MP Board Class 10th Special Hindi Sahayak Vachan Solutions Chapter 10 दीपक की आत्मकथा

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MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions Chapter 10 दीपक की आत्मकथा (आत्मकथा, संकलित)

दीपक की आत्मकथा अभ्यास

 

प्रश्न 1. 

ज्ञान और दीपक के आपसी सम्बन्ध को स्पष्ट कीजिए ।

उत्तर – 

ज्ञान और दीपक का आपसी सम्बन्ध बड़ा स्पष्ट है । दोनों का काम अंधकार मिटाना है , प्रकाश फैलाना है । पढ़ने – पढ़ाने का सम्बन्ध ज्ञान से है । इस तरह ज्ञान अन्दर के अज्ञान के अंधकार को दूर करता है । दीपक बाहर के अंधकार को दूर करता है तथा सभी तरफ प्रकाश की किरणें फैलाता है । दोनों ही वास्तविकता का परिचय कराते हैं । ज्ञान से सत्य का पता लगता है । दीपक से अंधकार में न दिखने वाली वस्तुएँ साफ दिखाई देने लगती हैं । इस तरह ज्ञान और दीपक दोनों ही सहकर्मी , सहधर्मी भाई – भाई हैं । 

प्रश्न 2. 

जीवन में आने वाले संघर्षों और चुनौतियों को विकास का मार्ग क्यों कहा गया है ? 

उत्तर – 

जीवन में व्यक्ति के सामने विभिन्न प्रकार के संघर्ष और चुनौतियाँ आती ही रहती हैं । ये संघर्ष चुनौतियाँ जीवन की गति को रोकने का पूरा – पूरा प्रयास करती हैं । जो इनसे घबरा जाते हैं । उनका विकास , जीवन की गति रुक जाती है और जो इन संघर्षों और चुनौतियों का वीरतापूर्वक सामना करते हैं , इनसे घबराते नहीं हैं , वे जीवन के विकास के मार्ग पर आगे बढ़ते चले जाते हैं । चुनौती को वीरता के साथ स्वीकार करना महानता प्राप्त करने का गुण है क्योंकि वीरता ही लक्ष्य प्राप्त कराती है । बिना संघर्ष के महानता तक पहुँचना संभव नहीं । संघर्ष और चुनौतियों से होकर ही विकास का मार्ग गुजरता है । 

प्रश्न 3. 

दीपक से मानव जीवन की तुलना किस रूप में की गई है ?

उत्तर – 

दीपक कट कर , मार खाकर , कुटते , पिटते , तपते हुए अपना आकार प्राप्त करता है । तमस को चीर कर आलोक की किरणें फैलाने की क्षमता उसमें कष्टों को सहकर ही आती है । नन्हा – सा दीपक स्वयं जलकर भी दूसरों को प्रकाश देने में ही अपना समस्त जीवन अर्पित कर देता है । ठीक वैसी ही स्थिति मानव जीवन की है । मानव जीवन निरन्तर समस्याओं , संघर्षों तथा कठिनाइयों से भरा है । जो इनको सहन कर बिना घबराए अपने आत्मबल का विस्तार कर लेता है वह सही मार्ग पर चलता है । जैसे दीपक समाज को प्रकाश देकर धन्य होता है , ठीक उसी प्रकार मानव को समाज और राष्ट्र के हित के लिए अपना जीवन न्यौछावर कर देना चाहिए । मनुष्य की जीवन की सार्थकता इसी में है , यही अनुपम आनन्द प्रदान करता है ।

प्रश्न 4. 

‘ दीपक की आत्मकथा ‘ नामक पाठ से आपको क्या प्रेरणा मिलती है ?

उत्तर – 

‘ दीपक की आत्मकथा ‘ पाठ में दीपक बनकर तैयार होने की प्रक्रिया का भावात्मक एवं सकारात्मक बखान करते हुए उसके प्रेरक रूप को प्रस्तुत किया गया है । दीपक बनने से पहले मिट्टी खोदी.जाती है , पीट – पीटकर महीन की जाती है , पैरों से रौंदी जाती है , फिर चाक पर चढ़ाकर आकार दिया जाता है । उसके बाद अवा की आग एवं बत्ती डालकर जलाया जाता है । वह स्वयं जलकर दूसरों को प्रकाश देता है । इससे स्पष्ट है कि दीपक नाना प्रकार के कष्ट सहकर आकार ग्रहण करता है , तपकर परिपक्व होता है । इससे हमें मरणा मिलती है कि जैसे कठिन साधना के द्वारा दीपक संसार तथा राष्ट्र की सेवा में स्वयं को समर्पित कर देता है , वैसे ही हमें कठिनाइयों का सामना कर अपने जीवन को विकसित करना चाहिए । हमें समाज और राष्ट्र के हितकारी कामों में लगकर अपने जीवन को सार्थक बनाना चाहिए । सेवा में बड़ा आनन्द मिलता है । 

प्रश्न 5. 

दीपक ने किस – किस को नमन किया और क्यों ? 

उत्तर – 

मिट्टी खोदकर , पीटकर , गलाकर , पानी मिलाकर चाक पर दीपक को आकार दिया गया । उसे सुखाकर अवा में पकाया गया । इसके बाद उसमें बत्ती और तेल डालकर उसे जलाया गया । अब वह दीप से प्रकाश करने वाला दीपक बन गया था । वह अपनी पूर्णता पर प्रसन्न हो रहा था । वह उसे आकार प्रदान करने वाले पंच तत्वों – आकाश , जल , अग्नि , पृथ्वी एवं वायु को नमन कर रहा था । वह अपनी मातृभूमि को कृतज्ञ भाव से झुक नमन कर रहा था । पंच तत्वों को वह इसलिए नमन कर रहा था कि उन्होंने उसे आकार प्रदान किया और मातृभूमि को इसलिए नमन कर रहा था क्योंकि उसने ही उसे पैदा किया था । 

प्रश्न 6. 

माता की कुक्षि कब धन्यता प्राप्त करती है ? 

उत्तर – 

माँ बच्चे को जन्म देती है । बच्चा जब सद्मार्ग पर चलकर अपनी तपस्या से महानता को प्राप्त कर समाज तथा राष्ट्र की सेवा करता है तब माँ की कुक्षि धन्यता को प्राप्त करती है । बुरे कर्म करने वाले चोर – उचक्के , अपराधी , अनाचारी अपनी माँ की कुक्षि को बदनाम करते हैं । उनके बुरे कामों से कुक्षि लज्जित होती है । दूसरी ओर कष्टों और संघर्षों को सहन कर जन सेवा करने वालों की जननी गौरव का अनुभव करती है । समाज और राष्ट्र को अपना सर्वस्व अर्पित करने वालों की माता की कुक्षि धन्यता को प्राप्त करती है । 

प्रश्न 7.

दीप ने अपने आप को ‘ सच्चा दीप ‘ कैसे सिद्ध किया ? 

उत्तर – 

मिट्टी खोदकर , कूटकर , पीटकर पानी में गलाकर , पैरों से रौंदकर कुम्हार ने दीप को चाक की सहायता से बनाया । फिर अवा की आग में उसे पकाया । वह विभिन्न संघर्षों का सामना करते हुए कठिन चुनौतियों को स्वीकार करने को तैयार हुआ । इस तरह उसने ‘ सच्चा दीपक ‘ सिद्ध किया । उसके बहुत से साथी सच्चे दीपक नहीं सिद्ध कर सके क्योंकि वे मार्ग के संघर्षों को नहीं झेल सके , वे टूट गये और बिखर गये किन्तु यह दीपक संघर्षों से नहीं घबराया । इसने कठिनाइयों का वीरतापूर्वक सामना किया और उन पर विजय प्राप्त की । इस तरह उसने अपने आपको सच्चा दीपक ‘ सिद्ध कर दिखाया । उसने अपना जीवन सार्थक कर लिया । 

प्रश्न 8. 

मानव जीवन को सार्थकता कैसे प्राप्त होती है ? 

उत्तर – 

मानव जीवन में विविध प्रकार की कठिनाइयाँ एवं समस्याएँ आती हैं । मनुष्य को उनसे घबराना नहीं चाहिए । उन कठिनाइयों का वीरता के साथ सामना करना चाहिए । अपने आत्मबल को विकसित कर समस्याओं पर विजय प्राप्त करनी चाहिए । मानव को अपना सर्वस्व समाज और राष्ट्र के हित में न्यौछावर कर देना चाहिए । मानव जीवन की यही सार्थकता है । त्याग से जो आनन्द मिलता है उसका वर्णन नहीं किया जा सकता है । जो काल की मार सहते हैं , कुटते , पिटते , गलते , तपते और पकते हैं , वे ही महानता धारण करते हैं और अपने जीवन को सार्थक बनाते हैं । 

प्रश्न 9. 

“गुरु कुम्हार सिष कुम्भ है … ” बाहर मारे चोट ।” इन पंक्तियों का आशय स्पष्ट कीजिए । 

उत्तर – 

ये पंक्तियाँ महाकवि कबीर की हैं । इसमें कबीर कहते हैं कि गुरु कुम्हार की तरह है तथा शिष्य घड़े के समान । जैसे कुम्हार घड़े को बनाते समय अन्दर से हाथ का सहारा लगाता है और बाहर से चोट मारकर उसे ठीक करता है , उसी तरह गुरु भी शिष्य के वास्तविक हित का ध्यान रखकर शिष्य को प्रताड़ित करता है और उसे सच्ची शिक्षा प्रदान करता है । जैसे कुम्हार के चोट मारने में घड़े का स्वरूप ठीक करना होता है न कि उस घड़े को फोड़ना , वैसे ही गुरु की ताड़ना शिष्य को हानि पहुँचाने की नहीं होती है । उसका भला करने का भाव गुरु के मन में रहता है । प्रताड़ना तो उसे सद्मार्ग पर लाने के लिए होती है ।

परीक्षोपयोगी अति उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1. 

महानता प्राप्त करने का प्रथम गुण क्या है और क्यों है ? 

उत्तर – 

चुनौती को वीरता के साथ स्वीकार करना ही महानता प्राप्त करने का प्रथम गुण है । इसका कारण यह है कि वीरता ही लक्ष्य का वरण करती है और महानता प्राप्त कराती है । 

प्रश्न 2. 

दीपक ने अपने अन्दर के कच्चेपन को कैसे दूर किया ? वह किसकी सत्संगति से मजबूत हो गया था ? 

उत्तर – 

दीपक ने रवि (सूर्य) के तेज ताप से तपाकर अपने अन्दर के कच्चेपन को दूर किया । वह सूर्य की सत्संगति में रहकर मजबूत हो गया था । 

प्रश्न 3. 

कौन महानता धारण करके जीवन की सार्थकता प्राप्त करते हैं ? 

उत्तर – 

संसार में जो काल की मार को सहते हैं , कुटकर , गलकर तथा तपकर संघर्षों की भट्टी में पकते हैं । वे ही अपने त्याग तथा तप बल पर महानता धारण करके अपने जीवन की सार्थकता प्राप्त करते हैं ।

दीपक की आत्मकथा पाठ का सारांश 

‘दीपक की आत्मकथा’ नामक इस पाठ में कुम्हार द्वारा दीपक निर्माण की प्रक्रिया का बखान करते हुए महान संदेश दिया गया है । जो काल की मार को सहते हैं , कुटते , गलते , तपते और संघर्षों की भट्टी में पकते हैं , वे ही अपने त्याग और तप के बल पर महानता धारण करते हैं । वे ही जीवन की सार्थकता को प्राप्त करते हैं । इस पाठ में यह शिक्षा प्रदान की गई है कि एक नन्हा – सा दीप स्वयं जलकर भी किस तरह दूसरों को प्रकाश देने में अपना जीवन अर्पित कर देता है । ठीक उसी प्रकार मनुष्य को भी जीवन के संघर्षों से घबराए बिना अपने आत्मबल को विकसित करके समाज और राष्ट्र के हित में अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देना चाहिए । जीवन का रस समर्पण , सेवा , त्याग में है , स्वार्थपूर्ति , आलस्य या पाने में नहीं । 

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