MP Board Class 10th Special Hindi पद्य साहित्य का विकास

MP Board Class 10th Special Hindi पद्य साहित्य का विकास

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समाज की विविध मनोवृत्ति की झलक हमें यथातथ्य रूप में साहित्य में दिखाई देती है । परिवर्तनशील मन – अवस्था का चित्रण विविध समय में विविध रूपों में होता रहा है । जिस काल – विशेष में जिस भावना – विशेष की प्रधानता रही , उसके आधार पर इतिहासकारों ने उस काल का नामकरण या वर्गीकरण कर दिया । विक्रम सम्वत् 1050 से 1375 तक हिन्दी साहित्य में युद्धनाद , शस्त्रास्त्रों की झंकार एवं कोलाहल विद्यमान है । इस काल में एकता के अभाव में युद्धों की प्रधानता रही । उस समय के कवियों में वीरभाव के प्रति विशेष आग्रह रहा , किन्तु ये कवि शृंगार रस से भी विमुख नहीं थे । इस काल के प्रमुख ग्रन्थ निम्नांकित हैं 

(1) विजयपाल रासो

(2) हम्मीर रासो

(3) कीर्तिलता

(4) कीर्तिपताका 

(5) खुमान रासो

(6) बीसलदेव रासो

(7) पृथ्वीराज रासो 

(8) जयचन्द्र प्रकाश 

(9) जयमयंक चन्द्रिक

(10) खुसरो की पहेलियाँ

(11) विद्यापति की पदावलियाँ 

(12) परमाल रासो । 

 

इन ग्रन्थों में अधिकांश वीरगाथाएँ हैं , अतएव इस काल का नामकरण वीरगाथा काल हुआ । वीरगाथाएँ मुक्तक एवं प्रबन्ध काव्य के रूप में लिखी गयीं । जगनिक कवि का परमाल रासो ‘ या आल्हा एवं नरपतिनाल्ह का ‘ बीसलदेव रासो ‘ मुक्तक हैं । प्रबन्ध काव्य में दलपति विजय का ‘ खुमान रासो ‘ , चन्दबरदाई का ‘ पृथ्वीराज रासो ‘ बहुत प्रसिद्ध है । वीरगाथा काल के प्रमुख विषय शौर्य , प्रेम और कीर्ति रहे , जो अपभ्रंश और प्राचीन हिन्दी में वीर और शृंगार रस के माध्यम से अभिव्यक्त हुए । इस काल के प्रमुख छन्द थे – दूहा ( दोहा ) , गाथा , त्रोटक , तोमर , छप्पय , आल्हा , वीर और आर्या । कवि लोग प्रायः राज्याश्रित रहते थे तथा अपने राजाओं की प्रशंसा गा – गाकर किया करते थे । वे भाट और चारण कहलाते थे । अपने राजाओं की शौर्य – गाथा का वर्णन करते – करते कवि अतिशयोक्ति एवं वर्णन की नीरस सूची से नहीं बच पाया । अतएव इन रचनाओं में राष्ट्रीय भावना एवं ऐतिहासिक प्रामाणिकता का अभाव ही है । वीरगाथाकाल में जिन युद्धों का वर्णन है , वे . पारस्परिक वैमनस्य एवं सुन्दरियों को लेकर होते थे । अतएव कवि सुन्दर नायिकाओं का वर्णन कर शृंगार रस का समावेश कर लिया करते थे । इस काल की भाषा सर्वथा भावानुरूप थी । डिंगल भाषा में हुए अभूतपूर्व युद्ध – वर्णन ही वीरगाथा काल को चमत्कृत किये हुए हैं । छन्दों का प्रयोग रसानुभूति एवं भावाभिव्यंजना में सहायक है । इस काल का प्रिय अलंकार यद्यपि अतिशयोक्ति और अनुप्रास रहा है , फिर भी उपमा , रूपक , सन्देह , उत्प्रेक्षा का प्रयोग भी उपयुक्त व सफल है । इस युग की प्रमुख धारणा मनोरंजन की थी । विद्यापति की पदावलियाँ भक्ति – शृंगार से ओत – प्रोत हैं । सिद्धों और नाथों की रचनाओं में भक्ति के तत्व विद्यमान थे । यही हिन्दी का आदिकाल है ।

 

वीरगाथा काल (आदिकाल) की प्रमुख प्रवृत्तियाँ और विशेषताएँ 

(1) राज्याश्रित चारण कवि

(2) आश्रयदाता राजाओं की प्रशंसा

(3) सजीव युद्ध वर्णन

(4) चरित काव्यों की रचना 

(5) वीर तथा शृंगार रसों की प्रधानता

(6) राजस्थानी , अपभ्रंश खड़ी बोली तथा मैथिली मिश्रित भाषा

(7) छप्पय और दोहा छन्द । 

भक्तिकाल 

भक्तिकाल सम्वत् 1375 से प्रारम्भ होकर सम्वत् 1700 तक समाप्त हुआ । वीरगाथा काल की युद्ध विभीषिका से त्रस्त मानव हृदय शान्ति की खोज में भटकने लगा । हिन्दू – मुस्लिम के मध्य विद्वेष की भावना को दूर कर उन्हें एकता के सूत्र में आबद्ध करने हेतु पण्डितों और मौलवियों दोनों ने ही जनता में भक्ति का प्रसार कर असीम की छत्रछाया की ओर संकेत किया । धर्म ने मस्तिष्क से हटकर हृदय में आश्रय लिया , वह भावाकुल हो उठा । बस , इसी बिन्दु से भक्ति का उन्मेष हुआ । इसलिए इस युग का नाम भक्तिकाल पड़ा । सगुण भक्ति का प्रतिपादन हुआ , जो आगे चलकर राम – भक्ति और कृष्ण – भक्ति दो धाराओं में विभाजित हो गयी । दूसरी ओर ब्रह्म उपासना या एकेश्वरवाद के प्रतिपादकों ने अपने काव्य में एक ऐसे ईश्वर की उपासना की , जो हिन्दू तथा मुसलमानों को समान रूप से मान्य हो । इस निर्गुण धारा की भी ज्ञानमार्गी और प्रेममार्गी दो शाखाएँ हुईं । 

 

(1) भक्तिकालीन निर्गुण प्रेममार्गी शाखा – 

इस शाखा में प्रेम – प्रधान निराकार ब्रह्म की उपासना का प्राधान्य था । इसमें प्रबन्ध काव्यों की रचना हुई , जिसमें मलिक मुहम्मद जायसी का ‘ पद्मावत ‘ ग्रन्थ बहुत प्रसिद्ध हुआ । प्रमुख छन्द , सोरठा , दोहा , चौपाई हैं । अवधी और फारसी भाषा का प्रयोग है तथा मसनवी शैली है । इस काल में सूफी कवियों ने आत्मा को प्रियतम मानकर हिन्दू प्रेम कहानियों का वर्णन किया है । हिन्दू – मुस्लिम एकता इस शाखा की प्रमुखता है । कवि कुतुबन , मंझन , उस्मान एवं जायसी ने प्रेमगाथाओं को काव्य – रूप में गूंथ दिया । पद्मावत के अतिरिक्त स्वप्नवती , मुग्धावती एवं मृगावती आदि प्रमुख काव्य ग्रन्थ हैं । मधु मालती कवि मंझन : का सुन्दर प्रेम काव्य है । ये सभी काव्य शृंगार रस के भण्डार हैं जिसके संयोग और विप्रलम्भ दो तट हैं । इस काल के काव्य ग्रन्थ उत्कृष्ट एवं अलौकिक प्रेम तत्व से परिपूर्ण हैं । इन सूफी काव्यों की रचना – शैली दोहा – चौपाई है और इसमें कथा को आदि से अन्त तक लिखा जाता है । इनकी भाषा – शैली बड़ी ही हृदयस्पर्शी एवं भावभीनी है । इस काल के सभी महाकाव्य प्रेम कथाओं पर आधारित हैं , जो शास्त्रीय कसौटी पर खरे उतरते हैं । इन काव्यों में कवि ने कल्पना की चादर ओढ़कर इतिहास की पृष्ठभूमि पर लेखनी चलाकर भावपूर्ण चित्र अंकित किए हैं । इस काल के काव्य में केला – पक्ष के अतिरिक्त भाव – पक्ष भी सबल है । शृंगार रस के दोनों पक्षों पर कवियों ने समान ध्यान दिया है , किन्तु रस – प्रयोग में शृंगार में कहीं – कहीं जुगुप्सा का भाव मिलता है । इसके अतिरिक्त करुण , रौद्र के भी दर्शन होते हैं । इस काल में यदि किसी रस का अभाव है , तो वह है – वात्सल्य । इस काल की भाषा ठेठ अवधी है । काव्य में रहस्यवाद , एकेश्वरवाद के समन्वय के दर्शन होते हैं , जो अत्यन्त प्रभावशाली है । 

 

(2) भक्तिकालीन ज्ञानमार्गी निर्गुण शाखा – 

भक्ति की इस शाखा में केवल ज्ञानप्रधान निराकार ब्रह्म की उपासना की प्रधानता है । इसमें प्रायः मुक्तक काव्य रचे गये । दोहा और पद आदि स्फुट छन्दों का प्रयोग हुआ है । भाषा खिचड़ी एवं सधुक्कड़ी है । भारतीय दर्शन के आधार पर आत्मा को प्रियतमा मानकर आत्मा – परमात्मा के विरह – मिलन का वर्णन है । राम और रहीम की एकता का प्रतिपादन है । इस काल में आडम्बरों का घोर विरोध किया गया और हिन्दू – मुस्लिम एकता पर जोर दिया गया । इस समय का प्रमुख रस शान्त रस है । इस बात की प्रमुख विशेषता एक ऐसे ईश्वर की उपासना है जो हिन्दू – मुस्लिम दोनों को समान रूप से मान्य हो । इन कवियों के मतानुसार ईश्वर का वास आत्मा में है , न कि बाहरी साज – सज्जा में । ईश्वर के केवल तात्विक स्वरूप की ही मीमांसा की गई है । इस काल की एक और विशेषता है – ‘ रहस्यवाद ‘ । इस शाखा के कवि साम्प्रदायिकता और वर्णाश्रम धर्म के विरोधी थे । वे इन्द्रिय – निग्रह और साधना पर जोर देते थे । इस काल के मुख्य कवि कबीरदास हैं । इनके अतिरिक्त अन्य मुख्य कवि सुन्दरलाल , मलूकदास , गुरुनानक , रैदास , दादू दयाल एवं पलटू साहब हैं । __ इस शाखा के कवि सन्त कवि कहलाते हैं , क्योंकि उनके काव्यों की प्रमुख विशेषता उसमें निहित उदात्त भावों की प्रधानता है । जिसका न केवल विशुद्ध जीवन के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध है , अपितु जिनकी अभिव्यक्ति भी प्रधानतः ऐसे कवियों के द्वारा की गयी – जिन्होंने स्वानुभूति की प्रयोगशाला में उनका मूल्यांकन एवं सत्यापन कर लिया था । 

 

(3) भक्तिकालीन सगुण रामभक्ति शाखा –

इस काल में भगवान श्रीराम के सत्य , शील एवं सौन्दर्य प्रधान अवतार की उपासना की गयी है । राम के सम्पूर्ण जीवन चरित का आधार लेकर इस काल में प्रबन्ध एवं मुक्तक काव्य दोनों प्रकार के काव्यों की रचना की गयी । इस -काल में प्रमुख रूप से दोनों अवधी और ब्रजभाषा का उपयोग हुआ और कई छन्दों में रचनाएँ हुईं । दोहा , चौपाई , कवित्त , सवैया , बरवै , रोला , तोमर , त्रोटक , गीतिका , हरिगीतिका और पद आदि प्रमुख छन्द हैं । तत्कालीन कवियों ने मर्यादित भक्ति एवं भारतीय संस्कृति के पुनः निर्माण की भावना के साथ रामकथा का वर्णन किया । कवियों की विनय भावना में परम दैन्य के दर्शन होते हैं । इस काल के काव्य में सभी रसों का समावेश हुआ , किन्तु शान्त और शृंगार प्रधान रस हैं । रामचरितमानस ‘ इस काल का सर्वश्रेष्ठ ग्रन्थ है । इसके रचयिता तुलसीदास हैं । तुलसीदास ही इस काल के प्रमुख कवि हैं । इसके अतिरिक्त नाभादास , प्राणचन्द चौहान , हृदयराम , रघुराज सिंह और केशवदास के नाम उल्लेखनीय हैं । रामभक्ति शाखा के प्रवर्तक रामानन्द हैं । उन्होंने रामानुजाचार्य की शिष्य परम्परा में भक्ति को ब्रह्म प्राप्ति का परम साधन बताया और सभी रामाश्रयी भक्तिकालीन कवियों ने इसी भक्ति मार्ग को अपनाया । उन्होंने भगवान राम की लोकमंगलकारी शक्ति का निरूपण किया । दास्य रूप में रामभक्ति का प्रारम्भ काव्य में तुलसीदास द्वारा ही हुआ । अन्य कवियों ने भी लिखा है , किन्तु तुलसी ने राम के बारे में इतना अधिक लिखकर राम – जीवन के सभी पक्षों का उद्घाटन किया कि और लोगों को लिखने के लिए कुछ भी शेषन रहा । रामकाव्य की मुख्य तीन विशेषताएँ हैं । वैष्णव धर्म को सामने रखकर भक्ति के सेव्य – सेवक रूप पर ही ध्यान दिया गया । इस काल में ज्ञान और कर्म से भक्ति की श्रेष्ठता दर्शायी है और जो सबसे प्रभावशाली बना है , वह है रचना – शैली । रामभक्त कवि किसी एक परिपाटी में नहीं बँधे । उन्होंने विभिन्न रचना – शैलियों का प्रयोग किया है । दृश्य , श्रव्य , मुक्तक और प्रबन्ध काव्य सभी की रचना हुई है । इस काल का काव्य स्वतन्त्र वातावरण में विकसित हुआ । कवियों पर किसी राजा का नियन्त्रण नहीं था , अतएव किसी की प्रशंसा करना या धनोपार्जन करना कवियों का उद्देश्य नहीं था । कवियों ने राम को अपना इष्टदेव माना और अपने हृदय का उल्लास , विनय तथा आत्म – निवेदन करना उनका मुख्य उद्देश्य था । अत : कवियों की कविता स्वान्तः सुखाय है । परम प्रतिभासम्पन्न , आदर्श भक्त एवं लोकनायक तुलसी ने लोक कल्याणार्थ कविता की रचना की । उन्होंने बारम्बार अपने काव्य में ज्ञान से भक्ति की श्रेष्ठता प्रतिपादित की है । इस काल के काव्य का भाव – पक्ष और कला – पक्षदोनों ही सबल हैं । काव्य में अति स्वाभाविक और सौन्दर्यवर्द्धक अलंकार योजना है , जिससे यत्र – तत्र सभी रस प्रवाहित हैं । 

 

(4) भक्तिकालीन सगुण कृष्णभक्ति शाखा – 

कृष्णभक्ति शाखा में भगवान विष्णु के कृष्णावतार की उपासना है । इस शाखा में केवल मुक्तक काव्यों की रचना हुई । भगवान कृष्ण की भक्ति के सभी पद ब्रजभाषा की माधुरी से ओत – प्रोत हैं । केवल ‘ पद ‘ छन्द का ही प्रयोग हुआ । इन पदों का मुख्य विषय – राधाकृष्ण की प्रेमपूर्ण उपासना है , किन्तु सूरदास ने कृष्ण की बाल – लीलाओं का भी वर्णन किया है , जो स्वाभाविक और हृदयस्पर्शी है । इस काल के प्रमुख रस श्रृंगार के दोनों पक्ष और वात्सल्य रस हैं । प्रमुख कवि सूरदास द्वारा रचित सूरसागर ही प्रमुख ग्रन्थ है । कृष्णभक्ति काव्य के प्रमुख प्रवर्तक बल्लभाचार्य हैं । इन्होंने कृष्णभक्ति में माधुर्य भाव को ही प्रधानता दी है । माधुर्य भाव की प्रधानता होने से कृष्ण के केवल लोकरंजक रूप का ही प्राधान्य है । किन्तु कहीं लोकरक्षक रूप का भी आभास होता है । इस काल में केवल मुक्तक रचनाएँ हुई हैं और प्रबन्ध काव्य का सर्वथा अभाव है । किन्तु ये मुक्तक भी इतने मर्मस्पर्शी हैं कि एक – एक पद पढ़कर पाठक भावानुकूल हो जाते हैं , जो स्मृति पटल में न जाने कितना विस्तार कल्पना के लिए छोड़ जाते हैं । सर्वत्र स्वतन्त्र प्रेम की झलक प्राप्त होती है , इसलिए लोक – जीवन की प्राय : अवहेलना ही हो गयी है । यदि कहीं लोक – जीवन का सामान्य – सा चित्रण है भी तो वह रस की पुष्टि के अर्थ में चित्रित है । पद – शैली में संगीत की विभिन्न राग – रागनियों का अच्छा समायोजन है । इसी से कृष्णभक्ति के अधिक पद गाये जाते हैं , जिसमें उत्कृष्ट माधुर्य भावना है । इस मधुरता को रक्षित करने के लिए ही मानो कृष्ण भक्त कवियों ने केवल एकमात्र माधुरी ब्रजभाषा को अपनाया है । अलंकारों का सुन्दर स्वाभाविक प्रयोग है । कृष्णभक्ति काल की रचनाओं में एक और बात जो ध्यान आकर्षित करती है , वह है – कृष्ण काव्य की व्यंग्यात्मक उपालम्भ शैली । विप्रलम्भ शृंगार इस काल में अपने चरमोत्कर्ष को प्राप्त कर चुका है । भ्रमर गीतों की अनूठी परम्परा इस रसराज की पोषक है । केवल मीराबाई ने कृष्ण की एकभाव से प्रेमिका के रूप में उपासना की है । कृष्णकाव्य के प्रसंग में हमें ‘ अष्टछाप ‘ को विस्मृत नहीं करना चाहिए । बल्लभाचार्य के पश्चात् उनके उत्तराधिकारी विट्ठलनाथजी थे । उनके समय तक कृष्ण की पुष्टिमार्ग के सिद्धान्तानुसार भक्ति करने वाले कवि अनेक थे । उन कवियों में से जिन आठ कवियों के काव्य का संग्रह विट्ठलनाथ ने किया , वह ‘ अष्टछाप ‘ कहलाता है । 

ये आठ कवि है – 

(1) सूरदास

(2) नन्ददास

(3) कुम्भनदास

(4) परमानन्ददास

(5) चतुर्भुजदास

(6) छीत स्वामी 

(7) गोविन्द स्वामी और

(8) कृष्णदास । 

 

सूरदास व नन्ददास इनमें श्रेष्ठ हैं । इसके अतिरिक्त कुछ कवि और भी हुए , जिन्होंने स्वतन्त्र रूप से कृष्णभक्ति की कविताएँ लिखीं । मीराबाई , रसखान , नरोत्तमदास आदि की कृष्ण सम्बन्धी कविताएँ भावों की व्यंजना से पूर्ण हैं । रसखान मुस्लिम कवि थे , जो अपनी तन्मयता के लिए प्रसिद्ध थे । ‘ सुजान रसखान ‘ और ‘ प्रेमवाटिका ‘ इनके दो ग्रन्थ हैं । मीराबाई जोधपुर की राजकुमारी थीं । ये कृष्ण – प्रेम की मतवाली थीं और गा – गाकर नाचा करती थीं । मीरा की पदावली ‘ में इनके पदों का संग्रह है । इनकी प्रेमवाणी हिन्दी – साहित्य में अनुपम है । नरोत्तमदास का ‘ सुदामा चरित्र ‘ ब्रजभाषा का खण्डकाव्य है । जिस प्रकार राम चरित्र का गान करने वाले भक्त कवियों में गोस्वामी तुलसीदासजी का स्थान सर्वश्रेष्ठ है । उसी प्रकार कृष्ण चरित्र गाने वालों में भक्त कवि सूरदासजी का शीर्षस्थ स्थान है । इन्हीं के काव्यों की सरसता से हिन्दी काव्य का स्रोत अविरल प्रवाहित है । सूरदास जन्मान्ध थे ; किन्तु कृष्ण की बाल – लीलाओं का जो सजीव वर्णन है , वह कोई आँख वाला कवि भी नहीं । सकता । जीवन भर सूरदास ने कृष्ण लीलाओं का गायन किया । ‘ सूरसागर ‘ , ‘ सूरसारावली ‘ एवं ‘ साहित्य लहरी ‘ इनके रचित ग्रन्थ हैं । बताया जाता है कि सूर ने सवा लाख पदों की रचना की । सूरदास वात्सल्य रस के सम्राट कहे जाते हैं । अंगार और शान्त रसों का भी वर्णन किया है । सूरदास बालक बनकर एक सखां की भाँति बालकृष्ण के साथ खेलते हैं । इनकी भक्ति सखा भाव की है । विनय के पदों में सूर ने सच्चे मानव जीवन की छवि अंकित की है । वह मार्मिक चित्रण शान्त रस का उत्कृष्ट उदाहरण है । सूर एक भक्ति कवि हैं । उनके काव्य का मुख्य गुण है सरलता और स्वाभाविकता । शृंगार के विप्रलम्भ पक्ष का अद्वितीय वर्णन भ्रमरगीत में है । इसमें सन्देह नहीं कि कृष्ण परम्परा में कवियों ने गीतिकाव्य को इतना सम्पन्न किया जो अक्षय है । यद्यपि रचनाएँ एकांगी हैं , उनमें बहुरूपता नहीं , तब भी सरस हैं । 

 

(5) भक्तिकाल की स्फुट शाखा- 

भक्ति का जो प्रवाह उमड़ा वह राजाओं और शासकों के प्रोत्साहन पर अवलम्बित नहीं था । वह जनता की प्रवृत्ति का द्योतक था । उसी प्रवाहकाल के बीच अकबर जैसे शासक द्वारा स्थापित शान्तिसुख के परिणामस्वरूप जो रचनाएँ लिखी गईं वह दूसरे प्रकार की थीं । नरहरि , गंग , रहीम जैसे सुकवि और तानसेन जैसे गायक अकबरी दरबार की शोभा बढ़ाते थे । इस काल में मुक्तक कविता की रचना हुई । दोहा , कवित्त आदि स्फुट छन्दों का प्रयोग हुआ । ब्रजभाषा के साथ अन्य बोलियों के शब्दों का भी निर्माण हुआ । स्फुट रूप में सभी रसों का समावेश हुआ । दरबारी कविता , नीति कविता , रीति कविता और प्रकृति की कविताएँ लिखी गयीं । प्रमुख कवि रहीम , गंग , सेनापति आदि थे । इनके अतिरिक्त कृपाराम , नरहरि , बन्दीजन , नरोत्तमदास , आलम , टोडरमल , बीरबल , मनोहर , बलभद्र मिश्र , जमाल , केशवदास , मुबारक , बनारसीदास , पुहुकर , लालचन्द या लक्षोदय और सुन्दर आदि कवियों का उल्लेख भी आचार्य शुक्ल ने अपने इतिहास ग्रन्थ में किया है । म रहीम अरबी , फारसी और संस्कृत के प्रकाण्ड पण्डित थे । इन्होंने चार ग्रन्थ लिखे । गंग अकबर के दरबारी कवि थे । सेनापति ने ‘ कविता रत्नाकर ‘ और ‘ काव्य कल्पद्रुम ‘ दो ग्रन्थ लिखे । ‘ ऋतु वर्णन ‘ हिन्दी साहित्य में अद्वितीय है । केशवदास भक्तिकाल और रीतिकाल के बीच की कड़ी हैं ।

भक्तिकाल की प्रमुख प्रवृत्तियाँ और विशेषताएँ

(1) ईश्वरभक्ति

(2) गुरु महिमा

(3) सादा जीवन

(4) समन्वय की भावना

(5) राज्याश्रय से मुक्ति

(6) विविध रसों का परिपाक

(7) भाषा की विविधता ।

रीतिकाल 

रीतिकाल का समय सम्वत् 1700 से सम्वत् 1900 तक ( सन् 1643 से 1843 ई . ) तक है । आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने इस काल की काव्यगत रीतिबद्धता की मूल प्रवृत्ति के कारण इसे रीतिकाल कहा है । इस काल में मुगलों का क्रमशः पतन हो रहा था , जिसके फलस्वरूप देश में छोटे – छोटे राजाओं ने अपनी रियासतें स्थापित करना शुरू कर दिया । इन राजाओं के आश्रय में कवि रहा करते थे । कवि अपने आश्रयदाताओं के मनोरंजनार्थ काव्य की रचना करते थे । इन कवियों को विषय भक्तिकाल से सहज रूप में मिल गये थे । भक्तिकाल के अलौकिक और आध्यात्मिक आराध्य राधाकृष्ण को रीतिकालीन कवियों ने बौद्धिक स्तर पर उनके लौकिक रूप को अपनी काव्य रचना में स्थान दिया । इस काल में रस , छन्द , अलंकार के शास्त्रीय पक्ष को विशेष बल मिला । रस में शृंगार रस के संयोग और वियोग दोनों बहिर्मुखी रूप में व्यंजित हुए । यही कारण है कि इन कवियों में नारी विषयक दृष्टिकोण में अन्तर आ गया । अलंकारों को इतना अधिक महत्त्व दिया कि काव्य का भाव – पक्ष उतना उभरकर सामने नहीं आ पाया । इससे बौद्धिक व्यायाम का रूप बढ़ता गया और रीतिकालीन कविता का भाव ग्रहण करने में कष्ट और परिश्रम की आवश्यकता पड़ी । 

रीतिकालीन काव्य की विशेषताएँ 

 

(1) सांसारिक सुख का प्राधान्य – 

यह समय विलास और समृद्धि का था । जीवन क्षणभंगुर है , अत : जितने दिन सुख भोग सके उतना ही अच्छा है । अतः काव्य रचना का उद्देश्य सुख प्राप्ति माना गया । 

(2) कविराज्याश्रित होने के कारण कविता भरण – पोषण और धन – प्राप्ति का साधन बनी । 

(3) मुक्तक काव्य और गीतिकाव्य – 

इस काल में मुक्तक रचनाएँ ही अधिक लिखी गीं , जो काव्यात्मक हैं । कवित्त , सवैया , बरवै , दोहा , छन्द , मुक्तक लिखने के लिए अनुकूल थे । 

(4) शृंगार और नखशिख वर्णन – 

इनकी श्रृंगार विषयक धारा में राम , कृष्ण जो भगवान थे , वे भी अछूते नहीं रहे । नायिकाओं के अंग – अंग और हर अदा का वर्णन बहुत ही लालित्यपूर्ण और विशुद्ध शृंगारपरक है । 

(5) नायिका भेद – 

काव्य – कला की दृष्टि से उत्कृष्ट नायिका भेद का वर्णन है , किन्तु यह काव्य विलास की वस्तु बन गया । 

(6) प्रकृति चित्रण – 

प्रकृति वर्णन अधिक नहीं हुआ , पर प्रकृति प्रायः विप्रलम्भ शृंगार के उद्दीपन के अर्थों में ही अधिक प्रयुक्त हुई । फिर भी प्रकृति वर्णन उपेक्षित नहीं है । जहाँ कहीं भी प्रकृति वर्णन हुआ है , बहुत ही उत्कृष्ट कोटि का बन पड़ा है । नये – नये उपमानों का प्रयोग हुआ है । 

(7) रीतिकालीन कविता में कला – 

पक्ष की प्रधानता रही । इस कला के प्रदर्शन में संस्कृत की सभी परम्पराओं का प्रभाव स्पष्ट है । कई रीति ग्रन्थ भी लिखे गये । भाषा में शब्दों का चमत्कार और अलंकारों की विविधता है । जी (8) विरह – 

वर्णन में फारसी शैली का प्रभाव है । सूक्ष्म भाव – निरूपण नहीं हुआ है । 

(9) भाषा – 

रीतिकाल की भाषा प्रायः ब्रजभाषा ही है । कुछ कवियों ने फारसी के शब्द अपनाये और कुछ ने संस्कृत के शब्द तथा पद अपनाये ।

(10) रस – 

वीर और शृंगार रस के अतिरिक्त जीवन के सन्ध्याकाल में कवियों ने शान्त रस की भी अच्छी रचनाएँ की ।

 

आधुनिक काल की कविता (1900 से अब तक) 

 

उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में सांस्कृतिक , राजनीतिक एवं सामाजिक आन्दोलनों के फलस्वरूप हिन्दी काव्य में नई चेतना तथा विचारों ने जन्म लिया और साहित्य बहुआयामी क्षेत्रों को संस्पर्श करने लगा । भारतेन्दु युग हिन्दी कविता का जागरण काल है । देशोद्धार , राष्ट्र – प्रेम , अतीत – गरिमा आदि विषयों की ओर ध्यान दिया गया और कवियों की वाणी में राष्ट्रीयता का स्वर निनादित होने लगा । भारतेन्दु हरिश्चन्द्र , प्रतापनारायण मिश्र , चौधरी बद्रीनारायण ‘ प्रेमघन ‘ , लाला सीताराम आदि प्रमुख रचनाकार हुए । द्विवेदी युग में खड़ी बोली कविता की सम्वाहिका बनी । काव्य में सामाजिक तथा पौराणिक विषयों का विस्तार हुआ । श्रीधर पाठक , आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी , अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘ हरिऔध ‘ , मैथिलीशरण गुप्त , गयाप्रसाद शुक्ल ‘ सनेही ‘ , रामचरित उपाध्याय , रामनरेश त्रिपाठी , गोपालशरण सिंह , जगन्नाथ प्रसाद ‘ रत्नाकर ‘ , सत्यनारायण ‘ कविरत्न ‘ आदि विशेष उल्लेखनीय हैं । हिन्दी कविता में आधुनिकता तथा नवीन युग के सूत्रपात का श्रेय छायावादी युग को प्रदान किया जाता है ।

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