MP Board Class 10th Social Science Solutions Chapter 2 भारत के संसाधन II

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MP Board Class 10th Social Science Chapter 2 पाठान्त अभ्यास

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Social Science Chapter 2 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

 

सही विकल्प चुनिए 

(1) भारत में सर्वाधिक रबड़ का उत्पादन होता है 

(i) केरल में 

(ii) तमिलनाडु में 

(iii) असम में 

(iv) कर्नाटक में । 

 

(2) नीली क्रान्ति का सम्बन्ध है 

(i) फलोत्पादन से

(ii) मछली उत्पादन से

(iii) भेड़ पालन से 

(iv) दुग्ध उत्पादन से । 

 

(3) लौह अयस्क का प्रकार नहीं है 

(i) हेमेटाइट 

(ii) मेगनेटाइट 

(iii) साइडेराइट 

(iv) बाक्साइट । 

 

(4) मध्यप्रदेश किस खनिज के उत्पादन में भारत में प्रथम स्थान रखता है ? 

(i) लोहा 

(ii) अभ्रक 

(iv) हीरा । 

(iii) सोना

 

उत्तर- (1) (i) , (2) (ii) , (3) (iv) , (4) (iv)

 

रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए 

(1) पीत क्रान्ति का सम्बन्ध ……….. 

(2) श्वेत क्रान्ति द्वारा भारत में …… को बढ़ावा मिला है । 

(3) प्रति हेक्टेयर गेहूं का सर्वाधिक उत्पादन करने वाला राज्य … है 

(4) सोयाबीन उत्पादन में प्रथम स्थान प्राप्त भारतीय राज्य … है

 

उत्तर- 

(1) खाद्य तेल एवं तिलहन उत्पादन

(2) दूध उत्पादन

(3) उत्तरप्रदेश

(4) मध्यप्रदेश । 

 

प्रश्न 3. सही जोड़ी मिलाइए 

भारत के संसाधन (II) लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1. खाद्यान्न फसलों से क्या तात्पर्य है ? खरीफ व रबी में अन्तर स्पष्ट कीजिए ।

उत्तर – खाद्यान्न फसलें – खाद्यान्न फसलों से आशय उन फसलों से है , जो भोजन के लिए मुख्य पदार्थ का कार्य करती हैं । 

जैसे- चावल , गेहूँ , ज्वार , मक्का , बाजरा , चना , अरहर आदि । 

खरीफ व रबी की फसल में निम्नलिखित अन्तर हैं – 

प्रश्न 2. हरित क्रांति से आप क्या समझते हैं ? 

उत्तर- स्वतंत्रता के पश्चात् भारत को विदेशों से खाद्यान्न का आयात करना पड़ता था । सन् 1961 में कृषि वैज्ञानिकों ने इस समस्या की ओर ध्यान दिया । देश में अधिक उपज देने वाले बीजों की किस्मों में सुधार , गहरी जुताई , मिट्टी – परीक्षण , सिंचाई सुविधा में वृद्धि , रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग तथा कीटनाशक दवाइयों का प्रयोग करते हुए कृषि के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी परिवर्तन किया गया , जिसे हरित क्रांति कहते हैं । कुछ वर्षों में भारत खाद्यान्न का निर्यात भी करने लग गया । हरित क्रांति का सफलतम प्रयोग पहले हरियाणा और पंजाब में किया गया । उसके बाद समूचे देश में लागू किया । हरित क्रांति के द्वारा भारत में अधिक पैदावार देने वाली गेहूँ की किस्में विकसित की गई । गेहूँ के पश्चात् चावल , मक्का व ज्वार की किस्मों में भी सुधार किया गया । इस प्रकार हरित क्रांति ने देश को खाद्यान्न में आत्मनिर्भर बना दिया । 

 

प्रश्न 3. श्वेत क्रांति व पीत क्रांति में अंतर स्पष्ट कीजिए ।

उत्तर- (1) श्वेत क्रांति का सम्बन्ध दूध उत्पादन से है , जबकि पीत क्रांति का सम्बन्ध खाद्य तेल और तिलहन फसलों से है । (2) श्वेत क्रांति का उद्देश्य दूध उत्पादन में वृद्धि है , जबकि पीत क्रांति का उद्देश्य खाद्य तेल और तिलहन फसलों के उत्पादन में वृद्धि करना है ।

 

प्रश्न 4. औषधीय उद्यान विधि के प्रमुख घटक कौन – कौन से हैं ? 

उत्तर- औषधीय उद्यान विधि के प्रमुख घटक , फल , सब्जियां , फूल – मसालें , औषधीय व सुगंधित पौधे हैं , जिनका उपयोग विभिन्न प्रकार से औषधी के रूप में किया जाता है । 

 

प्रश्न 5. औषधीय उद्यान विधि के अंतर्गत कौन – कौन सी फसलों का उत्पादन संभव है ? लिखिए । 

उत्तर – औषधीय उद्यान विधि के अन्तर्गत निम्नलिखित फसलों का उत्पादन संभव है – 

 

  1. फल- 

भारत में उष्ण कटिबंधीय फलों के अंतर्गत आम , कतरेलों , नींबू , अनन्नास , पपीता , अमरुद , चीकू , लीची , अंगूर तथा शीतोष्ण कटिबंधीय फलों में सेब , आडु , नाशपाती , खूबानी , बादाम , अवरोट और शुष्क क्षेत्र के फलों में आंवला , बेर , अनार और अंजीर का उत्पादन होता है ।

 

  1. सब्जियाँ- 

सब्जियों की पैदावार में चीन के बाद दूसरा स्थान भारत का है । भारत में उगाई जाने वाली प्रमुख टमाटर , प्याज , बैंगन , पत्तागोभी , फूल गोभी , मटर , आलू व खीरा है । 

 

  1. फूल- 

गुलाब , ग्लैडियोला , ट्यूब रोज , कोसाद्रो प्रमुख फूल है । इनकी खेती भारत में परम्परागत ढंग से हो रही है । 

 

  1. मसाले- 

भारत मसालों का घर कहा जाता है । यहाँ काली मिर्च , इलायची , अदरक , लहसुन , हल्दी , मिर्च के साथ – साथ बीज वाले मसालों का उत्पादन होता है । भारत मसालों में सबसे बड़ा उत्पादक उपभोक्ता एवं निर्यातक देश है । 

 

  1. औषधीय व सुगंधित पौधे- 

लगभग 2000 देशी प्रजातियों का औषधि के रूप में एवं 1300 प्रजातियों को सुगंधित एवं महक देने वाले पौधों के रूप में चिन्हित किया गया है । 

 

प्रश्न 6. उद्यानिकी विकास कार्यक्रम के प्रमुख प्रावधान बताइए । 

उत्तर- 

(1) कलम बैंक स्थापित करना , पर्याप्त गुणवत्ता वाले पौधों का उत्पादन एवं पूर्ति क्षमता बढ़ाना । 

(2) बागवानी फसलों के उत्पादन और उत्पादकता में वृद्धि करना । 

(3) मिट्टी एवं पत्तियों के परीक्षण हेतु प्रयोगशालाएँ , पौध शालाएँ , पाली हाऊस , ग्रीन हाऊस की सुविधाएँ बढ़ाना । 

(4) निर्यात के लिए उच्च किस्म की बागवानी फसलों का उत्पादन बढ़ाना । 

(5) उच्च किस्म के प्रसंस्करण उत्पादों की पैदावार बढ़ाना । 

(6) विपणन एवं निर्यात के लिए मूलभूत सुविधाओं में वृद्धि करना । 

 

प्रश्न 7. खनिज पदार्थ का क्या महत्व है ?

उत्तर – आधुनिक औद्योगिक उन्नति का आधार खनिज पदार्थ ही हैं । कारखानों में लगी मशीनें , पानी पर तैरते जहाज , ऊँची इमारतें , विभिन्न प्रकार के अस्त्र – शस्त्र , सिक्के व हमारे उपयोग में आने वाली धातु से बनी सभी वस्तुएँ खनिज पदार्थों की देन हैं । देश के औद्योगिक विकास का आधार विभिन्न प्रकार के खनिज पदार्थ ही हैं । यदि मानव समाज के पास धातुएँ व अन्य खनिज न होते , तो आज औद्योगिक उत्पादन व विकास बहुत कम होता । प्राचीन समय में जब मनुष्य धातुओं व शक्ति के साधनों से परिचित न था , वह पत्थर व अन्य कठोर वस्तुओं का उपयोग अपने लिए करता था । कालान्तर में उसे लोहा व कोयला की पहचान व उपयोगिता का ज्ञान हुआ । आज मनुष्य को नाना प्रकार के खनिज पदार्थों का ज्ञान है । हर देश अपने औद्योगिक विकास के लिए आवश्यक खनिज पदार्थों का आयात कर रहा है । 

 

प्रश्न 8. धातु के आधार पर खनिज पदार्थों के कौन – कौन से प्रकार हैं ? 

उत्तर- 

  1. धात्विक खनिज – 

वे खनिज पदार्थ , जिनमें धातु पर्याप्त मात्रा में मिलती है । जैसे – लोहा , मैगनीज , क्रोमाइट , टंगस्टन , बेरिल आदि लौह धातुएँ हैं । अलौह धातुएँ – ताँबा , सोना , चाँदी , सीसा , टिन , जस्ता , बॉक्साइट आदि हैं । 

 

  1. अधात्विक खनिज – 

ऐसे खनिज पदार्थ , जिनमें धातु नहीं पाई जाती है । जैसे- हीरा , अभ्रक , कोयला , नमक , जिप्सम , चूने का पत्थर आदि ।

 

प्रश्न 9. आधुनिक युग में लौहे का क्या महत्व है ? 

उत्तर – आधुनिक युग में लौहे का बहुत महत्व है । वर्तमान में लोहे के बिना किसी राष्ट्र की आर्थिक प्रगति नहीं हो सकती । मानव जीवन इतना सरल व सुविधाजनक नहीं हो सकता है , क्योंकि मानव उपयोग छोटी से छोटी वस्तु , अर्थात् सुई से लेकर बड़ी – बड़ी वस्तुओं , जैसे – मशीनें , ट्रक , हवाईजहाज , जहाज , रेल आदि की कल्पना नहीं की जा सकती है । अतः आधुनिक युग में लोहे का बहुत महत्व है । 

 

भारत के संसाधन (II) दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

 

प्रश्न 1. भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान स्पष्ट कीजिए । 

उत्तर- भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान इस प्रकार है –

(1) भारतीय कृषि से संसार की लगभग 17 प्रतिशत जनसंख्या का पोषण हो रहा है । कृषि हतारा 2/3 जनसंख्या का भरण पोषण करती है है । 

(2) भारतीय कृषि में देश की लगभग दो – तिहाई श्रमशक्ति लगी हुई है । इसके द्वारा अप्रत्यक्ष रूप में भी अनेक लोगों को रोजगार मिला है । लोग या तो दस्तकारी में लगे हैं या गाँवों में कृषि उत्पादों पर आधारित छोटे – मोटे उद्योग धंधों में लगे हैं । कृषि में बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार देने की सम्भावनाएँ छिपी हैं । 

(3) देश में वस्त्रों की जरूरतों को पूरा करने के लिए कच्चे माल कृषि से ही मिलते हैं । कपास , जूट , रेशम , ऊन एवं लकड़ी की लुग्दी से ही वस्त्रों का निर्माण होता है । चमड़ा उद्योग भी कृषि क्षेत्र की ही देन है । कृषि उत्पादों को कच्चे माल के रूप में उपयोग करने वाले उद्योगों का आधार भी यही है । वस्त्र उद्योग , जूट उद्योग , खाद्य तेल उद्योग , चीनी एवं तम्बाकू उद्योग सभी कृषि उत्पादों पर आधारित हैं । कृषि उत्पादों पर आधारित आय में कृषि का योगदान लगभग 34 प्रतिशत है । 

(4) भारतीय कृषि देश की बढ़ती जनसंख्या का भरण – पोषण कर रही है । कृषि पदार्थों से ही भोजन में कार्बोहाइड्रेट , संतुलित आहार हेतु प्रोटीन , वसा , विटामिन आदि प्राप्त होते हैं । संक्षेप में , भारतीय कृषि देश की अर्थव्यवस्था की महत्वपूर्ण आधारशिला है । इसकी सफलता अथवा विफलता का प्रभाव देश की खाद्य समस्या , सरकारी आय , आंतरिक व विदेशी व्यापार , यातायात के साधनों तथा राष्ट्रीय आय पर प्रत्यक्ष रूप से पड़ता है । इसलिए कहा जाता है कि मानव जीवन में जो महत्व आत्मा का है , वही भारत की अर्थव्यवस्था में कृषि का है । 

 

प्रश्न 2. भारत की प्रमुख कृषि उपजों का वर्णन करते हुए कृषि विकास हेतु किए गए सरकारी प्रयासों का वर्णन कीजिए । 

उत्तर – 

(1) गेहूँ- 

उत्तर प्रदेश , पंजाब , हरियाणा , मध्यप्रदेश , बिहार , राजस्थान , महाराष्ट्र , पश्चिम बंगाल , उत्तराखंड तथा गुजरात । 

(2) चावल- 

पश्चिम बंगाल , उत्तरप्रदेश , पंजाब , आन्ध्रप्रदेश , छत्तीसगढ़ , मध्यप्रदेश , बिहार , तमिलनाडु , उड़ीसा व असम । 

(3) बाजरा- 

राजस्थान , महाराष्ट्र , तमिलनाडु , पंजाब , आन्ध्रप्रदेश , उत्तरप्रदेश , गुजरात , हरियाणा , कर्नाटक व मध्यप्रदेश । 

(4) जौ- 

उत्तरप्रदेश , राजस्थान , बिहार और पंजाब । 

(5) चना व दाले- 

मध्यप्रदेश , उत्तरप्रदेश , पश्चिम बंगाल , राजस्थान , महाराष्ट्र , पंजाब व कर्नाटक । 

(6) मक्का- 

कर्नाटक , आन्ध्रप्रदेश , उत्तरप्रदेश , राजस्थान , मध्यप्रदेश , बिहार और पंजाब । 

(7) तिलहन- 

राजस्थान , मध्यप्रदेश , महाराष्ट्र , गुजरात , आन्ध्रप्रदेश , बिहार , उड़ीसा , उत्तरप्रदेश व पश्चिम बंगाल । 

(8) मूंगफली- 

गुजरात , आन्ध्रप्रदेश , तमिलनाडु , कर्नाटक , महाराष्ट्र , मध्यप्रदेश , मूंगफली उत्पादन में भारत का विश्व में प्रथम स्थान है । 

(9) रेपसीड और सरसों- 

राजस्थान , उत्तरप्रदेश , हरियाणा । 

(10) सोयाबीन- 

मध्यप्रदेश , महाराष्ट्र , राजस्थान । 

(11) सूरजमुखी- 

कर्नाटक , आन्ध्रप्रदेश , महाराष्ट्र । 

(12) चाय- 

असम , पश्चिम बंगाल , तमिलनाडु , केरल , त्रिपुरा , हिमाचल प्रदेश व उत्तरप्रदेश । 

(13) कहवा- 

कर्नाटक , तमिलनाडु व केरल । 

(14) तम्बाकू- 

आन्ध्रप्रदेश , गुजरात , बिहार , उत्तरप्रदेश , महाराष्ट्र , पश्चिम बंगाल , तमिलनाडु व कर्नाटक । 

(15) गन्ना- 

उत्तरप्रदेश , तमिलनाडु , महाराष्ट्र , कर्नाटक , आन्ध्रप्रदेश , हरियाणा , पंजाब , बिहार व गुजरात । 

(16) कपास- 

गुजरात , महाराष्ट्र , आन्ध्रप्रदेश , हरियाणा , मध्यप्रदेश , पंजाब , कर्नाटक , राजस्थान व तमिलनाडु । 

(17) जूट और मेस्ता- 

पश्चिम बंगाल , बिहार , असम , आन्ध्रप्रदेश , महाराष्ट्र , मेघालय व उड़ीसा ।

 

कृषि विकास हेतु किए गए सरकारी प्रयास इस प्रकार हैं- 

(1) अधिक उपज देने वाले बीजों की उपलब्धता सुनिश्चित की है

(2) रासायनिक उर्वरकों के उपयोग हेतु सहायता प्रदान की है । 

(3) कीटनाशक दवाओं के प्रयोग पर बल दिया है । 

(4) कृषि यंत्रीकरण के विस्तार हेतु प्रयत्न किए हैं । 

(5) लघु एवं मध्यम सिंचाई परियोजनाओं का विस्तार किया है । 

(6) भूमि संरक्षण की नयी तकनीकों के प्रयोग को प्रोत्साहित किया है 

(7) कृषि उत्पादों के समर्थन मूल्य का निर्धारण किया है । 

(8) कृषि शोध एवं भूमि परीक्षण को बढ़ावा दिया है । 

(9) कृषि विपणन सुविधाओं में वृद्धि की है । 

(10) कृषि – वित्त एवं ऋण सुविधाओं का विस्तार किया है । 

(11) कृषि सम्बन्धी विभिन्न बीमा योजनाओं को लागू किया है । 

 

प्रश्न 3. भारत में लोहा या मैंगनीज उत्पादन क्षेत्रों के वितरण का वर्णन कीजिए ।

उत्तर- भारत में लोहे के उत्पादन क्षेत्रों को निम्नांकित क्षेत्रों में विभाजित किया जा सकता है 

 

उत्तरी – पूर्वी क्षेत्र- 

झारखण्ड राज्य के सिंहभूमि की प्रसिद्ध लोहा खदानें – मनोहरपुर , पाशिराबुरु , बुढ़ाबुरु , गुआ और नोआमुंडो हैं । उड़ीसा के मयूरभंज जिले में गुरुमहिसानी , सलाइपट तथा बादाम पहाड़ की खदार्ने प्रमुख हैं । 

 

मध्य भारत क्षेत्र- 

इस क्षेत्र में मध्यप्रदेश में जबलपुर , मण्डला , बालाघाट , छत्तीसगढ़ का दुर्ग , रायगढ़ , बिलासपुर और महाराष्ट्र के चाँदा ( चंद्रपूर ) और रत्नागिरि जिलों में लौह भण्डार हैं । दुर्ग जिले की दल्ली व राजहरा और बस्तर की बैलाडिला एवं राउघाट की खदानें प्रसिद्ध है । राजस्थान के अरावली क्षेत्र , उदयपुर व भीलवाड़ा , डूंगरपुर व बूंदी जिलों में भी लौह खदानें हैं । 

 

प्रायद्वीपीय क्षेत्र- 

कर्नाटक में चिकमंगलूर , वल्लारि , उत्तर कन्नड़ तथा चित्रदुर्ग जिलों में , तमिलनाडु के सेलम , तिरुच्चिरापल्लि तथा दक्षिणी अर्काडु जिलों में तथा आन्ध्रप्रदेश के अनन्तपुर , कुर्नूल तथा नेल्लूर जिलों में लोहे की खदानें हैं । 

 

अन्य क्षेत्र- 

हरियाणा के महेन्द्रगढ़ , हिमाचल प्रदेश के मण्डी , उत्तराखण्ड के गढ़वाल , अल्मोड़ा तथा नैनीताल , केरल के कोजिकोड , जम्मू व कश्मीर के जम्मू व ऊधमपुर जिलों तथा नागालैण्ड में लोहे के भण्डार हैं । 

भारत में मैंगनीज अयस्क के उत्पादन क्षेत्रों को तीन क्षेत्रों में बाँटा जा सकता है 

 

मध्य भारतीय खदानें- 

इस क्षेत्र में भारत का 50 प्रतिशत मैंगनीज का उत्पादन होता है । मुख्य खदानें महाराष्ट्र के भण्डारा , रत्नागिरि व नागपुर , मध्यप्रदेश के बालाघाट , छिंदवाड़ा , सिवनी , मण्डला , धार , झाबुआ , छत्तीसगढ़ के बस्तर , गुजरात के खेड़ा व पंचमहल और राजस्थान के उदयपुर एवं बाँसवाड़ा 

 

प्रायद्वीपीय खदानें- 

कर्नाटक के उत्तरी कन्नड़ , चित्रदुर्ग चिकमंगलूर , शिमोगा , बल्लारि तथा तुमकुर जिलों में मैंगनीज अयस्क की खदाने हैं । आन्ध्रप्रदेश में विशाखापट्टनम् , कड़प्पा तथा श्रीकाकुलम् में मैंगनीज मिलता है ।

 

उत्तर – पूर्वी खदानें- 

झारखण्ड के सिंहभूमि और उड़ीसा के क्योंझर , गंजाम , सुन्दरगढ़ तथा बेलागिरि जिलों में मैग्नीज मिलता है । 

 

प्रश्न 4. मध्यप्रदेश खनिज सम्पदा का भण्डार है । इस कथन की पुष्टि कीजिए । 

उत्तर- मध्यप्रदेश खनिज सम्पदा के मामले में बहुत धनी है । यहाँ विभिन्न प्रकार के खनिज पदार्थ पार जाते हैं । मध्यप्रदेश के हर भाग में खनिज पाया जाता है , अतः मध्यप्रदेश खनिज सम्पदा की दृष्टि से विशेष रूप से धनी है । मध्यप्रदेश के खनिजों में लौह अयस्क , मैग्नीज , बाक्साइट , चीनी मिट्टी , चूना पत्थर , ताँबा , हीरा , अभ्रक , टंगस्टन , कोरण्डम , बेटाइट , फेल्स्पार , डोलोमाइट , रॉक फास्फेट , ग्रेफाइट , सीसा , सिलीमेनाइट , कोयला आदि खनिज पदार्थ बहुतायत से पाये जाते हैं । इसलिए मध्यप्रदेश को खनिज सम्पदा का भण्डार कहा जाता है । 

 

प्रश्न 5. छोटा नागपुर के पठार को विश्व का खनिज आश्चर्य ‘ क्यों कहते हैं ? 

उत्तर- छोटा नागपुर के पठार को ‘ विश्व का खनिज आश्चर्य ‘ कहा जाता है , क्योंकि यह खनिज पदार्थों की दृष्टि से बहुत धनी क्षेत्र है । यहाँ विभिन्न प्रकार का खनिज बहुतायत में पाया जाता है । इस क्षेत्र में खनिज के विपुल भण्डार हैं । इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि भारत के कुल खनिज का लगभग 40 प्रतिशत खनिज इसी क्षेत्र में पाया जाता है । छोटा नागपुर के पठार में खनिज पदार्थों की अपार उपलब्धता ने इसे ‘ विश्व का खनिज आश्चर्य ‘ बना दिया है । 

 

प्रश्न 6. लोहे के उपयोग पर प्रकाश डालते हुए भारत में लोहा उत्पादक क्षेत्रों का वर्णन कीजिए । 

उत्तर- लोहे का वर्तमान में हर क्षेत्र में उपयोग होता है । 

(1) कृषि क्षेत्र में लोहे का उपयोग कृषि उपकरण बनाने में किया जाता है । जैसे- हल , बीज बोने की मशीनें , ट्रेक्टर ट्राली आदि । 

(2) परिवहन के क्षेत्र में लोहे का उपयोग परिवहन के साधनों को निर्मित करने में किया जाता है । जैसे- ट्रक , हवाई जहाज , जहाज , रेल आदि । 

(3) निर्माण के क्षेत्र में लोहे का उपयोग विभिन्न निर्माण कार्यों , जैसे- पुल निर्माण , भवन निर्माण , सड़क निर्माण आदि में किया जाता है । 

(4) घरेलू उपकरणों के निर्माण में लोहे का प्रयोग किया जाता है , जैसे- घरेलू बर्तन , कुसी , टेबल आदि । 

(5) इसके अतिरिक्त लोहे का उपयोग विभिन्न उद्देश्यों को पूरा करने हेतु किया जाता है , जैसे- सुरक्षा उपकरण , बिजली उपकरण आदि । 

 

भारत में लोहा उत्पादक क्षेत्र – उत्तरी – पूर्वी क्षेत्र- 

झारखण्ड राज्य के सिंहभूमि की प्रसिद्ध लोहा खदानें मनोहरपुर , पाशिराबुरु , बुढाबुरु , गुआ और नोआमुंडो हैं । उड़ीसा के मयूरभंज जिले में गुरुमहिसानी , 

 

मध्य भारत क्षेत्र- 

इस क्षेत्र में मध्यप्रदेश में जबलपुर , मण्डला , बालाघाट , छत्तीसगढ़ का दुर्ग , रायगढ़ , महाराष्ट्र के चाँदा और रत्नागिरि जिलों में लौह भण्डार हैं । दुर्ग जिले की दल्ली व राजहरा और बस्तर की बैलाडिला एवं राउघाट की खदानें प्रसिद्ध हैं । राजस्थान के अरावली क्षेत्र , उदयपुर व भीलवाड़ा , डूंगरपुर व बूंदी जिलों में भी लौह खदानें हैं । 

 

प्रायद्वीपीय क्षेत्र- 

सेलम , तिरुच्चिरापल्लि तथा दक्षिणी अर्काडु जिलों में तथा आन्ध्रप्रदेश के अनन्तपुर , कुर्नूल तथा नेल्लूर -कर्नाटक के चिकमंगलूर , वल्लारि , उत्तर कन्नड़ तथा चित्रदुर्ग जिलों में , तमिलनाडु जिलों में लोहे की खदान है । 

 

अन्य क्षेत्र- 

हरियाणा के महेन्द्रगढ़ , हिमाचल प्रदेश के मण्डी , उत्तराखण्ड के गढ़वाल , अल्मोड़ा तथा नैनीताल , केरल के कोजिकोड , जम्मू व कश्मीर के जम्मू व ऊधमपुर जिलों तथा नागालैण्ड में लोहे के भण्डार हैं । 

 

प्रश्न 7. अभ्रक का क्या उपयोग है , ? भारत में अप्रक कहाँ – कहाँ मिलता है ? 

उत्तर- यह पुरानी कायान्तरित शैलों में पाया जाता है । यह परतदार , हल्का तथा चमकीला होता है । यह गरमी तथा बिजली के लिए कुचालक होता है । बहुत से उद्योगों में इसका उपयोग होता है । जैसे- औषधि बनाने में , बिजली के संचालन , टेलिफोन , रेडियो , वायुयान , मोटर परिवहन आदि उद्योग में । अभ्रक के उत्पादन में भारत का स्थान विश्व में दूसरा है । विश्व का 26 प्रतिशत अभ्रक भारत से प्राप्त होता है । बिलासपुर और प्राप्ति के क्षेत्र- भारत में अभक मुख्यतया बिहार , तमिलनाडु , आन्ध्रप्रदेश , राजस्थान व कर्नाटक राज्यों से प्राप्त होता है । भारत का 60 प्रतिशत अभ्रक बिहार और झारखण्ड से प्राप्त होता है । गया , मुंगर व हजारीबाग जिलों में अभ्रक की खदानें हैं । बिहार का अभ्रक स्वच्छता एवं सफेदी के लिए विश्व प्रसिद्ध है । इसीलिए बिहार के अभ्रक को रूबी अभ्रक ‘ ( Ruby Mica ) कहते हैं । तमिलनाडु में अभ्रक नीलगिरि , मदुराई , कोयम्बटूर तथा सलेम जिलों में पाया जाता है । आन्ध्रप्रदेश के नेल्लूर , गुंटुर , विशाखापट्टनम तथा पश्चिमी गोदावरी जिलों में अभ्रक पाया जाता है । यहाँ का अभ्रक हरे रंग का होता है और शीघ्र पहचान में आ जाता है । राजस्थान के भीलवाड़ा , जयपुर , उदयपुर , टोंक , सीकर तथा अजमेर में अभ्रक मिलता है । मध्यप्रदेश के ग्वालियर , छत्तीसगढ़ के बस्तर , कर्नाटक के हासन तथा केरल के पुन्नालूर जिले में अभ्रक पाया जाता है । इसके अलावा हरियाणा के नारनौल ( महेन्द्रगढ़ ) व गुड़गाँव तथा हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिलों में भी अभ्रक मिलता है । 

 

प्रश्न 8. जड़ी – बूटियों के औषधीय उपयोग का वर्णन कीजिए ।

उत्तर –

1 . मुलेठी- गला खराब होने , मुंह के छाले होने पर मुलेठी को चूसने से लाभ होता है । हृदय रोग तथा खांसी में भी इसका प्रयोग लाभकारी है । 

  1. ग्वारपाठा- शहद के साथ इसके पत्तों का रस लेने से खाँसी व कफ में आराम , पत्तों का ताजा गूदा लेने से गठिया , जोड़ों के दर्द में आराम मिलता है । 
  2. अश्वगंधा- इस पौधे की जड़ों का उपयोग खाँसी और स्त्री रोग के उपयोग में किया जाता है यह सभी प्रकार के अल्सर , गठिया के दर्द , फफोले , मवाद आदि को कम करने के लिए उपयोग की जाती है । 
  3. सर्पगंधा- इस पौधे की जड़ों का उपयोग उच्च रक्तचाप में , श्वाँस रोग में , अनिद्रा , हिस्टिरिया , • हैजा , पुराना बुखार आदि रोगों में किया जाता है 
  4. गिलोय- यद्यपि गिलोय की पत्ती , फल व जड़ का उपयोग औषधि के रूप में किया जाता है , लेकिन इसका तना सर्वाधिक उपयोगी होता है । इसके फल का उपयोग पीलिया व गठिया रोग के उपचार में देना उपयोगी है । 
  5. शतावरी- शतावर की जड़ों से बलवर्द्धक टॉनिक , मानसिक तनाव से मुक्ति , एनीमिया के उपचार , सूखी खाँसी , विष निरोधक पुराने फोड़े – फुसी के उपचार में उपयोगी है । 
  6. तुलसी – विभिन्न प्रकार के बुखारों में तुलसी के पत्तों को चाय में उबालकर सेवन करने से छाले की खराश दूर होती है । 
  7. आँवला – आँवले से त्रिफला चूर्ण तैयार कर रात में पानी में भिगोकर सुबह आँखें धोने से आँखों की रोशनी बढ़ती है । प्रतिदिन रात्रि में सोने से पूर्व गुनगुने पानी के साथ त्रिफला चूर्ण के लेने पर पेट सम्बन्धी विकार दूर होते हैं ।
  8. हल्दी- हल्दी की जड़ औषधीय गुण युक्त होती है । इसका उपयोग हृदय रोग पाचकीय उत्तेजक तथा प्रतिरोधी एवं एण्टीसेप्टिक के रूप में उपयोग किया जाता है । 
  9. नीम- बसंत ऋतु में नीम के कोमल पत्तों के सेवन से रक्त शुद्ध होता है । सूखी पत्ती अनाज में रखने से कीड़े नहीं पड़ते । नीम का तेल चर्मरोग नाशक होता है । 

 

भारत के संसाधन (II) अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न 

 

प्रश्न 1. भारत की फसलों का वर्गीकरण समझाइए । 

उत्तर –

  1. खरीफ की फसलें – 

वे फसलें , जो वर्षा ऋतु के आरम्भ ( जून , जुलाई ) में बोयी जाती है एवं दशहरे के बाद शरद ऋतु के अंत ( अक्टूबर , नवम्बर ) तक तैयार हो जाती हैं , खरीफ की फसलें कहलाती हैं । मानसून के आगमन पर बोई जाने वाली प्रमुख फसलें – चावल , ज्वार , बाजरा , मक्का , सोयाबीन , गन्ना , कपास , पटसन , तिल्ली , मूंगफली आदि हैं । 

 

  1. रबी की फसलें- 

जो फसलें शरद ऋतु के आगमन पर दशहरे के पश्चात् अक्टूबर , नवम्बर में बोई जाती हैं । 

जैसे – गेहूँ , चना , जी , सरसों , तम्बाकू आदि रबी की फसलें हैं । जायद फसलें कहलाती हैं । मक्का , बाजरा , चना , अरहर ( तुअर ) व अन्य दालें । बोई जाती है और ग्रीष्म त्रातु के आरम्भ में मार्च , अप्रैल में तैयार हो जाती है , रबी की फसलें 

 

  1. जायद फसलें –

विशेषतः ग्रीष्म ऋतु में पैदा की जाने वाली सब्जियाँ और हरे चारे की खेती 

 

4.खाद्यान्न फसलें – 

खाद्यान्न फसलों से हमारा आशय उन फसलों से हैं , जो भोजन के लिए मुख्य पदार्थ का कार्य करती हैं । खाद्यान्न फसलों में अनाज व दालें सम्मिलित हैं । जैसे – चावल , गेहूँ , ज्वार , 

 

  1. नकद या व्यापारिक फसलें – 

नकद या व्यापारिक फसलों से आशय उन फसलों से है , जो प्रत्यक्ष रूप से भोजन के लिए उत्पन्न नहीं की जाती हैं , किन्तु उन्हें बेचकर नकद राशि प्राप्त की जाती है । इनमें कपास , जूट , चाय , कॉफी , तिलहन , सोयाबीन , गन्ना , तम्बाकू , रबर आदि हैं । 

 

प्रश्न 2. श्वेत क्रांति पर टिप्पणी लिखिए । 

उत्तर- श्वेतक्रान्ति का पशुपालन से निकट का सम्बन्ध है । श्वेतक्रान्ति का अर्थ है – डेरी विकास कार्यक्रमों के दूध के उत्पादन में वृद्धि । इसमें ग्रामीण क्षेत्रों में दूध का उत्पादन बढ़ाने पर विशेष बल दिया गया है । इसे ऑपरेशन फ्लड ( Operation Flood ) के नाम से जाना जाता है । सरकार द्वारा विदेशी नस्लों की गार्यों तथा स्थानीय गायों के संकरण से नई जातियों का विकास किया है , जो अधिक दूध देती हैं । ग्रामीण क्षेत्रों में सहकारी समितियों का गठन कर गाँवों में दुग्ध उत्पादकों के दूध को एकत्रित करके उसे बेचने का प्रबन्ध करती है । ये समितियाँ ऋण देती हैं तथा पशुओं की चिकित्सा की व्यवस्था भी करती है । यह आंदोलन गुजरात के खेड़ा जिले से प्रारम्भ होकर बड़ी तेजी से महाराष्ट्र , आन्ध्रप्रदेश , पंजाब , हरियाणा , राजस्थान , उत्तरप्रदेश में फैल गया । वर्ष 1999-2000 में देश में कुल दूध उत्पादन 781 लाख टन था , जो बढ़कर वर्ष 2001-2002 में 850 लाख टन हो गया । 

 

प्रश्न 3. नीली क्रांति तथा गुलाबी क्रांति को समझाइए । 

उत्तर – नीली क्रान्ति- देश में मछली उत्पादन में हुई प्रगति को ‘ नीली क्रान्ति ‘ ( Blue Revolution ) कहते हैं । भारत विश्व में कुल मछली उत्पादन में तीसरा बड़ा राष्ट्र है । देश में मछली उत्पादन को बढ़ाने के लिए विश्व बैंक की सहायता से एक परियोजना 5 राज्यों में लागू की गई है । मछली उत्पादन से भोजन की आपूर्ति बढ़ती है , पोषणाहार का स्तर ऊँचा उठता है , रोजगार के अवसर बढ़ते हैं तथा विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है । वर्ष 2006-07 में देश में 63.99 लाख टन मछली का उत्पादन और 5,739 करोड़ रुपये मूल्य की मछली का निर्यात हुआ ।

गुलाबी क्रान्ति-  

शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में प्राकृतिक खनिज एवं विटामिन्स का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है । हमारे देश में विविध जलवायु एवं मिट्टी का उपयोग करते हुए उष्ण एवं शीतोष्ण कटिबन्धीय फलों ( सेव , आम , केला , नारियल , काजू , अन्नास , सन्तरे , नीबू , नाशपाती , आलूचे , खूबानी , बादाम ) की कृषि को विकसित करने पर जोर दिया गया है , इसे ही ‘ गुलाबी क्रान्ति ‘ का नाम दिया गया है । 

 

प्रश्न 4. पीत क्रान्ति ( पीली क्रान्ति ) पर टिप्पणी लिखिए । 

उत्तर – खाद्य तेलों और तिलहन फसलों के उत्पादन के क्षेत्र में अनुसन्धान और विकास करने की रणनीति को पीली क्रान्ति ( Yellow Revolution ) कहते हैं । साठ के दशक तक भारत तिलहन उत्पादन में आत्मनिर्भर था , किन्तु कुल कृषि भूमि में तिलहन फसलों के घटते क्षेत्रफल , खाद व उर्वरकों के नगण्य उपयोग , सिंचाई के सीमित साधन , बढ़ती आबादी और फसल सुरक्षा एवं वैज्ञानिक तरीकों के उपयोग न करने से देश में खाद्य तेलों की कमी हो गई । तिलहन उत्पादन बढ़ाने हेतु अनेक प्रयास किये गये । जैसे -1987-88 में भारत सरकार ने एक टेक्नॉलॉजी मिशन की शुरूआत की , जिसके द्वारा राष्ट्रीय , राज्य व स्थानीय स्तर पर गठित सरकारी समितियों , कृषि अनुसंधान संस्थाओं एवं ऋण प्रदान करने वाली संस्थाओं की मदद से तिलहन उत्पादन को अधिक लाभप्रद बनाने के उपाय किए । सरकार ने तिलहन के समर्थन मूल्य , भण्डारण और वितरण की सुविधाओं में वृद्धि की ।

 

प्रश्न 5. लोहा के प्रकारों को समझाइए । 

उत्तर- लोहा चार प्रकार का होता है- हेमेटाइट , मैग्नेटाइट , लिमोनाइट तथा साइडेराइट । 

 

हेमेटाइट- 

यह लाल एवं भूरे रंग का होता है । इसमें धातु का अंश 60 से 70 प्रतिशत होता है । यह सर्वोत्तम प्रकार का लौह अयस्क है । भारत में अधिकांश लोहा इसी किस्म का लोहा मिलता है । यह जलज शैलों ( Acqueous rocks ) में पाया जाता है । 

 

मैग्नेटाइट- 

यह काले रंग का चुम्बकीय लोहे का ऑक्साइड है । इसमें धातु का अंश 72 प्रतिशत तक होता है । यह आग्नेय शैलों में पाया जाता है । यह तमिलनाडु व कर्नाटक में मिलता है । 

 

लिमोनाइट- 

यह ऑक्सीजन , पानी व लोहे के मिश्रण से बनता है । इसमें 40 से 60 प्रतिशत तक लोहा होता है । इसका रंग पीला होता है और अवसादी शैलों में यह पाया जाता है । 

 

सिडेराइट- 

उसे आयरन कार्बोनेट कहते हैं । यह लोहे तथा कार्बन के मिश्रण से बनता है । इसका रंग भूरा होता है । इसमें धातु का अंश 10 से 48 प्रतिशत तक होता है । 

 

प्रश्न 6. ताँबा अयस्क पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए । 

उत्तर- ताँबा कायान्तरित शैलों में पाया जाता है । इसके साथ चाँदी , टिन , सीसा , सोना आदि धातुएँ भी मिली रहती हैं । शुष्क ताँबा बहुत लचीला होता है । यह लाल भूरे रंग का होता हैं । यह बिजली का उत्तम सुचालक है तथा घिसावट को रोकता है । ताँबे को अन्य धातुओं के साथ मिलाने पर एक नई धातु तैयार हो जाती है , इसीलिए ताँबा खनिजों में कुंजी – धातु कहलाती है । भारत में ताँबा का उपयोग प्राचीन काल से होता रहा है । बिजली के तार , टेलीफोन व टेलीग्राफ के यंत्र , बर्तन व सिक्के बनाने में ताँबा का बहुत उपयोग होता विश्व के ताँबा उत्पादक देशों में भारत का तीसरा स्थान है । भारत के ताँबा उत्पादक प्रमुख क्षेत्रों में झारखण्ड का सिंहभूमि , राजस्थान का अलवर , झुनझुनू , बाँसवाड़ा एवं झालावाड़ , पश्चिम बंगाल का दार्जिलिंग , आंध्रप्रदेश का गुण्टर , सिक्किम , कर्नाटक का चित्रदुर्ग , उत्तराखण्ड का गढ़वाल , अल्मोड़ा व देहरादून , हिमाचल का कुल्लू एवं कांगड़ा घाटी और मध्यप्रदेश का बालाघाट जिला प्रमुख हैं । 

 

प्रश्न 7. खनिज पदार्थों के संरक्षण के उपाय लिखिए । 

उत्तर – खनिज पदार्थों के संरक्षण के निम्नलिखित उपाय हैं- 

(1) प्रत्येक राष्ट्र यह समझे कि प्रकृति की यह सम्पदा आने वाली पीढ़ियों के लिए भी है । इसलिए आर्थिक विकास की दौड़ में खनिज पदार्थों का दोहन सीमित कर दें , जिससे मानव व प्रकृति का संतुलन बना रहे । प्रतिस्पर्धा के कारण मानवीय गुणों का हासन हो । विश्वबन्धुत्व की भावना रखकर हर देश को खनिजों के वैकल्पिक साधन तलाशना चाहिए । 

(2) वाता वरण प्रदूषित करने वाले पदार्थों का उपयोग बन्द किया जाना चाहिए । 

(3) खनिज पदार्थों के विकल्प की खोज की जानी चाहिए । 

(4) संयुक्त राष्ट्र संघ ( UN.O. ) द्वारा हर देश द्वारा खनिज पदार्थों के दोहन व उपयोग पर निगरानी रखी जाना चाहिए । 

 

प्रश्न 8. कार्बन की विद्यमान मात्रा आधार पर भारतीय कोयले के प्रकार लिखिए । 

उत्तर – 1. एन्धेसाइट- 

यह सर्वोत्तम कोयला है । भारत में मिलने वाले इस किस्म के कोयला में कार्बन की मात्रा 85 से 95 प्रतिशत तक है । यह कोयला अत्यधिक कठोर तथा चमकीला होता हैं । जलते समय धुंआ नहीं छोड़ता तथा ताप अधिक देता है । 

 

  1. बिटुमिनस- 

यह द्वितीय श्रेणी का कोयला है । इसमें कार्बन की मात्रा 70 से 80 प्रतिशत तक है । इसका रंग काला होता है तथा जलते समय कम धुंआ देता है । 

  1. भूरा या लिग्नाइट- 

यह घटिया किस्म का कोयला है , जिसमें कार्बन की मात्रा 40 से 55 प्रतिशत तक होती है । यह छूने पर हाथ काले करता है तथा जलते समय अधिक धुंआ देता है । 

 

  1. पीट- 

यह कोयले का प्राथमिक रूप है । इसका जमाव छिछले गड्ढों में वानस्पतिक विघटन से हुआ है । इसमें कार्बन की मात्रा 20 प्रतिशत तक है और आर्द्रता 80 प्रतिशत तक है ।

 

प्रश्न 9. भारत की तेल शोधक शालाओं के नाम लिखिए । 

उत्तर- ( 1 ) डिग्बोई ( असम ) , ( 2 ) विशाखापट्टनम ( आन्ध्रप्रदेश ) , ( 3 ) बरौनी ( बिहार ) , ( 4 ) कोइली ( गुजरात ) , ( 5 ) हल्दिया ( पं . बंगाल ) , ( 6 ) मथुरा ( उत्तरप्रदेश ) , ( 7 ) मंगलौर ( कर्नाटक ) , ( 8 ) . भटिंडा ( पंजाब ) , ( 9 ) नुमालीगढ़ ( असम ) , ( 10 ) ट्रांबे ( महाराष्ट्र ) , ( 11 ) नूनामाटी , ( 12 ) कोच्चि ( केरल ) , ( 13 ) चेन्नई ( तमिलनाडु ) , ( 14 ) बोंगईगाँव ( असम ) , ( 15 ) पानीपत ( हरियाणा ) , ( 16 ) जामनगर ( गुजरात ) , ( 17 ) नारीमनम् ( तमिलनाडु ) , ( 18 ) तातीपाका ( आंध्रप्रदेश ) 

 

प्रश्न 10. प्राकृतिक गैस की मांग बढ़ने के कारण लिखिए । 

उत्तर- प्राकृतिक गैस की मांग बढ़ने के कई कारण हैं जैसे- 

(1) इसका उत्पादन एवं वितरण आसान वकम खर्चीला है तथा संचय के लिए कम स्थान की आवश्यकता होती है । 

(2) यह पूर्णतः ज्वलनशील तथा गंध एवं कालिख रहित है । अतः घरों को गर्म रखने , भोजन बनाने आदि के लिए उत्तम ईंधन हैं । 

(3) उपयोग के बाद इससे धूल या राख नहीं होती । 

(4) अपने प्राकृतिक रूप में भी यह ज्वलनशील है । 

(5) प्राकृतिक गैस का उपयोग गृह ऊर्जा के अतिरिक्त पेट्रो रसायन उद्योग , उर्वरक तथा विद्युत उत्पादन में भी होता हैं । इसका 60 प्रतिशत भाग उर्वरक कारखानों , 20 प्रतिशत विद्युत उत्पादन , 15 प्रतिशत आन्तरिक प्रयोग और 5 प्रतिशत अन्य कार्यों में हो रहा है । 

 

प्रश्न 11. शक्ति संसाधनों के संरक्षण के लिए क्या उपाय किये जाने चाहिए ? 

उत्तर- शक्ति के संसाधनों के संरक्षण हेतु उपाय किए जाना चाहिए- 

(1) क्षयशील स्रोतों पर आधारित ऊर्जा का उत्पादन सीमित किया जाए । 

(2) ऊर्जा के नव्यकरणीय स्रोतों का तीव्रता से विकास किया जाए । 

(3) देश में उत्पादित होने वाली ऊर्जा का समुचित वितरण सुनिश्चित हो , ताकि ऊर्जा का हास न हो सके । 

(4) ऊर्जा संसाधनों का समुचित उपयोग किया जाए तथा इस हेतु जन जागृति को प्राथमिकता दी जाना चाहिए । 

(5) प्रदूषण रहित ऊर्जा स्रोतों से ऊर्जा उत्पादन विकसित किया जाए ।

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