MP Board Class 10th Social Science Solutions Chapter 17 मुद्रा एवं वित्तीय प्रणाली

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MP Board Class 10th Social Science Solutions Chapter 17 मुद्रा एवं वित्तीय प्रणाली

 

MP Board Class 10th Social Science Chapter 17 पाठान्त अभ्यास

 

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Social Science Chapter 17 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

 

सही विकल्प चुनिए 

 

( 1 ) मुद्रा का प्रमुख कार्य है 

( i ) विनिमय का माध्यम 

( ii ) मूल्य संचय 

( iii ) स्थगित भुगतानों का मान 

( iv ) उपर्युक्त सभी । 

 

( 2 ) साहूकारों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है 

( i ) औद्योगिक वित्त में 

( ii ) विकास वित्त में 

( iii ) कृषि वित्त में 

( iv ) उपर्युक्त में से कोई नहीं । 

 

( 3 ) विदेशी विनिमय बैंक का प्रमुख कार्य है 

( i ) जमाएँ स्वीकार करना 

( ii ) ऋण देना 

( iii ) मुद्रा का विनिमय करना 

( iv ) उपर्युक्त सभी

 

( 4 ) वित्त विधेयक का निर्णय करना है 

( i ) वित्त मंत्री 

( ii ) प्रधान मंत्री 

( iii ) लोकसभा अध्यक्ष 

( iv ) राष्ट्रपति 

 

उत्तर- ( 1 ) iv , ( 2 ) iii , ( 3 ) iv , ( 4 ) i 

 

रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए 

 

( 1 ) एक वस्तु से दूसरी वस्तु की अदला – बदली करके आवश्यकताओं की पूर्ति करना … प्रणाली कहा जाता है । 

( 2 ) वित्तीय प्रणाली में वित्तीय संस्थाएँ धन उधार लेकर उसे अन्य जरूरतमंदों को … देती हैं । 

( 3 ) स्व – सहायता समूह में सदस्यों की अधिकतम संख्या … होती है । 

( 4 ) औद्योगिक बैंक उद्योगों को अल्पकालीन एवं दीर्घकालीन … प्रदान करती है ।

( 5 ) बचत बैंक लोगों की … को एकत्रित करती है ।

 

उत्तर- 

( 1 ) विनिमय

( 2 ) ऋण

( 3 ) 20

( 4 ) त्राण

( 5 ) बचत

 

एक वाक्य में उत्तर दीजिए 

 

( i ) हॉल मार्क किसकी गुणवत्ता प्रमाणित करता है ?

( ii ) देश में नोट छापने का कार्य किसके द्वारा किया जाता है ? 

( iii ) लैटिन भाषा में मुद्रा को कहते हैं ।

( iv ) चिटफंड प्रचलित है 

( v ) चौदह व्यापारिक बैंकों का राष्ट्रीयकरण हुआ था । 

( vi ) ICICI बैंक कौन से क्षेत्र का बैंक है । 

 

उत्तर – 

( i ) स्वर्ण आभूषण

( ii ) केन्द्रीय बैंक द्वारा

( iii ) मोमेटो

( iv ) दक्षिण भारत में 

( v ) 1969 में 

( vi ) निजी क्षेत्र का बैंक

 

मुद्रा एवं वित्तीय प्रणाली अति लघु उत्तरीय प्रश्न 

 

प्रश्न 1. वस्तु – विनिमय की प्रणाली की मुख्य समस्या क्या थी ? 

उत्तर- वस्तु विनिमय की प्रणाली की मुख्य समस्या वस्तुओं के पारस्परिक आदान – प्रदान हेतु दोहरे संयोग की थी । 

 

प्रश्न 2. ‘ चिटफंड ‘ भारत के किस हिस्से में सर्वाधिक प्रचलित है ? 

उत्तर – ‘ चिटफंड ‘ दक्षिण भारत में सर्वाधिक प्रचलित है । 

 

प्रश्न 3. बैंक तथा गैर – बैंकिंग वित्तीय कम्पनियों में मुख्य अन्तर क्या है ? 

उत्तर – बैंक से आशय उन संसाधनों से है , जो जनता की बचत को एकत्रित करती है तथा जरूरतमंद व्यक्तियों व संस्थाओं को धन उधार देती है , जबकि गैर बैंकिंग वित्तीय कम्पनियाँ लोगों से धन एकत्र कर विनियोग करती है , व उससे प्राप्त लाभ अपने सदस्यों में बाँटती है । जैसे – बीमा कम्पनियाँ । 

 

प्रश्न 4. भूमि विकास बैंक किसान को किस अवधि के ऋण देता है ? 

उत्तर- भूमि विकास बैंक किसान को 15 से 20 वर्ष की अवधि के ऋण देता है । 

 

प्रश्न 5. राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक का संक्षिप्त नाम क्या है ? 

उत्तर- राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक का संक्षिप्त नाम ‘ नाबार्ड ‘ है । 

 

प्रश्न 6. देश में नोट छापने का कार्य किस बैंक द्वारा किया जाता है ? 

उत्तर – देश में नोट छापने का कार्य ‘ केन्द्रीय बैंक द्वारा किया जाता है । 

 

प्रश्न 7. देश का पहला मोबाइल बैंक किस प्रदेश में स्थापित किया गया है ? 

उत्तर – देश का पहला मोबाईल बैंक मध्यप्रदेश ( खरगोन ) में स्थापित किया गया है । 

 

मुद्रा एवं वित्तीय प्रणाली लघु उत्तरीय प्रश्न 

 

प्रश्न 1. प्राचीन काल में किन – किन वस्तुओं का मुद्रा के रूप में प्रयोग किया जाता था ? लिखिए । 

उत्तर – प्राचीन काल में गाय , बकरी , सीप , मछली के काटों , जानवरों की खाल , हाथी दांत आदि का मुद्रा के रूप में प्रयोग किया जाता था । 

 

प्रश्न 2. साहूकारी व्यवस्था के दोषों को बताइए । 

उत्तर – साहूकारी व्यवस्था के दोष ये हैं- 

( 1 ) ऊँची ब्याज दर

( 2 ) अग्रिम ब्याज 

( 3 ) बेगार कराना 

( 9 ) हिसाब में गड़बड़ी

( 5 ) ऋण वसूली में निर्दयता आदि । 

 

प्रश्न 3. मुद्रा की परिभाषा दीजिए । 

उत्तर – प्रो. मार्शल के अनुसार , ” मुद्रा में वे सब वस्तुएँ सम्मिलित हैं , जो किसी समय अथवा स्थान पर बिना किसी संदेह अथवा जाँच के वस्तुओं एवं सेवाओं को क्रय करने तथा व्यय का भुगतान करने के रूप में स्वीकार की जाती हैं । ” प्रो . एली के अनुसार- ” मुद्रा कोई भी ऐसी वस्तु हो सकती है , जिसका विनिमय के माध्यम के रूप में स्वतंत्रतापूर्वक हस्तान्तरण होता है , जो सामान्यतः ऋण के अन्तर्गत भुगतान में स्वीकार की जाती है । ” 

 

प्रश्न 4. व्यापारिक बैंक किसे कहते हैं ? 

उत्तर – व्यापारिक उद्देश्यों के लिए अल्पकालीन ऋणों की व्यवस्था करने वाले बैंकों को व्यापारिक या वाणिज्यिक बैंक कहा जाता है । ये बैंक जनता की जमाओं को स्वीकार करने तथा उन्हें ऋण देने के अलावा बैंकिंग सम्बन्धी कार्य भी करते हैं । 

 

प्रश्न 5. वित्तीय प्रणाली से क्या तात्पर्य है ? 

उत्तर – वित्तीय संस्थाओं द्वारा.हमारी अतिरिक्त आय या बचत को जमा के रूप में अपने पास रखना तथा जिन व्यक्तियों को धन की आवश्यकता होती है , उन्हें ऋण के रूप में उधार धन देने की प्रक्रिया ‘ वित्तीय प्रणाली ‘ कहलाती हैं । अर्थात् अर्थव्यवस्था में धन या पूँजी की माँग एवं पूर्ति के मध्य समन्वय बनाए रखने प्रक्रिया को वित्तीय प्रणाली कहा जाता है । 

 

मुद्रा एवं वित्तीय प्रणाली दीर्घ उत्तरीय प्रश्न 

 

प्रश्न 1. मुद्रा के विकास पर एक लेख लिखिए । उत्तर – आज जो मुद्रा का स्वरूप देखने को मिलता है , उसके विकास का एक लम्बा इतिहास है । प्राचीन युग का मनुष्य भी अपनी आवश्यकता की सभी वस्तुओं का उत्पादन स्वयं नहीं कर सकता था । फलतः उसने अपने द्वारा उत्पादित वस्तु का दूसरे व्यक्तियों द्वारा उत्पादित वस्तुओं से बदलना प्रारम्भ किया । इसे ‘ वस्तु विनिमय ‘ के रूप में जाना जाता है । अदला – बदली की यह प्रणाली काफी समय तक चलती रही । समय के साथ – साथ वस्तु – विनिमय प्रणाली की अनेक कठिनाइयाँ सामने आई । 

 

इस प्रणाली में सबसे बड़ी कठिनाई यह थी कि कोई ऐसा व्यक्ति मिले , जो एक व्यक्ति द्वारा उत्पादित वस्तु को स्वीकार करे एवं बदले में उसकी आवश्यकता की वस्तु को उपलब्ध कराए । फलतः ऐसी वस्तुओं की खोज की गई , जो सभी व्यक्तियों को स्वीकार हो । प्रारम्भ में गाय , बकरी , सीप , मछली के कार्यो , जानवरों की खाल , हाथी दाँत आदिको मुद्रा की इकाई के रूप में अपनाया गया । किन्तु इस व्यवस्था से भी अनेक कठिनाइयाँ सामने आई , जैसे- प्रमाणीकरण का अभाव , संचय की कठिनाई आदि । इससे धातुओं के उपयोग की प्रेरणा मिली फलतः धातु का सिक्कों के रूप में उपयोग होने लगा , जिससे अनेक समस्याएँ हल हो गई । राजा एवं महाराजाओं ने जालसाजी को रोकने के लए इन सिक्कों की तौल , आकार , रंग – रूप आदि को निर्धारित किया तथा इन सिक्कों की प्रमाणिकता के लिए उन पर सरकार की मुहर लगाई जाने लगी । 

 

सोना , चाँदी , ताँबा आदि धातुओं का उपयोग व्यापक रूप से सिक्कों के रूप में किया गया । समय के साथ – साथ धातु मुद्रा की कठिनाइयाँ सामने आने लगीं । फलतः बैंकिंग व्यवस्था के साथ साथ पत्र मुद्रा का विकास हुआ । पत्र मुद्रा का विस्तार अनेक रूपों में हुआ , जैसे – लिखित प्रमाण – पत्र , प्रतिनिधि कागजी मुद्रा , परिवर्तनीय कागजी मुद्रा , अपरिवर्तनीय कागजी मुद्रा आदि । केन्द्रीय बैंक एवं व्यापारिक बैंक के विस्तार के साथ – साथ चैक , हुण्डी , ड्राफ्ट के रूप में साख मुद्राओं का विकास हुआ । वर्तमान में क्रेडिट कार्ड एवं ए.टी.एम. कार्ड के रूप में प्लास्टिक मुद्रा भी चलन में है । इस प्रकार स्पष्ट है कि वर्तमान में हम जो मुद्रा देख रहे हैं , उसका एक लम्बा इतिहास है । 

 

प्रश्न 2. स्व – सहायता समूह किसे कहते हैं ? इसके गठन के क्या – क्या उद्देश्य हो सकते हैं ? लिखिए । 

उत्तर- स्व – सहायता समूह- स्व सहायता समूह गरीब व्यक्तियों का एक स्वैच्छिक संगठन है । इन समूहों का गठन आपसी सहयोग द्वारा अपनी समस्याओं के समाधान के लिए किया जाता है । यह समूह अपने सदस्यों के बीच छोटी – छोटी बचतों को बढ़ावा देता है । इन बचतों को बैंक में जमा किया जाता है । बैंक के जिस खाते में यह राशि जमा की जाती है , वह खाता समूह के नाम होता है । सामान्यतः एक समूह के सदस्यों की अधिकतम संख्या 20 होती है । प्रायः समूह के सदस्य ऐसे व्यक्ति होते हैं , जिनकी पहुँच बैंक आदि वित्तीय संस्थाओं तक नहीं होती । 

 

अतः समूह सदस्यों को बचत की ऐसी विधि सिखाता है , जो सदस्यों की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु उपयुक्त है । समूह सदस्यों को कम ब्याज दर पर आसानी से छोटे त्राण उपलब्ध कराता है । इन समूहों ने महिला सशक्तिकरण की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है । समूह की बैंकिंग सम्बन्धित गतिविधियों का समाज के उन गरीब पिछड़े व्यक्तियों को बैंकों से जोड़ना है , जिनको अभी तक अनदेखा किया गया है । 

 

स्व – सहायता समूह के गठन के अग्रलिखित उद्देश्य हो सकते हैं- 

( 1 ) सामूहिक रूप से संगठित होकर कार्य करने की भावना का विकास करना । 

( 2 ) सदस्यों में बेहतर भविष्य के लिए बचत करने की आदत विकसित करना । 

( 3 ) सदस्यों को ऋण प्रदान करके स्वरोजगार के अवसरों का सृजन करना । 

( 4 ) सदस्यों में स्वावलम्बन की भावना का विकास करना । 

( 5 ) स्वास्थ्य , पोषण , शिक्षा और घरेलू हिंसा , जैसे – विषयों के प्रति जागृति पैदा करना 

( 6 ) सरकार , बैंक तथा अन्य स्वयंसेवी संस्थाओं की सहायता से कल्याणकारी गतिविधियों का संचालन आदि ।

 

प्रश्न 3. भारत में पायी जाने वाली निजी वित्तीय संस्थाएं कौन – कौन सी हैं ? लिखिए । 

उत्तर –

  1. साहूकार- साहूकार या महाजन वह व्यक्ति है , जो अपने ग्राहकों को समय – समय पर ऋण उपलब्ध कराता है । 

 

साहूकार दो प्रकार के होते हैं । 

( अ ) कृषक साहूकार या जमींदार तथा 

( ब ) व्यावसायिक साहूकार । 

 

कृषक साहूकार वे व्यक्ति कहलाते हैं , जो मुख्य रूप से कृषि करते हैं , लेकिन धनवान होने के कारण , धन उधार देने का कार्य सहायक व्यवसाय के रूप में करते हैं । व्यावसायिक साहूकार वे व्यक्ति कहलाते हैं , जिनका मुख्य व्यवसाय धन उधार देना ही होता है । साहूकारों के कार्य करने का तरीका बहुत सरल होता है । ये अल्पकालीन , मध्यमकालीन व दीर्घकालीन तीनों प्रकार के त्राण देते हैं । ये उत्पादन उपभोग दोनों कार्यों के लिए ऋण देते हैं । ऋण जमानत लेकर व बिना जमानत लिए दोनों प्रकार के होते हैं । साहूकारों का कृषि वित्त में महत्वपूर्ण स्थान है । आजकल साहूकार कृषि वित्त की लगभग 25 प्रतिशत आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं । साहूकार लोकप्रिय होते हुए भी बदनाम हैं । इसका प्रमुख कारण इनकी दोषपूर्ण कार्य प्रणाली है , जिसमें 

( अ ) ऊँची ब्याज दर 

( ब ) अग्रिम ब्याज 

( स ) हिसाब में गड़बड़ी 

( द ) बेगार कराना आदि बातें सम्मिलित हैं । अतः सरकार ने साहूकारों पर नियन्त्रण लगा दिया है , फिर भी ग्रामीण क्षेत्रों में इनका महत्वपूर्ण स्थान है । 

 

  1. जमींदार- इस प्रथा का प्रारम्भ 1793 में लार्ड कार्नवालिस ने बंगाल में किया था । जमींदार बड़े भू – स्वामी होते थे । इनका कार्य किसानों से लगान वसूल करना था । ये किसानों से लगान वसूल करके सरकार को देते थे । जमींदार आवश्यकता पड़ने पर किसानों को उनकी आवश्यकता पूर्ति के लिए ऋण भी दिया करते थे । इनके द्वारा किसानों को दिए गये त्राणों पर ब्याज की दर बहुत ऊँची होती थी । इनके द्वारा प्रदत्त ऋणों की शतें भी कठोर होती थीं । ये ऋण वसूली में निर्दयता का व्यवहार करते थे , जिससे किसानों का शोषण होता था । फलस्वरूप सभी राज्यों ने कानून बनाकर जमींदारी प्रथा को पूर्णतः समाप्त कर दिया है , किन्तु वर्तमान समय में भी जमींदारों द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में ऋण देने का कार्य किया जाता है । 

 

  1. चिट – फंड – 

चिट – फंड योजनाओं का दक्षिण भारत के राज्यों में लम्बा इतिहास रहा है । दक्षिण भारत के गाँवों में यह बहुत लोकप्रिय है । यहाँ यह संगठित और असंगठित दोनों रूपों में संचालित है । चिट फंड भारत मे पायी जाने वाली एक प्रकार की बचत योजना है । इसमें निर्धारित संख्या में सदस्य बनाये जाते हैं । ये सदस्य पूर्व निर्धारित समय अन्तराल के बाद एक निश्चित स्थान पर एकत्रित होकर , तयशुदा धनराशि एक स्थान पर एकत्रित करते हैं । फिर इस एकत्रित धनराशि की सदस्यों के बीच नीलामी की जाती । इस नीलामी में जो सदस्य सबसे ऊँची बोली लगाता है , उसे एकत्रित धनराशि सौंप दी जाती है । इस प्रकार की चिट – फंड योजनाएँ किसी पंजीकृत वित्तीय संस्था या कुछ मित्र या रिश्तेदार आपस में मिलकर भी चलाते हैं । उद्देश्य में भिन्नता के साथ अलग – अलग तरह की अनेक चिट – फंड योजनाएँ देश में चल रही हैं । 

 

प्रश्न 4. बैंकों के विभिन्न प्रकार कौन – कौन से हैं ? लिखिए । 

उत्तर –

1 . वाणिज्यिक या व्यापारिक बैंक – 

व्यापारिक बैंक अथवा वाणिज्यिक बैंक वे बैंक होते हैं , जो व्यापारिक उद्देश्यों के लिए अल्पकालीन ऋणों की व्यवस्था करते हैं । ये बैंक जनता की जमा राशि को स्वीकार करने तथा उन्हें ऋण देने के अलावा बैंकिंग सम्बन्धी अन्य कार्य भी करते हैं । 

 

  1. औद्योगिक बैंक- 

उद्योगों के लिए मध्यकालीन एवं दीर्घकालीन ऋणों की व्यवस्था करने वाली संस्थाएँ औद्योगिक बैंक ‘ कहलाती हैं । ये बैंक उद्योगों को अपने पास से ऋण देने के अलावा अन्य स्रोतों से पूँजी प्राप्त करने में सहयोग देते हैं । भारत में औद्योगिक विकास बैंक , औद्योगिक साख एवं निवेश निगम , औद्योगिक वित्त निगम जैसी संस्थाओं की स्थापना उद्योगों की वित्त व्यवस्था करने के लिए की गई है । 

 

  1. विदेशी विनिमय बैंक- 

विदेशी मुद्राओं का लेन – देन तथा विदेशी व्यापार के लिए वित्त की व्यवस्था करने वाली संस्थाओं को विदेशी विनिमय बैंक कहा जाता है । ये बैंक अपनी शाखाएँ विदेशों में स्थापित करती हैं , जिससे विदेशी मुद्राओं के लेन – देन का कार्य सरल हो जाता है । वर्तमान समय में विनिमय बैंक , वाणिज्य बैंकों के समान बैंकों के अन्य कार्य भी करती हैं । इसी तरह वाणिज्य बैंक भी विनिमय बैंकों के कार्य करते हैं । इसीलिए ऐसे बैंक , जो अन्य बैंकिंग कार्यों के साथ – साथ विदेशी विनिमय का लेन – देन करते हैं , ‘ विनिमय बैंक ‘ कहलाते हैं ।

 

  1. कृषि बैंक- 

कृषि व्यवस्था , व्यापार तथा उद्योग – धन्धों से भिन्न होती है । अतः इसकी ऋण सम्बन्धी आवश्यकताएँ व्यापार तथा उद्योग – धन्धों की ऋण सम्बन्धी आवश्यकताओं से भिन्न होती है । यही कारण है कि किसानों की आवश्यकता को पूरा करने के लिए कृषि बैंकों की स्थापना की गई । 

 

  1. केन्द्रीय बैंक- 

केन्द्रीय बैंक किसी भी देश की बैंकिंग प्रणाली की शीर्ष संस्था होती है । इस बैंक का जनता से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं होता । देश की मुद्रा छापने का कार्य इसी बैंक द्वारा किया जाता है । यह बैंक सरकार की बैंकर होती है । सरकार के सभी प्रकार के खातों का हिसाब रखती है तथा आवश्यकता पड़ने पर सरकार को ऋण भी देती है । यह बैंक ‘ बैंकों की बैंक ‘ है । देश के सभी बैंकों को अपनी जमा राशि का एक निश्चित प्रतिशत भाग इसके पास रखना पड़ता है । आवश्यकता पड़ने पर यह बैंक अन्य बैंकों को ऋण भी देती है । इसके अलावा यह देश में मुद्रा एवं साख की मात्रा पर नियन्त्रण रखती है । अन्य सभी बैंकों को इसके आदेशों तथा नीतियों का पालन करना पड़ता है । भारत में केन्द्रीय बैंक को ‘ रिजर्व बैंक ऑफ इण्डिया ‘ के नाम से जाना जाता है । 

 

  1. अन्तर्राष्ट्रीय बैंक- 

अन्तर्राष्ट्रीय बैंकों के अन्तर्गत उन बैंकों को सम्मिलित किया जाता है , जिनकी स्थापना अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक समस्याओं को निपटाने तथा सदस्य राष्ट्रों को आर्थिक सहायता प्रदान करने के लिए की गई है । इस दिशा में 1945 में दो संस्थाओं विश्व बैंक तथा अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की स्थापना की गयी । 

 

प्रश्न 5. मुद्रा के प्रमुख कार्यों की व्याख्या कीजिए । 

उत्तर- 

  1. विनिमय का माध्यम- 

वस्तुओं एवं सेवाओं का.क्रय – विक्रय मुद्रा के माध्यम से होता है । उत्पादक अपनी वस्तु को बेचकर मुद्रा प्राप्त करता है और तत्पश्चात् प्राप्त मुद्रा के द्वारा वह अपनी आवश्यकता की वस्तुओं को खरीदता है । 

 

  1. मूल्य का मापन- 

वर्तमान में प्रत्येक वस्तु एवं सेवा का मूल्य मुद्रा में ही मापा जाता है । बाजार में सभी वस्तुओं का मूल्य मुद्रा में ही व्यक्त किया जाता है । यह मुद्रा का महत्वपूर्ण कार्य है । 

 

  1. क्रयशक्ति का हस्तान्तरण- 

मुद्रा को एक स्थान से दूसरे स्थान पर सरलता से भेजा जा सकता है । किसी स्थान से वस्तुएँ खरीदने की स्थिति में उनके मूल्य का भुगतान मुद्रा द्वारा या बैंक ड्राफ्ट , चेक , मनीआर्डर आदि के द्वारा किया जाता है । बैंकों के माध्यम से रुपये को सरलता से एक स्थान से दूसरे स्थान को भेजा जा सकता है । 

 

  1. क्रय शक्ति का संचय- 

मनुष्य स्वभाव से भावी विपत्तियों के लिए बचत करता है मुद्रा के माध्यम से बचत करके भविष्य के लिए रखना सरल हो गया है । बैंक एवं पोस्ट ऑफिस में रुपये जमा करके क्रयशक्ति का संचय करना एक आम बात हो गई है । 

 

प्रश्न 6. कृषि को ऋण देने वाली संस्थाओं की विवेचना कीजिए । 

उत्तर – कृषि को ऋण देने वाली संस्थाएँ निम्नलिखित हैं 

( अ ) कृषि सहकारी बैंक- 

कृषि सहकारी बैंक किसानों को अल्पकालीन ऋणों की सुविधाएँ कम ब्याज की दर पर प्रदान करते हैं । भारत में सहकारी बैंकों की रचना त्रिस्तरीय है । सबसे नीचे ग्राम स्तर पर प्राथमिक सहकारी साख समिति होती है । इन समितियों के ऊपर केन्द्रीय सहकारी बैंक होते हैं , जो आवश्यकता पड़ने पर इन समितियों को ऋण देते हैं । इन केन्द्रीय सहकारी बैंकों के ऊपर राज्य सहकारी बैंक होते हैं । राज्य सहकारी बैंक जिला सहकारी बैंक की ऋण सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है । राज्य सहकारी बैंकों को जब ऋण सम्बन्धी आवश्यकता होती है , तो राष्ट्रीय कृषि तथा ग्रामीण विकास बैंक , जिसे नाबार्ड भी कहा जाता है , इनकी मदद करता है । 

 

( ब ) भूमि विकास बैंक- 

भूमि विकास बैंक किसानों को दीर्घकालीन त्राण देते हैं । ये बैंक भूमि में सुधार करने , कुआँ खोदने , नलकूप लगाने , कृषि यंत्र खरीदने , ट्रेक्टर खरीदने आदि के लिए कम ब्याज पर 15 से 20 वर्ष की अवधि तक के लिए ऋण देते हैं । चूँकि इन बैंकों द्वारा भूमि को जमानत पर ऋण दिया जाता है , अतः इनका लाभ बड़े किसानों द्वारा अधिक उठाया जा रहा है ।

 

( स ) क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक- 

क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक की स्थापना वर्ष 1975 में की गई थी । इन बैंकों स्थापना विशेषकर दूरदराज के ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों को बैंकिंग सुविधाएँ पहुँचाने के उद्देश्य से की गई है । बैंकों द्वारा छोटे एवं सीमान्त कृषकों , कृषि श्रमिकों , ग्रामीण शिल्पकारों एवं छोटे उद्यमियों को ऋण प्रदान किये जाते हैं । देश में 30 जून , 2005 से क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की 14,484 शाखाएँ कार्यरत हैं । 

 

( द ) राष्ट्रीय कृषि तथा ग्रामीण विकास बैंक- 

राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक की स्थापना कृषि विकास हेतु ऋण उपलब्ध कराने के उद्देश्य से 12 जुलाई , 1982 को की गई । इसे संक्षेप में नाबार्ड कहते है । यह ग्रामीण ऋण ढाँचा में एक शीर्ष संस्था के रूप में कार्य करती है । यह संस्था अनेक वित्तीय संस्थाओं जैसे- राज्य भूमि विकास बैंक , राज्य सहकारी बैंक , वाणिज्यिक बैंक तथा क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक को पुनर्वित्त की सुविधाएं प्रदान करती है । अपनी ऋण सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए नाबार्ड भारत सरकार , विश्व बैंक तथा अन्य संस्थाओं से धन प्राप्त करता है । 

 

अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न 

 

प्रश्न 1. बांग्लादेश के ग्रामीण बैंक पर टिप्पणी लिखिए । 

उत्तर- स्व – सहायता समूहों के माध्यम से बांग्लादेश में ग्रामीण बैंकों का एक ठोस तंत्र विकसित हुआ है । इन बैंकों में अब 60 लाख कर्जदार हैं , जो बांग्लादेश के 40,000 गाँवों में फैले हुए हैं । इस कार्यक्रम की शुरुआत सन् 1970 में मोहम्मद युनूस द्वारा की गई थी । इन ग्रामीण बैंकों ने गरीबों की ऋण सम्बन्धी जरूरतों को पूरा करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है । इसी कार्य के लिए मोहम्मद युनूस को सन् 2006 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया । 

 

प्रश्न 2. प्रमुख वित्तीय संस्थाओं में बैंक के महत्व को स्पष्ट कीजिए । 

उत्तर – आधुनिक युग में वित्तीय संस्थाओं के अन्तर्गत बैंकों का विशेष महत्व है । सामान्यतः बैंकों को लोगों का धन जमा करने और उसे जरूरतमन्दों को ऋण के रूप में देने का कार्य करने वाली संस्था के रूप में जाना जाता है । वर्तमान में सभी आर्थिक क्रियाओं को मुख्यतः बैंकों के माध्यम से किया जाता है । बैंकों का कार्य मुद्रा के लेन – देन के साथ – साथ साख का निर्माण करना भी है । सरल शब्दों में कहा जा सकता है कि बैंक मुद्रा एवं साख का व्यवसाय करने वाली संस्था है । भारत में सार्वजनिक क्षेत्र के अन्तर्गत स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया , इलाहाबाद बैंक , केनरा बैंक , बैंक ऑफ इण्डिया जैसी अनेक बैंक कार्यरत हैं । सन् 1991 के बाद निजी क्षेत्र में अनेक बैंक स्थापित किए गए हैं । 

 

जैसे- आई.सी. आई.सी.आई. ( ICICI ) बैंक , एच.डी.एफ.सी. ( HDFC ) बैंक , यू.टी.आई. ( UTI ) बैंक , इन्डस ( INDUS ) बैंक आदि निजी क्षेत्र की बैंक हैं । वर्तमान में निजी क्षेत्र में बैंकों का कार्यक्षेत्र बहुत अधिक बढ़ गया है । 

 

प्रश्न 3. ए.टी.एम. क्या है ? इसके लाभ बताइए ।

उत्तर- वर्तमान में क्रेडिट कार्ड एवं ए.टी.एम. कार्ड के रूप में प्लास्टिक मुद्रा का भी चलन है । ए.टी.एम. को अंग्रेजी में Any Time Money कहते हैं । यह एक ऐसी व्यवस्था है , जिसमें कभी भी पैसे निकाले जा सकते हैं । ए.टी.एम. कार्ड प्लास्टिक का बना होता है । इसमें धातु की एक चिप लगी रहती है । इस पर बैंक एकाउन्ट से सम्बन्धित सभी विवरण अंकित रहते हैं । ए.टी.एम. ने बैंकिंग कार्य को बहुत अधिक सरल एवं सुविधाजनक बना दिया है । ग्राहक को सबसे बड़ा लाभ यह हुआ है कि वह किसी भी समय अपने पैसे का सदुपयोग कर सकता है । न लूटपाट का डर , न खो जाने का दुःख और न सुरक्षा की चिंता ।

 

प्रश्न 4. वस्तु विनिमय प्रणाली क्या है तथा इसकी मुख्य समस्या क्या है ? इसकी दो प्रमुख कठिनाइयों को उदाहरण सहित लिखिए ।

उत्तर- प्राचीन युग का मनुष्य अपनी आवश्यकता की सभी वस्तुओं का उत्पादन स्वयं नहीं कर सकता था । परिणामस्वरूप उसने अपने द्वारा उत्पादित वस्तु का दूसरे व्यक्तियों द्वारा उत्पादित वस्तुओं से बदलना प्रारंभ किया । इसे वस्तु – विनिमय के रूप में जाना जाता है । संक्षेप में एक वस्तु से दूसरी वस्तु की अदला बदली करके आवश्यकताओं की पूर्ति करना ‘ वस्तु – विनिमय प्रणाली ‘ कहा जाता है । अदला – बदली या वस्तु विनिमय की यह प्रणाली काफी समय तक चलती रही । समय बदलने के साथ वस्तु विनिमय प्रणाली की अनेक कठिनाइयाँ सामने आई । इस प्रणाली में सबसे बड़ी कठिनाई यह थी कि कोई ऐसा व्यक्ति मिले , जो एक व्यक्ति द्वारा उत्पादित वस्तु को स्वीकार करे एवं बदले में उसकी आवश्यकता की वस्तु को उपलब्ध कराए । 

 

इसके लिए ऐसी वस्तुओं की खोज की गई , जो सभी व्यक्तियों को स्वीकार हो । प्रारंभ में गाय , बकरी , सीप मछली के काँटों , जानवरों की खाल , हाथी दाँत आदि को मुद्रा की इकाई के रूप में अपनाया गया । परन्तु इस व्यवस्था में भी अनेक कठिनाइयाँ सामने आई । उदाहरण के लिए , प्रमाणीकरण का अभाव , संचय की कठिनाई आदि । इससे धातुओं के उपयोग की प्रेरणा मिली । परिणामतः धातु का सिक्कों के रूप में उपयोग होने लगा , जिससे अनेक समस्याएं हल हो गई । 

 

प्रश्न 5. राष्ट्रीय कृषि तथा ग्रामीण विकास बैंक की स्थापना किस उद्देश्य से की गई । 

उत्तर- राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक की स्थापना कृषि विकास हेतु ऋण उपलब्ध कराने के उद्देश्य से 12 जुलाई सन् 1982 से कार्य कर रहा है ।

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