MP Board Class 10th Social Science Solutions Chapter 10 स्वतन्त्रता आन्दोलन में मध्य प्रदेश का योगदान

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MP Board Class 10th Social Science Solutions Chapter 10 स्वतन्त्रता आन्दोलन में मध्य प्रदेश का योगदान

 

MP Board Class 10th Social Science Chapter 10 पाठान्त अभ्यास

 

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Social Science Chapter 10 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

 

सही विकल्प चुनिए 

 

( 1 ) मध्यप्रदेश के किस स्वतंत्रता संग्राम सेनानी को राष्ट्रपति बनने का गौरव प्राप्त हुआ है ? 

( i ) डॉ . शंकरदयाल शर्मा 

( ii ) पं.सुन्दरलाल 

( iii ) पं . द्वारिका प्रसाद मिश्र 

( iv ) पं . शम्भूनाथ शुक्ल । 

 

( 2 ) भोपाल के विश्वविद्यालय का नाम किस स्वतंत्रता सेनानी के नाम पर रखा गया है ? 

( i ) सेठ गोविन्ददास 

( ii ) बरकतउल्लाह 

( iii ) हरीसिंह गौड़ 

( iv ) रानी दुर्गावती । 

 

( 3 ) झण्डा सत्याग्रह का प्रारम्भ मध्यप्रदेश के किस शहर से हुआ था ? 

( i ) इन्दौर 

( ii ) जबलपुर 

( ii ) सागर 

( iv ) भोपाल । 

 

उत्तर- ( 1 ) ( i ) , ( 2 ) ( ii ) , ( 3 ) ( ii ) 

 

रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए 

 

( क ) ग्राम ढीमरपुरा में हरिशंकर ब्रह्मचारी के नाम से … ने निवास किया था । 

( ख ) रानी अवन्ती बाई … जिले के रामगढ़ की रानी थीं । 

( ग ) रानी लक्ष्मीबाई ने … की मदद से ग्वालियर पर अधिकार किया था । 

 

उत्तर- 

( क ) चन्द्रशेखर आजाद , 

( ख ) मण्डला , 

( ग ) तात्या टोपे । 

 

सही जोड़ियाँ मिलाइए 

सत्य / असत्य लिखिए 

 

( i ) चरण पादुका गोलीकांड को मध्यप्रदेश का जलियाँवाला बाग के नाम से भी जाना जाता है । 

( ii ) जनसंख्या विस्फोट से संसाधनों की कमी हो जाती है । 

( ii ) विकसित देशों में अधिकांश जनसंख्या प्राथमिक क्षेत्र से जुड़ी रहती है । 

( iv ) शिक्षक डॉक्टर , वकील की सेवाएँ उत्पादन में प्रत्यक्ष रूप से योगदान देती हैं । 

( v ) भारत में रेलवे प्रणाली का प्रारंभ 1837 में हुआ । 

( vi ) टांट्या भील ब्रिटिश सरकार के लिए आतंक का पर्याय था ।

 

उत्तर- 

( i ) सत्य

( ii ) सत्य

( iii ) असत्य

( iv ) असत्य

( v ) असत्य

( vi ) सत्य

 

स्वतन्त्रता आन्दोलन से सम्बन्धित घटनाएँ अति लघु उत्तरीय प्रश्न 

 

प्रश्न 1. चन्द्रशेखर आजाद का जन्म कहाँ हुआ था ? 

उत्तर- चन्द्रशेखर आजाद का जन्म मध्यप्रदेश के अलीराजपुर जिले के भाभरा ग्राम में हुआ था ।

 

प्रश्न 2. मध्यप्रदेश में स्थापित संस्थाओं के नाम लिखिए । 

उत्तर- गुरुकुल , लोकसेवा संघ , ज्ञान प्रकाश मण्डल , हरिजन सेवक संघ आदि मध्यप्रदेश में स्थापित 

 

प्रश्न 3. आजाद हिन्द फौज के किस सेनानी का सम्बन्ध शिवपुरी जिले से था ? 

उत्तर- कर्नल गुरुबख्श सिंह ढिल्लन , जो आजाद हिन्द फौज के सेनानी थे , का सम्बन्ध शिवपुरी जिले से था । 

 

स्वतन्त्रता आन्दोलन से सम्बन्धित घटनाएँ लघु उत्तरीय प्रश्न 

 

प्रश्न 1. मध्यप्रदेश के राष्ट्रीय चेतना की जागृति हेतु प्रकाशित होने वाले समाचार – पत्रों के नाम लिखिए ।

उत्तर- मध्यप्रदेश के राष्ट्रीय चेतना की जागृति हेतु प्रकाशित होने वाले प्रमुख समाचार पत्र निम्नलिखित थे – 

कर्मवीर, अंकुश, सुबोध सिंधु ( खण्डवा ), न्याय सुधा ( हरदा ), आर्य वैभव ( बुरहानपुर ) 

, लोकमत( जबलपुर ), प्रजामण्डल पत्रिका ( इन्दौर ), सरस्वती विलास ( जबलपुर ) साप्ताहिक आवाज एवं सुबह वतन ( भोपाल ) आदि । 

 

प्रश्न 2. असहयोग आन्दोलन में मध्यप्रदेश की जनता ने अपना सहयोग किस प्रकार दिया ?

उत्तर – असहयोग आन्दोलन में मध्यप्रदेश की जनता ने शराब बन्दी , तिलक स्वराज्य फण्ड , विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार , सरकारी शिक्षण संस्थाओं का त्याग कर राष्ट्रीय शिक्षा संस्थाओं की स्थापना , हाथकरघा उद्योग की स्थापना जैसे महत्वपूर्ण कार्यों में अपना योगदान दिया । वकीलों ने वकालत त्याग दी । जो वकील न्यायालय जाना चाहते थे , उन्होंने गाँधी टोपी पहनकर न्यायालयों में प्रवेश किया । जिला समितियों ने शासकीय आज्ञाओं की अवहेलना कर भवनों पर राष्ट्रीय ध्वज फहराये । इससे लोगों की भय एवं अधीनता की मनोवृत्ति दूर हुई । इस आन्दोलन के समय मध्यप्रदेश में भी साम्प्रदायिक सद्भावना की अभूतपूर्व मिसालें देखने को मिली । 

 

प्रश्न 3. जंगल सत्याग्रह क्या था ? लिखिए । 

उत्तर- 1930 में जब गाँधीजी ने दांडी मार्च कर नमक सत्याग्रह किया था , तब सिवनी के कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने दुर्गाशंकर मेहता के नेतृत्व में जंगल सत्याग्रह चलाया । सिवनी से 9-10 मील दूर सरकारी जंगल चंदन बगीचों में घास काटकर यह सत्याग्रह किया जा रहा था । इसी सिलसिले में 9 अक्टूबर , 1930 को सिवनी जिले के ग्राम दुरिया , जो कि सिवनी से 28 मील दूर स्थित है , में सत्याग्रह की तारीख निश्चित हुई । कुछ स्वयंसेवक घास काटकर सत्याग्रह करने गए । पुलिस दरोगा और रेंजर ने सत्याग्रहियों का समर्थन करने आए जनसमुदाय के साथ बहुत अभद्र व्यवहार किया , जिससे जनता उत्तेजित हो उठी । सिवनी के डिप्टी कमिश्नर के इस हुक्म पर कि ‘ टीच देम ए लेसन ‘ पुलिस ने गोली चला दी । घटनास्थल पर ही तीन महिलाएँ गुड्डो दाई , रैना बाई , बेमा बाई और एक र बिरजू गोंड शहीद हो गए ये चारों शहीद आदिवासी थे ।

 

प्रश्न 4. झंडा सत्याग्रह किस प्रकार हुआ ? वर्णन कीजिए । 

उत्तर – भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में चरखा युक्त तिरंगे झण्डे की आन – बान – शान को लेकर एक ऐसा प्रसंग उपस्थित हो गया , जिसमें न केवल राष्ट्रीय ध्वज के प्रति सम्पूर्ण राष्ट्र की श्रद्धा और निष्ठा की मुखर अभिव्यक्ति हुई , बल्कि अंग्रेजी हुकूमत तक को उसे मान्य करने पर विवश होना पड़ा । इतिहास के इस स्वर्णिम अध्याय को ‘ झण्डा सत्याग्रह ‘ के नाम से जाना जाता है । असहयोग आन्दोलन की मानसिक तैयारी की पड़ताल के लिए गठित कांग्रेस की समिति जबलपुर आई । हकीम अजमल खाँ उसके नेता थे । जबलपुर काँग्रेस कमेटी ने तय किया कि खाँ साहेब को अभिनन्दन – पत्र भेंट किया जाएगा और जबलपुर नगरपालिका भवन पर राष्ट्रीय तिरंगा ध्वज फहराया जाएगा । यह सम्मान गोरे डिप्टी कमिश्नर को ब्रिटिश हुकूमत का अपमान व चुनौती देता हुआ प्रतीत हुआ और वह भड़क उठा । उसने पुलिस को हुक्म दिया कि तिरंगे झण्डे को न केवल उतार दिया जाये , बल्कि पैरों से कुचला जाये , जिसका परिणाम स्वाभाविक रूप से तीव्र जनाक्रोश के रूप में फूटा और आन्दोलन आरम्भ हो गया , जिसने कुछ ही महीनों में अखिल भारतीय स्वरूप ग्रहण कर लिया । अंग्रेज हुकूमत की अपमानजनक कार्यवाही के विरोध में पं . सुन्दरलाल , सुभद्रा कुमारी चौहान , नाथूराम मोदी , नरसिंह दास अग्रवाल , लक्ष्मणसिंह चौहान तथा कुछ अन्य स्वयंसेवकों ने झण्डे के साथ जुलूस निकाला । 

 

स्वतन्त्रता आन्दोलन से सम्बन्धित घटनाएँ दीर्घ उत्तरीय प्रश्न 

 

प्रश्न 1. 1857 के संग्राम में मध्यप्रदेश क्षेत्र से सम्बनि सेनानियों के योग का वर्णन कीजिए । 

उत्तर -1857 के संग्राम में मध्यप्रदेश क्षेत्र से सम्बन्धित प्रमुख सेनानी व उनका योगदान निम्नलिखित हैं 

 

  1. वीरांगना रानी अवंतीबाई – 

1857 के स्वतंत्रता संग्राम में मण्डला जिले के रामगढ़ की रानी अवंतीबाई का योगदान महत्वपूर्ण था । रानी अवंतीबाई ने हड़प नीति ‘ के विरोध में अंग्रेजों से सीधे टक्कर ले ली । इस वीरांगना ने बड़ी बहादुरी के साथ अंग्रेजों का मुकाबला किया । अंग्रेजी सेना ने रानी अवंतीबाई को घेर लिया । रानी अवंतीबाई ने स्वयं ही अपनी छाती में तलवार घोंप कर अपना बलिदान कर दिया । 

 

  1. राजा बख्तावर सिंह – 

अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह की चिंगारी प्रज्वलित होने में अमझेरा ( धार से लगभग 30 कि.मी. ) के राजा बख्तावर सिंह मालवा के पहले शासक थे , जिसने कम्पनी के शासन का अंत करने का बीड़ा उठाया था । अंग्रेजों की सेना को राजा ने कड़ी टक्कर दी , किन्तु अपने ही सहयोगियों द्वारा विश्वासघात के कारण बख्तावर सिंह गिरफ्तार किए गए । अंग्रेजों ने उन्हें इन्दौर में फाँसी पर चढ़ा दिया । 

 

  1. सआदत खाँ और भगीरथ सिलावट –

1857 के स्वतंत्रता संग्राम में इन्दौर के सआदत खाँ और भगीरथ सिलावट ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई । इन्होंने अंग्रेज सैनिक अधिकारियों का डटकर मुकाबला किया । अंग्रेजों द्वारा पकड़ लिये जाने पर इन्हें फाँसी दे दी गई । इनका बलिदान उल्लेखनीय है । 

 

  1. राजा शंकर शाह और रघुनाथ- 

1857 की क्रांति में जबलपुर की विशिष्ट भूमिका रही । रानी दुर्गावती के वंशज एवं गोंड राजघराने के वृद्ध राजा शंकरशाह व उनके युवा पुत्र रघुनाथ शाह का बलिदान अविस्मरणीय था । इन्हें बहादुर सैनिकों तथा ठाकुरों ने मिलकर अंग्रेजी सेना के विरुद्ध बगावत करने की योजना का नेता बनाया । दुर्भाग्यवश क्रियान्वयन के पूर्व ही योजना का भंडाफोड़ हो गया , फलस्वरूप अंग्रेजों ने उन दोनों को गिरफ्तार कर रेसीडेन्सी ( वर्तमान कमिश्नर कार्यालय ) ले जाया गया । मुकदमा चलाने का नाटक करके भारी भीड़ के सामने 18 सितम्बर , 1857 को पिता – पुत्र दोनों को तोप के मुँह पर बाँधकर उड़ा दिया गया । 

 

  1. दिमान देसपत बुन्देला – 

ये महाराजा छत्रसाल के वंशज थे । दिमान देसपत ने 1857-58 में अंग्रेजी फौज को कड़ी चुनौतियाँ दी । उन्होंने तात्या टोपे की मदद के लिए एक हजार बंदूकची भी भेजे थे । देसपत ने अपने बल से शाहगढ़ रियासत के फतेहपुर के इलाके पर भी कब्जा कर लिया था । देसपत की शक्ति इतनी बढ़ी हुई थी कि ब्रिटिश सरकार ने उन्हें पकड़ने के लिए 5000 रु . का इनाम घोषित कर रखा था । लम्बे संघर्ष के बाद सन् 1862 में नौगाँव के कुछ मील दूर पर वीर देसपत बुदेला मारे गए । 

 

  1. महादेव शास्त्री – 

ग्वालियर के महादेव शास्त्री एक प्रखर राष्ट्रभक्त थे , जिन्होंने शस्त्र तो नहीं उठाए , लेकिन नाना साहब पेशवा को दिए गए सहयोग के कारण उन्हें फाँसी पर चढ़ा दिया गया । महादेव शास्त्री ने ग्वालियर में तात्या टोपे के में वातावरण तैयार किया । नाना साहब पेशवा का पत्रवाहक बनकर क्रांति की जानकारी अन्य सेनानियों तक पहुंचाई । अंग्रेज सरकार ने महादेव शास्त्री की गतिविधियों को देखते हुए उन्हें गिरफ्तार कर फांसी दे दी । अमीरचन्द वाढिया को भी फाँसी दे दी गई ।

 

प्रश्न 2. सविनय अवज्ञा आन्दोलन व भारत छोड़ो आन्दोलन का मध्यप्रदेश पर क्या प्रभाव पड़ा ?

उत्तर – सविनय अवज्ञा आन्दोलन का मध्यप्रदेश पर प्रभाव – पूर्ण स्वराज्य प्राप्ति के लिए गाँधीजी के नेतृत्व में ‘ सविनय अवज्ञा आन्दोलन ‘ का आरम्भ दांडी यात्रा से हुआ । इस आंदोलन का व्यापक प्रभाव । मध्यप्रदेश में भी देखने को मिला । इस आन्दोलन के तहत मध्यप्रदेश में महिलाओं द्वारा शराब की दुकानों , अफीम के अड्डों और विदेशी वस्त्रों की दुकानों पर धावा बोला गया । विदेशी वस्त्रों की होली जलाई गई । हिन्दुओं ने छुआछूत का परित्याग करने का संकल्प लिया । सरकारी स्कूल और कॉलेज छोड़ दिये गये और सरकारी कर्मचारियों ने अपनी नौकरियों से त्यागपत्र देकर इस आन्दोलन में सहयोग दिया । इस आन्दोलन में मध्यप्रदेश के सभी वर्ग के लोगों ने अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया । 

 

मध्यप्रदेश पर भारत छोड़ो आन्दोलन का प्रभाव – 

अगस्त 1942 में देश में राजनीतिक रंगमंच पर ‘ भारत छोड़ो ‘ नामक ऐतिहासिक आन्दोलन की शुरुआत हुई । 8 अगस्त को भारत छोड़ो प्रस्ताव बम्बई में होने वाली अखिल भारतीय कांग्रेस समिति ने पारित किया । 9 अगस्त को गाँधीजी सहित सारे बड़े नेता बन्दी बनाये जा चुके थे । ऐसी स्थिति में पंडित रविशंकर शुक्ल , द्वारकाप्रसाद मिश्र सहित मध्यप्रदेश के सभी बड़े नेता दमन के नग्न तांडव का सामना करने के लिए अपने प्रदेश वापस लौट आये । प्रत्येक नगर , तहसील और ग्राम में जनता ने अपने – आपको संगठित किया और संघर्ष का सूत्रपात किया । बैतूल जिले में आन्दोलन ने उग्र रूप धारण किया । पुलिस ने गोली चलाकर दमन का प्रयास किया । मंडला , सागर , होशंगाबाद , छिंदवाड़ा , जबलपुर आदि स्थानों पर जनता ने शासकीय कार्यालयों पर हमला कर अभिलेखों को विनष्ट किया , रेल , तार के परिवहन – साधनों को छिन्न – भिन्न कर दिया । पुलिस ने यहाँ दमनकारी नीति अपनाई । जबलपुर में सेठ गोविन्द दास बन्दी बना लिये गये । इसकी प्रतिक्रियास्वरूप आन्दोलन और तेज हुआ । अतः खण्डवा , खरगोन , नरसिंहपुर , दमोह , बालाघाट सहित सभी स्थानों पर नागरिकों ने बढ़ – चढ़कर आन्दोलन में भाग लिया । 

 

प्रश्न 3. टिप्पणी लिखिए- 

( क ) बरकतउल्लाह भोपाली

( ख ) चन्द्रशेखर आजाद

( ग ) कुँवर चैनसिंह

( घ ) टांट्या भील

( ङ ) वीरांगना रानी अवंतीबाई 

( च ) ठाकुर रणमत सिंह । 

 

उत्तर- ( क ) बरकतउल्लाह भोपाली – 

स्वतंत्रता संग्राम के समय अनेक क्रान्तिकारी देश के बाहर रहकर आन्दोलन चला रहे थे जिनमें मध्यप्रदेश के मौलाना मोहम्मद बरकतउल्लाह ( भोपाल ) जैसे महान क्रान्तिकारी भी थे । उन्होंने अपने बेजोड़ साहस , देशभक्ति की अमिट लगन के साथ देश की आजादी के लिए कार्य किए । अमेरिका , जापान , काबुल में आजादी के लिए संघर्ष में उनकी भूमिका उल्लेखनीय रही । 

 

( ख ) चन्द्रशेखर आजाद – 

अमर शहीद चन्द्रशेखर आजाद का जन्म मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले के भाभरा ग्राम में हुआ । वे 14 वर्ष की अवस्था में असहयोग आन्दोलन से जुड़े । गिरफ्तार होने पर अदालत में उन्होंने अपना नाम ‘ आजाद ‘ पिता का नाम ‘ स्वतंत्रता ‘ और घर का पता ‘ जेलखाना ‘ बताया , तभी से चन्द्रशेखर के नाम के साथ ‘ आजाद ‘ जुड़ गया । ब्रिटिश सरकार के लिए आतंक का दूसरा नाम था चन्द्रशेखर आजाद । सम्पूर्ण उत्तर भारत में सशक्त क्रांति की ज्वाला धधकने तथा क्रांतिकारियों की एक पीढ़ी तैयार करने का श्रेय चन्द्रशेखर आजाद को जाता है । उत्तर भारत की पुलिस आजाद के पीछे पड़ी हुई थी । दल के कुछ साथी विश्वासघात कर चुके थे , जिससे वे चिन्तित और क्षुब्ध थे । आजाद बचते – छिपते इलाहाबाद जा पहुँचे 27 फरवरी , 1931 को वे अलफ्रेड पार्क में बैठे हुए थे । दिन के दस बज रहे थे कि पुलिस ने उन्हें घेर लिया । दोनों ओर से गोलियाँ चलने लगी । आजाद ने पुलिस के छक्के छुड़ा दिए और जब उनकी पिस्तौल में एक गोली बची थी , तब उसे अपनी कनपटी पर दागकर शहीद हो गए । 

 

( ग ) कुँवर चैनसिंह – 

नरसिंहगढ़ के राजकुमार चैनसिंह को अंग्रेजों की सीहोर छावनी के पोलिटिकल एजेंट मैडाक ने अपमानित किया । इस पर चैनसिंह ने अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष छेड़ दिया । सीहोर के वर्तमान तहसील चौराहे पर चैनसिंह तथा अंग्रेजों के बीच सन् 1824 में भीषण लड़ाई हुई । अपने मुट्ठीभर वीर साथियों सहित अंग्रेजी सेना से मुकाबला करते हुए चैनसिंह सीहोर के दशहरा बाग वाले मैदान में वीरगति को प्राप्त हुए । 

 

( घ ) टांट्या भील –

1857 के महासमर के बाद मध्यप्रदेश के पश्चिमी निमाड़ में टांट्या भील ब्रिटिश सरकार के लिए आतंक का पर्याय था । उसके साथी दोपिया और बिजनिया भी उसकी क्रांतिकारी गतिविधियों में सहभागी थे । वर्षों तक जनजीवन में घुले – मिले रहकर गुप्त ढंग से क्रान्तिकारी कार्यवाहियाँ करते रहकर उसने ब्रिटिश सरकार को कैंपा दिया था । धोखे और षड्यंत्रपूर्वक अंग्रेजों ने टांट्या को गिरफ्तार किया और नवम्बर 1886 में फाँसी पर लटका दिया । भीलों के बीच आज भी टांट्या प्रेरणास्वरूप मौजूद हैं । 

 

( ङ ) वीरांगना रानी अवंतीबाई – 

मंडला जिले के वीर सेनानियों में रामगढ़ की रानी ने भी अपनी मातृभूमि के प्रति जिस प्रेम तथा शौर्य का प्रदर्शन किया था , उसके कारण उन्हें हमारे देश की महानतम वीरांगनाओं में स्थान प्राप्त है । रामगढ़ मंडला जिले की पहाड़ियों में स्थित एक छोटा – सा नगर है । सन् 1850 में रामगढ़ के राजा लक्ष्मण सिंह की मृत्यु के उपरांत उनके एकमात्र पुत्र विक्रमजीत सिंह को मानसिक रूप से अस्वस्थ होने के कारण शासन के अयोग्य समझते हुए अंग्रेज सरकार ने शासन प्रबन्ध अपने हाथ में ले लिया । रानी ने अपना विरोध प्रकट करते हुए रामगढ़ से अंग्रेजों द्वारा नियुक्त अधिकारी को निकाल भगाया और अपने राज्य का शासन सूत्र अपने हाथ में ले लिया । अप्रैल 1858 को अंग्रेजों की सेना ने रामगढ़ पर दोनों ओर से आक्रमण किया । रानी और उनकी सेना ने अपनी शक्ति और स्थिति को देखते हुए किला खाली कर दिया और पास के जंगल में चली गई । जब वह घिर गई तो वीरंगनाओं की गौरवशाली परम्परा के अनुरूप बंदी होने की अपेक्षा मृत्यु को श्रेष्ठतर समझा और क्षणमात्र में अपने घोड़े से उतर कर अपने अंगरक्षक के हाथ से तलवार छीनकर उसे अपनी छाती में घोंप कर हँसते – हँसते मातृभूमि के लिए बलिदान दे दिया । 

 

( च ) ठाकुर रणमत सिंह –

1857 में सतना जिले के मनकहरी ग्राम के निवासी ठाकुर रणमत सिंह ने भी अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए थे । पोलिटिकल एजेंट की गतिविधियों से क्षुब्ध होकर ठाकुर रणमत सिंह ने अंग्रेजों के विरुद्ध झंडा उठाया । उन्होंने अपने साथियों के साथ चित्रकूट के जंगल में सैन्य संगठन का कार्य कर नागौद की अंग्रेजी रेजीडेन्सी पर हमला कर दिया । वहाँ के रेजीडेंट भाग खड़े हुए । ठाकुर रणमत सिंह ने कुछ दिन बाद नौगाव छावनी पर भी धावा बोला एवं बरौधा में अंग्रेज सेना की एक टुकड़ी का सफाया कर डाला । ठाकुर रणमत सिंह पर 2000 रु . का पुरस्कार घोषित किया गया । लम्बे समय तक अंग्रेजों से संघर्ष करने के पश्चात् जब रणमत सिंह अपने मित्र के घर विश्राम कर रहे थे , धोखे से उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और 1859 में फाँसी पर चढ़ा दिया ।

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