MP Board Class 10th Special Hindi Sahayak Vachan Solutions Chapter 6 निंदा रस

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MP Board Class 10th Hindi Navneet Solutions Chapter 6 निंदा रस (व्यंग्य निबन्ध, हरिशंकर परसाई)

निंदा रस अभ्यास

 

प्रश्न 1. 

लेखक ने निंदकों को पास में रखने की सलाह क्यों दी है ?

उत्तर – 

निंदा की बड़ी महिमा है । एक स्थान पर बैठे निंदक निंदा में लीन हों तो उनकी तल्लीनता ईश्वर के भक्तों से भी अधिक गहरी होती है । इसलिए सन्तों ने निन्दकों को आँगन में कुटिया बनवाकर अपने पास रखने की सलाह दी है । यदि निंदक पास रहेंगे तो बिना साबुन तथा बिना पानी के ही स्वभाव निर्मल हो जायेगा । निंदक सभी विकारों को दूर कर देंगे । आशय यह है कि निंदक पास रहेगा तो व्यक्ति बुराइयों , अवगुणों से दूर रहने का प्रयास करेगा । उसे अपनी निंदा का भय सताता रहेगा । इस तरह उसमें सद्गुणों का विकास होगा । उसका स्वभाव पवित्र हो जायेगा । 

प्रश्न 2. 

अपने निंदकों को उचित उत्तर देने का लेखक ने क्या उपाय सुझाया है ? 

उत्तर – 

‘निंदारस में निंदकों के विभिन्न प्रकार बताये हैं । कुछ’ मिशनरी निंदक होते हैं कुछ संघ बनाकर निंदा का धंधा चलाते हैं । ऐसे ही एक संघ के अध्यक्ष ने लेखक से कहा , ” आजकल लोग तुम्हारे बारे में बहुत भला – बुरा कहते हैं । ” लेखक ने उनसे कहा कि ‘ आपके बारे में मुझसे कोई बुराई नहीं करता । ‘ लोग जानते हैं कि आपके कानों के घूरे में इस तरह का कचरा मजे से डाला जा सकता है । यह उत्तर सुनकर वह चुप हो गया । लेखक ने प्रकारान्तर से यहाँ बताया है कि निंदा करने वाले को करारा जवाब दिया जाय तो वह फिर निंदा करने का साहस नहीं कर सकता है । लेखक ने निंदा करने वाले की निंदा भी कर दी तथा अपने विषय में उसका भ्रम भी दूर कर दिया । लेखक ने निंदकों को उचित उत्तर देने का यही उपाय बताया है । 

प्रश्न 3. 

निंदा की प्रवृत्ति से बचने के लिए क्या करना चाहिए ? 

उत्तर – 

निंदा की उत्पत्ति कमजोरी से होती है । अपनी हीनता को दबाने के लिए व्यक्ति दूसरों की निंदा करता है । यह कार्य निठल्ले व्यक्ति ही करते हैं । जैसे – जैसे कर्म की प्रवृत्ति कम होती जायेगी वैसे – वैसे ही निंदा का स्वभाव बढ़ता जायेगा । कर्मठता ही इस प्रवृत्ति से छुटकारा दिला सकती है । व्यक्ति कठिन कार्य के द्वारा ही ईर्ष्या – द्वेष और उससे उत्पन्न होने वाली निंदा से बच सकता है । जब कर्म के द्वारा क्षमता का विकास किया जायेगा , अन्यान्य उपलब्धियाँ अर्जित कर ली जायेंगी तो हीनता अपने आप समाप्त हो जायेगी । हीनता के समाप्त होते ही निंदा से छुटकारा मिल जायेगा ।

प्रश्न 4.

‘छल का धृतराष्ट्र जब आलिंगन करे तो पुतला ही आगे बढ़ाना चाहिए । ‘ कथन का आशय स्पष्ट कीजिए । 

उत्तर – 

‘छल का धृतराष्ट्र जब आलिंगन करे तो पुतला ही आगे बढ़ाना चाहिए’ कथन महाभारत के सन्दर्भ की ओर संकेत करता है । अंधे धृतराष्ट्र ने भीम को स्नेह के साथ गले लगाने को बुलाया था , पर भीम जानता था कि बाहर से धृतराष्ट्र भले ही स्नेह दिखा रहा है , इसके भीतर भीम के प्रति क्षोभ का भाव भरा है । अत : उन्होंने धृतराष्ट्र के बुलाने पर स्वयं न जाकर अपना पुतला खड़ा कर दिया । धृतराष्ट्र ने आक्रोश से भरकर उस पुतले को अपनी भुजाओं से जकड़ा तो वह चूर – चूर हो गया । यदि भीम स्वयं होते तो वे भी चूर – चूर हो जाते । वे समझते थे कि धृतराष्ट्र छल कर रहे हैं । इसलिए आशय यह है कि व्यक्ति की वास्तविकता जानकर अवसर के अनुरूप सुरक्षित रहने का व्यवहार करना चाहिए । लोहा लोहे को काटता है । दूसरे के छल से छल द्वारा ही बचा जा सकता है । 

प्रश्न 5. 

” कुछ लोग बड़े निर्दोष मिथ्यावादी होते हैं । ” कथन की विवेचना कीजिए ।

उत्तर – 

हरिशंकर परसाई ने ‘ निंदा रस ‘ में निंदकों के विभिन्न प्रकार बताए हैं । उनमें से एक प्रकार यह है कि कुछ लोग निर्दोष मिथ्यावादी होते हैं । उनके मन में किसी के प्रति बुरा भाव नहीं होता है । वे किसी का बुरा भी नहीं चाहते हैं । फिर भी वे दिन – रात बड़ी निष्ठा से निंदा करने में लीन रहते हैं । उनकी निष्पक्षता और लिप्त न होने का भाव इसी से स्पष्ट होता है कि प्रसंग आने पर वे अपने पिता की निंदा भी पूरे आनन्द के साथ करते हैं । वस्तुतः निंदा इनके लिए टॉनिक होती है । इससे उन्हें ऊर्जा मिलती है । यदि वे निंदा में लीन न रहें तो उनके जीवन से सरसता व आनन्द ही उठ जायेगा । यही कारण है कि वे निरपेक्ष भाव से निंदा करने में संलग्न रहते हैं । 

प्रश्न 6. 

इस पाठ से आपने क्या शिक्षा ग्रहण की और क्या निश्चय किया ? स्पष्ट कीजिए । 

उत्तर – 

‘ निंदा रस ‘ पाठ से हमें शिक्षा मिलती है कि निंदा करना कर्महीन , निठल्लों का काम है । इससे व्यक्ति या समाज का किसी प्रकार का कोई हित नहीं होता है । इसलिए हमने निश्चय किया है कि हम इससे दूर रहेंगे । कर्मठ बनकर स्वयं को सामर्थ्यवान बनायेंगे । क्षमता के द्वारा उपलब्धियाँ अर्जित कर अन्य निंदकों का भी मुँह बंद कर देंगे । निंदा करना स्वयं की हीनता का प्रदर्शन करना है , यह ज्ञात होते ही निंदा के प्रति हम बहुत सजग हो गये हैं । हमें किसी की निंदा करना या किसी की निंदा सुनना पसन्द नहीं है । हमने निश्चयपूर्वक निंदा से स्वयं को पूरी तरह दूर कर लिया है । 

परीक्षोपयोगी अति लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1. 

निन्दा रस ‘ व्यंग्य के आधार पर निन्दा की महिमा बताइए । 

उत्तर – 

निन्दा की अपार महिमा है । निन्दा में लीन होने वाले निन्दकों की तल्लीनता ईश्वर भक्तों से भी अधिक होती है । इसीलिए कहा गया है कि ‘ निन्दक नियरे रखिए आंगन कुटी छबाइ । ‘

प्रश्न 2. 

निन्दा की प्रवृत्ति से बचने के क्या उपाय हो सकते हैं ? 

उत्तर – 

निठल्ले व्यक्ति निन्दा आदि में समय नष्ट करते हैं । कठिन कर्म लीन रहकर ही ईर्ष्या – द्वेष से बचा जा सकता है । कर्म के द्वारा उपलब्धि अर्जित करके हम सामर्थ्यवान बन सकते हैं । इससे हमारी हीनता स्वत : ही समाप्त हो जायेगी और हम निन्दा से मुक्ति पा जायेंगे । 

प्रश्न 3. 

निन्दा की उत्पत्ति का क्या कारण है ? 

उतर –

निन्दा की उत्पत्ति का कारण हीनता का भाव है । जब हम किसी को स्वयं से अधिक अनुभव करते हैं तो हमारी कमजोरी हमें स्वयं श्रेष्ठ दिखाने के लिए लालायित करती है । अतः हम अपनी श्रेष्ठता स्थापित करते हेतु दूसरों की निन्दा करने लग जाते हैं

निंदा रस पाठ का सारांश 

हरिशंकर परसाई द्वारा लिखित इस निबन्ध में निंदा रस की व्यंग्यात्मक विवेचना हुई है । अपने से जुड़ी निंदा रस की एक घटना का उल्लेख करते हुए लेखक कहता है – ‘ छल का धृतराष्ट्र जब आलिंगन करे , तो पुतला ही आगे बढ़ाना चाहिए । ‘ निंदा की महिमा का बखान करते हुए लेखक निंदकों के प्रकार एवं उनकी विशेषताओं को सामने लाता है । उसने निंदा की उत्पत्ति के कारण पर प्रकाश डालते हुए यह भी बताया है कि निंदा की समाप्ति कैसे हो सकती है । लेखक निंदा रस को काले सागर के समान मानते हुए भी निंदा को एक आनन्ददायक पूँजी सिद्ध करता है । वह अन्त में कहता है कि निन्दा की सरसता को ने ‘ निंदा सबद रसाल ‘ कहा है । 

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