MP Board Class 10th Social Science Solutions Chapter 9 स्वतन्त्रता आन्दोलन से सम्बन्धित घटनाएँ

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MP Board Class 10th Social Science Solutions Chapter 9 स्वतन्त्रता आन्दोलन से सम्बन्धित घटनाएँ

 

MP Board Class 10th Social Science Chapter 9 पाठान्त अभ्यास

 

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Social Science Chapter 9 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

 

सही विकल्प चुनिए 

 

( 1 ) बंगाल विभाजन का मूल उद्देश्य था 

( i ) बंगाल में प्रशासनिक व्यवस्था लागू करना 

( ii ) राष्ट्रवादी भावनाओं को दबाना 

( iii ) राष्ट्रवादी भावनाओं को बढ़ाना 

( iv ) उपर्युक्त में से कोई नहीं । 

 

( 2 ) कांग्रेस का विभाजन हुआ 

( i ) नागपुर अधिवेशन 

( ii ) सूरत अधिवेशन 

( iii ) लाहौर अधिवेशन 

( iv ) बम्बई अधिवेशन 

 

( 3 ) गाँधीजी ने ‘ खिलाफत आन्दोलन ‘ का समर्थन क्यों किया ? 

( i ) क्योंकि खलीफा भारतीय स्वतन्त्रता संघर्ष का समर्थक था । 

( ii ) क्योंकि गाँधीजी अंग्रेजों के विरुद्ध मुसलमानों का समर्थन चाहते थे । 

( iii ) क्योंकि खलीफा भारतीय सभ्यता व संस्कृति के प्रेमी थे । 

( iv ) क्योंकि टर्की ने भारतीय स्वतन्त्रता का समर्थन किया । 

 

( 4 ) रोलेट एक्ट का उद्देश्य था 

( i ) सभी हड़तालों को गैर कानूनी घोषित करना 

( ii ) आन्दोलनकारियों का दमन करना 

( iii ) सभी में समानता स्थापित करना 

( iv ) उपर्युक्त सभी । 

 

( 5 ) सविनय अवज्ञा आन्दोलन के कार्यक्रम में निम्नलिखित में से कौन शामिल नहीं है ? 

( i ) देशवासियों को नमक बनाना चाहिए 

( ii ) विदेशी वस्त्रों की होली जलाई जाए 

( iii ) हिंसात्मक साधनों से कानूनों का उल्लंघन किया जाए 

( iv ) शराब की दुकानों पर धरना दिया जाए । 

 

( 6 ) फारवर्ड ब्लाक की स्थापना किसने की ?

( i ) भगतसिंह 

( ii ) रास बिहारी बोस 

( iii ) चन्द्रशेखर आजाद 

( iv ) सुभाष चन्द्र बोस 

 

( 7 ) जुलाई , 1947 में ब्रिटिश संसद ने भारतीय स्वतन्त्रता अधिनियम पारित किया , जिसके अनुसार दो निम्न स्वतन्त्र देशों का निर्माण हुआ 

( i ) भारत – बांग्लादेश 

( ii ) भारत – पाकिस्तान 

( iii ) भारत – श्रीलंका 

( iv ) भारत – नेपाल । 

 

उत्तर- ( 1 ) ( i ) , ( 2 ) ( ii ) , ( 3 ) ( iv ) , ( 4 ) ( i ) , ( 5 ) ( iii ) , ( 6 ) ( iv ) , ( 7 ) ( ii ) 

 

रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए 

 

( 1 ) 1905 में बंगाल प्रांत में बंगाल … उड़ीसा सम्मिलित थे । 

( 2 ) करो या मरो का नारा … आन्दोलन में दिया गया 

( 3 ) 1928 में क्रान्तिकारियों ने … का गठन किया । 

( 4 ) भारत की स्वाधीनता के समय … भारत के वाइसराय थे ।

( 5 ) … के नेतृत्व में भारत की रियासतों के विलीनीकरण का कार्य सम्पन्न हुआ । 

( 6 ) जयहिन्द का नारा … ने दिया था ।

 

उत्तर- 

( 1 ) बिहार , असम , 

( 2 ) भारत छोड़ो , 

( 3 ) हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातांत्रिक सेना 

( 4 ) लार्ड माउंटबैटन , 

( 5 ) सरदार वल्लभभाई पटेल , 

( 6 ) सुभाषचन्द्र बोस । 

 

सत्य / असत्य को स्पष्ट कीजिए 

 

( i ) चौरा – चौरी नामक स्थान मध्यप्रदेश में है ।

( ii ) कांग्रेस का विभाजन सूरत अधिवेशन में हुआ । 

उत्तर- 

( i ) असत्य

( ii ) सत्य 

 

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक शब्द या एक वाक्य में दीजिए 

( i ) इंकलाब जिंदाबाद का नारा किसने दिया था ?

( ii ) चन्द्रशेखर आजाद का जन्म कहाँ हुआ ?

( iii ) रोलेट एक्ट का कोई एक उद्देश्य लिखिए ।

( iv ) रोलेट एक्ट अधिनियम कब लागू हुआ ?

( v ) क्रिप्स मिशन भारत कब आया ?

उत्तर- 

( i ) भगतसिंह ने 

( ii ) भाबरा ( म.प्र . )

( iii ) सभी हड़तालों को गैर – कानूनी घोषित करना । 

( iv ) सन् 1919 में 

( v ) 22 मार्च 1942 को ।

 

भारत में राष्ट्रीय जागृति एवं राजनैतिक संगठनों की स्थापना अति लघु उत्तरीय प्रश्न 

 

प्रश्न 1. बंगाल विभाजन कब और क्यों किया गया था ? 

उत्तर -16 अक्टूबर सन् 1905 को बंगाल में प्रशासनिक व्यवस्था लागू करने के लिए बंगाल विभाजन लार्ड कर्जन द्वारा किया गया । 

 

प्रश्न 2. असहयोग आन्दोलन अचानक क्यों स्थगित हो गया ? 

उत्तर- उत्तरप्रदेश के चौरा – चौरी नामक स्थान पर 4 फरवरी , 1922 को जनता ने एक पुलिस थाने में आग लगा दी , जिससे 22 पुलिसकर्मी जलकर मर गए और गाँधीजी ने असहयोग आंदोलन स्थगित कर दिया । 

 

प्रश्न 3. खिलाफत और असहयोग आन्दोलन के क्या लक्ष्य थे ? 

उत्तर- जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड एवं रोलेट एक्ट का विरोध , स्वराज प्राप्ति व अंग्रेजी सरकार का विरोध इन आन्दोलनों का लक्ष्य था । 

 

प्रश्न 4. आजाद हिन्द फौज ने अंग्रेजों पर आक्रमण कर किन स्थानों को अंग्रेजों से मुक्त कराया ? 

उत्तर- आजाद हिन्द फौज ने अंग्रेजों पर आक्रमण कर रामू , कोहिमा , पलेम , तिदिम आदि स्थानों को अंग्रेजों से मुक्त कराया । 

 

भारत में राष्ट्रीय जागृति एवं राजनैतिक संगठनों की स्थापना लघु उत्तरीय प्रश्न 

 

प्रश्न 1. बंगाल – विभाजन के पीछे ब्रिटिश शासन के क्या उद्देश्य थे ? 

उत्तर – बंगाल भारत का एक विशाल प्रान्त था । बंगाल पर कुशल प्रशासन की आड़ लेकर ब्रिटिश सरकार ने हिन्दू – मुस्लिम सम्प्रदाय में वैमनस्य फैलाने के उद्देश्य से बंगाल – विभाजन किया था । अर्थात् बंगाल विभाजन के पीछे ब्रिटिश शासन का उद्देश्य हिन्दू – मुस्लिम सम्प्रदाय की एकता को विभाजित करना था । 

 

प्रश्न 2. ” कांग्रेस का विभाजन भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन की दृष्टि से विनाशकारी सिद्ध हुआ । ” स्पष्ट कीजिए । 

उत्तर- कांग्रेस का विभाजन भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन की दृष्टि से विनाशकारी सिद्ध हुआ , क्योंकि कांग्रेस विभाजन के कारण कांग्रेस के दो दल हो गये- उदारवादी दल व उग्र राष्ट्रवादी दल । इस विभाजन से कांग्रेस के नेताओं में मतभेद हो गये , जिसे दूर करने के सारे प्रयास विफल रहे । इससे ब्रिटिश सरकार को फायदा हुआ व सरकार को लगा कि उसके विपक्षी आपस में ही उलझ कर रह जायेंगे , जिससे आन्दोलनों में कमजोरी उत्पन्न होगी । इस प्रकार कांग्रेस विभाजन भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन की दृष्टि से विनाशकारी सिद्ध हुआ । 

 

प्रश्न 3. स्वतन्त्रता संग्राम के इतिहास में 1929 के लाहौर अधिवेशन का क्या महत्व है ?

उत्तर- दिसम्बर 1929 में लाहौर में कांग्रेस का अधिवेशन आरम्भ हुआ । इसके अध्यक्ष पं . जवाहरलाल नेहरू थे । उन्होंने घोषित किया कि ” हमारे सामने एक ही ध्येय है और वह है पूर्ण स्वाधीनता का ” । इस अधिवेशन में कांग्रेस ने ‘ पूर्ण स्वाधीनता ‘ के प्रस्ताव को स्वीकार किया । 31 दिसम्बर , 1929 को कांग्रेस अध्यक्ष ने अर्धरात्रि में रावी के तट पर विशाल जनसमूह के समक्ष पूर्ण स्वाधीनता का ध्वज ‘ फहराया । कांग्रेस ने 26 जनवरी , 1930 को पूर्ण स्वाधीनता दिवस मनाये जाने का निर्णय लिया । अतः देश भर में स्वाधीनता दिवस उत्साहपूर्वक मनाया गया । 

 

दिसम्बर 1929 के लाहौर कांग्रेस अधिवेशन में कांग्रेस कार्यसमिति को सविनय अवज्ञा आन्दोलन आरम्भ करने की स्वीकृति दी गई थी । वायसराय लार्ड इरविन ने लाहौर अधिवेशन के पूर्ण स्वाधीनता के प्रस्ताव को मानने से इन्कार कर दिया था , परन्तु गाँधीजी अभी भी समझौते की आशा रखते थे । अतः उन्होंने 30 जनवरी , 1930 को लार्ड इरविन के समक्ष 11 माँगे प्रस्तुत की । गांधीजी ने यह भी घोषित किया कि मांगे स्वीकार न होने की स्थिति में सविनय अवज्ञा आन्दोलन आरम्भ किया जायेगा । इस दृष्टि से स्वतन्त्रता संग्राम के इतिहास में 1929 के लाहौर अधिवेशन का महत्वपूर्ण स्थान है । 

 

प्रश्न 4. सविनय अवज्ञा आन्दोलन चलाए जाने के क्या कारण थे ? 

उत्तर- गाँधीजी चाहते थे कि सरकार विनिमय की दर घटाए , भू – राजस्व कम करे , पूर्ण नशाबन्दी लागू हो , बन्दूकों को रखने का लाइसेंस दिया जाएँ , नमक- कर समाप्त हो , हिंसा से दूर रहने वाले राजनीतिक बन्दी छोड़े जाएँ , गुप्तचर विभाग पर नियन्त्रण स्थापित हो , सैनिक व्यय में पचास प्रतिशत कमी हो , कपड़ों का आयात कम हो आदि । वायसराय ने इन मांगों को अस्वीकार किया । अतः गाँधीजी ने योजनानुसार सविनय अवज्ञा आन्दोलन आरम्भ किया । 

 

प्रश्न 5. गाँधीजी के आरंभिक आंदोलन की तुलना में भारत छोड़ो आन्दोलन किस प्रकार भिन्न था ? 

उत्तर- गाँधीजी के आरम्भिक आन्दोलन की तुलना में भारत छोड़ो आन्दोलन भिन्न था , क्योंकि भारत छोड़ो आन्दोलन कांग्रेस द्वारा प्रवर्तित आन्दोलन था । इस आन्दोलन को मुस्लिम लीग , साम्यवादी दल , हिन्दू महासभा ने समर्थन नहीं दिया । यद्यपि अन्य राजनीतिक दलों ने इसमें भाग नहीं लिया , परन्तु व्यक्तिगत स्तर पर अनेक लोग स्वतः इस आन्दोलन में सम्मिलित हुए । 1942 का भारत छोड़ो आन्दोलन स्वाधीनता का घोषित लक्ष्य प्राप्त करने में असफल रहा , परन्तु आन्दोलन इस दृष्टि से सफल रहा कि ब्रिटिश सरकार को यह विश्वास हो गया कि भारत की स्वाधीनता की मांग की लम्बे समय तक उपेक्षा नहीं की जा सकती है । इस आन्दोलन के कारण ही विश्व जनमत इंग्लैण्ड के विरुद्ध जागृत हुआ । इसी कारण आन्दोलन की समाप्ति के पश्चात् सत्ता के हस्तान्तरण का प्रश्न ही प्रमुख बना । 

 

प्रश्न 6. स्वतन्त्रता आन्दोलन के दौरान गाँधीजी ने किन तरीकों को अपनाने के लिए कहा ? 

उत्तर- स्वतन्त्रता आन्दोलन के दौरान गांधीजी ने कर्म – दर्शन और अहिंसक प्रतिरोध पर आधारित तरीकों को अपनाने को कहा । उन्होंने अपने आन्दोलनों में कानूनों का उल्लंघन , शांतिपूर्ण प्रदर्शन , अदालतों का बहिष्कार , काम रोक देना , शिक्षा संस्थाओं का बहिष्कार , शराब और विदेशी माल बेचने वालों की दुकानों पर धरना , कर न चुकाना आदि तरीकों को अपनाने के लिए कहा । 

 

प्रश्न 7. क्रान्तिकारी आन्दोलनों का भारत के इतिहास में महत्व स्पष्ट कीजिए ।

उत्तर- क्रान्तिकारी आन्दोलनों का भारत के इतिहास में बहुत महत्व है । क्रांतिकारी विचारधारा के अनुयायियों ने हिंसा और भय दिखाकर ब्रिटिश सरकार की नींद हराम कर दी थी । क्रांतिकारी आंदोलनों के द्वारा वासुदेव बलवंत फड़के , चापेकर बंधु , सावरकर बंधु , खुदीराम बोस , रास बिहारी बोस , भगतसिंह , चन्द्रशेखर आजाद , रामप्रसाद बिस्मिल , बटुकेश्वर दत्त , राजगुरु आदि क्रान्तिकारियों ने ब्रिटिश सरकार की सैन्य व आर्थिक शक्ति को बहुत नुकसान पहुंचाया । इन क्रान्तिकारियों ने नवयुवकों में त्याग और बलिदान की भावना उत्पन्न कर उन्हें मातृभूमि को विदेशी बंधनों से मुक्ति दिलाने हेतु प्रेरित किया । 

 

प्रश्न 8. केबिनेट मिशन का क्या उद्देश्य था ? वह उन उद्देश्यों में कहाँ तक सफल रहा ? 

उत्तर- शिमला सम्मेलन की असफलता के बाद इंग्लैण्ड की नयी मजदूर दल की सरकार ने भारत की स्थिति की ठीक से जानकारी लेने के लिए एक शिष्टमंडल भारत भेजा । ब्रिटिश संसदीय शिष्टमंडल ने अपनी रिपोर्ट में भारत में सत्ता को तुरन्त हस्तान्तरित किये जाने की अनुशंसा की । इस स्थिति में ब्रिटिश प्रधानमंत्री लार्ड एटली ने कैबिनेट मिशन भारत भेजा । कैबिनेट मिशन ने भारत के भावी स्वरूप को निश्चित करने वाली एक योजना 16 मई , 1946 को प्रस्तुत की । योजना के दो मुख्य भाग थे- अन्तरिम सरकार की स्थापना की.तात्कालिक योजना तथा संविधान निर्माण की दीर्घकालीन योजना । 6 अगस्त , 1946 को वायसराय ने कांग्रेस अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू को अन्तरिम सरकार के निर्माण में सहयोग के लिए अनुरोध किया । इस बीच लीग ने पाकिस्तान की माँग का दबाव बढ़ाने के लिए 16 अगस्त , 1946 को सीधी कार्रवाई का निश्चय किया । लीग और जिन्ना की हठधर्मिता के कारण देश भर में साम्प्रदायिक दंगे हुए । 2 सितम्बर , 1946 को जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में अन्तरिम सरकार ने शपथ ली । सरकार को सुचारू रूप से कार्य करते देख लीग ने सरकारी कार्यों में अवरोध डालने की नीयत से अन्तरिम सरकार का हिस्सा बनना स्वीकार किया । इससे वातावरण खराब हुआ । सरकार ने दोनों पक्षों में समझौता कराने के प्रयास किए , परन्तु लीग की दबाव – नीति के कारण समझौता नहीं हो सका । इन्हीं परिस्थितियों में 20 फरवरी , 1947 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री लार्ड एटली ने भारत छोड़ने की घोषणा की । 

 

भारत में राष्ट्रीय जागृति एवं राजनैतिक संगठनों की स्थापना दीर्घ उत्तरीय प्रश्न 

 

प्रश्न 1. भारत छोड़ो आन्दोलन का क्या अर्थ है एवं यह कब शुरू हुआ ? भारतीय स्वतन्त्रता के इतिहास में इसके महत्व को लिखिए ।

उत्तर- 1942 के वर्ष में देश के राजनीतिक मंच पर एक ऐसा ऐतिहासिक आन्दोलन आरम्भ हुआ , जिसे ‘ भारत छोड़ो आन्दोलन ‘ के नाम से जाना जाता है । यह यथार्थतः जन – आन्दोलन था । यह एक ऐसा अंतःप्रेरित और स्वेच्छामूलक सामूहिक आन्दोलन था , जिसका जन्म राष्ट्र की स्वाधीनता के लिए स्व – प्रेरणा के फलस्वरूप हुआ था । इस आन्दोलन के आरम्भ होने के मूल में अनेक कारण विद्यमान थे । भारत द्वितीय विश्वयुद्ध में भागीदार बनने का इच्छुक नहीं था , परन्तु इस युद्ध में उसे उसकी सहमति के बिना सम्मिलित किया गया था । युद्ध का साया पड़ने के साथ ही देश की आर्थिक स्थिति शोचनीय हो गयी थी । खाद्य स्थिति क्रमशः बिगड़ती जा रही थी । निर्वाह व्यय तीन गुना बढ़ गया था । मुनाफाखोरी और शोषण अनवरत जारी । इन परिस्थितियों में काँग्रेस ने एक असहयोगात्मक आन्दोलन पुनः आरम्भ करने का निश्चय किया । .8 अगस्त की रात्रि में भारत छोड़ो ‘ प्रस्ताव मुम्बई में बहुमत से पारित हुआ । गाँधीजी ने इस अवसर पर कहा कि ” प्रत्येक भारतवासी को चाहिए कि वह अपने आपको स्वाधीन मनुष्य समझे । उसे स्वाधीनता की यथार्थतापूर्ण प्राप्ति अथवा उसके हेतु किए गए प्रयत्न में मर मिटने को तत्पर रहना चाहिए । ” गाँधीजी ने कहा , ” पूर्ण स्वाधीनता से न्यून किसी भी बात से मैं सन्तुष्ट होने वाला नहीं हूँ । हम करेंगे या मरेंगे ।

 

 गांधीजी के आन्दोलन आरम्भ करने के पूर्व ही 9 अगस्त की रात्रि को सरकार ने महात्मा गाँधी , मौलाना आजाद , सरदार पटेल , जवाहर लाल नेहरु , सरोजिनी नायडू तथा कार्यकारिणी के अन्य सदस्यों को बन्दी बना कर पूना भेज दिया । शासन द्वारा उतावलेपन में की गयी उत्तेजक कार्रवाई से संघर्ष स्वयमेव आरम्भ हो गया । जनसमूह सड़कों पर आ गया । देशभर में हड़ताल , प्रदर्शन तथा सभाओं का आयोजन हुआ । बम्बई , अहमदाबाद , पूना , दिल्ली , कानपुर , इलाहाबाद , वाराणसी , जबलपुर , पटना , यहाँ तक कि प्रत्येक नगर , तहसील और ग्राम में जनता ने अपने आपको संगठित किया और संघर्ष आरम्भ किया । 

 

भारत छोड़ो आन्दोलन का महत्व- 

भारत छोड़ो आन्दोलन का महत्व यह रहा कि इसमें भारत की स्वतन्त्रता को राष्ट्रीय आन्दोलन की तात्कालिक माँग बना दिया । आन्दोलनकारियों ने परिवहन के साधनों को नष्ट – भ्रष्ट किया , पुलिस स्टेशनों पर आक्रमण किए , शासकीय अभिलेखों को विनष्ट किया तथा शासन के प्रत्येक कानून की अवज्ञा की । पुलिस की उत्तेजनात्मक दमन कार्रवाई के कारण आन्दोलन ने अहिंसा के सिद्धान्तों का अतिक्रमण भी किया । 

 

प्रश्न 2. क्रान्तिकारियों के बारे में आप क्या जानते हैं ? ब्रिटिश शासन के विरुद्ध उन्होंने कौन – से तरीके अपनाए ? 

उत्तर – ब्रिटिश सरकार की प्रतिक्रियावादी नीति के परिणामस्वरूप 19 वीं शताब्दी के अंतिम दशक में भारत में क्रांतिकारी राष्ट्रीयता का अभ्युदय हुआ । बंगाल विभाजन के बाद भारतीयों में क्रांतिकारी भावना का तेजी से प्रसार हुआ । क्रांतिकारी विचारधारा के अनुयायियों का विश्वास था कि अहिंसा और वैधानिक साधनों द्वारा राजनीतिक अधिकार प्राप्त नहीं किये जा सकते हैं । क्रांतिकारी मानते थे कि हिंसा और भय दिखाकर स्वराज व स्वशासन प्राप्त किया जा सकता है । वे मातृभूमि को तत्काल विदेशी बंधन से मुक्त कराना चाहते थे । 

 

अपने उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए क्रान्तिकारियों ने गुप्त समितियों का गठन किया , युवकों को सैनिक प्रशिक्षण दिया , अस्त्र – शस्त्र एकत्र किये तथा समाचार – पत्रों और अन्य माध्यमों से क्रांतिकारी विचारों का प्रसार किया । अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए क्रांतिकारियों ने बंगाल में अनुशीलन समितियों की स्थापना की । ये समितियाँ युवकों को भारतीय इतिहास और संस्कृति से अवगत कराती थीं तथा उनमें स्वतन्त्रता की भावना जगाती थीं । समितियाँ युवकों में त्याग और बलिदान की भावना उत्पन्न कर उन्हें मातृभूमि को विदेशी बंधनों से मुक्ति प्राप्त करने के लिए तैयार करती थीं । इस कार्य के लिए क्रांतिकारियों ने पिस्तौल , बंदूक और गोला बारूद का रास्ता चुना । 

 

प्रश्न 3. आजाद हिन्द फौज की स्थापना क्यों की गई थी ? भारत की स्वतन्त्रता के लिए उसके योगदान को लिखिए ।

उत्तर – द्वितीय विश्व युद्ध का लाभ लेकर देश को आजाद कराने की दृष्टि से सन् 19413 सुभाषचन्द्र बोस ब्रिटिश पुलिस को चकमा देकर देश से बाहर निकले और पेशावर , मास्को , बर्लिन होते हुए जापान पहुंचे । सुभाषचंद्र बोस को यह विश्वास था कि दक्षिण – पूर्वी एशिया में उनकी योजनाएँ पूर्ण रूप ले सकती हैं , अतः उन्होंने आजाद हिन्द फौज का गठन किया तथा उसके प्रधान बनने में सफल हुए । सुभाषचन्द्र बोस भारतीय स्वतन्त्रता लीग से भी जुड़े । इस कार्य में उन्हें प्रसिद्ध क्रांतिकारी रासबिहारी बोस का सहयोग प्राप्त हुआ । सन् 1943 में सुभाषचन्द्र बोस ने आजाद हिन्द फौज के सेनापति की हैसियत से स्वतन्त्र भारत की अस्थायी सरकार सिंगापुर में बनायी तथा देश की स्वतन्त्रता हेतु अपने खून की आखिरी बूंद भी बहा देने की शपथ ली । सुभाषचन्द्र बोस ने भारत – बर्मा सीमा पर युद्ध आरम्भ किया । फरवरी 1944 में आजाद हिन्द फौज ने अंग्रेजों पर आक्रमण कर.रामू , कोहिमा , पलेम , तिदिम आदि को अंग्रेजों से मुक्त कराया । अप्रैल , 1944 में आजाद हिन्द फौज ने इम्फाल को घेर लिया , परन्तु वर्षा के आधिक्य और रसद की कमी के कारण उन्हें लौटना पड़ा । मई 1944 से जर्मनी और जापान की स्थिति कमजोर होने लगी । आजाद हिन्द फौज अभाव और निराशा की मनःस्थिति में बिखरने लगी । यद्यपि सुभाषचन्द्र ने सेना में पुनः जोश भरने का प्रयास किया , तथापिवे असफल रहे । 

 

प्रश्न 4. मुस्लिम लीग के कार्यों में पाकिस्तान के निर्माण की पृष्ठभूमि कैसे तैयार की ? समझाइए । 

उत्तर- मुसलमानों का एक शिष्टमण्डल अक्टूबर 1906 में आगा खाँ के नेतृत्व में भारत के वायसराय लार्ड मिण्टो से मिला और एक स्मृति – पत्र प्रस्तुत कर कुछ माँगें रखीं । माँगों में मुसलमानों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र , विधान मण्डलों में मुसलमानों को अधिक स्थान , सरकारी नौकरियों और विश्वविद्यालयों की स्थापना में रियायतें और गवर्नर जनरल की परिषद में मुसलमान प्रतिनिधि की नियुक्ति का आग्रह था । अंततः लार्ड मिण्टो भारत में मुस्लिम साम्प्रदायिकता का जनक बना । अंग्रेजों के प्रश्रय से कट्टरवादी मुसलमानों ने 30 दिसम्बर , 1906 को अखिल भारतीय मुस्लिम लीग की स्थापना की । उन्होंने 1907 के लखनऊ अधिवेशन में लीग के संविधान को लागू किया । 

 

मुस्लिम लीग के प्रमुख उद्देश्य थे- 

( 1 ) भारतीय मुसलमानों में ब्रिटिश राज के प्रति भक्ति भावना उत्पन्न करना । 

( 2 ) ब्रिटिश शासन के समक्ष मुसलमानों के राजनीतिक अधिकारों और हितों की रक्षा के लिए माँग करना । 

( 3 ) लीग के उद्देश्यों को हानि पहुँचाये बिना मुसलमानों एवं अन्य जातियों में यथासम्भव मेल – जोल रखना । र मुस्लिम लीग के समर्थकों ने इन उद्देश्यों हेतु कार्य किये , जिससे पाकिस्तान – निर्माण की पृष्ठभूमि तैयार हुई ।

 

प्रश्न 5. किन परिस्थितियों में भारत का विभाजन किया गया ? कांग्रेस ने भारत विभाजन क्यों स्वीकार किया ? 

उत्तर- द्वितीय विश्वयुद्ध में भारतीयों का सहयोग प्राप्त करने की इच्छा , युद्ध के मोर्चों पर मित्र राष्ट्रों की स्थिति खराब होना तथा विश्व जनमत के दबाव के कारण ब्रिटिश सरकार ने क्रिप्स को भारत भेजा । क्रिप्स ने 22 मार्च , 1942 को भारत पहुँचकर सभी प्रमुख राजनीतिक दलों से विचार – विमर्श किया । भारत के वैधानिक गतिरोध को दूर करने के लिए क्रिप्स अपने साथ निश्चित प्रस्ताव लाया था । ये प्रस्ताव दो भागों में थे- युद्ध के समय लागू होने वाले तथा युद्ध के बाद लागू होने वाले प्रस्ताव । क्रिप्स के प्रस्ताव कांग्रेस को सन्तुष्ट नहीं कर सके , क्योंकि इसमें युद्ध के बाद औपनिवेशिक स्वराज्य देने की बात कही गयी थी , जबकि कांग्रेस की मांग पूर्ण स्वराज्य की थी । लीग इसलिए असन्तुष्ट थी , क्योंकि इसमें उनकी पाकिस्तान की मांग को स्पष्ट रूप से स्वीकार नहीं किया गया था । 

 

कांग्रेस एवं लीग के अतिरिक्त सिखों , हिन्दू महासभा , दलितों तथा अन्य ने भी प्रस्तावों से असहमति जताई । लार्ड बॉवेल अक्टूबर , 1943 में गवर्नर जनरल बनकर भारत आए । बावेल भारत के वैधानिक गतिरोध को हल करना चाहता था । बावेल ने जो योजना प्रस्तुत की , उस पर विचार करने के लिए 25 जून , 1945 को भारतीय नेताओं का एक सम्मेलन शिमला में बुलाया गया । सम्मेलन में तय हुआ कि केन्द्रीय मंत्रिमंडल मिला – जुला होगा तथा उसमें 14 मंत्री होंगे । इसमें 5 कांग्रेस , 5 लीग तथा 4 बायसराय द्वारा मनोनीत होंगे । वायसराय ने कांग्रेस तथा लीग को 8 से 12 नाम देने को कहा । कांग्रेस ने जो सूची वायसराय को भेजी , उसमें दो सदस्य मुसलमान थे । परन्तु जिन्ना चाहते थे कि मुसलमान प्रतिनिधि लीग के सदस्यों में से ही लिये जाएँ । इसका कारण यह था कि जिन्ना कांग्रेस को हिन्दू संस्था सिद्ध करके , लीग को भारतीय मुसलमानों की एकमात्र प्रतिनिधि संस्था होने का दावा करना चाहते थे । लीग के असहयोग के कारण शिमला सम्मेलन असफल हुआ । जिन्ना के हठ एवं दुराग्रह के समक्ष बावेल ने हथियार डाल दिये । 

 

माउण्टबेटन योजना और भारत का विभाजन –

23 मार्च , 1947 को लार्ड बावेल के स्थान पर लार्ड माउण्टबेटन नया गवर्नर जनरल बनकर भारत आया । ब्रिटिश सरकार ने उन्हें पूर्ण अधिकार देकर भारत भेजा था , जिससे वे कैबिनेट योजना के अनुसार गठित संविधान सभा के माध्यम से भारतीयों को शासन – सत्ता सौंप सकें । कांग्रेस के नेता विभाजन नहीं चाहते थे , परन्तु लीग विभाजन के अलावा और कोई बात करने को .. तैयार नहीं थी । अंततः साम्प्रदायिक पागलपन के ज्वार के समक्ष विवश होकर कांग्रेस को भारत विभाजन की सहमति देना पड़ी । अन्तरिम सरकार की अपंगता , साम्प्रदायिक हिंसा का ज्वार , मुस्लिम लीग की हठधर्मिता , कांग्रेस नेताओं की विवशता तथा ब्रिटिश कूटनीति के परिणामस्वरूप भारत का विभाजन हुआ । 

 

अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न 

 

प्रश्न 1. साइमन कमीशन क्या था ? समझाइए । 

उत्तर -1919 के भारत सरकार के अधिनियम के अनुसार अगले दस वर्षों में संवैधानिक परिवर्तनों के प्रश्न पर पुनर्विचार किया जाना था । नवम्बर 1927 में ब्रिटिश सरकार ने उपर्युक्त अधिनियम की सफलता पर विचार करने तथा आवश्यक परिवर्तनों के सुझाव देने के लिए साइमन कमीशन का गठन किया । इस कमीशन में एक भी भारतीय नहीं था , इस आयोग से जिन बातों पर विचार करने को कहा गया , उनसे भारतीय जनता को स्वराज पा सकने की जरा भी आशा नहीं हुई । फरवरी , 1928 में साइमन कमीशन भारत पहुँचा । एक देशव्यापी हड़ताल ने उसका स्वागत किया । केन्द्रीय विधानसभा के अधिकतर सदस्यों तक ने कमीशन का बहिष्कार किया । कमीशन के विरोध के लिए . पूरे देश में कमेटियां बनाई गई , ताकि जहाँ भी वह जाए , उसके खिलाफ प्रदर्शनों और हड़तालों का आयोजन किया जा सके । हड़तालियों का नारा था- ‘ साइमन , वापस जाओ ‘ अनेक जगहों पर पुलिस ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को पीटा । पंजाब में विरोध का नेतृत्व लाला लाजपत राय ने किया । अंग्रेजों के लाठीचार्ज के फलस्वरूप लाला लाजपत राय घायल हो गए और बाद में उनका देहांत हो गया । अंत में साइमन कमीशन वापस चला गया ।

 

प्रश्न 2. साइमन कमीशन कब और क्यों भेजा गया था ? इसका भारतीयों द्वारा विरोध क्यों किया गया ? 

उत्तर -1919 के भारत सरकार अधिनियम पर पुनर्विचार एवं समीक्षा करने के उद्देश्य से सन् 1927 में ब्रिटिश सरकार ने एक आयोग का गठन किया , जिसके अध्यक्ष साइमन थे । इस आयोग का एक भी सदस्य भारतीय न होने से भारत की जनता को स्वराज्य की मांग के पूरा होने की होने की कोई आशा नहीं थी । सन् 1927 के अधिवेशन में पूर्ण स्वराज्य की मांग के साथ साइमन कमीशन के बहिष्कार ( विरोध ) का फैसला लिया गया । फरवरी 1928 में साइमन कमीशन भारत पहुँचा । एक देश व्यापी हड़ताल से साइमन कमीशन का स्वागत किया गया इसके साथ ही यह कमीशन देश के जिन भागों में गया इसका भरपूर विरोध किया गया । 

 

प्रश्न 3. बंग – भंग और स्वदेशी आन्दोलन के प्रभावों का वर्णन कीजिए । 

उत्तर- बंग – भंग और स्वदेशी आन्दोलन के प्रभाव निम्नलिखित थे- 

( 1 ) बंग – भंग के कारण एकता की भावना का विकास हुआ । 

( 2 ) स्वदेशी के प्रति नागरिकों का सम्मान बढ़ा , जिससे मृतप्रायः हो चुके हाथकरघा , रेशम बुनाई आदि अन्य पारम्परिक दस्तकारी उद्योग में नवजीवन का संचार हुआ । 

( 3 ) बंग – भंग के कारण स्वावलम्बन की भावना का विकास हुआ । यह आन्दोलन स्वावलम्बन व आत्मनिर्भरता के साथ जुड़ा हुआ था । लोगों में यह भावना पैदा हुई कि अपनी प्रगति के लिए वे स्वयं आगे आएँ । आत्मनिर्भरता के लिए स्वदेशी उद्योग अस्तित्व में आए । 

( 4 ) शिक्षा के क्षेत्र में परिवर्तन आया । गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के शांतिनिकेतन की तरह ही बंगाल नेशनल कॉलेज की स्थापना हुई , जिसके प्राचार्य अरविंद घोष बने । इसी के साथ बहुत कम समय में ही अनेक राष्ट्रीय विद्यालयों की स्थापना भी हुई । देशी भाषा ( क्षेत्रीय भाषा ) में शिक्षा का पाठ्यक्रम तैयार हुआ । 

( 5 ) बंग – भंग के कारण सांस्कृतिक चेतना का विकास हुआ । इस समय रवीन्द्रनाथ टैगोर , रजनीकांत सेन , द्विजेन्द्र लाल राय , मुकुन्द दास , सैय्यद अबू मोहम्मद आदि के लिखे गीत क्रांतिकारियों और स्वतन्त्रता प्रेमियों में प्रेरणा स्रोत बने । बंग – भंग के बाद अंग्रेजों ने साम्प्रदायिक वैमनस्य फैलाने का काम किया , जिसमें बहुत हद तक वे सफल भी हुए । अंग्रेजों ने स्वदेशी आन्दोलन को कमजोर करने के लिए समय – समय पर मुस्लिम सम्प्रदाय को भड़काया । अंग्रेजों के इशारे पर ‘ इण्डियन मुस्लिम लीग ‘ का गठन हुआ । अंग्रेजों के इशारे पर ही ढाका के नवाब सलीमुल्लाह ने स्वदेशी आन्दोलन का विरोध किया । 

 

प्रश्न 4. भारतीय स्वतन्त्रता अधिनियम 1947 के प्रमुख प्रावधानों का वर्णन कीजिए ।

उत्तर- भारतीय स्वतन्त्रता अधिनियम 1947 में कुल 20 धाराएँ तथा दो परिशिष्ट थे । इसके प्रमुख प्रावधान इस प्रकार थे- 

( 1 ) भारत को दो अधिराज्यों- भारत और पाकिस्तान में बाँटना था । गवर्नर जनरल ने 15 अगस्त , 1947 को भारत का दायित्व भारतीय नेताओं को सौंपा जाना तय किया । 

( 2 ) अधिनियम के अनुसार प्रत्येक अधिराज्य में एक गवर्नर जनरल होगा , जिसकी नियुक्ति ब्रिटिश सम्राट करेंगे । 

( 3 ) दोनों अधिराज्यों की सीमाएँ निर्धारित की गयीं । इसके अतिरिक्त जनमत संग्रह के आधार पर बंगाल , पंजाब तथा असम के विभाजन तथा उनकी सीमाओं के निर्धारण के सम्बन्ध में बातें तय की गयीं । 

( 4 ) दोनों अधिराज्यों की संविधान सभाओं को अपना संविधान बनाने का अधिकार होगा । जब तक दोनों राज्य नया संविधान नहीं बना लेते हैं , तब तक 1935 के भारत शासन अधिनियम के द्वारा ही शासन होना था । 

( 5 ) भारत सचिव का पद समाप्त करके उसके स्थान पर राष्ट्रमण्डल सचिव की नियुक्ति का प्रावधान रखा गया । 

 

प्रश्न 5. असहयोग आन्दोलन पर एक निबन्ध लिखिए ।

उत्तर- कांग्रेस ने 1920 में गाँधीजी के नेतृत्व में असहयोग का नया कार्यक्रम अपनाया । जलियाँवाला बाग का हत्याकाण्ड , रोलेट एक्ट का विरोध , ब्रिटिश सरकार की वादा – खिलाफी का विरोध और स्वराज की प्राप्ति , ये असहयोग आन्दोलन के उद्देश्य थे । इन आन्दोलन को कई चरणों में चलाया जाना था । आरंभिक चरण में सरकार द्वारा दी गई उपाधियों को वापस लौटाना था । इसके बाद विधान मंडलों , अदालतों और शिक्षा संस्थानों का बहिष्कार करने तथा करों का अदायगी न करने का अभियान चलाया जाना था । यह तय किया गया कि असहयोग आन्दोलन को चलाने के लिए 1.5 लाख स्वयंसेवकों का एक दस्ता तैयार किया जाएगा । असहयोग आन्दोलन को अपार सफलता मिली । 

 

विधानमंडलों के चुनावों में लगभग दो तिहाई मतदाताओं ने मतदान नहीं किया । शिक्षा – संस्थाएँ खाली हो गई । राष्ट्रीय शिक्षा का एक नया कार्यक्रम आरम्भ किया गया । जामिया मिलिया और काशी विद्यापीठ जैसी संस्थाएँ इसी दौर में स्थापित हुई । अनेक भारतीयों ने सरकारी नौकरियाँ छोड़ दीं । विदेशी कपड़ों की होलियाँ जलाई गई । पूरे देश में हड़तालें हुई । मालाबार में मोपला विद्रोह छिड़ गया । हिन्दू और मुसलमान एक होकर इस आन्दोलन में शामिल हुए और पूरे देश में भाईचारे के उदाहरण देखे गए । सिक्खों ने गुरुद्वारों से सरकार समर्थक और महतों का कब्जा खत्म कराने के लिए आन्दोलन छेड़ा । हजारों लोगों ने स्वयं सेवकों में नाम लिखाया । आन्दोलन के दौरान ‘ प्रिंस ‘ ऑफ वेल्स ‘ भारत आया । जब वह 17 नवम्बर , 1921 को भारत पहुँचा , तो उसका स्वागत ‘ आम हड़तालों और प्रदर्शनों द्वारा किया गया । अनेक जगहों पर पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलाई । दमन जारी रहा और साल के खत्म होने तक गाँधीजी को छोड़कर , सभी बड़े नेता जेलों में बंद किए जा चुके थे । 

 

असहयोग आन्दोलन और ब्रिटिश सरकार का दमन , दोनों जब चरम सीमा पर थे उसी समय दिसम्बर 1921 में काँग्रेस का वार्षिक अधिवेशन अहमदाबाद में हुआ । इसके अध्यक्ष हकीम अजमल खाँ थे । कांग्रेस ने आन्दोलन को तब तक जारी रखने का फैसला किया , जब तक पंजाब और तुर्की के साथ हुए अन्यायों का प्रतिकार नहीं हो जाता और स्वराज प्राप्त नहीं होता । फरवरी के आरम्भ में गाँधीजी ने गुजरात के बारदोली जिले में कर न चुकाने का अभियान चलाने का फैसला किया । मगर उत्तरप्रदेश के चौरी – चोरा नामक स्थान पर 4 फरवरी , 1922 को जनता भड़क उठी और उसने एक पुलिस थाने को आग लगा दी , जिसमें 22 पुलिसकर्मी जलकर मर गए । गाँधीजी तक जब यह समाचार पहुंचा , तो उन्होंने इसे देवी चेतावनी की तरह ग्रहण किया और पूरे असहयोग आन्दोलन को रोकने का फैसला किया । 

 

प्रश्न 6. 1857 के संग्राम में मध्यप्रदेश क्षेत्र के सम्बन्धित प्रमुख सेनानियों के योगदान का वर्णन कीजिए । 

उत्तर -1857 के संग्राम में मध्यप्रदेश क्षेत्र से सम्बन्धित प्रमुख सेनानी व उनका योगदान निम्नलिखित हैं 

 

  1. वीरांगना रानी अवंतीबाई –

1857 के स्वतंत्रता संग्राम में मण्डला जिले के रामगढ़ की रानी अवंती बाई का योगदान भी महत्वपूर्ण था । रानी अवंतीबाई ने हड़प नीति ‘ के विरोध में अंग्रेजों से सीधे टक्कर ले ली । इस वीरांगना ने बड़ी बहादुरी के साथ अंग्रेजों का मुकाबला किया । अंग्रेजी सेना ने रानी अवंतीबाई को घेर लिया तो रानी अवंतीबाई ने स्वयं ही अपनी छाती में तलवार घोंप कर अपना बलिदान कर दिया । 

 

  1. राजा बख्तावर सिंह – 

अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह की चिंगारी प्रज्वलित होने में अमझेरा ( धार से लगभग 30 कि.मी. ) के राजा बख्तावर सिंह मालवा के पहले शासक थे , जिसने कम्पनी के शासन का अंत करने का बीड़ा उठाया था । अंग्रेजों की सेना को राजा ने कड़ी टक्कर दी , किन्तु अपने ही सहयोगियों द्वारा विश्वासघात के कारण बख्तावर सिंह गिरफ्तार किए गए । अंग्रेजों ने उन्हें इन्दौर में फाँसी पर चढ़ा दिया । 

 

  1. सआदत खाँ और भागीरथ सिलावट –

1857 के स्वतंत्रता संग्राम में इन्दौर के सआदत खाँ और भागीरथ सिलावट ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई । इन्होंने अंग्रेज सैनिक अधिकारियों का डटकर मुकाबला किया । अंग्रेजों द्वारा पकड़ लिये जाने पर इन्हें फांसी दे दी गई । इनका बलिदान उल्लेखनीय है । 

 

  1. राजा शंकर साह और रघुनाथ- 

1857 की क्रांति में जबलपुर की विशिष्ट भूमिका रही । रानी दुर्गावती के वंशज एवं गोंड राजघराने के वृद्ध राजा शंकरशाह व उनके युवा पुत्र रघुनाथ शाह का बलिदान अविस्मरणीय था । इन्हें बहादुर सैनिकों तथा ठाकुरों ने मिलकर अंग्रेजी सेना के विरुद्ध बगावत करने की योजना का नेता बनाया । दुर्भाग्यवश क्रियान्वयन के पूर्व ही योजना का भंडाफोड़ हो गया , फलस्वरूप अंग्रेजों ने उन दोनों को गिरफ्तार कर रेसीडेन्सी ( वर्तमान कमिश्नर कार्यालय ) ले गए । मुकदमा चलाने का नाटक करके भारी भीड़ के सामने 18 सितम्बर 1857 को पिता – पुत्र दोनों को तोप के मुंह पर बाँधकर उड़ा दिया गया । 

 

  1. दिमान देसपत बुन्देला – 

ये महाराजा छत्रसाल के वंशज थे । दिमान देसपत ने 1857-58 में अंग्रेजी फौज को कड़ी चुनौतियाँ दी , उन्होंने तात्या टोपे की मदद के लिए एक हजार बंदूकची भी भेजे थे । देसपत ने अपने बल से शाहगढ़ रियासत के फतेहपुर के इलाके पर भी कब्जा कर लिया था । देसपत की शक्ति इतनी बढ़ी हुई थी कि ब्रिटिश सरकार ने उन्हें पकड़ने के लिए 5,000 रु . का इनाम घोषित कर रखा था । लम्बे संघर्ष के बाद सन् 1862 में नौगाँव के कुल दूर पर वीर देसपत बुंदेला मारे गए ।

 

  1. महादेव शास्त्री – 

ग्वालियर के महादेव शास्त्री एक प्रखर राष्ट्रभक्त थे , जिन्होंने शस्त्र तो नहीं उठाए , लेकिन नाना साहब पेशवा को दिए गए सहयोग के कारण उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया गया । महादेव शास्त्री ने ग्वालियर में तात्या टोपे के पक्ष में वातावरण तैयार किया । नाना साहब पेशवा का पत्रवाहक बनकर क्रांति की जानकारी अन्य सेनानियों तक पहुँचाई । अंग्रेज सरकार ने महादेव शास्त्री की गतिविधियों को देखते हुए उन्हें गिरफ्तार कर फांसी दे दी । अमीरचन्द वाढिया को भी फांसी दे दी गई । 

 

प्रश्न 7. खिलाफत आंदोलन क्या था ? 

उत्तर- खिलाफत आंदोलन असहयोग आंदोलन की एक महत्वपूर्ण घटना थी । इस आंदोलन का प्रारंभ प्रथम विश्वयुद्ध के बाद हुआ । खिलाफत आंदोलन का मुख्य उद्देश्य इस्लाम के खलीफा सुल्तान को फिर से शौकत अली ने खिलाफत आंदोलन प्रारम्भ किया । खिलाफत आंदोलन में कांग्रेस के नेता भी सम्मिलित हुए और आंदोलन को पूरे भारत में फैलाने में उन्होंने सहायता दी । किन्तु टर्की में इस आंदोलन के समाप्त होते ही भारत के मुसलमानों ने भी इसे समाप्त कर दिया । 

 

प्रश्न 8. भारतीय विदेश नीति की प्रमुख विशेषताएँ बताइए । 

उत्तर – भारत की विदेश नीति की प्रमुख विशेषताएँ- 

( 1 ) भारत विश्व राजनीति में असंलग्नता की नीति का अवलम्बन करता है । 

( 2 ) भारत की नीति शांतिपूर्ण सह अस्तित्व के सिद्धान्त में विश्वास करते हुए विश्व शांति बनाये रखने के लिए हर संभव सहयोग देने की नीति का पालन किया है । 

( 3 ) भारत साम्राज्यीय एवं प्रजातीय विभेद का विरोध करता है और पिछड़े राष्ट्रों की सहायता करने को तत्पर रहते हैं । 

( 4 ) भारत संयुक्त राष्ट्र संघ एवं उससे संबंधित अन्य संस्थाओं का समर्थन करता है तथा उनका सहयोग करता है । 

 

प्रश्न 9. भारत – बांग्लादेश सम्बन्धों का वर्णन कीजिए । 

उत्तर – निम्नांकित बिन्दुओं के आधार पर भारत और बांग्लादेश के सम्बन्धों को स्पष्ट किया गया है । 

 

  1. स्वतंत्र बांग्लादेश की घोषणा- 

26 मार्च , 1971 को शेख मुजीब के नेतृत्व में स्वतंत्र बांग्लादेश की घोषणा गुप्त रेडियो से की गई । इसके साथ ही पश्चिमी पाकिस्तान का दमनचक्र शुरु हुआ । अंततः 17 अप्रैल , 1971 को बांग्लादेश में स्वतंत्र प्रभुसत्ता सम्पन्न गणतंत्र की घोषणा की गई और विश्व की सरकारों से मान्यता प्रदान करने का आग्रह किया । मुक्ति संघर्ष के दौरान लगभग एक करोड़ बांग्लादेशी शरणार्थी भारत में आ गये थे । इसका सीधा प्रभाव भारत की सुरक्षा व एकता – अखण्डता पर भी पड़ रहा था । बांग्लादेश की समस्या के समाधान के लिए भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने कई पश्चिमी राष्ट्रों की यात्रा की किन्तु उन्हें पूर्णतः सफलता नहीं मिली । अंततः 3 दिसम्बर 1971 को भारत पाकिस्तान के मध्य युद्ध शुरू हो गया । 

 

  1. बांग्लादेश को मान्यता- 

बांग्लादेश के तत्कालीन विदेश मंत्री के अनुरोध पर भारत ने 6 दिसम्बर , 1971 को ही बांग्लादेश ने हुसैन अली को भारत में अपना प्रथम राजदूत नियुक्त कर दिया । 

 

  1. भारत – बांग्लादेश की प्रथम सन्धि- 

10 दिसम्बर , 1971 को भारत के साथ बांग्लादेश की प्रथम सन्धि हुई । इस सन्धि में भारत सैनिक और आर्थिक आधार पर स्वतंत्र बांग्लादेश के पुनर्निर्माण के लिए तैयार हुआ । सन् 1971 के युद्ध में पाकिस्तान के पराजित होते ही बांग्लादेश की सरकार ढाका में स्थापित हो गई । अंतर्राष्ट्रीय जनमत के समक्ष घुटने टेकते हुए पाकिस्तान को 8 जनवरी , 1971 को आवामी लीग नेता शेख मुजीबुर्रहमान को रिहा करने पर बाध्य होना पड़ा । रिहाई के बाद शेख ने भारत के प्रति अपना आभार व्यक्त किया । 

 

4.भारत – बांग्लादेश की द्वितीय सन्धि- 

बांग्लादेश को एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में स्थापित करने के उद्देश्य से भारत बांग्लादेश की द्वितीय सन्धि हुई भारत और भूटान के बाद एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में बांग्लादेश को पूर्वी जर्मनी , नेपाल , बर्मा आदि देशों ने भी मान्यता दे दी । जनवरी 1972 में काहिरा में अफेशियाई देशों का एकता सम्मेलन हुआ । जिसमें बांग्लादेश को स्थायी सदस्य बनवाने में भारत ने अपना बड़प्पन दिखाया । भारत ने बांग्लादेश के साथ व्यापार और सांस्कृतिक समझौते भी किये 1 9 अगस्त 1972 को भारत ने बांग्लादेश को संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्य राष्ट्रों के रूप में मान्यता दिये जाने को समर्थन किया परन्तु चीन द्वारा वीटों पावर से इस कार्य में भारत को सफलता नहीं मिली ।

 

प्रश्न 10. भारत छोड़ो आन्दोलन की असफलता के कारणों को स्पष्ट कीजिए । 

उत्तर – भारत छोड़ो आन्दोलन की असफलता का कारण यह है कि इस आन्दोलन में अधिकांश बड़े नेता बंदीगृह में थे । दूसरी बात यह है कि 10 फरवरी , 1943 को गांधीजी ने तीन सप्ताह का उपवास आरम्भ किया । गांधीजी की स्थिति चिन्ताजनक हो गई थी परन्तु अपने आत्मबल के सहारे उन्होंने उपवास पूर्ण किया । जब वे बंदीगृह में थे , तो उसी समय 23 फरवरी , 1944 को उनकी पत्नी कस्तूरबा गांधी की मृत्यु हो गई । इसके बाद आन्दोलन में धीरे – धीरे शिथिललता आने लगी । 6 मई , 1944 को सरकार ने बीमारी के आधार पर गांधीजी को रिहा कर दिया । भारत छोड़ो आन्दोलन कांग्रेस द्वारा प्रवर्तित आंदोलन था । इस आन्दोलन का मुस्लिम लीग , साम्यवादी दल , हिन्दू महासभा ने समर्थन नहीं किया । यद्यपि अन्य राजनीतिक दलों ने भी भाग नहीं लिया । 1942 का भारत छोड़ो आन्दोलन स्वाधीनता का घोषित लक्ष्य प्राप्त करने में असफल रहा । 

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