MP Board Class 10th Special Hindi सहायक वाचन Solutions Chapter 4 थके हुए कलाकार से

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MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions Chapter 4 थके हुए कलाकार से (कविता, धर्मवीर भारती)

थके हुए कलाकार से अभ्यास

 

प्रश्न 1. 

धर्मवीर भारती के अनुसार अधबनी धरा पर अभी क्या – क्या बनना शेष है ?

उत्तर – 

कलाकार को सम्बोधित इस कविता में अधबनी धरा के सृजन को पूरा करने का आंग्रह है । अभी नवीन कल्पना की कोमल चाँदनी नहीं खिल सकी है और जीवन रस की गंध से सुगन्धित चमत्कृत जीवन का प्रारम्भ भी नहीं हुआ है । अधबनी पृथ्वी पर अभी स्वर्ग की नींव भी नहीं रखी गई है । संसार को स्वर्ग बनाने का सतत् प्रयास करना आवश्यक है । ऐसी स्थिति में सृजक रुक गया तो संसार का सृजन भी थम जायेगा । अतः अधबनी धरा के सृजन के पूर्ण होने तक रुकने का नाम नहीं लेना है । “

प्रश्न 2. 

स्वर्ग की नींव का पता किस प्रकार लग सकता है ? 

उत्तर – 

स्वर्ग की कल्पना सभी प्रकार की सुख – समृद्धि से युक्त स्थान की है । जहाँ सभी प्रकार के आनन्द के विधान हो वहीं वह स्वर्ग कहलाता है । भारत में अभी विविध प्रकार की समस्याएँ हैं , यहाँ स्वर्ग के आनन्द की नींव का पता भी नहीं है अर्थात् यहाँ आनन्द के विधानों का प्रारम्भ भी नहीं हुआ है । जब सुख – सुविधाओं से युक्त जीवन की रचना होने लगेगी तब स्वर्ग की नींव रखे जाने का बोध हो जायेगा । इस प्रकार रचनात्मक सृजन के कार्यों के प्रारम्भ से ही स्वर्ग की नींव का पता लग सकता है ।

प्रश्न 3. 

कवि के अनुसार प्रलय से कलाकार को निराश क्यों नहीं होना चाहिए ? 

उत्तर – 

कवि धर्मवीर भारती कलाकार को सतत् सृजनशील रहने को प्रोत्साहित कर रहे हैं । वे कलाकार को समझाते हैं कि उसे प्रलय से भी निराश नहीं होना चाहिए । यद्यपि प्रलय में सब कुछ नष्ट – भ्रष्ट हो जाता है । प्रलय विनाश विकराल रूप है । सभी ओर हाहाकार मच जाता है । इसमें कितने प्राणी मारे जाते हैं किन्तु यह विनाश ही सृजन का प्रारम्भ करता है । कवि कहते हैं कि प्रलय के ध्वंश के बीच ही मूच्छित – सी जिन्दगी पड़ी हो सकती है । आवश्यकता उस मूछित जिन्दगी को खोजकर उसे रचनात्मकता की ओर ले जाने की है । कवि मानते हैं कि निराश न होकर ध्वंश में से ही सृजन का विधान करना चाहिए ।

प्रश्न 4. 

थके हुए कलाकार से ‘ कविता का केन्द्रीय भाव स्पष्ट कीजिए । 

उत्तर – 

‘ थके हुए कलाकर से ‘ धर्मवीर भारती की आशावादी कविता है । इसमें पृथ्वी के अधूरे सृजन को पूर्ण करने की प्रेरणा दी गई है । अभी सृजन का भली प्रकार प्रारम्भ भी नहीं हुआ है । सुख – समृद्धि की नींव भी नहीं पड़ पायी है । इस प्रकार की स्थिति में कलाकार की दूरदृष्टि , आशावादी भावना का सुप्त हो जाना संसार के सृजन का रुकना है । अधूरे सृजन से निराश न होकर उसे पूरा करने की ललक होनी चाहिए । प्रलय से भी कलाकार में निराशा नहीं जागृत होनी चाहिए , क्योंकि प्रलय के मध्य ही सृजन के सूत्र मिल सकते हैं । विध्वंश के मध्य ही नवीन जिन्दगी पड़ी मिल सकती है । इसलिए कलाकार को अपनी सृजन की थकान भूलकर ऊर्जा के साथ सृजन में लग जाना चाहिए । 

प्रश्न 5. 

कवि ने अधूरे सृजन से निराश न होने की बात कहकर क्या संकेत देना चाहा है ? 

उत्तर – 

धर्मवीर भारती रचनात्मकता के समर्थक ऊर्जावान कवि हैं । वे दोषों को , अधूरेपन को निराशा का कारण मानने को तैयार नहीं हैं । वे कहते हैं अधूरे सृजन से निराश होने की भला क्या आवश्यकता है । जब पूर्ण कुछ है ही नहीं तो अधूरापन होगा ही । उस अधूरेपन को सृजन के द्वारा आगे बढ़ाना है । कवि संकेत देना चाहते हैं कि पूर्णता की बात मात्र कल्पना है और अगर पूर्णता हो सकती है तो केवल सृजन के द्वारा ही । अतः कलाकार को थकान भूलकर पूरी ऊर्जा के साथ सृजन में लग जाना है । 

परीक्षोपयोगी अति लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1. 

सृजन की थकान भूलने के लिए किससे कहा गया है , और क्यों ? 

उत्तर – 

सृजन करने में कलाकार को जो थकान होती है उसे भूल जाने के लिए कहा गया है । कवि का परामर्श है कि मंगलकारी विधान के लिए थकान भूलकर सृजन में लगना आवश्यक है

प्रश्न 2. 

क्या कविता ‘ थके हुए कलाकार से ‘ निराशावादी सन्देश देती है ? 

उत्तर- 

थके हुए कलाकार से ‘ कविता के अन्त में कहा गया है कि विध्वंश के अन्दर मूर्छित पड़ी नवीन जिन्दगी मिल सकती है । इसलिए निराश होने की आवश्यकता नहीं है । इस तरह यह कविता निराशावादी नहीं , आशावादी सन्देश देती है ।

थके हुए कलाकार से पाठ सारांश

थके हुए कलाकार से निवेदन करते हुए कवि ने परामर्श दिया है कि मंगलकारी विधान के लिए थकान भूलकर सृजन में लग जाना आवश्यक है । अभी जीवन का सुखद प्रारम्भ भी नहीं हुआ है । पृथ्वी पर सृजन की अभी बहुत आवश्यकता है । ऐसी स्थिति में यदि कलाकार रुक जाता है तो निश्चय ही सृजन भी रुक जायेगा । आज के भ्रमित वातावरण में भविष्य का सतरंगा स्वप्न भी सुप्त प्रतीत हो रहा है । ऐसी स्थिति में थकान से निराश होकर बैठे रहना ठीक नहीं है क्योंकि सम्भव है इस विध्वंश के मध्य ही नवीन जीवन का विधान पड़ा हो । अतः थकान भूलकर सृजन में लग जाना चाहिए । अथक परिश्रम के द्वारा ही धरा का सृजन पूरा होगा । 

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