MP Board Class 10th Special Hindi गद्य की विविध विधाए

MP Board Class 10th Special Hindi गद्य की विविध विधाएँ

भावों एवं विचारों की स्वाभाविक एवं सरल अभिव्यक्ति गद्य के द्वारा ही होती है। इसी कारण सामाजिक, साहित्यिक तथा वैज्ञानिक आदि समस्त विषयों के लिखने का माध्यम प्रायः गद्य है।

In this article, we will share MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutioni गद्य की विविध विधाएँ Pdf, These solutions are solved subject experts from the latest edition books.

 

एकांकी किसे कहते है ? 

यह गद्य की प्रमुख विधा है । विद्वानों के मत में इसकी परिभाषा अवलोकनीय है । परिभाषा – डॉ . नगेन्द्र के अनुसार , ” एकांकी में हमें जीवन का क्रमबद्ध विवेचन मिलकर उसके एक पहलू , एक महत्त्वपूर्ण घटना , एक विशेष परिस्थिति अथवा एक उद्दीप्त क्षण का चित्रण मिलेगा । अतः उसके लिए एकता अनिवार्य है । ” एकांकी नाटक का एक प्रकार है । एकांकी और नाटक में वही अन्तर है जो कहानी और उपन्यास में होता है । एकांकी में जीवन का खण्ड – दृश्य अंकित किया जाता है जो अपने में पूर्ण होता है । एकांकीकार अपनी रचना द्वारा एक ही उद्देश्य को व्यक्त करता है । विचार की अभिव्यक्ति , कथावस्तु , पात्र , संवाद आदि के माध्यम से होती है और एक विशेष उद्देश्य की अभिव्यक्ति करते हुए केवल एक ही प्रभाव की सृष्टि की जाती है ।

एकांकी के तत्त्व एकांकी के छः तत्त्व होते हैं 

(1) कथावस्तु

(2) पात्र 

(3) संवाद

(4) वातावरण 

(5) भाषा – शैली

(6) अभिनेयता

 

कथावस्तु क्या है ?

कथा और कथावस्तु में अन्तर होता है । केवल क्रमबद्ध कथा लिखने से उद्देश्य की पूर्ति नहीं हो सकती । लेखक के मन में सर्वप्रथम कोई भाव आता है जिससे कथा बनती है । कभी – कभी किसी कथा से ही भाव स्फूर्त होता है । एकांकीकार कथा के क्रम में आवश्यक परिवर्तन करता है , एक घटना को दूसरी घटना या क्रिया से जोड़ता है , अन्तर्द्वन्द्व की सृष्टि करता है , किसी पात्र का चमत्कारपूर्ण ढंग से प्रवेश कराता है । नयी – नयी नाटकीय परिस्थितियों की योजना करता है । यही रचनात्मक तन्त्र कथावस्तु है । एकांकी की कथावस्तु को तीन भागों में विभाजित किया जाता है 

(1) प्रारम्भ

(2) विकास 

(3) चर्मोत्कर्ष ।

 

आलोचना किसे कहते है ?

आलोचना भी गद्य की एक सशक्त विधा है । इसे समालोचना , समीक्षा , विवेचना , मीमांसा और अनुशीलन भी कहा जाता है । समालोचना में किसी विषय के गम्भीर अध्ययनपूर्ण विवेचना का भाव होता है । आलोचना सामान्य विवेचन का ही संकेत करती है । अत : हम कह सकते हैं । किसी विषय की पूर्ण जानकारी प्राप्त कर उस पर विचार – विमर्श करना , उसको स्पष्ट करना , उसके गुण – दोषों की विवेचना कर उन पर अपना मंतव्य प्रकट करना आलोचना कहलाती है । आलोचना साहित्य की किसी भी विधा की , की जा सकती है । आलोचना के प्रकार – आलोचना के दो भेद किये जाते हैं

(1) सैद्धान्तिक (2) प्रयोगात्मक । 

 

सैद्धान्तिक समीक्षा में अनेक सिद्धान्तों पर प्रकाश डाला जाता है । प्रयोगात्मक समीक्षा पश्चिम की देन है । रचनाओं की पूर्ण विवेचना के साथ ही साहित्य सम्बन्धी धारणाओं के निर्माण का प्रयास पाश्चात्य साहित्य में ही अधिक दिखाई देता है । हिन्दी में भी यह प्रभाव अब स्पष्टत : दिखाई देने लगा है । 

 

पत्र किसे कहते है ?

पत्र साहित्य भी गद्य की एक सशक्त विधा है । उर्दू में ‘गुबारे खातिर’ (आजाद का पत्र संग्रह) और रूसी भाषा में ‘ टालस्टॉय की डायरी ‘ स्थायी साहित्य की निधि हैं । पत्र के द्वारा आत्म – प्रदर्शन , विचारों की अभिव्यक्ति को अच्छी दिशा प्राप्त होती है । हिन्दी में द्विवेदी पत्रावली , द्विवेदी युग के साहित्यकारों के पत्र , पिता के पत्र पुत्री के नाम आदि रचनाएँ उल्लेखनीय हैं । इस विधा के प्रवर्तन में बैजनाथ सिंह , विनोद , बनारसीदास चतुर्वेदी , जवाहरलाल नेहरू आदि का योगदान महत्त्वपूर्ण है ।

 

रिपोर्ताज किसे कहते है ?

यह गद्य की एक नई विधा है । द्वितीय महायुद्ध के समय इस विधा का प्रचलन हुआ । रिपोर्ताज शब्द का विकास रिपोर्ट शब्द से स्वीकारा गया है । रिपोर्ट का आशय है घटना का यथार्थ अंकन । युद्ध की विभीषिका का अनुभव कराने के लिए युद्ध का जो आँखों देखा हाल लिखा जाता था उसे रिपोर्ताज नाम दिया गया । इसमें घटना , दृश्य या वस्तु का चित्रण होता है । उसकी भाषा अत्यन्त ही सजीव और रोचक होती है । आँखों देखी कानों सुनी घटनाओं पर ही रिपोर्ताज लिखी जाती है । इस विधा का शुभारम्भ शिवदान सिंह चौहान की लक्ष्मीपुरा से हुआ । साहित्य के इस क्षेत्र में रांगेय राघव , वेद राही , प्रभाकर माचवे , कन्हैयालाल मिश्र ‘ प्रभाकर ‘ , अमृतराय , उपेन्द्रनाथ अश्क आदि का महत्त्वपूर्ण स्थान है । 

 

रेखाचित्र किसे कहते है ?

इसे अंग्रेजी में स्कैच कहा जाता है । चित्रकार जिस प्रकार अपनी तूलिका से चित्र बनाता है उसी प्रकार लेखक अपने शब्दों के रंगों के द्वारा ऐसे चित्र उपस्थित करता है जिससे वर्णन योग्य वस्तु की आकृति का चित्र हमारी आँखों के सामने घूमने लगे । चित्रकार की सफलता उसके रेखांकन तथा रंगों के तालमेल पर निर्भर करती है , जबकि रेखाचित्र के लेखक की उसके शब्दों को गूंथने की कला पर । रेखाचित्र का लेखक अपने शब्दों से ऐसा चित्र बनाता है जो हमारे मानस पटल पर उभरकर मूर्त रूप धारण कर लेता है । इस विधा के प्रमुख लेखक हैं श्रीराम शर्मा, बनारसीदास चतुर्वेदी, रामवृक्ष बेनीपुरी, कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ , निराला तथा महादेवी वर्मा ।

 

संस्मरण क्या है ?

संस्मरण आत्मकथा के ही क्षेत्र से निकली हुई विधा है, किन्तु आत्मकथा और संस्मरण में गहरा अन्तर होता है । आत्मकथा का प्रमुख पात्र लेखक स्वयं होता है, किन्तु संस्मरण के अन्तर्गत लेखक जो कुछ देखता है, अनुभव करता है, उसे भावात्मक प्रणाली के द्वारा प्रकट करता है । ऐसे लेखन में सम्पूर्ण जीवन का चित्र न होकर किसी एक या एकाधिकार घटनाओं का रोचक वर्णन रहता है । स्मृति पटल पर आने वाले का अंकन करते हुए वह खुद ही अंकित हो जाता है । संस्मरण का क्षेत्र अन्तर्जगत न होकर बहिर्जगत का होता है । संस्मरण लेखकों में पद्मसिंह शर्मा कमलेश ‘ , महादेवी वर्मा, बनारसीदास चतुर्वेदी, रामवृक्ष बेनीपुरी तथा शान्तिप्रिय द्विवेदी, देवेन्द्र सत्यार्थी आदि प्रमुख हैं । हिन्दी में आदर्श संस्मरण की रचना छायावादोत्तर युग में हुई ।

 

जीवनी या आत्मकथा किसे कहते है ?

जीवन चरित्र और आत्मकथा के रूप परस्पर भिन्न होते हैं । आत्मकथा स्वयं लिखी जाती है , जीवनी कोई दूसरा लिखता है । हिन्दी में जीवन चरित्र के लेखक अनेक हैं । आत्मकथाओं में गाँधीजी के ‘ सत्य के प्रयोग ‘ , नेहरूजी की ‘ मेरी कहानी ‘ तथा राजेन्द्र प्रसाद बाबू की ‘ आत्मकथा ‘ प्रसिद्ध हैं । 

 

डायरी क्या है ?

अपने जीवन के दैनिक प्रसंगों को या किसी प्रसंग विशेष को डायरी के रूप में लिखा जाता है । इनमें जीवन की यथार्थ घटनाओं का वर्णन संक्षेप में रहता है । व्यंजना , व्यंग्य और वर्णन डायरी की विशेषताएँ हैं । नित्यप्रति के जीवन की कुछ विशिष्ट घटनाओं के सुख – दुःखात्मक रूपों की मार्मिक स्थितियों को लेखक अपनी प्रतिक्रिया के साथ कलात्मक ढंग से प्रस्तुत करता है तो डायरी साहित्य की रचना होती है । इसमें तिथि , स्थान आदि का सत्य उल्लेख होता है । इसका आकार लघु अथवा विशद दोनों प्रकार का हो सकता है । धीरेन्द्र वर्मा , प्रभाकर माचवे , घनश्याम दास बिड़ला , सुन्दरलाल त्रिपाठी हिन्दी के श्रेष्ठ डायरी लेखक हैं । 

 

इण्टरव्यू ( साक्षात्कार ) किसे कहते है ? 

इण्टरव्यू वह रचना है जिसमें लेखक किसी व्यक्ति विशेष से साक्षात्कार करके उसके सम्बन्ध में कतिपय जानकारियों को तथा उसके सम्बन्ध में अपनी क्रिया – प्रतिक्रियाओं को अपनी पूर्व धारणाओं , आस्थाओं और रुचियों से रंजित कर सरस एवं भावपूर्ण शैली में व्यक्त करता है । यह एक प्रकार से संस्मरण का ही रूप है । 

 

उपन्यास किसे कहते है ?

उपन्यास में कल्पना का पूरा संयम और व्यायाम रहता है । उपन्यासकार विश्वामित्र की सी सृष्टि बनाता है , किन्तु ब्रह्मा की सृष्टि के नियमों में भी बँधा रहता है । उपन्यास में सुख – दु : ख , प्रेम , ईर्ष्या – द्वेष , आशा , अभिलाषा , महत्त्वाकांक्षा , चरित्रों के उत्थान – पतन आदि जीवन के सभी दृश्यों का समावेश रहता है । उपन्यास में नाटक की अपेक्षा अधिक स्वतन्त्रता है , किन्तु नाटक के मूर्त साधनों के अभाव में उपन्यासकार इस कमी को शब्दचित्रों द्वारा पूरा करता है । 

 

उपन्यासकार को जीवन सजीव चित्र अंकित करना पड़ता है । उपन्यास एक प्रकार का जेबी थियेटर बन जाता है । उसके लिए घर से बाहर जाने की आवश्यकता नहीं । घर , वन , उपवन सब कहीं उसका आनन्द लिया जा सकता है किन्तु इस आनन्द दान के लिए उपन्यासकार को शुद्ध चित्रों का सहारा लेना पड़ता है । डॉ . श्यामसुन्दर दास ने उपन्यास को मानव के वास्तविक जीवन की काल्पनिक कथा कहा है । उपन्यास जीवन का चित्र है , प्रतिबिम्ब नहीं । प्रतिबिम्ब कभी – कभी पूरा नहीं होता । उपन्यासकार जीवन के निकट – से – निकट आता है , किन्तु उसे जीवन में से बहुत कुछ छोड़ना पड़ता है और अपनी तरफ से जोड़ना भी पड़ता है । उपन्यास में व्यक्ति की अधिक प्रधानता होती है । वह सत्य का आदर करता हुआ भी अपने आदर्शों की पूर्ति करने तथा कथा को अधिक रोचक तथा प्रभावशाली बनाने के लिए कल्पना से काम लेता है । उसमें सत्य को सुन्दर और रोचक रूप में देखने की प्रवृत्ति रहती है । उपन्यास एक ओर इतिहास या जीवनी की तरह वास्तविकता का अनुकरण करता है । दूसरी ओर उसमें काव्य का कल्पना का – सा पुट , भावों का परिपोषण और शैली का सौन्दर्य रहता है । एक ओर उसमें दार्शनिक – सी जीवन मीमांसा और तथ्य उद्घाटन की प्रवृत्ति रहती है तो दूसरी ओर समाचार – पत्रों की – सी कौतूहल वृत्ति और वाचालता भी रहती है । 

उपन्यास के तत्त्व 

 

कथावस्तु , पात्र और चरित्र – चित्रण , कथोपकथन , वातावरण , विचार और उद्देश्य , रस और भाव तथा शैली । 

(1) कथानक – यह उपन्यास का मूल तत्व है । कथानक कार्यकारण श्रृंखला में बँधा हुआ होना चाहिए । उसका उचित विन्यास हो ताकि वह पाठकों की रुचि के अनुकूल हो सके । अच्छे कथानक में मौलिकता , कौशल , सम्भवता , सुसंगठितता और रोचकता की आवश्यकता है ।

(2) पात्र और चरित्र – चित्रण – उपन्यास का विषय मनुष्य है । अत : चरित्र – चित्रण उपन्यास का महत्त्वपूर्ण तत्त्व है । चरित्र के द्वारा मनुष्य के व्यक्तित्व को प्रकाश में लाया जाता है । यह व्यक्तित्व दो प्रकार का होता है – बाहरी और आन्तरिक । बाहरी व्यक्तित्व में मनुष्य का आकार – प्रकार , वेश – भूषा , आचार – विचार , रहन – सहन , चाल – ढाल , बातचीत के विशेष ढंग और कार्यकलाप आ जाते हैं । आन्तरिक व्यक्तित्व में बाहरी परिस्थितियों के प्रति संवेदनशीलता , उसके राग – विराग , महत्त्वाकांक्षाएँ , अन्धविश्वास , पक्षपात , मानसिक संघर्ष , दया , करुणा , उदारता आदि मानवीय गुण तथा नृशंसता , क्रूरता , अनुदारता आदि सभी दुर्गुणों का चित्रण रहता है । 

(3) विचार और उद्देश्य – उपन्यास कहानी मात्र नहीं है , उसमें पात्रों के भाव और विचार भी रहते हैं । पात्रों के विचार लेखक के विचारों की प्रतिध्वनि होते हैं । लेखक का जीवन के प्रति एक विशेष दृष्टिकोण होता है । उसी दृष्टिकोण से वह जीवन की व्याख्या करता है । उसमें जीवन तथ्य सूक्ति रूप में विखरे रह सकते हैं , किन्तु उपन्यासकार को उपदेशक नहीं बन जाना चाहिए । उपन्यासकार के विचार , परोक्ष रूप से व्यंजित होने चाहिए जिससे उपन्यास की स्वाभाविकता में किसी प्रकार की बाधा न पड़े । 

(4) भाव या रस – हमारे विचार जीवन के प्रति रागात्मक या विरागात्मक दृष्टिकोण के ही फल – फूल होते हैं । उपन्यासों में भी महाकाव्य का – सा शृंगार , वीर , हास्य , करुण रस का समावेश होना चाहिए । 

(5) शैली – उपन्यास की शैली का प्रमुख गुण है प्रसाद , ओज और माधुर्य का भी विषयानुकूल समावेश उसमें होना चाहिए । भाषा मुहावरेदार हो । उपमा , रूपक , उत्प्रेक्षा आदि का चमत्कार शैली को उचित मात्रा में आकर्षक बनाता है ।

 

नाटक किसे कहते है ?

नाटक के मुख्य तत्त्व हैं – कथावस्तु , नायक और रस । वैसे तो नाटक के भी वे ही तत्व होते हैं जो कहानी , उपन्यास आदि के होते हैं , किन्तु नाटकों में रस की प्रधानता होती है । नाटक काव्य की वह विधा है जिसमें लोक – परलोक की घटित – अपघटित घटनाओं का दृश्य दिखाने का आयोजन किया जाता है । इस कार्य के लिए अभिनय की सहायता ली जाती है । शास्त्रीय परिभाषा में नाटक को रूपक कहा जाता है । सफल नाटक का रूप और आकार , दृश्यों और अंकों का उपयुक्त विभाजन , रस का साधारणीकरण , क्रिया व्यापार , प्रवेग तथा प्रवाह , अनुभावों और सात्विक भावों का निदर्शन , संवादों की कसावट , नृत्य और गीत , भाव , भाषा और साहित्यिक अलंकरण , वर्जित दृश्यों का अप्रदर्शन , सुरुचिपूर्ण प्रदर्शन , आलेखन , अलंकरण तथा परिधान और प्रकाश की व्यवस्था आवश्यक होती है । 

 

लोक साहित्य किसे कहते है ?

लोक साहित्य अंचल विशेष में रचा गया साहित्य है । यह अंचल विशेष वह भूखंड होता है , जो एक सांस्कृतिक इकाई के रूप में विकसित होकर , अपनी बोली और जीवन – पद्धति को अपनी लोकपरक चेतना में ढालता है । इस साहित्य में प्रकृति सम्बन्धी उक्तियों की अधिकता है । – इसके अन्तर्गत लोकगीत , लोककथाओं , लोकोक्तियों और कहावतों को शामिल किया जा सकता है । लोक साहित्य हमारी परम्पराओं और मूल्यवान धरोहरों को अपनी विषय वस्तु में समेटे है ।

 

परीक्षाउपयोगी लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1. 

निबन्ध किसे कहते हैं ? बाबू गुलाबराय के अनुसार निबन्ध की परिभाषा लिखिए ।

अथवा 

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने निबन्ध की क्या परिभाषा दी है ? उल्लेख कीजिए तथा निबन्ध के प्रमुख भेद बताइए । 

अथवा 

निबन्ध के कितने भेद होते हैं ? नाम लिखिए ।

अथवा 

निबन्ध के प्रमुख भेद कौन – से हैं ? नाम सहित लिखें । 

भावात्मक निबन्ध किसे कहते हैं ? उदाहरणस्वरूप एक भावात्मक निबंध का नाम लेखक के नाम सहित लिखिए । 

उत्तर – 

निबन्ध हिन्दी साहित्य की एक महत्त्वपूर्ण विधा है । अंग्रेजी में निबन्ध को ऐसे ‘ ( Essay ) कहते हैं । निबन्ध का अर्थ है- ” विधिवत् कसा हुआ अथवा बँधा हुआ । ” परिभाषा – बाबू गुलाबराय के अनुसार , ” निबन्ध गद्य रचना को कहते हैं जिसमें एक सीमित आकार के भीतर किसी विषय का वर्णन या प्रतिपादन एक विशेष निजीपन , स्वच्छन्दता , सौष्ठव और सजीवता व आवश्यक संगति और सम्बद्धता के साथ किया गया हो । ” परिभाषा – आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार , ” यदि गद्य कवियों या लेखकों की कसौटी है , तो निबन्ध गद्य की कसौटी है । ” निबन्ध के भेद – निबन्ध – लेखक के व्यक्तित्व के अनुसार निबन्ध रचना के अनेक प्रकार हो सकते हैं । सुविधा की दृष्टि से मोटे तौर पर इसे चार भागों में विभाजित किया जा सकता है 

(1) वर्णनात्मक – यह निबन्ध का प्रमुख प्रकार है । निबन्ध किसी दर्शनीय स्थल , मैले , तीर्थस्थान तथा प्राकृतिक दृश्य से सम्बन्धित होते हैं । इनमें भाषा में सरसता , सजीवता तथा चित्रात्मकता होती है । 

(2) विवरणात्मक निबन्ध – इन निबन्धों में यात्रा , युद्ध घटनाओं , आत्मकथा अथवा काल्पनिक घटनाक्रम का विवरण दिया जाता है । मन की माँग में भी ये निबन्ध लिखे जाते हैं । 

(3) विचारात्मक निबन्ध – इस निबन्ध में किसी विषय पर सुव्यवस्थित प्रस्तुति होती है । इनमें तर्क , चिन्तन की प्रधानता होती है । बुद्धि तत्व भी प्रदान होता है । शुक्ल जी का कविता क्या है ‘ इसी प्रकार का निबन्ध है । 

(4) भावात्मक निबन्ध – ये निबन्ध भाव , काव्यतत्व , कल्पनाप्रधान होते हैं । कभी – कभी लेखक इतना भावुक हो जाता है कि वह मूल विषय से भी भटक जाता है । सरदार पूर्णसिंह का ” सच्ची वीरता ‘ श्रेष्ठ भावात्मक निबन्ध है । 

प्रश्न 2. 

निबन्ध का स्वरूप स्पष्ट करते हुए हिन्दी निबन्ध के विकास पर संक्षिप्त प्रकाश डालिए ।

उत्तर – 

स्वरूप – किसी विषय को व्यवस्थित ढंग से क्रमबद्ध रूप में सुगठित भाषा में प्रस्तुत करने वाली गद्य रचना निबन्ध कहलाती है । निबन्ध किसी भी विषय पर लिखा जा सकता इसमें लेखक का व्यक्तित्व प्रतिबिम्बित होता है । आचार्य रामचन्द्र शुक्ल मानते हैं कि ” यदि गद्य काव्य की कसौटी है तो निबन्ध गद्य की कसौटी है । ” विकाश – हिन्दी निबन्ध का विकास आधुनिक काल में इस प्रकार हुआ है 

(1) भारतेन्दु युग – भारतेन्दु युग से ही हिन्दी निबन्ध लेखन प्रारम्भ हुआ । इस युग में धर्म , समाज , राजनीति , शिक्षा , प्रकृति आदि सभी विषयों पर निबन्ध लिखे गये । बालकृष्ण भट प्रतापनारायण मिश्र , बालमुकुंद गुप्त आदि श्रेष्ठ निबन्धकार हुए । 

(2) द्विवेदी युग – द्विवेदी युग में विषय तथा भाषा के परिमार्जन का उल्लेखनीय कार्य हुआ । महावीर प्रसाद द्विवेदी ने ‘ सरस्वती ‘ पत्रिका के द्वारा लेखकों का मार्गदर्शन किया । श्यामसुन्दर दास , सरदार पूर्णसिंह , माधव प्रसाद मिश्र आदि इस युग के प्रमुख निबन्धकार हैं । 

(3) शुक्ल युग – आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने हिन्दी निबन्ध को चरम उत्कर्ष पर पहुँचाने का सराहनीय कार्य किया । विषय तथा भाषा – शैली की प्रौढ़ता उस युग के निबन्धों में देखी जा सकती है । बाबू गुलाब राय , वियोगी हरि , वासुदेव शरण अग्रवाल आदि इस युग के निबन्धकार 

(4) शुक्लोत्तर युग – इस युग में इस विधा को व्यापक रूप प्राप्त हुआ है । मनोविज्ञान , विज्ञान , राजनीति , समीक्षा आदि विषयों पर निबन्ध लिखे गये हैं । हजारी प्रसाद द्विवेदी , रामविलास शर्मा , विद्यानिवास मिश्र आदि इस युग के प्रमुख निबन्धकार हैं । 

प्रश्न 3. 

भारतेन्दु युग के निबन्ध की किन्हीं चार विशेषताओं का उल्लेख कीजिए । 

उत्तर- 

(1) निबन्धों के कलेवर में पत्रकारिता का पुट समाविष्ट है । 

(2) सड़ी – गली मान्यताओं एवं रूढ़ियों का प्रबल विरोध है । 

(3) शैली सरस , हदयस्पर्शी एवं मनभावन है । बिना 

(4) निबन्धकार अंधानुकरण के घोर विरोधी थे । 

प्रश्न 4. 

भारतेन्दु युग के प्रमुख चार निबन्धकारों के नामों का उल्लेख कीजिए ।

उत्तर – 

(1) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र 

(2) प्रताप नारायण मिश्र 

(3) बाल मुकुन्द गुप्त 

(4) बद्रीनारायण चौधरी । 

प्रश्न 5. 

द्विवेदी युग का सामान्य परिचय दीजिए । 

उत्तर – 

भारतेन्दु युग के पश्चात् आधुनिक काल का द्वितीय चरण द्विवेदी युग के नाम से जाना जाता है । द्विवेदी जी के कुशल निर्देशन में न जाने कितने कलाकार साहित्य जगत् में उजागर हुए जिनकी सफल कीर्ति आज भी फैली है ।

प्रश्न 6. 

द्विवेदी युग के निबन्धों की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए । 

उत्तर – 

(1) निबन्धों की भाषा प्रांजल एवं परिमार्जित है । (2) हिन्दी में समालोचना शैली का सूत्रपात भी इसी युग में हुआ । 

प्रश्न 7.

शुक्ल युग के निबन्धों की किन्हीं पाँच विशेषताओं का उल्लेख कीजिए । 

उत्तर –

(1) भाषा शक्ति सम्पन्न एवं कलात्मक बनी । 

(2) भारतीय एवं पाश्चात्य समीक्षा का तर्कसंगत समन्वय है ।

(3) सरल एवं प्रचलित शब्दावली में कहीं – कहीं करारा व्यंग्य है ।

(3) छायावाद के संदर्भ में तर्कपूर्ण विवेचना है । 

(4) यत्र – तत्र गाँधीवाद का प्रभाव भी अवलोकनीय है । 

प्रश्न 8. 

शुक्लोत्तर युग का सामान्य परिचय एवं प्रमुख निबन्धकारों का उल्लेख कीजिए । 

उत्तर – 

सामान्य परिचय – शुक्ल युग के पश्चात् का युग शुक्लोत्तर युग के नाम से जाना जाता है । इसे ‘ वर्तमान युग ‘ भी कहा जाता है । प्रमुख निबन्धकार – आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी , बाबू गुलाबराय , डॉ . नगेन्द्र , रामधारी सिंह ‘ दिनकर ‘ , शिवदानसिंह चौहान , महादेवी वर्मा , धर्मवीर भारती , भगवतशरण उपाध्याय , प्रभाकर माचवे आदि । 

प्रश्न 9. 

कहानी की परिभाषा देते हुए उसके तत्त्व बताइए ।

अथवा 

कहानी के तत्त्व लिखते हुए किन्हीं दो कहानीकारों के नाम एवं उनकी एक – एक रचना लिखिए ।

उत्तर – 

परिभाषा – कहानी वास्तविक जीवन की ऐसी काल्पनिक कथा है जो छोटी होते हुए भी स्वत : पूर्ण और सुसंगठित होती है । कहानी के छ : तत्त्व स्वीकार किये गये हैं जो निम्न प्रकार है 

(1) कथानक – कथानक कहानी का मूल आधार होता है । कहानी की कथावस्तु ऐतिहासिक , पौराणिक , राजनीतिक , पारिवारिक , मनोवैज्ञानिक , काल्पनिक हो सकती है । कथानक में भी तीन चरण होते हैं – आरम्भ , मध्य और अन्त । कथानक का आरम्भ आकर्षक होना चाहिए जिसमें जिज्ञासा का भाव होना चाहिए और उसका अन्त प्रभावी होना चाहिए । 

(2) पात्र और चरित्र – चित्रण – कहानी पात्रों के चरित्र – चित्रण के आधार पर ही आगे बढ़ती है । जब हमारे चरित्र इतने सजीव और आकर्षक होते हैं कि पाठक स्वयं को उनके स्थान पर समझ लेता है तो पाठक को कहानी में आनन्द आता है । जब कहानीकार इस तरह की सहानुभूति उपस्थित कर देता है , तो उसे अपने उद्देश्य में सफलता प्राप्त होती है । कहानी में पात्रों की संख्या सीमित होनी चाहिए । 

(3) कथोपकथन या संवाद – पात्र अपने संवादों के माध्यम से कहानी को गति प्रदान करते हैं । संवादों के माध्यम से पात्र जीवन्त होते हैं । कहानी में कथोपकथन पात्रों के अनुकूल , संक्षिप्त , सरल और कौतूहलपूर्ण होने चाहिए । 

(4) देशकाल या वातावरण – कहानी में देशकाल या वातावरण जीवंतता लाता है । वेश – भूषा , रीति – रिवाज , विचार एवं भाषा – शैली युग के अनुरूप होनी चाहिए । ऐतिहासिक कहानियों , ग्रामीण परिवेश की कहानियों या विदेशी कहानियों में वातावरण का विशेष ध्यान रखा जाता है । 

(5) भाषा – शैली – कहानी में भाषा – शैली का विशेष महत्त्व है । सहज एवं सुगठित भाषा वातावरण को चित्रित करने में सहयोगी होती है । कहानी में उस भाषा का प्रयोग होना चाहिए जो जनजीवन के निकट हो । भाषा देशकाल एवं वातावरण के अनुकूल होनी चाहिए । कहानी में चार प्रकार की शैलियाँ प्रचलित हैं – 

(1) ऐतिहासिक शैली 

(2) आत्म चरित्र शैली

(3) डायरी शैली 

(4) पत्रात्मक शैली ।

(6) उद्देश्य – वैसे तो कथा साहित्य का उद्देश्य मनोरंजन माना जाता है , किन्तु मनोरंजन ही साहित्य की सार्थकता को नष्ट कर देता है । कहानी में ऐसी मूल संवेदना होती है जिसका अनुभव करके पाठक उसके बारे में सोचता है । उद्देश्य कहानी का प्राण तत्त्व है । दो कहानीकार मुंशी प्रेमचन्द ( कफन ) एवं जयशंकर प्रसाद ( आकाशदीप ) हैं । 

प्रश्न 10. 

कहानी में कथावस्तु का क्या महत्त्व है ? 

उत्तर – 

कहानी में कथावस्तु या कथानक मुख्य ढाँचा होता है । विषय की दृष्टि से कहानी में सांस्कृतिक , धार्मिक , सामाजिक , मनोवैज्ञानिक आदि में से किसी भी प्रकार का कथानक अपनाया जा सकता है , किन्तु यह बात ध्यान रखनी चाहिए कि कहानी में जीवन की बाहरी घटना का प्रकाशन न होकर मानव हृदय का भी उद्घाटन होता है ।

प्रश्न 11. 

एकांकी की परिभाषा लिखिए । 

उत्तर – 

परिभाषा – डॉ . नगेन्द्र के अनुसार , ” एकांकी में हमें जीवन का क्रमबद्ध विवेचन मिलकर उसके एक पहलू , एक महत्त्वपूर्ण घटना , एक विशेष परिस्थिति अथवा एक उद्दीप्त क्षण का चित्रण मिलेगा । अत : उसके लिए एकता अनिवार्य है । 

प्रश्न 12. 

रेखाचित्र से क्या आशय है ? 

उत्तर – 

इसे अंग्रेजी में स्कैच कहा जाता है । चित्रकार जिस प्रकार अपनी तूलिका से चित्र बनाता है उसी प्रकार लेखक अपने शब्दों के रंगों के द्वारा ऐसे चित्र उपस्थित करता है जिससे वर्णन योग्य वस्तु की आकृति का चित्र हमारी आँखों के सामने घूमने लगे । 

प्रश्न 13. 

संस्मरण की परिभाषा दीजिए । दो प्रमुख रचनाकारों के नाम लिखिए ।

उत्तर – 

संस्मरण आत्मकथा के क्षेत्र से निकली हुई विधा है , किन्तु आत्मकथा एवं संस्मरण में गहरा अन्तर होता है । आत्मकथा का प्रमुख पात्र लेखक स्वयं होता है , किन्तु संस्मरण के अंतर्गत लेखक जो कुछ भी देखता है उसे भावात्मक प्रणाली के द्वारा व्यक्त करता है । इसके अन्तर्गत सम्पूर्ण जीवन का चित्र न होकर किसी एक या एकाधिक घटनाओं का रोचक वर्णन रहता है । महादेवी वर्मा , रामवृक्ष बेनीपुरी प्रमुख रचनाकार हैं । 

प्रश्न 14. 

रेखाचित्र एवं संस्मरण में अन्तर बताइए ।

उत्तर – 

रेखाचित्र एवं संस्मरण निकट होते हुए भी दो अलग – अलग गद्य रूप हैं । रेखाचित्र में किसी व्यक्ति , वस्तु या घटना का कलात्मक प्रस्तुतीकरण किया जाता है जबकि संस्मरण में -किसी महान व्यक्ति के प्रत्यक्ष संसर्ग को यथार्थ के सहारे अंकित किया जाता है । कला श्रीराम शर्मा , कन्हैयालाल मिश्र ‘ प्रभाकर ‘ , महादेवी वर्मा , सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘ निराला ‘ आदि प्रमुख रेखाचित्रकार हैं तथा पद्म सिंह शर्मा , रामवृक्ष बेनीपुरी , महादेवी वर्मा , बनारसीदास चतुर्वेदी आदि प्रमुख संस्मरण लेखक हैं । 

प्रश्न 15. 

उपन्यास की परिभाषा देते हुए उपन्यास के तत्त्वों पर प्रकाश डालिए । 

उत्तर – 

उपन्यास जीवन का चित्र है , प्रतिबिम्ब नहीं । कथा मात्र को उपन्यास नहीं माना जा सकता है । उपन्यास लेखन की एक विशिष्ट शैली होती है । उपन्यास के प्रमुख तत्त्व इस प्रकार हैं – 

(1) कथानक

(2) पात्र एवं चरित्र – चित्रण 

(3) उद्देश्य

(4) शैली 

(5) भाव या रस । 

प्रश्न 16. 

जीवनी और आत्मकथा में क्या अन्तर है ? तीन जीवनी लेखकों के नाम लिखिए । 

अथवा 

आत्मकथा और जीवनी में अन्तर समझाते हुए किन्हीं दो आत्मकथाकारों के नाम लिखिए । 

उत्तर – 

‘ जीवनी ‘ तथा ‘ आत्मकथा ‘ गद्य की प्रमुख विधाएँ हैं । किसी व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति के जीवनवृत्त को रोचक साहित्यिक ढंग से प्रस्तुत किया जाए तो वह जीवनी कहलायेगी एवं जबलेखक अपने जीवनवृत को स्वयं ही प्रस्तुत करे तब वह आत्मकथा मानी जाएगी । जीवनी में विवरण एवं तथ्यों पर ध्यान रहता है , जबकि आत्मकथा में अनुभूति की गहराई अधिक होती है । स हिन्दी के जीवनी लेखकों में डॉ . रामविलास शर्मा , अमृतराय एवं गुलाबराय के नाम प्रमुख हैं । आत्मकथाकारों में महात्मा गाँधी , हरिवंशराय बच्चन , राजेन्द्र प्रसाद आदि के नाम प्रसिद्ध हैं ।

प्रश्न 17. 

नाटक एवं एकांकी में अन्तर बताते हुए प्रमुख लेखकों के नाम लिखिए 

उत्तर – 

नाटक एवं एकांकी दोनों का सम्बन्ध रंगमंच से है किन्तु दोनों में पर्याप्त अन्तर है  

(1) नाटक का आकार विस्तृत होता है । उसमें कई अंक तथा अंकों के दृश्य होते हैं जबकि एकांकी का आकार छोटा होता है तथा इसमें मात्र एक अंक होता है । 

(2) नाटक की तीन या इससे भी अधिक घण्टे की समय सीमा होती है जबकि एकांकी आधा घण्टे की समयावधि में समाप्त हो जाता है ।

(3) नाटक में अधिक पात्र तथा विस्तृत मंच सज्जा होती है जबकि एकांकी में सीमित पात्र तथा सीमित मंच सज्जा होती है । वस्तुतः नाटक का लघु रूप एकांकी है । प्रमुख लेखकों में जयशंकर प्रसाद , हरिकृष्ण प्रेमी , राजकुमार वर्मा , उदयशंकर भट्ट , उपेन्द्रनाथ अश्क , मोहन राकेश , विष्णु प्रभाकर , धर्मवीर भारती आदि हैं । 

प्रश्न 18. 

कहानी और नाटक में कोई चार अन्तर लिखिए ।

उत्तर – 

कहानी और नाटक में चार अन्तर इस प्रकार हैं- 

(1) कहानी श्रव्य साहित्य है जबकि नाटक दृश्य साहित्य के अन्तर्गत आता है । 

(2) कहानी को पाठक पढ़कर आनन्द लेता जबकि नाटक अभिनय के द्वारा प्रस्तुत होता है । 

(3) कहानी का आकार छोटा होता है जबकि नाटक बड़े होते हैं । 

(4) कहानी किसी शैली में लिखी जा सकती है जबकि नाटक में संवाद शैली का प्रयोग होता है । 

प्रश्न 19. 

रिपोर्ताज किसे कहते हैं ? कोई दो विशेषताएँ लिखिए । 

उत्तर – 

रिपोर्ताज में किसी आँखों देखी घटना , स्थिति , प्रकृति आदि का सरस , स्वाभाविक , वास्तविक एवं रोचक वर्णन किया जाता है । रिपोर्ताज की दो विशेषताएं इस प्रकार हैं 

(1) रिपोर्ताज में किसी आँखों देखी घटना , स्थिति आदि का वर्णन होता है । 

(2) यह वर्णन सत्य होता है , इसमें कल्पना का प्रयोग नहीं किया जाता है । 

प्रश्न 20. 

गद्य की विधाओं में से आपको कौन – सी विधा अच्छी लगती है और क्यों ? 

उत्तर – 

हिन्दी साहित्य की विविध विधाएँ समृद्धशाली हैं – नाटक , एकांकी , उपन्यास , कहानी . आलोचना , निबन्ध , जीवनी , आत्मकथा , यात्रावृत , गद्य काव्य , संस्मरण , रेखाचित्र , रिपोर्ताज , डायरी तथा रेडियो रूपक आदि । मुझे इन विधाओं में से कहानी अच्छी लगती है । यह गद्य विधा जीवन के किसी एक संक्षिप्त ‘ प्रसंग को उद्देश्य सहित प्रस्तुत करती है । लेखक कल्पना के सहारे उसे पाठकों के समक्ष रखता है । कहानी में आदर्श और यथार्थ का सुन्दर समन्वय होता है । इसमें कम – से – कम घटनाओं और प्रसंगों के माध्यम से अधिक – से – अधिक प्रभाव की सृष्टि करता है । कहानी में मानवीय संवेदना को बड़ी ही बारीकी से उजागर किया जाता है । 

मानवीय मूल्यों को स्थापित करना कहानीकारक मूल उद्देश्य होता है । यद्यपि साहित्य की सभी विधाएँ सौद्देश्य होती हैं तथापि कहानी अल्प समय में पाठकों को उसके उद्देश्य से अवगत करा देती है । जीवन की किसी घटना या चरित्र का रोचक एवं प्रभावशाली चित्रण होता है । कहानी में चरित्र अत्यन्त ही सजीव और आकर्षक होते हैं । पाठ चरित्रों के माध्यम से उद्देश्य को समझने में तत्पर रहता है । पात्रों की सहानुभूति पाठकों को प्राप्त होती है । का कहानी का शुभारम्भ आकर्षक तथा जिज्ञासापूर्ण होता है । जिसमें विषय की विषयवस्तु समायी रहती है । ऐतिहासिक कहानी में वातावरण या घटनाओं का महत्त्व होता है । ऐतिहासिक कहानी हमें अतीत के गौरव का स्मरण कराती है जिससे देशभक्ति की भावना जाग्रत होती है । बालक के कोमल मन पर कहानी अपना अमिट प्रभाव छोड़ती है । पाठक कहानी के उद्देश्य के विषय में सोचने को विवश होता है ।

प्रश्न 21. 

उपन्यास और कहानी में अन्तर स्पष्ट कीजिए ।

उत्तर – 

(1) उपन्यास का आकार बड़ा होता है जबकि कहानी छोटे आकार की होती है । 

(2) उपन्यास में समस्त जीवन का अंकन होता है जबकि कहानी में जीवन का खण्ड चित्रण होता है । 

(3) उपन्यास की अपेक्षा कहानी में पात्र कम होते हैं । 

(4) उपन्यास में कई कथाएँ जुड़ जाती हैं जबकि कहानी में एक ही कथा होती है । 

प्रश्न 22. 

लोक साहित्य किसे कहते हैं ? लोकगीत अथवा लोककथा का परिचय दीजिए । 

उत्तर – 

लोक भाषा के माध्यम से जनसामान्य की अनुभूति को प्रस्तुत करने वाला साहित्य लोक साहित्य कहलाता है । लोकगीत – सामान्य समाज की अनुभूति को उन्हीं की भाषा में गेय रूप में व्यक्त करने वाला साहित्य लोकगीत कहलाता है । इसमें जीवन के यथार्थ का अनुभव भरा होता है । लोकगाथा – जनसाधारण के अनुभवों पर आधारित वे कथाएँ जो जनभाषा में होती हैं वे लोकगाथा कही जाती हैं । ये समाज के मनोरंजन का श्रेष्ठ माध्यम होती हैं । 

1 thought on “MP Board Class 10th Special Hindi गद्य की विविध विधाए”

Leave a Comment