MP Board Class 10th Social Science Solutions Chapter 1 भारत के संसाधन I

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MP Board Class 10th Social Science Solutions Chapter 1 भारत के संसाधन I

MP Board Class 10th Social Science Chapter 1 पाठान्त अभ्यास

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Social Science Chapter 1 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

सही विकल्प चुनिए 

  1. केवला देवघाना पक्षी विहार स्थित है 

(1) केरल में 

(2) राजस्थान में 

(3) पश्चिमी बंगाल में

(4) मध्यप्रदेश में ।

 

  1. कौन – सा कारक मृदा के निर्माण में सहयोगी नहीं है ?

(1) वायु और जल 

(2) सड़े – गले पेड़ – पौधे तथा जीव – जन्तु 

(3) शैल और तापमान 

(4) पानी का इकट्ठा होना । 

 

  1. आन्ध्रप्रदेश और उड़ीसा के डेल्टा क्षेत्रों तथा गंगा के मैदानों में सामान्यतः कौन – सी मिट्टी पाई जाती है । 

(1) लाल मिट्टी 

(2) जलोढ़ मिट्टी 

(3) काली मिट्टी 

(4) लैटेराइट मिट्टी । 

 

  1. मृदा संरक्षण के लिए समोच्च रेखा बन्ध बनाने की विधि प्रायः किस क्षेत्र में उपयोग में लाई जाती है ? 

(1) डेल्टा प्रदेश 

(2) पठारी प्रदेश 

(3) पहाड़ी क्षेत्र 

(4) मैदानी क्षेत्र । 

 

  1. मानव सर्वाधिक उपयोग करता है 

(1) भौम जल ‘ 

(2) महासागरीय जल 

(3) पृष्ठीय जल 

(4) वायुमंडलीय जल 

 

उत्तर -1. (1) , 2. (4) , 3. (2) , 4. (3) , 5. (3) 

 

रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए 

(1) संयुक्त वन प्रबन्धन व्यवस्था में … का महत्वपूर्ण स्थान है ।

(2) सामाजिक वानिकी योजना को … से वित्तीय सहायता प्राप्त हो रही है । 

(3) वन अग्नि नियन्त्रण परियोजना … के सहयोग से संचालित है । 

(4) वन्य जीवों की सुरक्षा एवं संरक्षण हेतु … की स्थापना की गई है । 

उत्तर- 

(1) ग्रामीण वन सुरक्षा , 

(2) विश्व बैंक , 

(3) यू.एन.डी.पी . , 

(4) राष्ट्रीय पार्क , अभ्यारण्यों समितियों । 

 

प्रश्न 3. सही जोड़ी मिलाइए  

अति लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1. मृदा अपरदन से क्या तात्पर्य है ?

उत्तर- बहते हुए जल अर्थवा बहती हुई वायु द्वारा भू – सतह से मृदा के आवरण को हटानां मृदा अपरदन कहलाता है । 

 

प्रश्न 2. मृदा संरक्षण से आप क्या समझते हैं ? 

उत्तर- मृदा अपरदन को रोकना ही मृदा संरक्षण कहलाता है । 

 

प्रश्न 3. भौम जल पाने के स्रोत क्या हैं ? 

उत्तर – कुएँ तथा ट्यूबवेल भौम जल पाने के प्रमुख स्रोत हैं । 

 

प्रश्न 4. संशोधित वन – नीति 1988 का मुख्य आधार क्या है ? 

उत्तर- पर्यावरण में स्थिरता , जीव जन्तुओं का संरक्षण एवं वनों का विकास संशोधित वन – नीति 1988 का मुख्य आधार है । 

 

प्रश्न 5. सामाजिक वानिकी योजना की सफलता का आधार क्या है ? 

उत्तर- सामाजिक वानिकी योजना की सफलता का आधार विश्व बैंक है , जिसने इस योजना हेतु वित्तीय सहायता दी है ।

 

प्रश्न 6. भारतीय वन प्रबन्ध संस्थान की स्थापना क्यों की गई है ? 

उत्तर- वन संसाधनों तथा उनके प्रबन्धन की नवीन बातों की जानकारी प्रदान करने के लिए भारतीय वन प्रबन्ध संस्थान की स्थापना की गई है । 

 

लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1. मृदा परिच्छेदिका से क्या तात्पर्य है ? स्पष्ट कीजिए । 

उत्तर- मृदा परिच्छेदिका- पूर्ण विकसित मृदाओं के लम्बवत् परिच्छेद ( कटान ) में गठन , रंग और परतें एक के ऊपर एक बिछी होती हैं । मृदा के परतों के विन्यास को मृदा परिच्छेदिका कहते हैं ( क ) ऊपरी परत को ऊपरी मृदा , ( ख ) दूसरी परत को उप मृदा , ( ग ) तीसरी परत को अपक्षयित मूल चट्टानी पदार्थ तथा ( घ ) चौथी परत में मूल चट्टानें होती है । ऊपरी परत की ऊपरी मृदा ही वास्तविक मृदा की परत है । इसकी सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसमें ह्यूमस तथा जैव पदार्थ का पाया जाना है । सबसे ऊपर ह्यूमस तथा उसके नीचे जैव तत्वों की प्रधानता होती है । दूसरी परत में उपमृदा होती है , जिसमें चट्टानों के टुकड़े , बालू , गाद और चिकनी मिट्टी होती है । तीसरी परत में अपक्षयित मूल चट्टानी पदार्थ तथा चौथी परत में मूल चट्टानी पदार्थ होते हैं । 

 

प्रश्न 2. मानव – जीवन में मृदा का क्या महत्व है ? समझाइए । 

उत्तर- मृदा मानव – जीवन का आधार है , अतः मानव – जीवन में मृदा का महत्व बहुत अधिक है । समस्त मानव जीवन मिट्टी पर निर्भर करता है । समस्त प्राणियों का भोजन प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मिट्टी से प्राप्त होता है । हमारे वस्त्रों के निर्माण में प्रयुक्त कपास , रेशम , जूट व ऊन प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से हमें मिट्टी से ही मिलते हैं , 

जैसे – भेड़ , मिट्टी पर उगी घास खाती है और हमें ऊन देती है । रेशम के कीड़े वनस्पति पर जीते हैं और वनस्पति मिट्टी पर उगती है । भारत में लाखों घर मिट्टी के बने हुए हैं । हमारा पशुपालन उद्योग , कृषि और वनोद्योग मिट्टी पर आधारित हैं । 

 

प्रश्न 3. लाल मिट्टी एवं लैटराइट मिट्टी में अन्तर स्पष्ट कीजिए । 

प्रश्न 4. जल संरक्षण के प्रमुख उपाय क्या हैं ? 

उत्तर- जल संरक्षण के प्रमुख उपाय निम्नलिखित हैं- 

( 1 ) उपलब्ध जल का उपयोग मितव्ययी रूप किया जाना चाहिए । 

( 2 ) जल के अपव्यय को नियन्त्रित किया जाना चाहिए । 

( 3 ) जल स्रोतों को सूखने से बचाने के लिए उनका उचित प्रबन्धन किया जाना चाहिए । 

( 4 ) जल स्रोतों को प्रदूषित होने से बचाना , चाहिए । 

( 5 ) वर्षा के जल के संग्रहण व उसके प्रवाह को रोकने की व्यवस्था की जानी चाहिए । 

( 6 ) जल संरक्षण हेतु वैज्ञानिक तरीकों से जल प्रबन्धन करना चाहिए ।

 

प्रश्न 5. वर्षा जल का संग्रहण क्यों जरूरी है ? 

उत्तर- भूमि पर जल का वितरण असमान है , साथ ही भारत में वर्षा सम्बन्धी कई समस्याएँ हैं । समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं । पर्याप्त पेय जल उपलब्ध नहीं हो पाता है । सिंचाई हेतु पर्याप्त जल नहीं जैसे- वर्षा का समय पर न होना , कभी वर्षा होना , कभी नहीं होना , जिससे जल सम्बन्धी कई रहता है , एवं पूरे वर्ष जल की उपलब्धता नहीं रह पाती है । अतः पूरे वर्ष मानय उपयोग हेतु पर्याप्त जल उपलब्ध रहे , इसलिए वर्षा जल का संग्रहण जरूरी है । 

 

प्रश्न 6. वनों का संरक्षण क्यों आवश्यक है ? 

उत्तर- वन प्रकृति एवं राष्ट्र की अमूल्य धरोहर है । मनुष्य ने अपने स्वार्थ के लिए वनों को साफ कर दिया है । वनों पर आधारित अनेक उद्योग भारत में फल – फूल रहे हैं । इनमें मुख्य रूप से कागज उद्योग , फर्नीचर उद्योग , औषधि निर्माण से सम्बन्धित उद्योग शामिल हैं । इनके अलावा चर्म उद्योग , इत्र , सुगंधित तेल , लाख , गोंद , बीड़ी आदि से सम्बन्धित उद्योग भी वनों वनों के संरक्षण से ही सम्भव है । अगर हम वनो का संरक्षण नहीं करेंगे तो वर्षा और अकाल एवं महामारी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है 

 

प्रश्न 7. वन आधारित उद्योगों का उल्लेख कीजिए ?

उत्तर- वन आधारित प्रमुख उद्योग निम्नलिखित हैं- 

( 1 ) वनों से प्राप्त लकड़ी , घास तथा बाँस आदि से कागज उद्योग

( 2 ) चीड़ , घूस तथा सफेद सनोवर से दियासलाई उद्योग

( 3 ) वनों से प्राप्त लाख से लाख उद्योग

( 4 ) वनों से प्राप्त मोम से मोम उद्योग

( 5 ) महुआ की छाल व बबूल से गोद उद्योग

( 6 ) चन्दन , तारपीन , केवड़ा आदि से तेल उद्योग

( 7 ) वनों में उपलब्ध विभिन्न जड़ी – बूटियों से औषधि उद्योग आदि । 

 

प्रश्न 8. वन , जलवायु को कैसे नियन्त्रित करते हैं ? 

उत्तर- वन , जलवायु को नियन्त्रित कर पर्यावरण संतुलन में सहयोग करते हैं । वन जलवायु को नियन्त्रित करने हेतु ठण्डी वायु के प्रवाह को रोकते हैं व अत्यधिक ठण्डी जलवायु होने से बचाते हैं । वन गर्म व तेज हवाओं के प्रवाह को कम कर देते हैं , जिससे जलवायु अत्यधिक गर्म नहीं हो पाती है व जलवायु समशीतोष्ण रहती है । इस प्रकार वन , जलवायु को नियन्त्रित करते हैं । 

 

प्रश्न 9. दिसम्बर , 1988 की वन – नीति की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए । 

उत्तर- 7 दिसम्बर , 1988 की नवीन वन – नीति की प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं- 

( 1 ) पहाड़ी , घाटियों व नदियों के जलग्रहण क्षेत्रों में वन बढ़ाए जाने पर विशेष ध्यान रखने की व्यवस्था की गई है । 

( 2 ) जंगलों पर आदिवासियों और गरीबों के पारम्परिक हक को बरकरार रखे जाने के प्रयास किए गए हैं । 

( 3 ) वनों की उत्पादकता बढ़ाने पर ध्यान दिया गया है । 

( 4 ) वर्तमान वनों को कटाई से बचाया गया और पर्यावरण संतुलन बनाये रखने के प्रयास किए गए । 

( 5 ) उद्योगों को रियायती दर पर वन – उत्पाद प्राप्त करने पर रोक लगाये जाने के प्रयास किए गए । 

( 6 ) ग्रामीण व आदिवासी इलाकों के लोगों को ईंधन , चारा

 

प्रश्न 10. सामाजिकवानिकी योजना क्या है ?

उत्तर- सामाजिक वानिकी योजना विश्व बैंक से वित्तीय सहायता प्राप्त कर शुरु की गई है । यह योजना वृक्षारोपण पर आधारित है । इस योजना के अन्तर्गत चक वानिकी , विस्तार वानिकी एवं शहरी वानिकी के अन्तर्गत खेतों , सड़कों , रेल लाईनों के किनारे वृक्षारोपण का कार्य किया जाता है । यह योजना इमारती लकड़ी की पूर्ति पर ध्यान दिया गया । वनों के संरक्षण व विस्तार हेतु एक सराहनीय कार्य है । इससे वनों में वृद्धि के साथ – साथ प्राकृतिक सुंदरता में भी वृद्धि होती है । 

 

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1. भारत में मिट्टियों के विभिन्न प्रकार , उनकी विशेषताएँ एवं वितरण को स्पष्ट कीजिए । 

उत्तर- भारत में मिट्टियों को निम्नानुसार वर्गीकृत किया जा सकता है

 

  1. जलोढ़ मिट्टी- 

इसे काँप , दोमट , कछारी या चीका मिट्टी कहा जाता है । यह मिट्टी हल्के भूरे रंग की होती है । इस मिट्टी में पोटाश और चूना पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है । भारत में यह मिट्टी हिमालय से निकलने वाली तीन बड़ी नदियों – सतलज , गंगा एवं ब्रह्मपुत्र और उनकी सहायक नदियों द्वारा बहाकर लाई गई है । यह मिट्टी हिमालय से निकलने वाली सतलज , गंगा तथा ब्रह्मपुत्र और उनकी सहायक नदियों की द्रोणी में स्थित पंजाब , हरियाणा , उत्तरप्रदेश , उत्तराखण्ड , बिहार , पश्चिमी बंगाल , असम , मेघालय तथा उत्तर – पूर्वी राजस्थान में मिलती है । 

 

  1. काली या रेगड़ मिट्टी- 

इस मिट्टी को रेगड़ या कपास वाली काली मिट्टी भी कहते हैं । इसका रंग गहरा काला और कणों की बनावट बारीक व घनी होती है , इसमें अधिक देर तक जल एवं नमी ठहर सकती है । इस मिट्टी में चूना , पोटाश , मैग्नीशियम , एल्युमीनियम तथा लोहा पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है । इसमें रासायनिक तत्वों की मात्रा अधिक होती है । सूख जाने पर इसमें दरारें पड़ जाती हैं । इन दरारों से इसके वायु मिश्रण में सहायता मिलती है । इसे स्वतः जुताई वाली मिट्टी भी कहा जाता है । यह मिट्टी महाराष्ट्र के विदर्भ , खानदेश एवं मराठवाड़ा , मध्यप्रदेश में , उड़ीसा के दक्षिणी भाग , कर्नाटक के उत्तरी जिलों , आन्ध्रप्रदेश के दक्षिणी और तटवर्ती भाग , तमिलनाडु के भाग तथा राजस्थान के कुछ जिलों तथा उत्तरप्रदेश के बुन्देलखण्ड संभाग में मिलती है । 

 

  1. लाल मिट्टी- 

यह मिट्टी शुष्क और तर जलवायु में प्राचीन रवेदार और परिवर्तित चट्टानों के टूट – फूट से बनती है । ताप्ती नदी घाटी में पहाड़ियों के ढालों पर लगातार अधिक गर्मी पड़ने से चट्टानों के टूटने पर उसमें मिला हुआ लोहा मिट्टी में फैल जाता है , जिससे इसका रंग लाल हो गया है । यह मिट्टी अत्यन्त रन्ध्रयुक्त है । यह अत्यन्त बारीक तथा गहरी होने पर ही उपजाऊ होती है । यह मध्यप्रदेश , झारखण्ड , पश्चिमी बंगाल , मेघालय , नागालैण्ड , उत्तरप्रदेश , राजस्थान , तमिलनाडु तथा महाराष्ट्र में मिलती है । 

 

  1. लैटेराइट मिट्टी- 

इस मिट्टी का निर्माण ऐसे भागों में हुआ है , जहाँ शुष्क व तर मौसम बारी – बारी से होता है । यह मिट्टी लैटेराइट चट्टानों की टूट – फूट से बनती है । यह मिट्टी चौरस उच्च भूमियों पर मिलती है । इस में चूना , फास्फोरस और पोटाश कम मिलता है , किन्तु बनस्पति का अंश पर्याप्त होता है । लेटराइट मिट्टी तीन प्रकार की होती है- ( 1 ) गहरी लाल लैटेराइट मिट्टी , ( 2 ) सफेद लैटेराइट मिट्टी , ( 3 ) भूगर्भीय जल वाली लैटेराइट मिट्टी । वह तमिलनाडु के पहाड़ी भागों और निचले क्षेत्रों , कर्नाटक के कुर्ग जिले , केरल राज्य के चौड़े समुद्री तट , महाराष्ट्र के रत्नागिरि जिले , पश्चिम बंगाल के बेसाल्ट और ग्रेनाइट पहाड़ियों के बीच तथा उड़ीसा के पठार के ऊपरी भागों और घाटियों में मिलती है । 

 

  1. मरुस्थलीय मिट्टी- 

यह बालू प्रधान मिट्टी है , जिसमें बालू के कण मोटे होते हैं । यह मिट्टी दक्षिण – पश्चिम मानसून द्वारा कच्छ के रन की ओर से उड़कर भारत के पश्चिमी शुष्क प्रदेश में जमा हुई है । इसमें खनिज नमक अधिक मात्रा में पाया जाता है । इस मिट्टी में गेहूँ , गन्ना , कपास , ज्वार , बाजरा , सब्जियाँ आदि पैदा की जा सकती हैं । सिंचाई की सुविधा उपलब्ध न होने पर यह बंजर पड़ी रहती है । इस प्रकार की मिट्टी शुष्क प्रदेशों में विशेषकर पश्चिमी राजस्थान , गुजरात , दक्षिणी पंजाब , दक्षिणी हरियाणा और पश्चिमी उत्तरप्रदेश में मिलती है ।

 

  1. पर्वतीय मिट्टी- 

यह मिट्टी हिमालयी पर्वत श्रेणियों पर पायी जाती है । अधिकांशतः यह मिट्टी पतली , दलदली और छिद्रमयी होती है । नदियों की घाटियों और पहाड़ी ढालों पर यह अधिक गहरी होती है । पहाड़ी ढालों के तलहटी में टरशियरीकालीन मिट्टी पाई जाती है , जो हल्की बलुई , छिछली , छिद्रमय और कम वनस्पति अंश वाली है ।

हिमालय के दक्षिणी भाग में , असम और दार्जिलिंग में , चिकनी एवं महीन मिट्टी मिलती हैं , जिसमें पत्थरों के छोटे टुकड़े अधिक तथा वनस्पति , चूना और लोहे के अंश कम पाये जाते हैं । यह चाय एवं आलू की कृषि के लिए उपयुक्त है । नैनीताल , मसूरी , चकराता आदि स्थानों के निकट चूने एवं डोलोमाइट चट्टानों से मिट्टी प्राप्त होती है , जिसमें चीड़ एवं साल के वृक्ष होते हैं ।

 

प्रश्न 2. मृदा अपरदन के कारण तथा संरक्षण के प्रमुख तरीकों की व्याख्या कीजिए । 

उत्तर- मृदा अपरदन के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं 

  1. तेज वायु प्रवाह- 

जब वायु का प्रवाह तेज होता है , तब भूमि की ऊपरी सतह से मृदा एक स्थान है दूसरे स्थान तक हवा के साथ उड़कर चली जाती है , जिससे मृदा अपरदन होता है । 

  1. तेज वर्षा- 

जब बहुत तेज वर्षा होती है तो वर्षा के सतह से मृदा बह जाती है , जिससे मृदा अपरदन होता है । 

  1. वनों का विनाश- 

मानव द्वारा बनों की अंधाधुंध कटाई के कारण भूमि की सतह से मृदा की पकड कमजोर हो जाती है व मृदा अपरदन होता है । 

  1. अनियन्त्रित चराई- 

पशुओं की अनियन्त्रित चराई के फलस्वरूप भूमि की ऊपरी सतह से मृदा की पकड़ ढीली हो जाती है तथा मृदा अपरदन होता है । 

मृदा संरक्षण के प्रमुख तरीके या उपाय- 

( 1 ) पहाड़ी एवं पर्वतीय क्षेत्रों में सीढ़ीदार खेतों में फसल उगाना । 

( 2 ) खेतों में बंधिकाएँ बनाकर नालीदार अपरदन को रोकना । 

( 3 ) शुष्क प्रदेशों में पवन की गति को रक्षकमेखला ( पेड़ – पौधों की बाड़ ) द्वारा कम करके मृदा अपरदन को रोकना चाहिए । 

( 4 ) पहाड़ी ढालों पर तथा बंजर भूमि में वृक्षारोपण करना चाहिए तथा पशुओं की चराई पर नियन्त्रण रखना चाहिए । 

( 5 ) पर्वतीय ढालों एवं ऊँचे – नीचे क्षेत्रों में बहते हुए जल का संग्रह करना चाहिए । 

( 6 ) ग्रामीण क्षेत्रों में पशुओं के लिए चारागाहों का विकास करना चाहिए । 

 

प्रश्न 3. मृदा परिच्छेदिका का नामांकित चित्र , बनाइए । 

प्रश्न 4. जल संसाधन के प्रमुख स्रोत क्या हैं , जल संसाधन का मानव जीवन में क्या महत्व है ? 

उत्तर – जल संसाधन के प्रमुख स्रोत निम्नलिखित हैं 

  1. पृष्ठीय जल – 

नदियों , झीलों व छोटे – बड़े जलाशों का जल ‘ पृष्ठीय जल ‘ कहलाता है । पृष्ठीय जल के प्रमुख स्रोत नदियाँ , झीलें , तालाब आदि हैं । भारत में नदियां व सहायक नदियाँ देश के हर भाग में पाई जाती हैं ।

  1. भौम जल- 

वर्षा – जल का कुछ भाग भूमि द्वारा सोख लिया जाता है , जिसे ‘ भौम जल ‘ कहते हैं । इसका 60 प्रतिशत भांग ही मिट्टी की ऊपरी सतह तक पहुंचता है । कृषि व वनस्पति उत्पादन में इसका योगदान महत्वपूर्ण होता है । शेष सोखा हुआ जल धरातल के नीचे अभेद्य चट्टानों तक पहुँचकर एकत्र हो जाता है । इसे कुओं व ट्यूबवेलों के द्वारा धरातल पर लाया जाता है तथा मानवीय उपयोग के अतिरिक्त कृषि भूमि की सिंचाई , बागवानी , उद्योग आदि के लिए उपयोग किया जाता है । 

  1. वायुमंडलीय जल – 

वायुमण्डलीय जल वाष्प रूप में होता है । अतः इसका उपयोग नहीं हो पाता है । 

  1. महासागरीय जल- 

देश के पश्चिम , पूर्व व दक्षिण में क्रमशः अरब सागर , बंगाल की खाड़ी और हिन्द महासागर है । इस जल का उपयोग मुख्यतः जलपरिवहन और मत्स्योद्योग में होता है । 

 

जल संसाधन का मानव जीवन में महत्व – 

जल का उपयोग मुख्यतः पीने , भोजन बनाने , सफाई हेतु तथा सिंचाई , जलविद्युत उत्पादन , उद्योग , परिवहन , मनोरंजन आदि के लिए होता है । जल का सर्वाधिक उपयोग सिंचाई के लिए किया जाता है । जल एक मूल्यवान सम्पदा है । इससे हमारी मूलभूत आवश्यकताएँ पूर्ण होती हैं । पृथ्वी पर जीवन का आधार जल ही है । वनस्पति एवं जीव – जन्तुओं के शरीर में जल का अंश प्रधान होता है । मनुष्य के शरीर में 70 प्रतिशत जल होता है । अतः जल संसाधन का मानव – जीवन में बहुत महत्व है । 

 

प्रश्न 5. जल संरक्षण क्यों आवश्यक है ? इसके उपायों का वर्णन कीजिए । 

उत्तर- जल मानव – जीवन का आधार है । बिना जल के मानव – जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है । मानव जल का विभिन्न प्रकार से उपयोग करता है । वह जल का उपयोग पीने के लिए , भोजन पकाने के लिए , विभिन्न प्रकार की वस्तुएँ निर्मित करने के लिए , सिंचाई करने के लिए करता है । इसके अतिरिक्त वह जल का उपयोग विभिन्न क्रियाओं में करता है , इसलिए जल संरक्षण आवश्यक है । 

जल संरक्षण के उपाय 

  1. वर्षा – जल को संग्रहित करके – 

जल संरक्षण हेतु वर्षा के जल का संग्रहण आवश्यक है , अतः नये तालाबों , कुओं का निर्माण कर वर्षा का जल संग्रहित किया जाना चाहिए । 

  1. उपलब्ध जल का सदुपयोग- 

हमें उपलब्ध जल का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए , जिससे जल की कमी उत्पन्न न हो व जल को संरक्षित किया जा सके । 

  1. जल स्रोतों का उचित प्रबन्धन- 

हमें जल स्रोतों को सूखने से बचाने के लिए उचित प्रबन्ध करना चाहिए , जिससे उन स्रोतों से हमेशा जल की प्राप्ति होती रहे । 

  1. जल प्रदूषण को रोकना चाहिए- 

हमें जल संरक्षण हेतु जल प्रदूषण को रोकने के लिए हर संभव प्रयास करना चाहिए व लोगों को जल प्रदूषित करने से रोकना चाहिए । 

  1. जन साधारण में जल संरक्षण के प्रति जागरूकता लाना चाहिए- 

हमें जल संरक्षण हेतु जन साधारण को जल संरक्षण का महत्व बताते हुए उन्हें जल संरक्षण हेतु जागरूक करना चाहिए । 

 

प्रश्न 6. वनों से होने वाले प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष लाभ कौन – कौन से हैं ? वर्णन कीजिए ।

उत्तर- वनों से हमें निम्नलिखित प्रत्यक्ष लाभ हैं 

  1. लकड़ी की प्राप्ति – 

वनों से प्राप्त लकड़ी एक महत्वपूर्ण ईंधन है । वृक्षों से सागौन , साल , शीशम , चीड़ , देवदार , आवनूस , चंदन आदि लकड़ी मिलती है । लकड़ी से फर्नीचर बनाया जाता है । 

  1. सहायक उपजों की प्राप्ति- 

वनों से सहायक उपजों के रुप में लाख , चमड़ा , गोंद , शहद , कत्था , मोम , छालें , बाँस व बैंत , जड़ी – बूटियाँ व जानवरों के सींग आदि मिलते हैं । ये लाभकारी उद्योगों के आधारभूत तत्व हैं । 

  1. आधारभूत उद्योगों के लिए सामग्री- 

वनों से प्राप्त लकड़ी , घास , सनोवर तथा बाँस से कागज उद्योग , चीड़ , स्यूस तथा सफेद सनोवर से दियासलाई उद्योग , लाख से लाख उद्योग , मोम से मोम उद्योग , महुआ की छालें व बबूल से गोंद , चमड़ा उद्योग , चन्दन , तारपीन और केवड़ासे तेल उद्योग , जड़ी – बूटियों व से औषधि उद्योग विकसित हुए हैं । 

  1. जानवरों के लिए चरागाह- 

वन क्षेत्र उत्तम चरागाह स्थल हैं । वनों से जानवरों के लिए । पत्तियाँ मिलती हैं । 

  1. रोजगार प्राप्ति- 

वनों पर 7.8 करोड़ व्यक्तियों की आजीविका आश्रित है । वनों से जो कहा पदार्थ मिलते हैं , उनसे बहुत से उद्योग चल रहे हैं और करोड़ों व्यक्तियों को रोजगार मिला हुआ है । 

  1. विदेशी मुद्रा की प्राप्ति- 

वनों से प्राप्त लाख , तारपीन का तेल , चन्दन का तेल , लकड़ी से बनी कलात्मक वस्तुओं को निर्यात करने से विदेशी मुद्रा मिलती है । 

  1. लघु उद्योगों में सहायक- 

वनों से प्राप्त वस्तुओं , जैसे – तेंदूपत्ता , बेंत , शहद , । आदि से लघु उद्योगों का विकास हुआ है ।

  1. सरकार को राजस्व- 

सरकार को बनों से राजस्व व रायल्टी के रूप में करोड़ों रुपये की प्राप्ति होती है । वर्तमान में यह राजस्व 670 करोड़ रुपये वार्षिक है । 

 

वनों से हमें निम्नलिखित अप्रत्यक्ष लाभ हैं 

  1. मिट्टी के कटाव में कमी- 

वनों के कारण मिट्टी की ऊपरी सतह नहीं बह पाती है । इससे मिट्टी के पोषक तत्वों में कमी नहीं होती एवं मिट्टी उपजाऊ बनी रहती है । 

  1. जलवायु को सम बनाये रखना- 

बन ठंडी वायु के प्रवाह को रोकते हैं , गरम व तेज हवाओं के प्रवाह को कम करते हैं । इससे वनक्षेत्र की जलवायु समशीतोष्ण बनी रहती है । 

  1. बाढ़ नियन्त्रण में सहायक – 

वन पानी के वेग को कम कर देते हैं , बाढ़ के पानी को सोख लेते हैं । बाढ़ का पानी वन क्षेत्रों में फैलकर धीरे – धीरे नदियों में जाता है । इससे बाढ़ नियन्त्रण होता है । 

  1. रेगिस्तान के प्रसार पर रोक – 

सरदार पटेल ने कहा था कि “ यदि रेगिस्तान के बढ़ते हुए प्रसार को रोकना है और मानव सभ्यता की रक्षा करनी है , तो वन सम्पदा के क्षय को अवश्य रोकना होगा । ” वृक्षारोपण से रेगिस्तान का प्रसार रुकता है । 

  1. वर्षा में सहायक – 

बनों को वर्षा का संचालक कहा जाता है । वन बादलों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं , जिससे वर्षा होती है । 

  1. जलस्तर में वृद्धि – 

वन देश के कुँओं , तालाबों , नदियों , झरनों आदि में पानी का स्तर बढ़ा देते हैं , जिससे इसमें पानी बना रहता है । 

  1. भूमि की उर्वराशक्ति में वृद्धि – 

पेड़ – पौधों की पत्तियाँ वन क्षेत्रों में गिरती हैं और सड़ – गल कर भूमि की उर्वराशक्ति में वृद्धि करती हैं 

  1. ऑक्सीजन की मात्रा पर प्रभाव – 

वन ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ाने में सहायक होते हैं । यदि वृक्षों के कटाव की वर्तमान स्थिति बनी रही तो वातावरण में ऑक्सीजन की कमी हो जायेगी । ऑक्सीजन के अभाव में मानव समुदाय संकट में पड़ जाएगा । इसलिए वृक्षारोपण को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए । 

9.प्राकृतिक सौन्दर्य- 

वनों से देश के प्राकृतिक सौन्दर्य में वृद्धि होती है , वन देशी व विदेशी सैलानियों को आकर्षित करते हैं । 

 

प्रश्न 7. सरकार द्वारा वन संरक्षण के लिए किये गये प्रयासों का वर्णन कीजिए ?

उत्तर- सरकार द्वारा वन संरक्षण के लिए किये गये प्रयासों में निम्नलिखित उल्लेखनीय हैं

  1. केन्द्रीय वन आयोग की स्थापना- 

केन्द्र सरकार ने सन् 1965 में केन्द्रीय वन आयोग की स्थापना की है । इसका कार्य आँकड़े व सूचनाएं एकत्रित करना , तकनीकी सूचनाओं को प्रसारित करना , बाजारों का अध्ययन करना और वन विकास में लगी संस्थाओं के कार्यों को समन्वित करना है । 

  1. भारतीय वन सर्वेक्षण संगठन- 

वनों में क्या – क्या वस्तुएँ उपलब्ध हैं , उनका पता लगाने हेतु 1971 में इस संगठन की स्थापना की गई ।

  1. वन अनुसंधान संस्थान की स्थापना- 

देहरादून में वनों से प्राप्त वस्तुओं तथा वनों के सम्बन्ध में अनुसंधान एवं शिक्षा देने के लिए इस संस्था को स्थापित किया गया । इसके चार क्षेत्रीय केन्द्र , बैंगलूर , 

  1. काष्ठ कला प्रशिक्षण केन्द्र की स्थापना – 

राज्य सरकार के वन अधिकारियों एवं कर्मचारियों को लकड़ी काटने का प्रशिक्षण देने के लिए 1965 में देहरादून में काष्ठ कला प्रशिक्षण केन्द्र स्थापित किया गया । 

  1. राज्य वन विकास निगमों की स्थापना- 

राज्यों में वनों की कटाई को ठेके पर देने की प्रथा थी । ठेकेदारी प्रथा को समाप्त कर वनों की कटाई हेतु वाणिज्यिक वन विकास निगमों की स्थापना 19 राज्यों में की गई है । 

  1. भारतीय वन प्रबन्ध संस्थान की स्थापना- 

वन संसाधन व प्रबन्धन व्यवसाय की नवीन बातों की जानकारी देने हेतु 1978 में स्वीडिश कम्पनी की सहायता से भारत के अहमदाबाद शहर में इस संस्थान की स्थापना की गई है । यहाँ पर अनुसंधान व केस स्टडी के आधार पर वन प्रबन्ध में स्नातकोत्तर व डॉक्टरेट की उपाधि प्रदान की जाती है । 

  1. वन संरक्षण अधिनियम –

1980 में भारत सरकार ने वन संरक्षण अधिनियम पारित करके किसी भी वनभूमि को सरकार की अनुमति के बिना कृषि भूमि में परिवर्तित नहीं करने का प्रावधान निश्चित किया है । सरकार ने वनों को चार वर्गों में बाँटा है । ( 1 ) सुरक्षित वन , ( 2 ) राष्ट्रीय वन , ( 3 ) ग्राम्य वन , ( 4 ) वृक्ष समूह । प्रबन्धन की दृष्टि से वनों के तीन वर्ग हैं- आरक्षित वन ( 52 प्रतिशत ) , सुरक्षित वन ( 32 प्रतिशत ) , अवर्गीकृत वन ( 16 प्रतिशत ) । 

  1. वनमहोत्सव – 

वनों के क्षेत्रफल को बढ़ाने व जनता में वृक्षारोपण की प्रवृत्ति पैदा करने के लिए भारत के तत्कालीन कृषि मंत्री के.एम. मुन्शी ने 1950 में वन महोत्सव ‘ अधिक वृक्ष लगाओ आंदोलन ‘ प्रारम्भ किया । प्रतिवर्ष देश में 1 से 7 जुलाई तक वन महोत्सव कार्यक्रम मनाया जाता है । 

 

प्रश्न 8. वन्य प्राणी संरक्षण क्यों आवश्यक है ? वन्य प्राणी संरक्षण के उपाय बताइए ।

उत्तर – वनों के साथ – साथ वन्य प्राणी भी मानव के लिए महत्वपूर्ण संसाधन हैं । वन्य प्राणियों से हमें माँस , खाल , हाथीदांत आदि प्राप्त होते हैं । वन के साथ – साथ मानव ने वन्य प्राणियों का भी बेदर्दी से विनाश किया है । इसमें वन्य जीवों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है । बाघ , सिंह , हाथी , गेंडे आदि की संख्या में निरन्तर कमी आ रही है । आने वाले कुछ ही वर्षों में वन्य प्राणियों की कुछ प्रजातियों के पूर्णतः लुप्त हो जाने का भय है । अतः पर्यावरण संतुलन के लिए वन्य प्राणी संरक्षण आवश्यक है । वन्यप्राणी संरक्षण के उपाय इस प्रकार हैं- 

( 1 ) वन्य जीवों के प्राकृतिक आवासों को बिना नुकसान पहुंचाए नियन्त्रित करना चाहिए । 

( 2 ) वन्य जीवों के शिकार पर पूर्णतः प्रतिबन्ध लगाना चाहिए । 

( 3 ) वन्य क्षेत्रों में नवीन जैव मण्डल रिजर्व की स्थापना की जानी चाहिए । 

( 4 ) लुप्त हो रहे जीवों के पुनर्विस्थापन के लिए नये राष्ट्रीय पार्क , अभ्यारण्यों की स्थापना की जाना चाहिए । 

( 5 ) वन्य जीवों के प्रति लोगों के रवैये में परिवर्तन हेतु शिक्षा एवं जागरूकता का विकास करना चाहिए । 

( 6 ) वन्य जीव प्रबन्धन की योजनाओं को कुशलता से लागू कराया जाना चाहिए ।

 

अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न 

प्रश्न 1. संसाधन क्या है ? समझाइए 

उत्तर- मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति अथवा उनको किसी कठिनाई का निवारण करने वाले या निवारण में योग देने वाले आश्रय या स्रोत को ‘ संसाधन ‘ कहते हैं । दूसरे शब्दों में , कोई वस्तु या तत्व तभी संसाधन कहलाता है , जब उससे मनुष्य की किसी आवश्यकता की पूर्ति होती है , जैसे- जल एक संसाधन है , क्योंकि इससे मनुष्यों व अन्य जीवों की प्यास बुझाती है , खेतों में फसलों की सिंचाई होती है और यह स्वच्छता प्रदान करने , भोजन पकाने आदि कार्यों में हमारे लिए आवश्यक होता है । इसी प्रकार , वे सभी पदार्थ , जो मानव की आवश्यकताओं की पूर्ति में सहायक हैं , संसाधन कहलाते हैं ।

 

प्रश्न 2. मृदा अपरदन से क्या हानियाँ हैं ? 

उत्तर- मृदा अपरदन से ये हानियाँ हैं- 

( 1 ) वनस्पति के नष्ट हो जाने के कारण सूखे की अवधि उत्पन्न हो जाती है । 

( 2 ) नदियों की तह में बालू जम जाती है , जिससे धरापरिवर्तन और बंदरगाहों का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है । 

( 3 ) उच्चकोटि की भूमि नष्ट हो जाती है एवं कृषि उत्पादन निम्न हो जाता है । 

( 4 ) कृषि योग्य भूमि के क्षेत्र में कमी आती जाती है । 

 

प्रश्न 3. पुनः पूर्ति के आधार पर संसाधनों का वर्गीकरण कीजिए । 

उत्तर- पुनः पूर्ति के आधार पर संसाधन निम्नानुसार है 

  1. पुनः पूर्ति योग्य संसाधन- 

वे संसाधन , जिनका उपयोग होने पर भी उनके गुणों को बनाये रखा जा सके , जैसे – खाद के उपयोग द्वारा कृषि भूमि को कृषि योग्य बनाये रखना है । 

  1. पुनः आपूर्तिहीन संसाधन ( एक बार उपयोगी संसाधन ) – 

वे संसाधन , जो एक बार उपयोग होने के बाद समाप्त हो जाते हैं , यथा पेट्रोल , कोयला आदि । 

  1. बारम्बार प्रयोग वाले संसाधन – 

वे संसाधन , जिनका उपयोग एक बार होने के बाद भी आवश्यक संशोधन के साथ पुनः उपयोग में लिया जाता है । जैसे- धात्विक खनिज लोहा , ताँबा आदि । 

  1. सनातन प्राकृतिक संसाधन- 

ऐसे संसाधन , जो उपयोग होने पर भी नष्ट नहीं होते । जैसे- सौर ऊर्जा , महासागर इत्यादि । 

 

प्रश्न 4. मृदा का निर्माण कैसे होता है , एवं मृदा के प्रकारों का वर्णन कीजिए । 

उत्तर – मृदा एक नवीकरणीय संसाधन है , लेकिन इसके निर्माण की प्रक्रिया बहुत धीमी है , मृदा की 1 से.मी. परत के निर्माण में सैकड़ों वर्ष लग जाते हैं । इसकी 2 से.मी. की पतली सी परत के निर्माण में 1000 वर्षों से अधिक का समय लग सकता है । मृदा – निर्माण के लिए समतल भूमि सबसे अच्छी होती है , क्योंकि इस पर मृदा के निर्माण में कम से कम बाधाएँ होती हैं ।

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