभव करते हुए भी वह उस आनन्द का बखान नहीं कर पाता है क्योंकि उसके पास वाणी नहीं होती है। 

प्रश्न 3. 

कुब्जा कौन थी तथा उसका उद्धार कैसे हुआ ?

अथवा

कुब्जा कौन थी ? उसका उद्धार किसने किया ?

उत्तर –

 कुब्जा कुबड़ी थी। वह कंस की दासी थी। ब्रज में गोपियों में यह खबर फैल गयी थी कि मथुरा में श्रीकृष्ण कुब्जा के प्रेम में फंस गये हैं , इसीलिए गोकुल नहीं लौट रहे हैं। श्रीकृष्ण ने कुब्जा का कूबड़ सीधा करके उसका उद्धार किया था। 

प्रश्न 4. 

सूरदास ने स्वयं को ‘ कुटिल खल कामी ‘ क्यों कहा है ?

उत्तर – 

सूरदास भगवान श्रीकृष्ण के भक्त हैं। वे भगवान से विनय करते हैं कि आप मेरा उद्धार कर दीजिये। भक्त भगवान के समक्ष अपनी दीनता – हीनता का बखान कर कृपा प्राप्ति के लिए निवेदन करता है। इसीलिए सूरदास स्वयं को दुष्ट , कुटिल और वासनाओं में लिप्त रहने वाला कहते हैं। यह निवेदन कर वे भगवान की कृपा पाना चाहते हैं । 

प्रश्न 5. 

जायसी के अनुसार परमात्मा ने किस – किस तरह के मनुष्य बनाये हैं ? 

उत्तर – 

जायसी के अनुसार परमात्मा ने इस संसार में कई प्रकार के मनुष्य बनाये हैं । उन्होंने मनुष्य को अन्य प्राणियों से अधिक बड़प्पन दिया है । उसने राजा , ठाकुर , दास आदि प्रकार के मनुष्य बनाये हैं । धनवान , निर्धन , असहाय , बलवान आदि प्रकार के मनुष्यों की रचना भी उसने की है । उसने अहंकारी , लोभी , भिखारी आदि प्रकार के मनुष्यों की सृष्टि भी की है ।

भक्ति धारा दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. 

सूरदास ने किस आधार पर ईश्वर को समदर्शी कहा है ? 

उत्तर – 

ईश्वर ने ही संसार की रचना की है । वही इस जगत का नियंता है । उसका सभी के प्रति एक प्रकार का ही भाव है । ईश्वर किसी के प्रति पक्षपात का भाव नहीं रखता है । वह भले – बुरे के भाव से परे है । समस्त सृष्टि उसने रची है । अतः सभी के प्रति उसकी समान दृष्टि रहती है । वे भले – बुरे सभी का कल्याण करते हैं । पारस का स्वभाव अच्छे – बुरे का भेद करने का नहीं , उसके चाहे बधिक का वध करने वाला लोहा हो अथवा पूजा में प्रयोग होने वाला लोहा , वह दोनों को ही शुद्ध सोना बना देता है । गंगा भी नदी या गंदे नाले में भेद नहीं करती है । उसमें आकर जो भी मिल जाता है वह देवनदी गंगा कहलाने लगती है । सूरदास ने सभी के प्रति समान भाव के आधार पर आप मेरा उद्धार कर दीजिये । ही ईश्वर को समदर्शी कहा है तथा याचना की है कि मेरे अवगुणों की ओर ध्यान मत दीजिये 

प्रश्न 2. 

निर्गुण और सगुण भक्ति में क्या अन्तर है ?

उत्तर – 

भक्तिकाल में भक्ति के दो प्रकार- 

(1) निर्गुण भक्ति एवं ( 2 ) सगुण भक्ति । 

निर्गुण भक्ति की प्रमुख विशेषताएँ- 

(1) निराकार ब्रह्म में विश्वास करने वाले निर्गुण भक्त कहलाते हैं । उनका निर्गुण ब्रह्म घट – घटवासी है । उसका कोई आकार , गुण , जाति आदि नहीं है । निर्गुण ब्रह्म अजन्मा और निर्विकार है । 

(2) निर्गुण भक्ति में गुरु का विशेष महत्त्व माना गया है । इस भक्ति में गुरु ही सिद्धि तक पहुँचाने का माध्यम है । गुरु की कृपा से ही माया आदि से मुक्ति मिलती है । गुरु के बिना ज्ञान नहीं हो सकता है और ज्ञान के बिना मुक्ति संभव नहीं है ।

(3) निर्गुण भक्ति में माया को साधना – मार्ग की बाधा माना गया है । इससे छुटकारा पाना आवश्यक है । 

(4) निर्गुण भक्ति में रहस्यमय अव्यक्त सत्ता से मिलन का माध्यम प्रेम है । निर्गुण ब्रह्म का विरह की पीर के बाद ही साक्षात्कार हो पाता है । हिन्दी में निर्गुण भक्ति को मानने वाले दो वर्गों में विभाजित हैं- ( 1 ) ज्ञानमार्गी , ( 2 ) प्रेममार्गी । ज्ञानमार्गी निर्गुण भक्त कवियों में कबीर , दादू , मलूकदास , नानक , रैदास आदि हैं । प्रेममार्गी , निर्गुण भक्ति शाखा के कवि सूफी संत हैं । मलिक मुहम्मद जायसी , कुतुबन , मंझन आदि इस धारा के प्रमुख कवि हैं । 

सगुण भक्ति की विशेषताएँ- 

(1) सगुण , साकार ब्रह्म की उपासना सगुण भक्ति कहलाती है । सगुण भक्ति में मुक्ति कामना न करके भक्ति की चाह रहती है । सगुण ब्रह्म के दिव्य गुणों का क्षय या विकास नहीं होता है । सगुण भगवान सृष्टि के कर्ता , पालक तथा संहारक हैं । 

(2) लीला रहस्य – सगुण भक्ति में लीलावतार का अत्यधिक महत्त्व है । भगवान राम तथा भगवान कृष्ण दोनों ही लीलावतारी हैं । इनकी लीलाओं का वर्णन ही सगुण भक्ति काव्य में है । 

(3) भेदभाव का अभाव – सगुण भक्ति अपनाने वाले जाति , वर्ग आदि का बंधन नहीं मानते हैं

(4) गुरु की महत्ता – सगुण भक्ति में गुरु की महत्ता को स्वीकार किया गया है । 

(5) लोक मंगल – सगुण भक्ति में लोक के कल्याण का भाव विद्यमान रहता है । सौन्दर्य की उपासना के द्वारा मंगल का विधान करना इनका लक्ष्य है । सगुण भक्ति की हिन्दी काव्य में दो शाखाएँ- ( 1 ) रामभक्ति शाखा तथा ( 2 ) कृष्ण भक्ति शाखा हैं । रामभक्ति शाखा के प्रमुख कवि तुलसीदास हैं । इन्होंने मर्यादा पुरुषेतम भगवान राम को आराध्य रूप में अपनाया है । कृष्णभक्ति शाखा के प्रमुख कवि सूरदास , नन्ददास , मीराबाई , रसखान आदि हैं । लीलावतारी श्रीकृष्ण इनके आराध्य हैं । 

प्रश्न 3. ईश्वर ने प्रकृति का निर्माण कितने रूपों में किया है ? वर्णन कीजिये । 

उत्तर – 

जायसी ने ‘ पद्मावत ‘ महाकाव्य के ‘ स्तुति खण्ड में ईश्वर द्वारा रचित प्रकृति के विविध रूपों का वर्णन किया है । ईश्वर ने अग्नि , पवन , जल और मिट्टी चार तत्वों की रचना की है । उसने पृथ्वी , स्वर्ग और पाताल बनाये हैं । दिन , सूर्य , चन्द्रमा , रात्रि , नक्षत्र एवं तारागणों की पंक्तियों , धूप , शीत , छाया , बादल , बिजली आदि की रचना की है । उसने असीम समुद्र , सुमेरु एवं किष्किधा पर्वत , नदी – नाले , झरने , नग आदि बनाये हैं । उसी के द्वारा जंगल , जड़ी – मूल , ताड़ , खजूर आदि के वृक्षों का निर्माण किया गया है । जंगली जानवरों , पक्षियों , पान – फूल , औषधियों आदि की रचना करने वाले वे ईश्वर ही हैं । इस प्रकार ईश्वर ने ही प्रकृति के जड़ और चेतन तत्त्वों का निर्माण विविधि रूपों में किया है ।

विनय के पद भाव सारांश

प्रस्तुत विनय के पदों में सूरदास जी ने कहा है कि निर्गुण ब्रह्म की उपासना दुरूह होने के कारण वे सगुण की उपासना करते हैं। निर्गुणोपासक योगी ब्रह्म का अनुभव मन ही मन करके आनन्द प्राप्त कर सकता है किन्तु उसे अभिव्यक्त नहीं कर सकता। जैसे एक मूक व्यक्ति मधुर फल का रसास्वादन मन ही मन करता है किन्तु उसकी अभिव्यक्ति नहीं कर पाता, उसी प्रकार से निर्गुण ब्रह्म रूप व आकार से परे है। इसीलिए सूरदास जी सगुणोपासना को अत्यन्त सरल बताते हैं।

सूरदास जी के अनुसार परमात्मा अत्यन्त दयालु और समदर्शी हैं। वह सभी का कल्याण करते हैं। हम ही उनकी भक्ति से दूर होकर विषय-भोगों की मरीचिका में भटकते फिरते हैं। यदि हम उनकी शरण में जायें तो वह हमारा क्षण भर में उद्धार कर सकते हैं। वह बड़े-बड़े पापियों का उद्धार करने वाले हैं। जिस पर उनकी कृपादृष्टि पड़ती है, वह इस संसार सागर को पार कर जाता है।

विनय के पद संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

(1) अविगत-गति कछु कहत न आवै।

ज्यों गूंगे मीठे फल को रस, अन्तरगत ही भावै।

परम स्वाद सबही सुनिरन्तर, अमित तोष उपजावै।

मन-बानी को अगम अगोचर, सो जानै जो पावै।

रूप-रेख-गुन-जात जुगति-बिनु, निरालंब कित धावै।

सब विधि अगम विचारहि तातें, सूर सगुन पद गावै।।

शब्दार्थ – 

अविगत = जिसके विषय में कुछ ज्ञान न हो , निराकार । गति = स्थिति , स्वरूप । गूंगे = मूक , न बोल पाने वाला । रस = आनन्द । भावै = अच्छा लगता है । अन्तरगत = अन्दर ही अन्दर । परम = श्रेष्ठ । अमित = अत्यन्त । तीष = सन्तोष । अगम जहाँ पहुँचा न जा सके । अगोचर = जो दिखाई न दे , दृष्टि से परे । रूप = स्वरूप । रेख = आकृति । गुन = गुण । जात = जाति । जुगति = युक्ति । निरालम्ब = बिना आधार । धावै दौड़े । अगम = अगमनीय । तातें = इसीलिए । सगुण = साकार भगवान ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद ‘भक्तिधारा’ पाठ के महाकवि सूरदास द्वारा रचित ‘विनय के पद’ से अवतरित है ।

प्रसंग – 

साकार भक्ति के समर्थक सूर ने इस पद में निर्गुण का खण्डन करते हुए सगुण का समर्थन किया है । 

व्याख्या – 

निराकार ब्रह्म की स्थिति तथा स्वरूप के विषय में कुछ भी कहते नहीं बनता है । निर्गुण ब्रह्म की प्राप्ति से मिलने वाला आनन्द वैसा ही है , जैसा गूंगा व्यक्ति मीठे फल को खाकर उसका आनन्द तो मन ही मन अनुभव करता है किन्तु शब्दों द्वारा वर्णन नहीं कर पाता है । यह ब्रह्म की श्रेष्ठ आनन्दानुभूति सभी प्रकार से असीमित सन्तोष उत्पन्न कराती है , किन्तु वह ( ब्रह्म ) मन तथा वाणी के लिए अगम्य एवं दिखायी न देने वाला है । उसे वही जान पाता है , जो उसे प्राप्त कर लेता है । निर्गुण ब्रह्म बिना स्वरूप , आकृति , गुण तथा जाति वाला है । ऐसी स्थिति में बिना किसी आधार के मन किधर भटके ? निर्गुण ब्रह्म सभी तरह से अगमनीय है । इसलिए सूर सगुण भगवान कृष्ण की लीलाओं का गुणगान करने वाले पद गाते हैं । 

विशेष- 

(1) इस पद में निर्गुण से सगुण उपासना को उत्तम बताया गया है । (2) विषय का प्रतिपादन शुद्ध साहित्यिक ब्रजभाषा में किया गया है । (3) उदाहरण , विरोधाभास तथा अनुप्रास अलंकारों का सौन्दर्य दर्शनीय है । (4) छन्द – पद । (5) रस – शान्त ।

(2) हमारे प्रभु औगुन चित न धरौ।

समदरसी है नाम तुम्हारौ, सोई पार करौ।

इक लोहा पूजा मैं राखत, इक घर बधिक परौ।

सो दुविधा पारस नहिं जानत, कंचन करत खरौ।

इक नदिया, इक नार कहावत, मैलौ नीर भरौ।

जब दोऊ मिलि एक बरन गए, सुरसरि नाम परौ।

तन माया ज्यों ब्रह्म कहावत सूर सुमिलि बिगरौ।

कै इनको निरधार कीजिए, कै प्रन जात टरौ॥

शब्दार्थ – 

औगुन = अवगुण , बुराइयाँ । चित = मन , ध्यान । न धरौ = धारण मत करो । समदरसी = सबको समान भाव से देखने वाला । सोई = वही । इक = एक । बधिक = शिकारी , वध करने वाला । दुविधा = भेद , द्वन्द्व । पारस लोहे को छूकर सोना बना देने वाला पत्थर । कंचन = सोना । खरौ = शुद्ध । नार= नाला । मैलौ = गंदा । नीर = पानी । दोऊ = दोनों । बरन = रंग । सुरसरि = देव नदी , गंगा । ज्यों = जीव । सुमिलि = मिलकर । बिगरौ = बिगड़ गया । कै = या तो । निरधार निर्धारण , निर , निश्चय करने की क्रिया । प्रन = प्रण , प्रतिज्ञा । टरौ = टला जा रहा है ।

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद ‘भक्तिधारा’ पाठ के महाकवि सूरदास द्वारा रचित ‘विनय के पद’ से अवतरित है ।

प्रसंग – 

प्रस्तुत पद में सूरदास ने भगवान से प्रार्थना की है कि हमारी बुराइयों की ओर ध्यान मत दीजिए । आप हमारा उद्धार कर दीजिए 

व्याख्या – 

हे भगवन ! आप हमारे दुर्गुणों की ओर ध्यान मत दीजिए । हममें अनेक अवगुण हैं किन्तु आप तो भले – बुरे सबके प्रति समान भाव रखते हैं , इसलिए अपने उसी स्वभाव से हमें इस भवसागर के कष्टों से पार कर दीजिए । एक लोहा भगवान की पवित्र पूजा में प्रयोग होता है और एक लोहा जीवों का वध करने वाले शिकारी के यहाँ होता है किन्तु पारस पत्थर इनमें भेद नहीं करता है वह तो दोनों को ही शुद्ध सोना बना देता है । वैसे ही आप मेरी बुराइयों की ओर न देखकर मुझे कष्टमुक्त कर दीजिए । एक स्वच्छ जल वाली नदी होती है और एक गंदे पानी वाला नाला होता है परन्तु जब दोनों गंगा में जाकर मिल जाते हैं तो उसका नाम देव नदी गंगा पड़ जाता है । सूरदास जी कहते हैं कि ब्रह्म का अंश जीव माया से मिलने के कारण दोषमय हो गया सभी का कल्याण करने का व्रत भंग हो जायेगा । 

विशेष- 

(1) भक्त ने भगवान से अपने उद्धार की प्रार्थना की है (2) शुद्ध , साहित्यिक ब्रजभाषा में विषय को प्रस्तुत किया गया है । (3) दृष्टान्त , अनुप्रास अलंकारों का स्वाभाविक प्रयोग हुआ है । (4) पद – छन्द । (5) शान्त रस । 

(3) मो सम कौन कुटिल खल कामी।

तुम सौं कहा छिपी करुनामय, सबके अन्तरजामी।

जो तन दियौ ताहि बिसरायौ, ऐसौ नोन-हरामी।

भरि-भरि द्रोह विर्षे कौं धावत, जैसे सूकर ग्रामी।

सुनि सतसंग होत जिय आलस, विषयिनि संग बिसरामी।

श्री हरि-चरन छाँड़ि बिमुखनि की, निसि-दिन करत गुलामी।

पापी परम, अधम अपराधी, सब पतितनि मैं नामी।

सूरदास प्रभु अधम-उधारन, सुनियै श्रीपति स्वामी।।

शब्दार्थ – 

मो = मुझ , समसमान । कुटिल = टेढ़े स्वभाव वाला । खल = दुष्ट । कामी काम वासनाओं में लिप्त रहने वाला । करुणामय = दयावान । अंतरजामी = हृदय की बात जानने वाले । बिसरायौ भुला दिया । हरामी = नमक हराम , आभार न मानने वाला । वि = कामनाओं । धावत = दौड़ता है । सूकर सूअर । ग्रामी = गाँव का । जिय = हृदय में । आलस = आलस्य । संग = साथा , बिसरामी = विश्राम करने वाला , लीन रहने वाला । बिमुखनि विरोधियों की , मोह = माया को । पापी – पाप करने वाला । परम = महान । अधम = नीच , उधारन = उद्धार करने वाले । श्रीपति = विष्णु भगवान। 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद ‘भक्तिधारा’ पाठ के महाकवि सूरदास द्वारा रचित ‘विनय के पद’ से अवतरित है ।

प्रसंग – 

प्रस्तुत पद में नीचों का उद्धार करने वाले भगवान कृष्ण से परम पतित भक्त के उद्धार की प्रार्थना की गयी है । 

व्याख्या – 

भक्त भगवान से प्रार्थना करते हुए कहता है कि मेरे समान कुमार्ग पर चलने वाला दुष्ट तथा विषय – कामनाओं में लीन रहने वाला कोई नहीं होगा । सभी के हृदय की बात जानने वाले हे करुणावान प्रभु ! आपसे कुछ भी नहीं छिपा है । आपने मुझे पूजा – सेवा के लिए जो शरीर दिया था मैंने उसे भी भुला दिया है । मैं ऐसा नमक हरामी हूँ कि द्रोह से भरकर वैसे ही विषय – वासनाओं की ओर दौड़ता हूँ जैसे गाँव में सूअर गंदगी की ओर भागता है । सत्संग की बात सुनते ही मेरे हृदय में आलस्य आ जाता है । मैं भोग – विलास में लीन रहता हूँ । इस तरह मैं श्री हरि के चरणों की सेवा छोड़कर इनकी विरोधी वासनाओं की दिन – रात गुलामी करता रहता हूँ अर्थात् इन्द्रियों की इच्छा – पूर्ति में ही हर समय लगा रहता हूँ । मैं महान नीच पापकर्म करने वाला तथा अपराध करने वाला होने के कारण सभी पतितों में कुख्यात हूँ । सूरदास जी कहते हैं कि हे विष्णु भगवान ! आप मुझ नीच की पुकार सुन लीजिए । आप नीच प्राणियों का उद्धार करने वाले हैं , अत : मेरा भी उद्धार कर दीजिए । 

विशेष- 

(1) यहाँ भक्त भगवान से अपने उद्धार का निवेदन करता है । (2) शुद्ध , साहित्यिक एवं मुहावरे युक्त ब्रजभाषा में विषय का प्रभावी प्रतिपादन हुआ है । (3) अनुप्रास , पुनरुक्तिप्रकाश , उदाहरण अलंकारों की छटा अवलोकनीय है । (4) पद – छन्द । (5) शान्त रस ।

(4) जापर दीनानाथ ढरैं।

सोइ कुलीन बड़ौ सुन्दर सोई, जिहि पर कृपा करे।

कौन विभीषन रंक-निसाचर, हरि हँसि छत्र धरै।

राजा कौन बड़ौ रावन तैं, गर्बहि-गर्ब गरे।

रंकव कौन सुदामा हूँ तै, आप समान करै।

अधम कौन है अजामील तें, जम तँह जात डरै।

कौन विरक्त अधिक नारद तैं, निसि दिन भ्रमत फिरै।

जोगी कौन बड़ौ संकर तैं, ताको काम छरै।

अधिक कुरूप कौन कुबिजा तैं, हरिपति पाइ तरै।

अधिक सुरूप कौन सीता तै, जनक वियोग भरै।

यह गति-गति जानै नहि कोऊ, किहिं रस रसिक ढरै।

सूरदास भगवंत-भजन बिनु, फिरि-फिरि जठर जरै॥

शब्दार्थ – 

जापर = जिस पर । दीनानाथ = दीनों के स्वामी । सोई = वही । कुलीन = उच्च कुल वाला । जिहि = जिस पर । कृपा = अनुग्रह । रंक = गरीब । निसाचर = राक्षस । छत्र मुकुट । गर्बहि = अहंकार को । गरैगला दिया , नष्ट कर दिया । रंकव = गरीब । अधम = नीच । अजामिल — एक विख्यात पापी जिसका मरते समय अपने बेटे ‘ नारायण ‘ का नाम लेने से उद्धार हो गया । जम = यमराज , मृत्यु । विरक्त लगाव रहित । भ्रमत = घूमता । जोगी = योगी । काम = कामदेव । छरै छल , ठग लिया । कुरूप = असुन्दर । सुरूप = सौन्दर्यवान । बियोग = विरह । रसिक = आनन्द भरा । ढरै अनुगृहीत हो । जठर = जठराग्नि अर्थात् संसार में जन्म लेकर पेट की पूर्ति में परेशान रहे । 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद ‘भक्तिधारा’ पाठ के महाकवि सूरदास द्वारा रचित ‘विनय के पद’ से अवतरित है ।

प्रसंग – 

प्रस्तुत पद में बताया गया है कि जिस पर भगवान श्रीकृष्ण की कृपा हो जाय उसका सभी तरह से कल्याण हो जाता है । 

व्याख्या – 

जिसके प्रति दीनों के स्वामी श्रीकृष्ण का झुकाव (अनुग्रह) हो जाय वही उच्च कुल का हो जाता है । जिस पर वे कृपा कर देते हैं वही अत्यधिक सुन्दर हो जाता है । विभीषण से अधिक गरीब राक्षस कौन हो सकता है जिसे भगवान ने मुस्कराते हुए मुकुट पहनाकर (लंका का) राजा बना दिया । रावण से बड़ा राजा कौन हो सकता है जिसके अहंकार को भगवान विष्णु ने नष्ट कर दिया , उसका विनाश कर दिया । सुदामा से अधिक गरीब कौन है जिसे भगवान कृष्ण ने अपने समान कर दिया , अर्थात् उसे राजा बना दिया । अजामिल से नीच प्राणी कौन हो सकता है जिसके पास जाने में यमराज भी डरता था (अपने पुत्र’नारायण ‘ का नाम लेने मात्र से भगवान ने उसका उद्धार कर दिया) । नारद से अधिक लगाव रहित कौन है किन्तु भगवान की कृपा से वे दिन – रात चक्कर लगाते फिरते हैं । शिवजी से बड़ा योगी कोई नहीं है किन्तु उसे भी कामदेव ने ठग लिया । कुब्जा से असुन्दर कौन हो सकता है जो भगवान कृष्ण को पति रूप में पाकर मुक्त हो गई । सीता से.अधिक सौन्दर्यवान कौन हो सकता है जिन्हें जीवन भर वियोग का कष्ट झेलना पड़ा । इस प्रकार आनन्दमय भगवान विष्णु की स्थिति , मति को कोई नहीं जान पाता है कि वे किस भाव पर रीझ जायेंगे । सूरदास जी कहते हैं कि हे जीव , भगवान श्रीकृष्ण के भजन के बिना तुझे बार – बार जन्म के 

विशेष – 

(1) भगवान की कृपा की महिमा का वर्णन करते हुए उनकी भक्ति करने पर बल दिया गया है । (2) शुद्ध , साहित्यिक एवं विषय के अनुरूप ब्रजभाषा का प्रयोग किया गया है । (3) अनुप्रास , सभंग यमक , विन्योक्ति अलंकार का स्वाभाविक प्रयोग हुआ है । लेकर संसार की आग में जलना पड़ेगा ।

स्तुति खण्ड भाव सारांश

निर्गुण भक्ति धारा के प्रेममार्गी सूफी कवि मलिक मुहम्मद जायसी ने अपने ग्रन्थ ‘पद्मावत’ में लौकिक दाम्पत्य-प्रेम के माध्यम से अलौकिक सत्ता के प्रति प्रेम भावना व्यक्त की है। पाठ्य-पुस्तक के स्तुति खण्ड’ में कवि ने उस करतार’ का स्मरण करते हुए कहा है कि वह उसने प्रकृति को अनेक रूपों में सृजित किया है। अग्नि, जल, गगन, पृथ्वी,वायु आदि सब उसी से उत्पन्न हुए। उसने संसार में वृक्ष, नदी, सागर, पशु-पक्षी और मनुष्य आदि अनेक प्रकार के जीवों की संरचना की। उसने इनके लिए भोजन बनाया। उसने रोग, औषधियाँ, जीवन, मृत्यु, सुख,दुःख,आनन्द, चिन्ता और द्वन्द्व आदि बनाये तथा संसार में उसने किसी को राजा,किसी को सेवक, किसी को भिखारी और किसी को धनी बनाया।

स्तुति खण्ड संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या

(1) सँवरौं आदि एक करतारू। जेहँ जिउदीन्ह कीन्ह संसारू॥

कीन्हेसि प्रथम जोति परगासू। कीन्हेसि तेहिं पिरीति कवितासू॥

कीन्हेसि अगिनि पवन जल खेहा। कीन्हेसि बहुतइ रंग उरेहा॥

कीन्हेसि धरती सरग पतारू। कीन्हेसि बरन-बरन अवतारू॥

कीन्हेसि सात दीप ब्रह्मडा। कीन्हेसि भुवन-चौदहउ खंडा।

कीन्हेसि दिन दिनअर ससि राती। कीन्हेसि नखत तराइन पाँती॥

कीन्हेंसि धूप सीउ और छाहाँ। कीन्हेसि मेघ बिजु तेहि माहाँ॥

कीन्ह सबइ अस जाकर दोसरहि छाज न काहु।

पहिलेहिं तेहिक नाउँलइ, कथा कहौं अवगाहुँ।।

शब्दार्थ – 

सँवरो = स्मरण करता हूँ । आदि = सबसे पहले । करतारू = कर्ता , ईश्वर , जेहँ जिसने । जिउ = जीवन । कीन्हेसि = किया । पिरीति = प्रेम , प्रीति । कैलासू = कैलास , स्वर्ग । खेहा = मिट्टी । बहुतइ = बहुत से । उरेहा = चित्रकारी । सरग = स्वर्ग । पतारू = पाताल । विभिन्न रंगों के । अवतारू = अवतार , योनियाँ । ब्रह्माण्डा = ब्रह्माण्ड । खंडा = बरन । दिनअर = दिनकर , सूर्य । ससि = चन्द्रमा । राती = रात्रि । सीउ = शीत । बिजु बिजली । मेघ = बादल । जाकर जिसकी । छाजम शोभा । अवगाहु = अवगाहन , डूबना । 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्यांश ‘ भक्ति धारा के स्तुति खण्ड ‘ से लिया गया है । इसके रचयिता मलिक मुहम्मद जायसी हैं ।

प्रसंग – 

यहाँ कवि ने सृष्टि के विभिन्न तत्त्वों का सृजन करने वाले ईश्वरीय सत्ता का श्रद्धा भाव से स्मरण किया है । 

व्याख्या – 

मलिक मुहम्मद जायसी कहते हैं कि सबसे पहले उस एक कर्ता अर्थात् ईश्वर का स्मरण करता हूँ जिसने ( सृष्टि को ) जीवन दिया तथा संसार बनाया । उसने ही प्रथम ज्योति ( नूर ) अर्थात् पैगम्बर मुहम्मद साहब को प्रकट किया ( जन्म दिया ) । उन्हीं के प्रेम के कारण कैलास अर्थात् स्वर्ग की रचना हुई । उसने अग्नि , वायु , जल और मिट्टी ( चार तत्त्वों ) को बनाया । इन चार तत्त्वों के द्वारा उसने विभिन्न रंगों के बहुत से चित्र बनाये । आशय है कि उसने अनेक प्रकार की वस्तुओं की रचना की । उसने फिर पृथ्वी , स्वर्ग और पाताल बनाये । इसके बाद उसने विभिन्न प्रकार के जीव – जन्तुओं की रचना की । उसने सात द्वीपों को बनाकर ब्रह्माण्ड की रचना की । फिर उसने चौदह भुवन और उनके भिन्न – भिन्न विभाग बनाये । उसने दिन , सूर्य , चन्द्रमा , रात्रि बनाये और बहुत से नक्षत्रों तथा तारांगणों की पंक्तियाँ बनाईं । उसने धूप , शीत और छाया की रचना की । उसने बादलों तथा उनके ( बादलों के ) मध्य बिजली पैदा की जिस ईश्वर ने इस प्रकार की सुन्दर सृष्टि की रचना की उसकी शोभा ( यश ) को कोई दूसरा नहीं पा सकता है । इसलिए मैं सबसे पहले उसी का नाम लेकर ( स्मरण करके ) इस गम्भीर कथा में अवगाहन करता हूँ

विशेष- 

(1) विषय के अनुरूप व्यावहारिक अवधी भाषा को अपनाया गया है । (2) अनुप्रास , पुनरुक्तिप्रकाश , पद – मैत्री का सौन्दर्य दर्शनीय है । (3) रस – शान्त ।

(2) कीन्हेसि हेवँ समुंद्र अपारा। कीन्हेसि मेरु खिखिंद पहारा॥

कीन्हेसि नदी नार औझारा। कीन्हेसि मगर मछं बहुबरना॥

कीन्हेसि सीप मोंति बहुभरे। कीन्हेसि बहुतइ नग निरमरे॥

कीन्हेसि वनखंड औ जरि मूरी। कीन्हेसि तरिवर तार खजूरी॥

कीन्हेसि साऊन आरन रहहीं। कीन्हेसि पंखि उड़हि जहँ चहहीं॥

कीन्हेसि बरन सेत औ स्यामा। कीन्हेसि भूख नींद बिसरामा॥

कीन्हेसिपान फूल बहुभोगू। कीन्हेसि बहुओषद बहुरोगू॥

निमिख न लाग कर, ओहि सबइ कीन्ह पल एक।

गगन अंतरिख राखा बाज खंभ, बिनु टेक॥

शब्दार्थ – 

अपारा = असीम । मेरु = सुमेरु पर्वत । खिखिंद = किष्किन्धा । नार = नाले । झारा = झरने । बहु बरना = बहुत प्रकार के । नग = रत्न । निरमरे = निर्मल , चमचमाते । जरि मूरि = जड़ और मूल । तरिवर = वृक्ष । साउज = जानवर । आरन ही = अरण्य , जंगल । पंखि = पक्षी । सेत = श्वेत , सफेद । विसरामा = विश्राम , आराम । बहु भोगू = बहुत से भोग । ओषद = औषधि । निमिख = क्षय । ओहि = उसे । अंतरिख = अंतरिक्ष । बाजा = बिना । टेक = सहारा । 

सन्दर्भ – 

प्रस्तुत पद्यांश ‘ भक्ति धारा के स्तुति खण्ड ‘ से लिया गया है । इसके रचयिता मलिक मुहम्मद जायसी हैं ।

प्रसंग – 

यहाँ ईश्वर द्वारा की गयी सृष्टि रचना का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है । 

व्याख्या – 

उस ईश्वर ने असीम सात समुद्रों की रचना की । सुमेरु और किष्किन्धा पर्वतों को उसी ने बनाया । उसने बहुत से नदी , नाले और झरने बनाये और उनमें विभिन्न प्रकार के मगरमच्छ पैदा किये । उसने ऐसी सीपों को बनाया जिनमें मोती भरे थे और बहुत से निर्मल कान्ति वाले रत्नों की रचना उसी ने की । उसने जंगल बनाये और उनमें जड़ी – बूटियों अर्थात् जड़ एवं मूलों की रचना की । ताड़ , खजूर जैसे लम्बे वृक्षों को उसी ने बनाया । उसने ऐसे जानवर रचे जो जंगलों में रहते हैं और ऐसे पक्षी बनाये जो जहाँ चाहते हैं वहाँ उड़ते हैं । उसने सफेद और काले रंग बनाये और भूख , नींद तथा विश्राम का विधान किया । उसने पान , फूल एवं भोग की बहुत – सी वस्तुओं को बनाया । उसने बहुत – सी औषधियों और अनेक रोगों की रचना की । उस ईश्वर को यह सब करने में क्षण भर भी नहीं लगा । उसने पल भर में ही इन सभी की रचना कर दी । उसने आकाश और अंतरिक्ष को बिना किसी सहारे के ( अधर में ) ही रख दिया 

विशेष –

(1) सुमेरु’,’किष्किधा’ पर्वतों का उल्लेख हिन्दू मान्यताओं के आधार पर किया है । (2) भावानुरूप बोलचाल की अवधी भाषा का प्रयोग किया गया है । (3) अनुप्रास अलंकार एवं पद – मैत्री की सुन्दर अवलोकनीय है । (4) वर्णनात्मक शैली को अपनाया गया है । (5) छन्द – चौपाई एवं दोहा ।

(3) कीन्हेसि मानुस दिहिस बड़ाई। कीन्हेसि अन्न भुगुति तेंहि पाई॥

कीन्हेसि राजा पूँजहि राजू। कीन्हेसि हस्ति घोर तिन्ह साजू॥

कीन्हेसि तिन्ह कहँ बहुत बेरासू। कीन्हेसि कोई ठाकुर कोइ दासू॥

कीन्हेसि दरब गरब जेहिं होई। कीन्हेसि लोभ अघाइन कोई॥

कीन्हेसि जिअन सदा सब चाहा। कीन्हेसि मीच न कोई राहा॥

कीन्हेसि सुख औ कोड अनंदू। कीन्हेसि दुख चिंता औ दंदू॥

कीन्हेसि कोई भिखारि कोई धनी। कीन्हेसि संपति विपति पुनि घनी॥

कीन्हेसि कोई निभरोसी, कीन्हेसि कोई बरिआर।

छार हुते सब कीन्हेसि, पुनि कीन्हेसि सब छार॥

शब्दार्थ – 

दिहिस = दी । बड़ाई = बड़प्पन । भुगुति = भुक्ति , भोजन । पूँजहि = भोगते हैं । हस्ति = हाथी । घोर = घोड़ा । बेरासू = विलास । दरब = द्रव्य , धन । अघाइ = तृप्त , तुष्ट । जिअन = जीवन । मीचु = मृत्यु । दंदू = द्वन्द्व , क्लेष । विपति = संकट । निभरोसी = असहाय । बरिआर = बलवान । छार = मिट्टी ।

सन्दर्भ – प्रस्तुत पद्यांश ‘ भक्ति धारा के स्तुति खण्ड ‘ से लिया गया है । इसके रचयिता मलिक मुहम्मद जायसी हैं ।

प्रसंग – 

प्रस्तुत पद्यांश में ईश्वर द्वारा की गई सृष्टि रचना का विस्तृत वर्णन किया गया है । 

व्याख्या – 

उसने (ईश्वर ने) मनुष्य को उत्पन्न किया तथा उसे (अन्य प्राणियों से अधिक) बड़प्पन दिया । उसने अन्न बनाया जिससे उसको भोजन प्राप्त हुआ । उसने राजाओं को बनाया जो राज्य का भोग करते हैं । उसने उन ( राजाओं ) की शोभा के लिए हाथी घोड़े बनाये । उसने उन राजाओं के लिए बहुत – सी विलास की वस्तुएँ बनाईं । उसने किसी को स्वामी बनाया तथा किसी को दास । उसने द्रव्य ( धन ) की रचना की जिसे पाने पर गर्व हो जाता है । उसने लोभ बनाया , जिसके कारण कोई कभी संतुष्ट नहीं होता है । उसने जीवन ( प्राण ) का सृजन किया जिसे सभी सदैव चाहते हैं । उसने मृत्यु को रचा जिससे कोई नहीं बच पाता है । उसने सुख और करोड़ों तरह के आनन्द बनाये । उसने दुःख , चिन्ता और क्लेष की रचना की । उसने किसी को भिखारी तथा किसी को धनवान बनाया । उसने सम्पत्ति की रचना की तो बहुत – सी विपत्तियाँ भी बनाईं । उसने किसी को असहाय ( कमजोर ) बनाया तो किसी को बलवान । उसने सभी की रचना मिट्टी से की और सभी को मिट्टी बना दिया । 

विशेष – 

(1) इसमें ईश्वर की सृष्टि रचना , सुख – दुःख , जीवन – मरण आदि का वर्णन किया गया है । (2) व्यावहारिक अवधी भाषा में विषय का प्रतिपादन किया गया है । (3) अनुप्रास अलंकार एवं पदमैत्री की छटा दृष्टव्य है ।

सूरदास कवि परिचय 

जीवन परिचय – 

भक्त शिरोमणि सूरदास कृष्णाश्रयी शाखा के प्रतिनिधि कवि हैं । इस महाकवि का जन्म – स्थान , जन्म तिथि एवं जीवन – वृत्ति के विषय में विद्वानों में मतभेद है । कुछ विद्वान इनका जन्म आगरा के निकट रुनकता नामक ग्राम में सन् 1478 ई . मैं मानते हैं । कुछ विद्वान दिल्ली के निकट ‘ सीही ‘ नामक ग्राम में मानते हैं । उनका जन्म एक निर्धन सारस्वत ब्राह्मण परिवार में हुआ था । उनके पिता का नाम रामदास था । 

सूरदास का अन्धत्व विवादग्रस्त है । कुछ लोग इन्हें जन्मान्ध मानते हैं और कुछ इनके सजीव वर्णनों को देखकर बाद में अन्धा होने का अनुमान लगाते हैं । सूरदास एक अच्छे गायक थे । वे तन्मय होकर भजन गाया करते थे । एक बार महाप्रभु बल्लभाचार्य गऊ घाट पर रुके । सूरदास ने उनको एक पद गाकर सुनाया । बल्लभाचार्य ने इन्हें अपना शिष्य बना लिया । उन्होंने गोवर्धन पर अपने इष्टदेव श्रीनाथजी के मन्दिर के कीर्तन की सेवा सूरदास को सौंप दी । सूरदास कृष्णलीला का गायन करने लगे । अष्टछाप ‘ के कवियों में सूरदास का नाम महत्वपूर्ण है ।

सूरदास की मृत्यु गोवर्धन के पास पारासौली ‘ नामक ग्राम में सन् 1583 ई . के आस – पास हुई थी । 

रचनाएँ – 

सूरदास की 24 रचनाएँ मानी जाती हैं परन्तु प्रामाणिक रूप से सूर की निम्नलिखित तीन रचनाएँ ही उपलब्ध हैं- (1) सूरसागर – इसमें सूरदास के पद संकलित हैं । (2) सूर- सारावली – यह सूरसागर का सार रूप है , इसमें 1107 पद संकलित हैं । (3) साहित्य लहरी- इसमें रस और अलंकारों से परिपूर्ण 118 पद संकलित हैं ।

काव्यगत विशेषताएँ – 

(अ) भावपक्ष ( भाव तथा विचार ) – कृष्ण लीलाओं के अमर गायक सूरदास के काव्य में भक्ति , वात्सल्य एवं शृंगार की त्रिवेणी प्रवाहित है । उन्होंने वात्सल्य का कोना – कोना झाँका है तथा सगुण कृष्ण भक्ति का भावमय अंकन किया है । विनय , माधुर्य एवं साख्य भाव की भक्ति का मिश्रण सूर के काव्य में है । 

(ब) कलापक्ष (भाषा तथा शैली) – सूरदास ने सुललित एवं माधुर्यमयी ब्रजभाषा में काव्य रचना की है । इनकी भाषा में सरलता , तरलता , सरसता , मधुरता एवं स्वाभाविकता के सर्वत्र दर्शन होते हैं । व्यंग्य , वक्रता तथा वाग्वैदग्ध्य सूर की भाषा की विशेषताएँ हैं । सूर ने गेय पद शैली को अपनाया है । इनके पदों में भावुकता , तीव्रता एवं संगीतात्मकता का अद्भुत समन्वय है । 

साहित्य में स्थान – 

सूरदास भक्तिकाल की कृष्ण भक्तिधारा के प्रतिनिधि कवि हैं । वे वात्सल्य तथा शृंगार रस के आचार्य हैं । उनके काव्य में सभी रसों का परिपाक हुआ है । ब्रजभाषा को सुललित काव्य – भाषा बनाने का श्रेय सूरदास को है ।

मलिक मुहम्मद जायसी कवि परिचय 

जीवन परिचय – मलिक मुहम्मद जायसी निर्गुण भक्ति की प्रेममार्गी सूफी शाखा के प्रतिनिधि कवि हैं । इनके प्रेमाख्यानक प्रेम की पीर से ओत – प्रोत हैं । हिन्दी साहित्य के सच्चे साधक जायसी प्रेम काव्य में सदैव दिवाकर की भाँति दमकते रहेंगे । जायसी का जन्म सन् 1492 ई . के लगभग हुआ था । वैसे इनके जन्म स्थान एवं जन्म तिथि के बारे में सभी विद्वानों का एक मत नहीं है । इनके काव्य ग्रन्थों के आधार पर ” भौ औतार मोर नौ सदी से जायसी का जन्म नव सिदी ‘ भी माना गया है । इनके जन्म के समय भयंकर भूचाल आया था । उसी समय सूर्य ग्रहण पड़ा था । इसके बारे में उन्होंने स्वयं लिखा है कि ” आवत उधर चार विधि ठानाभा भूकम्प जंगत अकुलाना । ” कुछ विद्वान इनका जन्म स्थान रायबरेली के पास जायस नगर तथा अन्य गाजीपुर मानते हैं । जायसी ने स्वयं भी ” जायस नगर मोर अस्थानू । नगरक गाँव आदि उदयानू ” स्वीकार किया है । 19 जायसी के पिता का नाम मलिक राजे अशरफ था । इनके माता – पिता जायस के कंचाने मुहल्ले में रहते थे । माता – पिता की मृत्यु बचपन में हो जाने के कारण ये साधुओं और फकीरों के साथ रहने लगे । गुरु के विषय में वे लिखते हैं के ” सैय्यद असरफ पीर पियारा । जोहि मोहि दीन्ह पंथ उजियारा । ” की तथा ” गुरु मोहिदी सेवक में सेवा । चले उताइल जेहि कर खेवा । ” इस आधार पर ‘ सैयद अशरफ पीर ‘ एवं ‘ मोहिदी ‘ इनके गुरु थे  जायसी शरीर से कुरूप एवं हृदय से सन्त थे । इनकी एक आँख चेचक में जा चुकी थी । इन्होंने स्वयं स्वीकार किया कि ‘ मुहम्मद बार्थी दिसि तजा एक सरवन एक आँख ‘ । जायसी गाजीपुर और अमेठी महाराजा रामसिंह के आश्रय में रहे । इनकी मृत्यु अमेठी के निकट सन् 1542 ई . में हो गयी । 

रचनाएँ – 

यद्यपि जायसी की अठारह रचनाएँ मानी गयी हैं किन्तु अभी तक निम्न तीन रचनाएँ ही विख्यात हैं -1. पद्मावत – यह एक प्रबन्ध काव्य है जिसमें पद्मावती और रत्नसेन की प्रेमकथा प्रस्तुत की गयी है । इसमें आध्यात्मिक प्रेम की भावमयी अभिव्यंजना हुई है । 2. अखरावट – सृष्टि की उत्पत्ति का वर्णन करने वाले इस ग्रन्थ में आध्यात्मिक चेतना मुखरित हुई है । 3. आखिरी कलाम – इसमें मसनवी शैली में सृष्टि संहार का वर्णन किया गया है । 

काव्यगत विशेषताएँ – 

(अ) भावपक्ष ( भाव तथा विचार ) – जायसी निर्गुण प्रेममार्गी भक्ति शाखा प्रमुख कवि हैं । इन्होंने प्रेमाख्यानों के माध्यम से आध्यात्म की अभिव्यक्ति की है । जायसी ने पद्मावती को ब्रह्म सत्ता का प्रतीक माना है । इन्होंने अनेकत : पद्मावती के द्वारा परोक्ष सत्ता के संकेत किये हैं । रहस्यवाद का रमणीय अंकन इनके काव्य में हुआ है । इन्होंने लौकिक प्रेम द्वारा अलौकिक प्रेम की अभिव्यंजना की है । आत्मा प्रेम की पीर में व्याकुल रहकर परमात्मा से मिलने को आतुर रहती है । जायसी का विरह वर्णन अद्वितीय है । प्रकृति के द्वीप , वन , उपवन , नदी आदि के वर्णन में कवि भावुक हो उठे हैं । इनके काव्य में यद्यपि सभी रसों का परिपाक हुआ है किन्तु शृंगार तथा शान्त रस इनके काव्य के मूल रस हैं। 

(ब) कलापक्ष ( भाषा तथा शैली ) – जायसी ने अपनी बात को समझाने के लिए व्यावहारिक अवधी भाषा को अपनाया है । इस भाषा में अरबी – फारसी के शब्द भी आ गये हैं । इन्होंने मसनवी शैली में काव्य रचना की है । पद्मावत प्रबन्ध काव्य को खण्डों में विभाजित किया है । अन्योक्ति एवं प्रतीकात्मकता का सहारा भी इन्होंने लिया है । जायसी के काव्य में अलंकारों का सहज – स्वाभाविक प्रयोग हुआ है । उपमा , रूपक , उत्प्रेक्षा , यमक आदि अलंकारों का सौन्दर्य इनके काव्य में दिखाई पड़ता है । आपने दोहा एवं चौपाई छन्दों में काव्य रचना की है । सोरठा छन्द भी जहाँ – तहाँ मिल जाता है । 

साहित्य में स्थान – 

हिन्दू गाथाओं को मसनवी शैली में प्रस्तुत करने वाले जायसी ने सांस्कृतिक एकता का रचनात्मक प्रयास किया । ‘ पद्मावत ‘ हिन्दी साहित्य का सरस महाकाव्य है । इस प्रकार की सरसता इससे पूर्व के काव्यों में नहीं मिलती है । परवर्ती कवियों पर भी उनका व्यापक प्रभाव पड़ा है । इस प्रकार हिन्दी साहित्य में मलिक मुहम्मद जायसी का महत्त्वपूर्ण स्थान

 

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